मिट्टी की सेहत सुधारें, टिकाऊ खेती अपनाएं – कृषि संकल्प अभियान में डॉ. मांधाता सिंह की किसानों को सीख

Amit Srivastav

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देवरिया। कृषि विज्ञान केंद्र मिट्टी की सेहत सुधारें टिकाऊ खेती अपनाएं (भाकृअनुप–भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी), मल्हना देवरिया और कृषि विभाग देवरिया के संयुक्त तत्वावधान में संचालित “विकसित कृषि संकल्प अभियान” का दसवां दिन 7 जून 2025 को विशेष रूप से स्मरणीय रहा।

देवरिया के विभिन्न ग्रामों – बैजनाथपुर, पिपरा मदन, हेतिमपुर, भटनी दादन, नौतन हतियागढ़, हरैया बसंतपुर, पड़ौली, शामपुर और बरवामीर छापर – में एक साथ आयोजित इस अभियान में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया और आधुनिक, जैविक एवं प्राकृतिक खेती की तकनीकों से सीधे तौर पर परिचित हुए। इस अवसर पर प्रमुख वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने गांवों में जाकर किसानों से संवाद किया और खेती को लाभकारी, सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के विविध उपायों पर विस्तृत जानकारी दी।

मिट्टी की सेहत सुधारें, टिकाऊ खेती अपनाएं –

मिट्टी की सेहत सुधारें, टिकाऊ खेती अपनाएं

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और कृषि विज्ञान केंद्र, देवरिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मांधाता सिंह ने ग्रामीण किसानों को संबोधित करते हुए मिट्टी की सेहत को खेती की नींव बताया। उन्होंने कहा कि यदि मिट्टी की उर्वरता को बनाए नहीं रखा गया, तो हमारे खेत भविष्य में बंजर हो सकते हैं। उन्होंने किसानों को प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने की सलाह दी और जोर देकर कहा कि जैविक और प्राकृतिक खेती से न केवल उपज में सुधार आता है, बल्कि भूमि दीर्घकालिक रूप से उत्पादक बनी रहती है।

डॉ. सिंह ने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक उपयोग से मिट्टी के क्षरण और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि खेती को टिकाऊ बनाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी है।

मिट्टी की सेहत सुधारें, टिकाऊ खेती अपनाएं – कृषि संकल्प अभियान में डॉ. मांधाता सिंह की किसानों को सीख


कार्यक्रम में उप निदेशक कृषि, देवरिया श्री सुभाष मौर्य ने किसानों से अपील की कि वे अब पारंपरिक रासायनिक खेती से हटकर प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाएं। उन्होंने बताया कि आज के समय में जैविक उत्पादों की बाज़ार में अत्यधिक मांग है और उपभोक्ता जागरूक हो चुका है। ऐसे में यदि किसान प्राकृतिक और जैविक तरीकों को अपनाते हैं, तो उन्हें उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा और लागत भी कम होगी। उन्होंने कहा कि किसान यदि खाद और कीटनाशकों के स्थान पर स्वयं के द्वारा तैयार किए गए जैविक घोलों और जीवाणु आधारित खादों का प्रयोग करें, तो इससे पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा और कृषि का मुनाफा भी सुरक्षित रहेगा।

कार्यक्रम में उद्यान वैज्ञानिक डॉ. रजनीश श्रीवास्तव ने सब्जी उत्पादन में जैविक विधियों की उपयोगिता को रेखांकित किया। उन्होंने संकर बीजों, उन्नत किस्मों, बिछावन विधि तथा मेड पर सब्जी की खेती जैसी तकनीकों को ग्रामीणों के सामने सरल भाषा में प्रस्तुत किया। उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट, नीम आधारित कीटनाशकों और ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक उत्पादों के प्रयोग को लाभकारी बताया और इन तकनीकों को स्थानीय वातावरण के अनुकूल एवं सस्ती बताया।

वहीं सस्य वैज्ञानिक डॉ. कमलेश मीना ने बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत, ब्रह्मास्त्र और नीमास्त्र जैसे जैविक घोलों की वैज्ञानिक संरचना और खेतों में उनके अनुप्रयोग की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि ये सभी घोल किसान अपने घर में आसानी से बना सकते हैं और ये रासायनिक दवाओं की तुलना में अधिक टिकाऊ और सुरक्षित होते हैं।

कार्यक्रम के दौरान गृह विज्ञान वैज्ञानिक जय कुमार ने स्वरोजगार की दिशा में महिलाओं को सशक्त बनाने की अपील की। उन्होंने बताया कि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग कर महिलाएं दुग्ध उत्पाद, आचार, पापड़, मसाले जैसे घरेलू उत्पाद तैयार कर सकती हैं और उन्हें विक्रय कर आय अर्जित कर सकती हैं। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू करने की प्रेरणा दी और बताया कि यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

इसी क्रम में पशु जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ डॉ. अंकुर शर्मा ने वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन की जानकारी दी और इसे छोटे व सीमांत किसानों के लिए आय का भरोसेमंद स्त्रोत बताया। उन्होंने कहा कि उचित नस्ल चयन, टीकाकरण, संतुलित आहार और स्वच्छता जैसे उपायों से दुग्ध उत्पादन में वृद्धि कर किसान अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकते हैं।

कृषि विभाग के ए.डी.ओ. (पौध संरक्षण) श्री इंद्रसेन कुमार विश्वकर्मा ने जैविक कीट प्रबंधन और एकीकृत फसल सुरक्षा उपायों की जानकारी दी। उन्होंने फेरोमोन ट्रैप, प्रकाश प्रपंच, जैव कीटनाशक, और प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण जैसी तकनीकों पर जोर दिया। वहीं, उपस्थित फसल बीमा अधिकारियों ने किसानों को फसल बीमा योजना की जानकारी देते हुए कहा कि यह योजना आपदा की स्थिति में किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है और उन्हें पुनः खेती के लिए तैयार रहने में मदद करती है।

मिट्टी की सेहत सुधारें, टिकाऊ खेती अपनाएं – कृषि संकल्प अभियान में डॉ. मांधाता सिंह की किसानों को सीख

गांव-गांव जाकर चलाए जा रहे इस कृषि संकल्प अभियान में लगभग 1500 से अधिक किसान सीधे रूप से शामिल हुए। उन्होंने विशेषज्ञों से अपने सवाल पूछे और खेती संबंधी जटिल समस्याओं का समाधान पाया। इस प्रकार का ग्रामीण स्तर पर केंद्रित, तकनीकी और संवादात्मक प्रयास न केवल किसानों को आधुनिक खेती के लिए प्रशिक्षित कर रहा है, बल्कि ग्रामीण भारत में कृषि की एक नई चेतना भी जगा रहा है। यह अभियान आने वाले समय में खेती को केवल उत्पादन केंद्रित नहीं, बल्कि सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन की दिशा में अग्रसर करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
amitsrivastav.in विशेष संवाददाता, देवरिया

HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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