ईद-उल-अजहा

Amit Srivastav

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ईद-उल-अजहा

ईद-उल-अजहा – एक सकारात्मक पहलू 

हमारे महापुरुषों और बुजुर्गों ने हमें ऐसी परम्पराओं व त्यौहारों से जोड़ दिया है जिनके माध्यम से हम सामाजिक समरसता व कौमी एकता के साथ साथ ईश्वरीय मार्ग पर चल सकते हैं। हमारा देश फूलों के गुलदस्तें जैसा है जिसमें विभिन्न प्रकार के फूल विभिन्न प्रकार की खूशबू देते हैं। हमारे त्यौहार हमें इन्सानियत की राह पर चलकर ईश्वरीय सत्ता के इशारे पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
 

ईद और होली भाइचारे का त्योहार 

 
हिन्दुओं में अगर होली के बहाने सैकड़ों साल पुरानी दुशमनी को भुलाकर दुश्मन को जिगरी दोस्त बनाया जा सकता है तो ईद के बाद ईद-उल-अजहा के बहाने भी दुश्मन को गले लगाकर नये युग की शुरूआत की जा सकती है। ईद का पर्व ईश्वर की इबादत और खुशियों का पर्व होता है। वैसे ही ईद-उल-अजहा भी होता है। अल्लाह खुदा ईश्वर रमज़ान के पवित्र महीने में अपनी रहमते बाँटता है। जो उसके बताये वसूलों पर चलता है वह रमजान के महीने में रहमतों से मालामाल हो जाता है।

ईद-उल-अजहा

होली या ईद या ईद-उल-अजहा त्यौहार हमें इन्सानियत व ईश्वरीय सत्ता के निकट पहुँचाने में अहम भूमिका अदा करते हैं। रमजान के महीने में कोई गुनाह नहीं किया जाता है बल्कि भूखे रहकर पूर्व में किये गये गुनाहों की माफी माँगी जाती है। ईद का पर्व हमें इन्सानियत की याद दिलाता है और खुद नहीं पूरे समाज के साथ खुशी मनाने की प्रेरणा देता है। अगर पड़ोसी गरीबी के चलते ईद नहीं मना पा रहा है तो तुम्हारा ईद मनाना बेकार है। इसी लिए ईद में खैरात बाँटने का रिवाज होता है। खैरात शुद्ध मन और शुद्ध धन से दी जाती है तो ऊपर वाला तुम्हारी खुशियों में शामिल होकर अपनी रहमतों से मालामाल कर देता है।

आज हम अपने सभी पाठकों को ईद-उल-अजहा की हार्दिक शुभकामनाएँ मुबारकवाद देते हैं और विश्व शांति की ईश्वर से कामना करते हैं। होली और ईद व ईद-उल-अजहा त्यौहार हमें मिठास भरी नयी इबारत लिखने का सुलभ अवसर प्रदान करते हैं क्योंकि इन त्यौहारों पर कोई किसी को गले मिलने से रोक नहीं सकता है। यह मिठास भरे प्रेम मिलाप का त्यौहार है जो पूरे वातावरण में मिठास भरकर मन को उमंगित कर देता है। रमजान का महीना नये कपड़े पहनने के लिये सेवई खाने के लिये नहीं होता है बल्कि रमजान का महीना इन्सान बनने और इन्सानियत करने के लिये आता है।

रोजेदारों के लिये रमज़ान पर्व ईद और उसके बाद आया यह ईद-उल-अजहा विशेष महत्व रखता है किन्तु रोजा ईश्वरीय व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए। रोजा या व्रत रखने का मतलब संकल्प लेना होता है और रमजान में तो एक महीने तक अन्न जल त्याग कर ईश्वरीय सत्ता के निकट रहने का अवसर प्राप्त होता है। जो सारी बुराइयों से विरक्त और सांसारिक भोग विलास से दूर होकर रमजान में ईश्वर यानी अल्लाह की इबादत करता गरीबों की सेवा मदद करता है और उसके बताये मार्ग पर चलता है उसका जीवन धन्य हो जाता है।

ईद-उल-अजहा पर्व पर कुर्बानी का चलन पूर्वजों की दी हुई परम्परा है जो अपनी अपनी सामर्थ के अनुसार निभाई जाती है। ऊपर HOME पर क्लिक कर अन्य कंटेंट को भी पढ़िए। 

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