puppet media आज की भारतीय मीडिया अपनी स्वतंत्रता खोती जा रही है और एजेंडा आधारित पत्रकारिता का शिकार बन रही है। सत्ता, पूंजीपति और सामंतवादी ताकतों के प्रभाव में आई मीडिया आम जनता के मुद्दों को दरकिनार कर रही है। इस लेख में जानिए कि कैसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी प्रासंगिकता खो रहा है और क्या यह अब केवल एक कठपुतली बनकर रह गया है?
मीडिया की खबरें लगातार एजेंडे की चपेट में आती चली जा रही हैं। एजेंडा यानी फायदे वाली उद्देश्य को लेकर की जाने वाली पत्रकारिता, जिसमें किसी को लाभ पहुंचाया जाता है या उसका महिमामंडन किया जाता है। ’पीतपत्रकारिता’ की परिभाषा तो इसके आगे ‘पीठ’ दिखाती हुई नजर आती है।. Puppet media meaning कठपुतली मीडिया। भारतीय मीडिया कठपुतली: की डोर किसके पास? जानिए इस सकारात्मक लेखनी में।
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कठपुतली मीडिया puppet media

मीडिया खबरों को छुपा ले और महिमा मंडन करना शुरू कर दे तो निश्चित ही मीडिया की चलने वाली यह रेलगाड़ी जनता के लिए दुर्घटना वाली साबित होता है। कठपुतली मीडिया की डोर किनके हाथों में है। सत्ता के हाथों में? पूंजीपतियों के हाथों में? सामंतवादियों के हाथों में? नौकरशाहियों के हाथों में? दरअसल इन सभी हाथों से गुजरती हुई मीडिया अब आपकी नहीं रही!
मतलब साफ है कि जनता से छुपाया जाएगा। दरअसल जनता से हर खबरें छिपायी जाएगी जिससे सत्तापक्ष की नाकामयाबी नजर आती है। इन सब की वजह से कितना नुकसान हो रहा है इसका अंदाजा तो जब कई तरह की रिपोर्ट आना शुरू हुई तो इससे लगना शुरू हुआ। बहरहाल इसे सब रिपोर्टों को भी झूठा ठहराया जा रहा है।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहना नाम मात्र का रह गया है। विचारधारा के खेल में मीडिया का इस्तेमाल करने वाले सिस्टम अब आम जनता की बातों और जज्बातों को अपने अखबार और माध्यमों में जगह नहीं देते हैं।
एकमात्र स्थान अब सोशलमीडिया प्लेटफॉर्म ही रह जाता है। आप में से बहुत से लोग बहुत जागरुक हैं और सोशल मीडिया पर लगातार इन मुद्दों को उठाते रहे हैं कि आखिरकार मीडिया में आपके मुद्दे ‘कहाॅं गायब?’ हो गए हैं!
आश्चर्य तब होता है, जब हम लोग इन तरह की तमाम खबरें, जो एजेंडा प्रायोजित होती हैं; उन्हें पढ़ते हैं और देखते हैं तो भी उनके ख़िलाफ़ एक बात भी नहीं रख पाते हैं।
दरअसल अब अधिकांश लोग के मन में एक ‘डर’ पैदा किया जा रहा है, यह डर निसंदेह बड़ी ताकतों के जरिए हो रहा है। कुछ महीनों में आपने देखा है कि ख़बरों को किस तरह से ‘मुख्यधारा की मीडिया’ एजेंडा की तरह परोसती है और अब शासन और सरकार की सीधी जिम्मेदारी मीडिया तय नहीं करती है। बल्कि आम जनता को ज़िम्मेदार दिखाकर मीडिया यह साबित करना चाहती है कि सरकार का इसमें कोई ‘दोष’ नहीं है। दरअसल आप लोकतांत्रिक समाज में रह रहे हैं। यहाॅं मीडिया का जो स्थान आज से पहले रहा है, वह स्थान अब ख़त्म हो चुका है।
प्रायोजित विचारधारा और एजेंडा परोसने वाली मीडिया अब आपके ‘हितों के सवाल’ को अपने ‘कंटेंट’ से गायब कर रही है।
आम इंसान आज चाहे जितना भी सक्रिय हो लेकिन मीडिया के माध्यम से उसे जो खबरें मिल रही हैं, वह बिलकुल एजेंडा वाली है। विदेश की खबरों को जिस तरीके से मुख्यधारा की मीडिया में ‘बनावटी’ दिखाया जाता है और ‘छुपाया’ जाता है, वह कदापि ख़बर नहीं है।
मैं समझता हूं कि मेरे साथ जुड़े फेसबुक में हर कोई व्यक्ति इन बातों से परिचित हैं जिनका जिक्र मैंने पोस्ट के माध्यम से किया है। आज का मनुष्य शोषण की आवाज भले ही ना उठा पाए लेकिन वह समझ चुका है कि एजेंडा और प्रायोजित मीडिया सच्ची मीडिया नहीं हो सकती है। निश्चित तौर पर हम एक ऐसे समाज (लोकतंत्र) में हैं, जहाॅं पर सरकार तो हम चुन लेंगे लेकिन सरकार से हम काम नहीं करवा पाऍंगे; दरअसल मीडिया के माध्यम से ही तो सरकार अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिए विपक्ष और जनता को दोष देती है।
राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार अमूमन किसी भी पार्टी की सरकार हो; लगभग इसी पैटर्न पर अब सब कुछ चल रहा है क्योंकि मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यही नहीं दोस्त! पत्रकार और लेखक, यहाॅं तक शिक्षक और दूसरे पेशे से जुड़े बुद्धिजीवों भी एक पक्षीय बात बोलते हुए नजर आते हैं। वे बिलकुल अच्छी तरीके जानते हैं कि वह भी इस खेल का हिस्सा बन चुके हैं। जिसमें लोकतंत्र की बुनियाद को समाप्त करने की बड़ी कोशिश हो रही है।
इतिहास हमेशा स्वयं को दोहराता रहा है। ‘पूॅंजीवादी शक्तियों’ और ‘सामंतवादी सोच’ हमेशा लोकतंत्र के विरोध में खड़ा रहा है। यही सोच लगातार, मीडिया माध्यमों और आईटी सेल द्वारा लगातार सोशल मीडिया में भरा जा रहा है। 18 साल से लेकर 50 साल तक का अधेड़ भी इसका शिकार हो रहे हैं। वह भी सोशल मीडिया पर आईटी सेल का हिस्सा बन रहा है।

चालाक बुद्धिजीवी हमेशा अपना फायदा ही सोचता है, जहां पलड़ा भारी होता है, उस ओर वह झुकता चला जाता है। इतिहास के पन्नों में झाॅंके तो सामंती और पूंजीवादी ताकतों के अलावा अब चालाक बुद्धिजीवि वर्ग अपने वर्चस्व को बचाए रखने के लिए कई तरह के खेल-खेल रहा है, इन्हें पहचानने की ज़रूरत है-दोस्तो!
खामोश रहा वक्त अगर, फितरत भी हमारी बदल जाएगी
सावधान रहिए! ऐसे लोग से जो अपने बुद्धि का प्रयोग करके लेख, किताबों और अलग-अलग मीडिया माध्यम से आपको प्रभावित करते हैं। केवल इसलिए विश्वास न कर लीजिए कि आखिरकार वह प्रकाशित (छपता) है। (ध्यान रहें! आजकल वही सबसे ज़्यादा हर जगह छपता है जो सत्ता के मन का लिखता है।) बल्कि समझिए कि वह कठपुतली भी हो सकता है। एक ऐसा ‘कठपुतली’ जिसकी डोर किसी एक पूॅंजीपति या किसी सामंतवादी के हाथों में होती है; और जैसे ही उसे नचाएगा, वैसे ही वह नाच दिखाएगा। अब न कहना है कि हमने बताया न था; पर आज जो तारीख थी समझने की थी।
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सर्वाधिकार सुरक्षित – लेखक अभिषेक कांत पांडेय

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