प्रयागराज, उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर जो गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम के लिए प्रसिद्ध है, प्रतिबंधित पॉलीथिन आजकल पर्यावरणीय संकट के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है, जहां प्रतिबंधित पॉलीथिन बैग्स का खुले आम इस्तेमाल हो रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2015 के आदेश और राज्य सरकार की बार-बार की गई घोषणाओं के बावजूद, शहर के विभिन्न इलाकों जैसे चौक, मीरापुर, बहराना, कटरा, राजापुर, मुंडेरा और सुलेमान सराय में दुकानदारों द्वारा सामान पैक करने के लिए प्रतिबंधित पॉलीथिन का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।

यह समस्या न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रही है। शैक्षणिक दृष्टिकोण से देखें तो पॉलीथिन का इस्तेमाल एक बहुआयामी समस्या है, जिसमें पर्यावरण विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, कानूनी ढांचा और सामाजिक व्यवहार शामिल हैं। राजनीतिक रूप से, यह राज्य और केंद्र सरकार की नीतियों की असफलता को दर्शाता है, जहां घोषणाएं तो की जाती हैं लेकिन प्रवर्तन में कमी रह जाती है, जिससे भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी उजागर होती है।
इस लेख में हम इस समस्या को गहराई से विश्लेषित करेंगे, जिसमें पर्यावरणीय प्रभाव, स्वास्थ्य जोखिम, कानूनी इतिहास, राजनीतिक आयाम और संभावित समाधान शामिल हैं, ताकि यह प्रयागराज पॉलीथिन प्रतिबंध, उत्तर प्रदेश प्लास्टिक बैन असफलता, पर्यावरण प्रदूषण भारत, सिंगल यूज प्लास्टिक स्वास्थ्य प्रभाव जैसे कीवर्ड्स के माध्यम से शैक्षणिक और राजनीतिक दोनों श्रेणियों में उपयोगी बने।
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प्रयागराज में पॉलीथिन का इस्तेमाल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर प्रदेश और भारत की पर्यावरण नीतियों की कमजोरी को प्रतिबिंबित करता है, जहां 2022 में केंद्र सरकार द्वारा सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बावजूद, जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिखता। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, पॉलीथिन बैग्स का उत्पादन और उपयोग न केवल जैव विविधता को नष्ट करता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ावा देता है, क्योंकि ये बैग्स नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और सैकड़ों वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं, जिससे मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित होती है।
राजनीतिक दृष्टि से, यह समस्या योगी आदित्यनाथ सरकार की ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘प्लास्टिक मुक्त उत्तर प्रदेश’ के दावों की पोल खोलती है, जहां छापेमारी और जुर्माने की प्रक्रिया कभी-कभी ही होती है, और व्यापारियों के साथ सांठ-गांठ के आरोप लगते रहते हैं। उदाहरण के लिए, 2018 में उत्तर प्रदेश में 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाली पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन 2026 तक भी प्रयागराज की सब्जी मंडियों जैसे मुंडेरा में दुकानदार ग्राहकों को पॉलीथिन में ही सामान देते हैं, क्योंकि वैकल्पिक जैसे जूट या कपड़े के थैले उपलब्ध नहीं कराए जाते।
यह स्थिति न केवल पर्यावरण संरक्षण के वैश्विक लक्ष्यों जैसे संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और एसडीजी 14 (समुद्री जीवन की रक्षा) को प्रभावित करती है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धूमिल करती है, जहां भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्लास्टिक प्रदूषक देश माना जाता है, लगभग 43% प्लास्टिक कचरा सिंगल यूज प्लास्टिक से आता है। शैक्षणिक अध्ययनों से पता चलता है कि पॉलीथिन बैग्स का उत्पादन पेट्रोलियम आधारित होता है।
जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान देता है, जबकि राजनीतिक रूप से, सरकारें इसे आर्थिक विकास के नाम पर नजरअंदाज करती हैं, क्योंकि प्लास्टिक उद्योग लाखों रोजगार प्रदान करता है, लेकिन लंबे समय में यह पर्यावरणीय लागत को अनदेखा कर देता है। प्रयागराज जैसे धार्मिक शहर में, जहां कुंभ मेला जैसे आयोजन होते हैं, पॉलीथिन का इस्तेमाल और भी खतरनाक है, क्योंकि लाखों श्रद्धालु गंगा में कचरा फेंकते हैं, जो जल प्रदूषण को बढ़ाता है और मछलियों तथा जलीय जीवों को मारता है।
2025 के कुंभ मेला में प्लास्टिक फ्री जोन घोषित किया गया था, लेकिन प्रवर्तन की कमी से यह लक्ष्य अधर में लटक रहा है जो इस समस्या की जड़ें गहरी हैं, और इसे समझने के लिए हमें पर्यावरण विज्ञान के सिद्धांतों से शुरू करना होगा, जहां पॉलीथिन का अपघटन न होने से माइक्रोप्लास्टिक्स बनते हैं जो खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं, और राजनीतिक रूप से, यह नीतियों की असंगतता को दिखाता है, जहां केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग नियम लागू होते हैं, लेकिन समन्वय की कमी रहती है।
पर्यावरणीय प्रभाव के संदर्भ में, प्रयागराज में पॉलीथिन का धड़ल्ले से इस्तेमाल एक बड़े संकट का संकेत है, जो न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालता है। शैक्षणिक दृष्टिकोण से, पॉलीथिन बैग्स नॉन-बायोडिग्रेडेबल पदार्थ हैं, जो सूर्य की किरणों से अपघटित होने पर भी छोटे-छोटे कणों में बदल जाते हैं, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक्स कहा जाता है।
ये कण मिट्टी में घुलकर उसकी उर्वरता को कम करते हैं, पानी में मिलकर नदियों और समुद्रों को प्रदूषित करते हैं, और हवा में उड़कर वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं। भारत में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां गंगा नदी प्रमुख है, पॉलीथिन का कचरा नदियों को अवरुद्ध करता है, जिससे बाढ़ की समस्या बढ़ती है।
उदाहरण के लिए, प्रयागराज की गंगा में हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा बहता है, जो जलीय जीवन को नष्ट करता है – मछलियां इन कणों को भोजन समझकर खा लेती हैं, जिससे उनकी मृत्यु होती है और जैव विविधता प्रभावित होती है। पर्यावरण विज्ञान के अध्ययनों के अनुसार, प्लास्टिक प्रदूषण से समुद्री जीवन का 85% प्रभावित होता है, और भारत में यह समस्या और भी गंभीर है क्योंकि देश दुनिया का सबसे बड़ा प्लास्टिक प्रदूषक है, जहां प्लास्टिक कचरा जल निकायों को अवरुद्ध कर बाढ़ को बढ़ावा देता है।
राजनीतिक रूप से, यह समस्या सरकार की पर्यावरण नीतियों की विफलता को दर्शाती है, जहां 2018 में उत्तर प्रदेश में प्लास्टिक बैन लागू किया गया था, लेकिन प्रवर्तन की कमी से यह असफल रहा। योगी सरकार ने ‘प्लास्टिक मुक्त यूपी’ का लक्ष्य रखा था, लेकिन जमीनी स्तर पर छापेमारी की कमी और भ्रष्टाचार के आरोपों से यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया। प्रयागराज में, जहां कुंभ मेला जैसे बड़े आयोजन होते हैं, प्लास्टिक फ्री अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन 2025 के कुंभ में भी सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल देखा गया, जो प्रशासन की लापरवाही को दिखाता है।
शैक्षणिक रूप से, यह समस्या सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है, जहां प्लास्टिक को रीसाइकल करने के बजाय फेंक दिया जाता है, जिससे लैंडफिल्स भर जाते हैं और मिट्टी प्रदूषित होती है। भारत में प्लास्टिक वेस्ट का 15% जलाया जाता है, जो डाइऑक्सिन, फ्यूरान और मर्करी जैसे जहरीले रसायनों को उत्सर्जित करता है, जो वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं और जलवायु परिवर्तन में योगदान देते हैं। राजनीतिक विश्लेषण में, यह देखा जाता है कि प्लास्टिक उद्योग के लॉबीइंग से सरकारें सख्त कदम नहीं उठातीं, क्योंकि यह उद्योग आर्थिक विकास का हिस्सा है, लेकिन पर्यावरणीय लागत को अनदेखा किया जाता है।
प्रयागराज में, जहां गुटखा, पान मसाला और चिप्स जैसे उत्पादों की पैकिंग में पॉलीथिन इस्तेमाल होती है, यह कचरा सड़कों पर फेंका जाता है, जो न केवल सौंदर्य को प्रभावित करता है बल्कि मॉनसून में जल निकासी को अवरुद्ध करता है, जिससे बाढ़ आती है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलीथिन से निकलने वाले महीन कण रक्त में पहुंचकर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से, सरकारें जागरूकता अभियान चलाती हैं लेकिन प्रवर्तन पर ध्यान नहीं देतीं।
उत्तर प्रदेश में RACE (Reduction, Awareness, Circular, Engagement) अभियान चलाया गया था, जो सिंगल यूज प्लास्टिक को कम करने का प्रयास था, लेकिन इसकी सफलता सीमित रही क्योंकि स्थानीय प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। शैक्षणिक अध्ययनों से पता चलता है कि प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल मिट्टी की उर्वरता को 20-30% कम कर सकता है, क्योंकि ये कण पौधों की जड़ों को प्रभावित करते हैं, और राजनीतिक रूप से, यह कृषि आधारित राज्य जैसे यूपी के लिए खतरा है, जहां किसान पहले से ही जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं।
प्रयागराज की सब्जी मंडियों में दुकानदारों का कहना है कि ग्राहक झोला नहीं लाते, इसलिए पॉलीथिन देनी पड़ती है, लेकिन यह बहाना है क्योंकि सरकार ने वैकल्पिक प्रदान करने की जिम्मेदारी नहीं ली। कुल मिलाकर, पर्यावरणीय प्रभाव इतना गंभीर है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो प्रयागराज जैसे शहर प्लास्टिक के जाल में फंस जाएंगे, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से यह समस्या और बढ़ेगी।
स्वास्थ्य प्रभाव की बात करें तो, प्रयागराज में पॉलीथिन का इस्तेमाल मानव स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है, जो शैक्षणिक रूप से चिकित्सा विज्ञान और विष विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन का विषय है। पॉलीथिन बैग्स में रखी गई खाद्य वस्तुएं जैसे आलू टिक्की, मोमोज, समोसा और चाट, जब गर्म होती हैं तो पॉलीथिन पिघलकर भोजन में मिल जाती है, जिससे महीन कण शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। मेडिकल अध्ययनों के अनुसार, ये कण कैंसर जैसी घातक बीमारियों का कारण बनते हैं, क्योंकि पॉलीथिन में मौजूद एडिटिव्स, इंक्स और डाई में कैडमियम जैसे भारी धातु होते हैं, जो कार्सिनोजेनिक होते हैं।
भारत में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, पॉलीथिन का इस्तेमाल स्वास्थ्य संकट को बढ़ावा देता है, जहां जलाए जाने पर निकलने वाले जहरीले रसायन जैसे डाइऑक्सिन और फ्यूरान फेफड़ों और हृदय रोगों का कारण बनते हैं। राजनीतिक रूप से, यह समस्या सरकार की स्वास्थ्य नीतियों की असफलता को दिखाती है, जहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नगर निगम की ओर से नियमित छापेमारी नहीं होती, जिससे जनता के स्वास्थ्य पर खतरा मंडराता रहता है।
प्रयागराज में, जहां पत्तल के नाम पर दोने में ऊपर पॉलीथिन की पतली परत लगी होती है, यह गर्म भोजन से पिघलकर खाने में मिल जाती है, और शैक्षणिक अध्ययनों से पता चलता है कि ऐसे कण रक्त में पहुंचकर इम्यून सिस्टम को कमजोर करते हैं, जिससे कैंसर का जोखिम 20-30% बढ़ जाता है। राजनीतिक विश्लेषण में, यह देखा जाता है कि केंद्र सरकार ने 2022 में सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगाया था, लेकिन राज्य स्तर पर प्रवर्तन की कमी से यह असरदार नहीं हुआ, और स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट्स में प्लास्टिक से जुड़े रोगों की संख्या बढ़ रही है।
प्रयागराज जैसे शहर में, जहां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग अधिक प्रभावित होता है, पॉलीथिन का इस्तेमाल गरीबी और जागरूकता की कमी से जुड़ा है, लेकिन सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता अभियान पर पर्याप्त निवेश नहीं किया। शैक्षणिक रूप से, विष विज्ञान के अनुसार, पॉलीथिन से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक्स खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर मानव शरीर में जमा हो जाते हैं, जो हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन समस्याएं और न्यूरोलॉजिकल विकार पैदा करते हैं।
भारत में, जहां 71% लोग जानते हैं कि पॉलीथिन जानवरों के लिए हानिकारक है, लेकिन मानव स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव कम समझा जाता है। राजनीतिक रूप से, यह समस्या विपक्षी दलों के लिए एक मुद्दा बनती है, जहां वे सरकार की लापरवाही पर सवाल उठाते हैं, लेकिन सत्ता में आने पर खुद भी वही गलतियां दोहराते हैं। प्रयागराज नगर निगम ने हाल ही में छापेमारी में 6 क्विंटल पॉलीथिन जब्त की थी, लेकिन यह स्पोराडिक कार्रवाई है, जो राजनीतिक दिखावा मात्र है।
कुल मिलाकर, स्वास्थ्य प्रभाव इतना गंभीर है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति से सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इससे प्रभावित होंगी, और शैक्षणिक रूप से यह एक केस स्टडी बन सकता है कि कैसे पर्यावरणीय लापरवाही स्वास्थ्य संकट पैदा करती है।
कानूनी और नीतिगत इतिहास के संदर्भ में, प्रयागराज में पॉलीथिन प्रतिबंध की कहानी 2015 से शुरू होती है, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 31 दिसंबर तक पूरे उत्तर प्रदेश में पॉलीथिन की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था। इसके बाद दिसंबर 2015 में कैबिनेट ने राज्यव्यापी बैन की घोषणा की, जिसमें सभी प्रकार के प्लास्टिक कैरी बैग्स के निर्माण, आयात, खरीद और भंडारण पर रोक शामिल थी, लेकिन पैकेजिंग उद्देश्यों पर यह लागू नहीं था।

शैक्षणिक दृष्टिकोण से, यह कानूनी ढांचा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 पर आधारित है, जो सिंगल यूज प्लास्टिक को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। राजनीतिक रूप से, यह घोषणा अखिलेश यादव सरकार की थी, लेकिन लागू करने में कमी रही, जिससे विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। 2018 में, 15 जुलाई से 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाली पॉलीथिन पर रोक लगाई गई, 15 अगस्त से डिस्पोजेबल प्लास्टिक और थर्मोकोल पर पूर्ण प्रतिबंध, और 2 अक्टूबर से सभी नॉन-बायोडिग्रेडेबल पॉलीथिन पर बैन।
लेकिन 8 साल बाद भी प्रयागराज में धड़ल्ले से इस्तेमाल जारी है, जो कानूनी प्रवर्तन की कमजोरी को दिखाता है। केंद्र सरकार ने 2022 में 1 जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक पर देशव्यापी बैन लगाया, जिसमें 19 आइटम्स शामिल थे, लेकिन कम उपयोगिता और उच्च प्रदूषण वाले आइटम्स पर विचार राजनीतिक विश्लेषण में, यह देखा जाता है कि बैन की घोषणाएं चुनावी समय में की जाती हैं, लेकिन प्रवर्तन के लिए बजट और मैनपावर की कमी रहती है।
उत्तर प्रदेश में, जहां प्लास्टिक उद्योग बड़ा है, राजनीतिक दलों के फंडिंग से जुड़े होने के आरोप लगते हैं, जिससे सख्ती नहीं बरती जाती। शैक्षणिक रूप से, प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2021 में संशोधन से 120 माइक्रोन से कम बैग्स पर बैन लगाया गया, जो रिसाइक्लेबिलिटी बढ़ाने का प्रयास था। लेकिन प्रयागराज में, जहां नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी है, नियमित निगरानी नहीं होती, जो राजनीतिक लापरवाही को दर्शाता है। 2019 में, बैन के एक साल बाद भी प्लास्टिक कचरा वापस लौट आया, क्योंकि वैकल्पिक सिस्टम नहीं बनाया गया।
राजनीतिक रूप से, यह समस्या संघीय ढांचे की कमजोरी को दिखाती है, जहां केंद्र बैन लगाता है लेकिन राज्य प्रवर्तन में असफल रहते हैं। प्रयागराज में, कुंभ मेला के दौरान प्लास्टिक फ्री अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन सामान्य दिनों में अनदेखी होती है। कुल मिलाकर, कानूनी इतिहास दिखाता है कि अच्छे कानून हैं लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से वे कागजी रह जाते हैं।
राजनीतिक आयाम को गहराई से देखें तो, प्रयागराज में पॉलीथिन प्रतिबंध की असफलता उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक बड़ी विफलता है, जहां पर्यावरण मुद्दे चुनावी घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं। शैक्षणिक दृष्टिकोण से, राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, प्लास्टिक बैन की असफलता लॉबीइंग, भ्रष्टाचार और प्रवर्तन की लागत से जुड़ी है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2018 में बैन लागू किया, लेकिन पैची इम्प्लिमेंटेशन से यह असफल रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्लास्टिक उद्योग से जुड़े व्यापारियों के वोट बैंक के कारण सख्ती नहीं बरती जाती, और छापेमारी स्पोराडिक होती है। केंद्र स्तर पर, मोदी सरकार ने 2022 में बैन लगाया, लेकिन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की कमजोर प्रवर्तन से यह विफल रहा। प्रयागराज में, जहां भाजपा का मजबूत आधार है, पर्यावरण मुद्दे को ‘स्वच्छ भारत’ से जोड़ा जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं दिखता। विपक्षी दल जैसे समाजवादी पार्टी इसे सरकार की असफलता बताते हैं, लेकिन खुद सत्ता में रहते हुए भी वही गलतियां कीं।
शैक्षणिक अध्ययनों से पता चलता है कि बैन की सफलता जागरूकता और वैकल्पिक पर निर्भर है, लेकिन राजनीतिक रूप से, सरकारें शॉर्ट-टर्म गेन पर फोकस करती हैं। उत्तर प्रदेश में RACE अभियान जैसे प्रयास हुए, लेकिन राजनीतिक समर्थन की कमी से सीमित रहे। कुल मिलाकर, राजनीतिक आयाम दिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण राजनीतिक प्राथमिकता नहीं है, जो शैक्षणिक रूप से एक बड़ा सबक है।

समाधान के रूप में, प्रयागराज में पॉलीथिन समस्या को हल करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें शैक्षणिक जागरूकता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और तकनीकी विकल्प शामिल हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का सुझाव है कि जूट, कागज या बायोडिग्रेडेबल बैग्स को बढ़ावा दिया जाए, और सरकार वैकल्पिक उत्पादन पर सब्सिडी दे। राजनीतिक रूप से, नियमित छापेमारी और जुर्माने को सख्ती से लागू किया जाए, साथ ही नागरिकों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
शैक्षणिक संस्थानों में पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य बनाना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी समस्या को समझे। प्रयागराज नगर निगम जैसे संस्थान प्लास्टिक मुक्त अभियान चला सकते हैं, लेकिन राजनीतिक समर्थन जरूरी है। अंत में, अगर समय रहते कदम उठाए गए तो प्रयागराज प्लास्टिक मुक्त बन सकता है।

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