दो चार सौ से हजार रुपये देकर जुटाई जाती है जनसभाओं में लोगों की भीड़। प्रत्याशी देते हैं मुंहमांगी रकम, सत्तापक्ष पर नही है चुनाव आयोग की नज़र। बेरोजगारी के दौर में लोगों को नेताओं की जनसभाओं में आने के लिए दिए जाते हैं रुपये। कार्यकर्ताओं पर दी जाती रही है – रुपये देकर भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी। खर्च होती है मोटी रकम, आखिर यह मोंटी रकम आती कहाँ से है इन सभी मुद्दों पर एक विश्लेषण निस्पक्ष लेखक अमित श्रीवास्तव की कलम से ।
जी हां आंखों देखी व तमाम वायरल बीडीओ से स्पष्ट है भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा नेताओं के आगमन पर रुपये देकर दी जाती है भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी, खर्च होता है बड़ी मोटी रकम, यहां अंधा है कानून और अंधा है भारत का चुनाव आयोग, नही दिखता सरकार के अधीनस्थ जिम्मेदार अधिकारियों को।
विश्व का एक देश भारत जहां लूट-खसोट, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी चरम पर है और सरकार तानाशाह होती जा रही हैं, कानून भी अंधा है और आखों देखी बताने वाले को शाक्य देना पड़ता है। यहां की मीडिया संस्थाओं द्वारा निस्पक्ष और स्पष्ट भी नही दिखाया जाता, क्यूँकि मोटी रकम मीडिया सच को छुपा झूठ दिखाने के लिए विज्ञापन के नाम पर पाती है। जो सच दिखायेंगा उसे सरकारी विज्ञापन भी भरसक नही दिया जाता। विश्व स्तर पर ज्यादातर भारतीय मीडिया को गोदी मीडिया के नाम से जाना जाने लगा है।
तो आज इस आर्टिकल में एक दो छोटा बीडीओ फुटेज लगा जमीनी हालात से अवगत करा रहे हैं। क्या है भाजपा के रैली में भीड़ का राज। जहां बेरोजगारों की बड़ी फौज, चार साल के लिए नियुक्त अग्निवीर सहित संविदा कर्मी व पुरानी पेंशन बहाल की मांग करने वाली लगभग आधी आबादी भाजपा सरकार से नाराज है, अरविंद केजरीवाल के दस गारंटी और राहुल गांधी अखिलेश यादव के आश्वासन और मेनिफेस्टो 2024 से खुश होकर जनता भाजपा के विरोध में मतदान कर रही है। जनता भाजपा की रैली में भाषण सुनने जाना भी नही चाह रही फिर भी भीड़ कैसी है जानिए निस्पक्ष कलम से।
1 जून को भारत में लोकसभा 2024 का अंतिम चुनाव है एक छोटा-सा बीडीओ देखिए कैसे दो बार रह चुके तीसरी बार प्रत्याशी घोषित भाजपा के सांसद खुद अपने हाथों से जहां जनसभा को संबोधित करने के लिए मंच लगाया गया है वहीं पर खुलेआम मुंहमांगी रकम बांटते नज़र आ रहे हैं। फिर भी भारत का अंधा चुनाव आयोग को ऐसे सार्वजनिक जगहों पर भी वोट के बदले नोट बांटते दिखाई नहीं दे रहा है। यह स्थिति लगभग हर जगह रही है किन्तु बीडीओ फुटेज के अभाव में इस आर्टिकल को लिखने में कलम असमर्थ थी। मुख से सूनी कही बात सत्ता पर आरोप लगाना लेखक के लिए उचित नहीं होता जब तक पुख्ता सबूत नहीं होता हम निस्पक्ष लेखक भी एक शब्द नही लिखते। मीडिया और लेखक समाज के लिए मार्गदर्शी और आईने के समान होता है। झूठ वो फैलाता है जो झूठ फैलाने और दिखाने के बदले में मोटी रकम खाता है। आज लेखकों पत्रकारों कि कलम बिकते देखा जा रहा है जो समाज के लिए अहितकारी है। कुछ गिने-चुने पत्रकार आज भी हैं जो निस्पक्ष लेखनी समाज के हितों में लिखने की छमता रखते हैं। दस साल के शासनकाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार जमीनी स्तर पर वैसा कुछ भी नहीं कर पाई है जो आम जन की खास जरूरत है। उत्तर प्रदेश के लोकसभा सलेमपुर क्षेत्र में भाजपा के आला कमान के आगमन पर मंच लगाया गया है और वही भाजपा से तीसरे बार घोषित प्रत्याशी जो चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में दिखाई भी नहीं देता खुलेआम रुपये बांट रहा है। आखिर यह रुपये बांटने का बीडीओ फुटेज सार्वजनिक है फिर भी चुनाव आयोग आंखें बंद कर नज़र अंदाज क्यो कर रहा है? क्या चुनाव आयोग सत्ता पक्ष के इशारे पर काम कर रहा है? तमाम प्रश्न उठाया जा सकता है। मंच पर कभरेज करने आये तमाम मीडिया रिपोर्टर आखिर इसका कभरेज कर अपनी मीडिया संस्थाओं से क्यूं नहीं दिखाएं? ऐसा बीडीओ फुटेज निस्पक्ष निस्वार्थ लेखक को सोचने समझने फिर लिखने के लिए मजबूर कर रहा है।
भारत देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसभा को संबोधित करते हुए कहें थे अडानी-अंबानी टेम्पो भर-भर माल दिया काग्रेस को और कांग्रेस व सपा प्रत्याशी रुपये बांटते कहीं दिखाई नहीं दिए। मुझे दिखा तो भाजपाई ही, तो क्या नरेंद्र मोदी मंच से यह उल्टा आरोप कांग्रेस पर लगाया। अगर उल्टा आरोप नहीं लगाया तो भाजपा के प्रत्याशी रुपये कहां से बांट रहे हैं।
हिंदी पत्रकारिता दिवस की हार्दिक शुभकामना

आज 30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस है हिन्दी पत्रकारिता को कलंकित करने वाले पत्रकारों ने ऐसे घृणित कार्य को मंच पर रहते हुए भी अनदेखा किया है। तो क्या वहां उपस्थित पत्रकार अपनी आंखे बंद किए हुए थे या वो भी कभरेज पर जाने के लिए मोटी रकम पा चुके थे। गोदी मीडिया लोकतंत्र की हत्या करने कराने पर तूली हुई है। इसी वजह से भाजपा के द्वारा किया जाने वाला घृणित कार्य को दिखाने से कतरा जाती है। गरीबी बेरोजगारी के आलम में दो चार सौ रुपए मतदाताओं को देकर वोट खरीद लोकतंत्र की हत्या की जा रही है। जनता इतना सोचने समझने में देर कर जाती है जो दो चार सौ रुपये देकर हमारे बहुमूल्य मत को खरीद रहा है वो फिर बीच के साढ़े चार साल तक दिखाई भी नहीं देता न हमारी दुख तकलीफ़ से उसको कोई मतलब रहती। जब दो चार सौ रुपये लेकर मतदाता मतदान उसके पक्ष में कर देता है समय आने पर जब वो कभी किसी अपनी समस्या को लेकर जाता है तब वह जन प्रतिनिधि यह कहते देखा सूना गया है। हमे फोकट में वोट दिये हो क्या? तो ऐसे जन प्रतिनिधियों का चुनाव करना लोकतंत्र की हत्या कराना ही है। जो प्रत्याशी या राजनेता अपनी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अन्तर एक नही दो बार दिखा दे पांच साल के बदले दस साल गंवा दे वैसे नेताओं का चयन करने से जनता इंकार करते दिखाई दे रही है। सत्ता का परिवर्तन निकम्मे नेताओं का बदलाव लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है।
पहले चरण के चुनाव से पहले 400 पार का नारा खुद खुश होने के लिए व खरीदू भीड़ जनसभाओं में जुटाने के लिए बहुत मोंटी रकम खर्च करने पड़ते हैं। भाजपा कार्यालयों में मोटी रकम भेजी जा रही है और कार्यकर्ताओं में बांट जनसभाओं में भीड़ जुटाने के लिए खर्च किया जा रहा है।
भाजपा पार्टी कार्यालय से कार्यकताओं को भीड़ जुटाने के लिए पैसे दिए जाते हैं और कार्यकर्त्ता थोड़ी बहुत गांवों के बेरोजगार युवाओं महिलाओं में बांटकर अपने साधन से जनसभा तक लाने ले जाने की जिम्मेदारी निभाते हैं।
विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी अक्सर नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगाते रहे हैं। जनता का पैसा जो भारी-भरकम टैक्स के जरिए सरकार के पास आता है। उसे नरेंद्र मोदी पूंजी पत्तियों के कर्ज माफी मे खर्च करते हैं। इसके बदले में भारतीय जनता पार्टी को वही पूंजीपति इलेक्टोरल बाॅन्ड के रूप में चंदा देते हैं। इसी चंदा का इस्तेमाल चुनाव में गलत तरीके से वोट खरीदने के लिए जनता में बांटकर किया जाता है। भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा मोंटी रकम पाकर सौ दो सौ रुपये बांटकर नकली भीड़ जुटाने का काम किया जा रहा है।
काला धन क्या हुआ ?
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक नोट बंदी किया गया इसलिए कि अब काला धन सामने आ जायेगा आठ साल बीत चुके हैं अभी मोदी जी काला धन का खुलासा तक जनता के बीच नही किए। अभी चुनाव बाद जोड़-तोड़ की राजनीति भी शुरू हो जाएगी यही काला धन प्रत्याशियों को खरीदने में भी लगाया जा सकता है। हालांकि पिछले चुनाव में भी इस तरह के मामले खबरों के सुर्खियों में रहे हैं। लेकिन बिकीं मीडिया दिखाने से परहेज करतीं रही। मजेदार बात यह है कि भारतीय चुनाव आयोग इस सब पर चुप्पी साधे हुए है। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई है और चुनाव आयोग निस्पक्ष नही है।
इलेक्टोरल बाॅन्ड upsc
इलेक्टोरल बांड का पैसा काले धन के रूप में चुनाव में खपाया जा रहा है इस संलग्न बीडीओ से लगता है कि भीड़ काले धन के सहारे जुटाई जा रही है। जो नरेंद्र मोदी 2014 में मंच से कह रहे थे काला धन वापस लाऊगा और देश की जनता को पंद्रह पंद्रह लाख दूंगा वो काला धन चुनाव में खपाने का काम कर रहे हैं। देश की जनता को नोटबंदी करने के बाद भी नही बताया काला धन कितना लाया। अभी कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट इलेक्टोरल बाॅन्ड मुद्दे पर सरकार को फटकार लगायी।
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