गोदीमीडिया : पत्रकारिता की ‘शयनकालीन’ क्रांति!

Amit Srivastav

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गोदीमीडिया: जब निष्पक्ष पत्रकारिता सत्ता की गोद में बैठ गई! जानिए कैसे भारतीय मीडिया ने सवाल पूछना छोड़कर सरकार की भक्ति को ही देशभक्ति बना दिया। पढ़ें पूरी समीक्षा। खट्टी-मीठी चटपटी बातें –

गोदीमीडिया: पत्रकारिता की ‘शयनकालीन’ क्रांति!
जब मीडिया सवाल छोड़कर आरती उतारने लगा!
भारतीय पत्रकारिता का उद्देश्य जनता को सच दिखाना था, लेकिन आज यह सत्ता की भक्ति में लीन हो गई है। पहले न्यूज़ एंकर सरकार से तीखे सवाल पूछते थे, अब वे प्रधानमंत्री की मेहनत के स्रोत जानने में रुचि रखते हैं।

टीआरपी गई तेल लेने, अब सरकारी विज्ञापनों से जलता है चूल्हा – मीडिया हाउस अब दर्शकों की पसंद से नहीं, बल्कि सरकारी विज्ञापनों से चलते हैं। जब सत्ता ही सबसे बड़ा प्रायोजक बन जाए, तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जाए?

‘येलो जर्नलिज़्म’ से ‘भगवा जर्नलिज़्म’ तक का सफर।
पहले सनसनीखेज़ खबरें बिकती थीं, अब सत्ता-समर्थक खबरें बिकती हैं। पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में ‘येलो जर्नलिज़्म’ तो पढ़ाया जाता है, लेकिन ‘गोदीमीडिया’ पर चर्चा नहीं होती।

भविष्य में ‘गोदीमीडिया’ एक शोध विषय होगा?
2040 में विद्यार्थी पूछेंगे— “2014-2025 में पत्रकारिता सत्ता की गोद में क्यों बैठ गई थी?” और तब भी जवाब गोल-मोल ही मिलेगा!

गोदी मीडिया क्या है? गोदी मीडिया और वर्तमान सत्ता, गोदी मीडिया की संपूर्ण गाथा इस लेख में

click on the link गोदी मीडिया क्या है गोदी मीडिया और सरकार। जानिए कहां किस परिक्षा मे पूछा गया सवाल गोदी मीडिया के बारे में आप क्या जानते हो?

क्या ‘गोदीमीडिया’ शब्द हिंदी शब्दकोश में आएगा?

अगर यह जुड़ा, तो शायद इसकी परिभाषा होगी – “वह पत्रकारिता जो सत्ता के हर निर्णय को महान साबित करे और जनता को ‘देशभक्ति’ की घुट्टी पिलाए।”
तो क्या अब निष्पक्ष पत्रकारिता का समय समाप्त हो गया? या फिर कोई नया विद्यार्थी हिम्मत दिखाएगा और पूछेगा – “सर, मीडिया की निष्पक्षता कहाँ गायब हो गई?”

“पूछता है विद्यार्थी!” लेकिन जवाब आता है – ‘यह प्रश्न परीक्षा में नहीं आएगा’

पत्रकारिता के विद्यार्थी ने हिम्मत जुटाकर सवाल पूछ लिया –
“सर, मीडिया की निष्पक्षता कहाँ गायब हो गई?”
प्रोफेसर साहब पहले मुस्कुराए, फिर सिर खुजलाया, और अंत में गंभीर होते हुए बोले –
“पत्रकारिता का कार्य समाज को दिशा देना है…”
विद्यार्थी ने फिर टोका – “सर, अब मीडिया दिशा दे रही है या दिशा-भ्रमित कर रही है?”
प्रोफेसर की आँखों में हल्की नमी दिखी… शायद इस सवाल के जवाब में उनका प्रमोशन अटका हो!

गोदी मीडिया क्या है

जब मीडिया की रिपोर्टिंग ‘संध्या वंदन’ बन गई!

एक समय था जब पत्रकार सरकार से सवाल किया करते थे –
“प्रधानमंत्री जी, आपकी नीति पर आलोचना हो रही है, क्या जवाब देंगे?”
अब न्यूज़ एंकर ऐसे सवाल पूछते हैं –
“प्रधानमंत्री जी, आपको इतनी मेहनत करने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है?”
पहले स्टूडियो में बहस होती थी, अब आरती होती है।
पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार को घेरा जाता था, अब प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार के आगे घुटने टेक दिए जाते हैं।
पत्रकारों की कुर्सी अब ‘सनम कपूर एंड संस’ के आरामदायक गद्दों से बनी होती है, ताकि जब वे गोदी में बैठें तो पीठ दर्द न हो!

टीआरपी गई तेल लेने, अब सरकारी विज्ञापन से जलता है चूल्हा!

पहले मीडिया का धंधा टीआरपी पर चलता था।
कौन सा न्यूज़ शो सबसे ज्यादा देखा गया?
किस चैनल की बहस सबसे तीखी थी?
कौन सा एंकर सबसे ज्यादा चिल्लाया?

अब खेल बदल चुका है। अब न्यूज चैनलों को सरकार के विज्ञापन मिलने लगे हैं, और टीआरपी की जरूरत ही खत्म हो गई। बड़ी कंपनियों ने भी समझ लिया – “न्यूज़ चैनल से कोई चीज़ नहीं बिकती, लेकिन सरकार से सेटिंग करके धंधा जरूर चमक सकता है!”

अब हर चैनल एक ही चीज़ बेच रहा है – “देशभक्ति!”
(लेकिन देशभक्ति का मतलब सिर्फ सरकार की भक्ति है!)

‘येलो जर्नलिज़्म’ से आगे बढ़कर ‘भगवा जर्नलिज़्म’

2004 की पत्रकारिता कक्षा में ‘येलो जर्नलिज़्म’ पर चर्चा होती थी। बताया जाता था कि कैसे मीडिया सनसनीखेज़ खबरें फैलाकर जनता को भ्रमित करती है।
2024 में चर्चा होनी चाहिए थी – “गोदीमीडिया का जर्नलिज़्म कैसे सत्ता की चरणवंदना में बदल गया?”


लेकिन अफसोस! प्रोफेसर अब भी वही 2004 वाली स्लाइड चला रहे हैं। कहीं गलती से कोई विद्यार्थी ‘गोदीमीडिया’ पर सवाल न उठा दे, इसलिए सेमिनार के विषय भी सेलेक्टिव हो गए हैं-

‘पत्रकारिता में नैतिकता’ (लेकिन ज्यादा नैतिकता की उम्मीद मत करो!)
‘भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता’ (हमें गर्व है कि हम अब भी स्वतंत्र होने का दिखावा कर सकते हैं!)
‘सोशल मीडिया बनाम परंपरागत मीडिया’ (संकेत साफ हैं - जो भी गोदीमीडिया पर सवाल उठाए, उसे ट्रोल कर दो!)

“भविष्य में ‘गोदीमीडिया’ एक शोध विषय होगा”

1975 की इमरजेंसी पर किताबें लिखी गईं, बहसें हुईं, और सत्ता से सवाल हुए। 2024 की मीडिया-सत्ता गठजोड़ पर कब सवाल होंगे?
शायद 2040 में पत्रकारिता के विद्यार्थी अपने प्रोफेसर से पूछें-
“सर, 2014-2025 के बीच पत्रकारिता क्यों सत्ता का प्रचार तंत्र बन गई थी?”
और प्रोफेसर तब भी गला खंखारेंगे, पानी पिएंगे, और कहेंगे-
“देखिए, यह ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने वाली बात है!”
अर्थात्, सवाल को गोल कर दो!

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Click on the link- puppet media भारतीय मीडिया कठपुतली की डोर किसके हाथ पढ़िए रोचक जानकारी एक क्लिक में।

‘गोदीमीडिया’ हिंदी शब्दकोश में कब आएगा?

शब्दकोश में ‘येलो जर्नलिज़्म’ है, लेकिन ‘गोदीमीडिया’ नहीं।
शायद भविष्य में यह शामिल होगा और उसकी परिभाषा कुछ यूं होगी – “वह पत्रकारिता जो सत्ता की गोद में बैठकर निष्पक्षता को भुला दे, और दर्शकों को देशभक्ति की घुट्टी पिलाकर सत्ता के हर फैसले को महान साबित करे।”

विद्यार्थी पूछता रहेगा… प्रोफेसर चुप रहेंगे… और न्यूज़ एंकर आरती उतारते रहेंगे!

सारांश: गोदीमीडिया – पत्रकारिता की ‘शयनकालीन’ क्रांति!
इस लेख में भारतीय मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाया गया है, जो अब सरकार से जवाब मांगने के बजाय उसकी प्रशंसा में लगी हुई है। पहले पत्रकार सरकार की नीतियों की आलोचना करते थे, लेकिन अब वे प्रधानमंत्री से प्रेरणा के स्रोत पूछते हैं।

टीआरपी की दौड़ खत्म हो चुकी है क्योंकि मीडिया अब सरकारी विज्ञापनों से चलती है। ‘येलो जर्नलिज़्म’ से आगे बढ़कर ‘भगवा जर्नलिज़्म’ का दौर आ चुका है, जहां पत्रकारिता सत्ता की चरणवंदना में बदल गई है। विश्वविद्यालयों में अब भी पुरानी पढ़ाई हो रही है, लेकिन ‘गोदीमीडिया’ पर खुली चर्चा नहीं होती।

भविष्य में यह एक शोध विषय बन सकता है, और तब विद्यार्थी पूछेंगे कि 2014-2025 के दौरान मीडिया क्यों सत्ता का प्रचार तंत्र बन गई थी। शब्दकोश में ‘गोदीमीडिया’ शब्द शायद तब दर्ज होगा, जिसका अर्थ होगा— “वह पत्रकारिता जो निष्पक्षता छोड़कर सत्ता की गोद में बैठ जाए और जनता को सत्ता की भक्ति में लीन कर दे।” Click on the link गूगल ब्लाग पर अपनी पसंदीदा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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