प्रदूषण पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले प्रोफेसर साहब जब पांच सितारा होटल में पर्यावरण बचाने का ज्ञान बाँटते हैं, लेकिन खुद वातानुकूलित एसयूवी और प्लास्टिक की बोतलों से परहेज नहीं करते, तो यह व्यंग्य जन्म लेता है। पढ़ें एक चुभता हुआ लेकिन मज़ेदार लेख, जो बताता है कि असली पर्यावरण रक्षक कौन है – भाषण देने वाले या कूड़ा बीनने वाला?
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महा-व्यंग्यात्मक लेख ✍️अभिषेक कांत पांडेय

प्रोफेसर साहब का कद दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। आखिरकार, अब वे छोटे-मोटे मंचों पर ज्ञान नहीं बाँटते थे। वे अब सरकारी पर्यावरण कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि बन चुके थे। यही कारण था कि आज उन्हें राजधानी के एक प्रसिद्ध पाँच सितारा होटल में पर्यावरण और प्रदूषण पर भाषण देने के लिए बुलाया गया था।
सुबह-सुबह उन्होंने तैयार होकर आईने में खुद को निहारा। सफ़ेद कुर्ता, झकाझक जैकेट, और माथे पर ज्ञान से दमकती लकीरें। आज उन्हें दुनिया को यह बताना था कि प्रदूषण के लिए कौन जिम्मेदार है और इसका समाधान क्या हो सकता है। पर समाधान देना उनके कार्यक्षेत्र में नहीं आता था, वे केवल समस्या बताने में निपुण थे।
ट्रैफिक जाम और जनता की बेवकूफी
होटल जाने के लिए उन्होंने अपनी पुरानी गाड़ी निकालने का कष्ट नहीं किया। ग़रीब लोग भले ही पुरानी गाड़ियों से संतोष करें, लेकिन पर्यावरणविदों को तो नवीनतम तकनीकों से लैस बड़े-बड़े वाहनों की आवश्यकता होती है। उन्होंने एक शानदार वातानुकूलित एसयूवी बुक की और उसमें विराजमान हो गए।
जैसे ही वे घर से निकले, उन्हें शहर के असली हालात का सामना करना पड़ा। चारों ओर ट्रैफिक जाम था। गाड़ियाँ धुआँ उगल रही थीं, लोग हॉर्न पर हाथ जमाए हुए थे, और सड़कों पर धूल-धक्कड़ उड़ रही थी। प्रोफेसर साहब का धैर्य जवाब देने लगा।
“इस देश के लोग सुधरने का नाम ही नहीं लेते!” उन्होंने ड्राइवर से कहा। “इतनी गाड़ियाँ! कोई पैदल क्यों नहीं चलता? या सार्वजनिक परिवहन का उपयोग क्यों नहीं करता?”
ड्राइवर ने उनकी बात ध्यान से सुनी और मुस्कराया। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन एक विद्वान व्यक्ति के सामने अपनी मूर्खता प्रदर्शित करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
खैर, एक घंटे की मशक्कत के बाद वे होटल पहुँचे। दरवाजे पर स्वागत के लिए आयोजक खड़े थे। ठंडी हवा से ठिठुरते हुए उन्होंने बड़ी मुश्किल से हाथ जोड़कर प्रोफेसर साहब का अभिवादन किया।
पाँच सितारा होटल में पर्यावरण संरक्षण
होटल में कदम रखते ही प्रोफेसर साहब की आत्मा प्रसन्न हो उठी। बाहर भले ही सूरज आग उगल रहा हो, लेकिन अंदर का माहौल सुखद था। वातानुकूलित हॉल, ग्रीन डेकोरेशन, जैविक फल-सब्ज़ियों से सजी मेज़ें और मिनरल वाटर की बोतलें—सबकुछ पर्यावरण संरक्षण की सजीव मिसाल थे।
कार्यक्रम शुरू हुआ। एक वरिष्ठ अधिकारी ने भाषण दिया, जिसमें बताया गया कि सरकार पर्यावरण के लिए कितनी गंभीर है। हर साल अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वृक्षारोपण हो रहा है, जागरूकता फैलाई जा रही है। इसके बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है।
अब प्रोफेसर साहब की बारी थी। उन्होंने माइक सँभाला और जोरदार अंदाज में बोलना शुरू किया—
“मित्रों, पर्यावरण की जो दुर्दशा हो रही है, उसके लिए जनता स्वयं ज़िम्मेदार है। लोग सड़क पर कचरा फेंकते हैं, अंधाधुंध वाहन चलाते हैं, प्लास्टिक का प्रयोग करते हैं, और जल की बर्बादी करते हैं। यह चिंता का विषय है!”
उन्होंने अपने ज्ञान का सागर बहाते हुए बताया कि लोग कैसे अपने स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं। उन्हें खुद की सुविधा चाहिए, लेकिन पर्यावरण की कोई चिंता नहीं। फिर उन्होंने समाधान भी बताया—”हमें साइकिल चलानी चाहिए, पैदल चलना चाहिए, और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना चाहिए।”
यह सुनते ही श्रोताओं ने तालियाँ बजाईं। कोई यह नहीं पूछ पाया कि प्रोफेसर साहब खुद साइकिल से क्यों नहीं आए।
चाय-समोसे के साथ पर्यावरण संरक्षण
भाषण समाप्त होते ही चाय-समोसे की महक पूरे हॉल में फैल गई। हर कोई वातानुकूलित कमरे में बैठकर गर्म चाय की चुस्कियाँ लेने लगा। बातचीत का दौर शुरू हुआ।
“बहुत शानदार भाषण दिया आपने, सर!” एक अधिकारी ने कहा।
“धन्यवाद, लेकिन असली समस्या जनता की अज्ञानता है,” प्रोफेसर साहब ने गंभीरता से कहा।
तभी एक वेटर ने ट्रे में मिनरल वाटर की बोतलें रखीं और मेज पर रख दीं। प्लास्टिक की बोतलों को देखकर प्रोफेसर साहब थोड़े असहज हुए, लेकिन पर्यावरण-प्रेमी होने का यह मतलब तो नहीं कि वे नारियल के खोल से पानी पिएँ!
घर वापसी और फिर वही धुआँधार ज्ञान
कार्यक्रम समाप्त हुआ। प्रोफेसर साहब अपनी एसयूवी में बैठे और वापस घर के लिए रवाना हुए। बाहर सड़क पर वही ट्रैफिक, वही धुआँ, वही कोलाहल था। लेकिन अब उनकी चिंता समाप्त हो चुकी थी। उन्होंने अपनी गाड़ी की खिड़कियाँ बंद कीं, एसी की ठंडी हवा का आनंद लिया और आँखें मूँद लीं।
उन्होंने अपने कर्तव्य का पूरी तरह पालन कर लिया था। जनता को जागरूक करना उनका कार्य था, लेकिन स्वयं जागरूक होना उनके कार्यक्षेत्र में नहीं आता था।
बाहर सड़क किनारे एक बच्चा नंगे पैर दौड़ते हुए प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा कर रहा था। शायद उसे पता नहीं था कि वह पर्यावरण का सबसे बड़ा रक्षक है। लेकिन उसका क्या? ज्ञान तो सिर्फ बड़े-बड़े हॉलों में बैठकर ही बाँटा जाता है!

ज्ञान का बोझ और वास्तविक नायक
प्रोफेसर साहब की गाड़ी धुएँ और शोर के बीच आगे बढ़ रही थी, लेकिन उनके मन में कोई हलचल नहीं थी। आखिरकार, उन्होंने अपना काम कर दिया था—जनता को उनकी मूर्खता का एहसास करा दिया था। वातानुकूलित सभागार में बैठकर, ऑर्गेनिक समोसे खाते हुए, और मिनरल वाटर की चुस्कियाँ लेते हुए पर्यावरण पर चर्चा कर लेना ही तो असली जागरूकता थी!
बाहर वही नन्हा बच्चा, नंगे पैर, सड़क किनारे प्लास्टिक की बोतलें बीन रहा था। उसे किसी सरकारी योजना की जानकारी नहीं थी, न ही किसी पर्यावरण सम्मेलन में आमंत्रण मिला था। वह बस अपने रोज़मर्रा के संघर्ष में बिना भाषण दिए, बिना तालियों के, धरती को स्वच्छ बना रहा था। Click on the link गूगल ब्लाग पर अपनी पसंदीदा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
काश! कोई प्रोफेसर साहब को भी जागरूक कर पाता कि पर्यावरण बचाने के लिए सिर्फ़ ज्ञान बाँटना ही काफी नहीं, बल्कि खुद भी उस पर अमल करना पड़ता है। लेकिन नहीं—ज्ञान का बोझ उठाना आसान है, पर जिम्मेदारी का बोझ? वह तो किसी और के लिए छोड़ देना ही बेहतर होता है!

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