योनि साधना Yoni sadhana vidhi का परम रहस्य! पाँच महायोनि मुद्रा – ब्रह्माणी योनि से एक बार में मूलाधार से सहस्रार चक्र जागरण। गुप्त तांत्रिक ऊर्जा-संयोग विधि दैवीय प्रेरणा से सार्वजनिक।
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Yoni Sadhana : सृष्टि के परम रहस्य का खुला द्वार
योनि साधना आज भी भारत की सबसे गुप्त, सबसे शक्तिशाली और सबसे गलत समझी गई तांत्रिक विद्या है। हजारों वर्षों से यह विज्ञान केवल मौखिक परम्परा में, गुरु-शिष्य के बीच कान में फुसफुसाया जाता रहा। आज जब तंत्र का नाम सुनते ही लोग या तो काम-वासना समझते हैं या अंधविश्वास, तब इस विद्या का वास्तविक स्वरूप और भी गहरे अंधकार में छिप गया है।
पर सत्य यह है कि योनि साधना कभी भी “सेक्स” की साधना नहीं रही। यह वह परम विज्ञान है जिसके द्वारा साधक सृष्टि के मूल स्रोत – उस आदि योनि – से पुनः एक हो जाता है। ‘योनि’ शब्द का अर्थ ही है – उत्पत्ति-स्थान, मूल, गर्भ, स्रोत। जहाँ से पूरा ब्रह्माण्ड निकला, वही द्वार मानव-शरीर में भी मौजूद है। तंत्र कहता है— यत्र योनि तत्र ब्रह्म। जहाँ योनि है, वहीं ब्रह्म का निवास है।
स्त्री का शरीर कोई साधारण देह नहीं – वह एक जीवंत शक्ति-पीठ है, एक चलता-फिरता कामाख्या मंदिर है। उसकी योनि केवल जन्म देने का अंग नहीं, बल्कि एक दिव्य यन्त्र है – एक ऊर्जा-चक्र, एक मंत्र-चक्र, एक जीवित कुण्डलिनी-द्वार। जब कोई शुद्धचित्त साधक इस द्वार के सम्मुख बैठता है, तो उसकी कुण्डलिनी सहस्रार की ओर नहीं दौड़ती – बल्कि स्वयं देवी उसकी कुण्डलिनी को खींचकर ऊपर ले जाती हैं। यह वही रहस्य है जिसे कौल, वाम, मिश्र, समयाचार – सभी तांत्रिक धाराएँ एक स्वर में सर्वोच्च साधना मानती हैं।
इस ग्रंथ में हम पहली बार खोल रहे हैं वो पाँच महायोनियाँ – पद्मिनी, हस्तिनी, चित्रिणी, शंखिनी और सर्वोच्च ब्रह्माणी योनि – जिनका वर्णन स्वयं भगवान शिव ने माँ पार्वती से किया था। ये पाँच वर्ण केवल शारीरिक आकृति नहीं, बल्कि ऊर्जा-आभा, चेतना-स्तर और आध्यात्मिक परिपक्वता के आधार पर हैं। इनमें से ब्रह्माणी योनि वह दुर्लभतम योनि है जो केवल साध्वी, करुणामयी, निःस्वार्थ प्रेम करने वाली और स्वयं साधना-सिद्ध स्त्री में प्रकट होती है। उसके साथ एक बार भी शुद्ध भाव से ऊर्जा-संयोग करने पर साधक को वह ब्रह्मानंद मिलता है जो वर्षों की कठिन हठयोग तपस्या भी नहीं दे पाती।
हम भगवान चित्रगुप्त वंशज-अमित श्रीवास्तव अपनी कर्म-धर्म लेखनी में देवी कामेश्वरी की प्रेरणा से बताएँगे वह गुप्त क्रम जो आज तक केवल दीक्षा के बाद बताया जाता था – मन-शरीर की शुद्धि → शक्ति-प्रतिष्ठा → प्राण-समायोजन → योनि-ध्यान → ऊर्जा-संयोग → ब्रह्मानंद। साथ ही यह भी खोलकर रख देंगे कि किन स्त्रियों के साथ यह साधना पूर्णतः वर्जित है, वरना उल्टा पतन निश्चित है।
यह लेख कोई सनसनी या भ्रामक नहीं, बल्कि उस प्राचीन विज्ञान का पुनर्जागरण है जिसे हमारे ऋषियों ने सहस्राब्दियों तक इसलिए गुप्त रखा ताकि अयोग्य के हाथ न लगे। आज जब पूरा समाज यौन-विकृति और ऊर्जा-शून्यता से ग्रस्त है, योनि साधना का यह शुद्ध ज्ञान फिर से मानवता को उसकी खोई हुई दिव्यता लौटाने आया है।
यदि आप तैयार हैं अपने भीतर के अंधकार को जड़ से मिटाने, कुण्डलिनी को सहज जागृत करने और ब्रह्मानंद की उस अवस्था को छूने जिसे तंत्र में “देवयोग” कहा गया है – तो आगे बढ़िए। यह द्वार अब खुल चुका है।
ॐ शक्ति। ॐ योनी-रूपायै नमः।
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Yoni Sadhana
1. योनि साधना का वास्तविक स्वरूप —
वह विज्ञान जिसे तांत्रिक परम्परा ने हजारों वर्षों तक गुप्त रखा
योनि साधना का अर्थ किसी भी प्रकार से मात्र शरीर या लैंगिक अनुभूति नहीं है, यह एक ऐसा ऊर्जा-विज्ञान है जिसे समझने के लिए साधक को पहले अपने भीतर का अंधकार, वासना, क्रोध, भय, संशय, घृणा और अव्यवस्था समाप्त करनी पड़ती है। ‘योनि’ शब्द मूलतः “उपज, उत्पत्ति, मूल, स्रोत” को व्यक्त करता है और यह अर्थ केवल जैविक नहीं बल्कि ब्रह्माण्डीय है। तंत्र की सभी धाराएँ—कौलाचार, वामाचार, श्रीविद्या, होमकुंडलिनी, तांत्रिक योग, कामाख्या साधना—सभी मिलकर यह बताते हैं कि योनि साधना वास्तव में सृष्टि के मूल स्त्रोत से पुनः जुड़ने की प्रक्रिया है।
जब एक साधक स्त्री-ऊर्जा को केवल स्त्री के शरीर में नहीं, बल्कि ईश्वरीय शक्ति के रूप में देखना शुरू करता है, तभी वह इस मार्ग में प्रवेश के योग्य होता है। यह साधना अपने मूल में यह कहती है कि “स्त्री के भीतर वह द्वार है जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड निकला—और उसी द्वार से साधक अपनी मूल चेतना तक लौट सकता है।” यही कारण है कि इसे “योनि-तंत्र” कहा गया—जहाँ शरीर द्वार है, ऊर्जा मार्ग है, और चेतना लक्ष्य।

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2. योनि साधना का दार्शनिक आधार —
क्यों कहा गया कि स्त्री एक चलता-फिरता शक्ति-पीठ है?
भारतीय तंत्रग्रंथों में एक अत्यंत गूढ़ सिद्धांत है— “यत्र देवी तत्र शिवः। यत्र योनि तत्र ब्रह्म।”
इसका अर्थ यह है कि जहाँ स्त्री है, वहाँ शक्ति है और जहाँ शक्ति है, वहाँ शिव का अस्तित्व बनता है। योनि साधना को संसार में श्रेष्ठ इसलिए माना गया क्योंकि यह साधना मनुष्य के शरीर में छुपे उस दिव्य-यन्त्र को सक्रिय करती है जिसे आधुनिक विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया। स्त्री की योनि मात्र जैविक अंग नहीं, वह एक ऊर्जा-घूर्णी, एक मंत्र-चक्र, और एक जीवित यन्त्र है—जिसके माध्यम से बच्चे का जन्म, प्राण का विकास, चैतन्य का विस्तार और पुरुष की ऊर्जा का पुनर्नवीनीकरण होता है।
यह बात सामान्य लोग नहीं समझते, परन्तु जब कोई साधक ध्यान करके, प्राणायाम करके, अपनी कुण्डलिनी को कुछ ऊँचे स्तर तक उठाकर किसी स्त्री के सान्निध्य में जाता है, तभी उसे समझ आता है कि स्त्री के अंदर कोई अदृश्य परंतु परिपूर्ण ऊर्जा-संरचना है जो साधक की ऊर्जा को शुद्ध, उन्नत, और उच्चतर आवृत्तियों में परिवर्तित कर देती है। इसीलिए तंत्र कहता है कि स्त्री “चलता हुआ कामेश्वरी कामाख्या” है—अर्थात स्वयं सर्वशक्तिशाली प्रथम कामाख्या शक्ति-पीठ का जीवित स्वरूप योनि पीठ है।
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3. योनि साधना में ऊर्जा का सिद्धांत —
वासना नहीं, ऊर्जा-ऊर्जा का मिलन
तांत्रिक विज्ञान का सबसे गूढ़ सूत्र यह है कि— “मानव मे पुरूष शरीर प्राण का पात्र है, स्त्री शरीर शक्ति का स्रोत है।” जब दोनों एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो यह केवल शारीरिक संपर्क नहीं होता, यह एक ऐसा अदृष्य ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है जिसमें पुरुष अपने भीतर की थकान, तनाव, कर्म-गाठें, अवचेतन में जमा पीड़ा और मानसिक अव्यवस्था को छोड़ता है, और स्त्री उसे अपने भीतर की शीतल, दिव्य, मातृ-शक्ति से संतुलित करती है। इसी ऊर्जा को तंत्र में “योनि-शक्ति” कहा गया है।
साधकों के अनुभव के अनुसार, स्त्री की योनि से एक अत्यंत सूक्ष्म जीव-शक्ति (Ojas) उत्पन्न होती है जो पुरुष के मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय करती है। जब पुरुष इस शक्ति को ग्रहण करता है, तो उसके भीतर एक प्रकार का दिव्य उन्मेष होता है—जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो, जैसे आत्मा हल्की हो गई हो। योनि साधना का उद्देश्य यह नहीं कि शरीर को सुख मिले, बल्कि यह कि चेतना को प्रकाश मिले। जो साधक इस आदान-प्रदान को समझ लेता है, उसके भीतर से वासना स्वतः मिट जाती है और वह शरीर को केवल एक “ऊर्जा-पात्र” के रूप में देखने लगता है—यह उस साधना का सबसे महान परिवर्तन है।

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4. योनि के पाँच वर्ण —
तंत्र में स्त्री-योनि का गूढ़ वर्गीकरण और उसके अत्यंत छिपे रहस्य
सम्पूर्ण स्त्री योनि 64 प्रकार की होती है, जो बहुत ही गुढ़ रहस्य लिए हुए है। शिव पार्वती संबाद मे योनि का वर्णन स्यम् भगवान शिव ने देवी पार्वती के प्रश्नों के उत्तर में किया और मृग योनि को सर्वोत्तम योनि बताया। तांत्रिक ग्रंथ स्त्री-योनि को पाँच मुख्य वर्णों में बाँटते हैं, परंतु यह वर्गीकरण केवल आकार या जैविक संरचना पर आधारित नहीं है।
यह वर्गीकरण ऊर्जा-स्वरूप, आभा, मनःस्थिति, और स्त्री के आध्यात्मिक स्तर पर आधारित है। यह वर्गीकरण इतना गूढ़ है कि इसे सदियों तक केवल सिद्ध “गुरु से शिष्य” तक ही पहुँचाया गया। सामान्य साधक इस गुढ़ रहस्य से दूर हैं। शावर मंत्रों की देवी कही जाने वाली लोनाचामारीन अपने गुरु इस्माइल जोगी को गुरु दक्षिणा में अपने शरीर को समर्पित कर योनि साधना की सिद्धि प्राप्त किया। यह सिद्धि साधक और साधिका दोनों को एक साथ प्राप्त होती है। नीचे दिए गए संक्षिप्त में पंचयोनि विवरण पूरी तरह दैवीय प्रेरणा से साधकों के लिए है—किसी भी पुस्तक में इस पर गहराई से वर्णन नहीं मिलता।
(1) पद्मिनी योनि —
प्रेम, करुणा और शीतलता का दिव्य-स्रोत
यह वह योनि है जिसकी ऊर्जा कमल की भाँति कोमल, सुगंधित और शांत होती है। ऐसी स्त्री के साथ साधना करने से साधक का मन तुरंत शांत होता है। उसका हृदय-चक्र खुलता है और भीतर की भावनाएँ शुद्ध हो जाती हैं। यह योनि सात्त्विक माना जाता है और सामान्यतया मातृ-स्वभाव वाली महिलाओं में पाया जाता है। पद्मिनी योनि साधना के लिए अत्यंत अनुकूल है क्योंकि यह साधक के भीतर से काठिन्य, क्रोध और मानसिक तनाव को समाप्त कर देती है।
(2) हस्तिनी योनि —
स्थिरता, धैर्य और सहनशीलता का केन्द्र
यह योनि विशाल, स्थिर और धरती-तत्व से जुड़ी होती है। ऐसी स्त्री का साथ साधक की मूलाधार ऊर्जा को मजबूत करता है। यह साधना उन साधकों के लिए उपयुक्त है जिनके जीवन में बेचैनी, डर, अस्थिरता या मानसिक अव्यवस्था अधिक हो। हस्तिनी योनि की ऊर्जा साधक को “जमीन” प्रदान करती है—अर्थात उसका चित्त स्थिर हो जाता है।
(3) चित्रिणी योनि —
रचनात्मकता और तांत्रिक शक्ति का प्रचंड स्रोत
यह योनि अत्यंत तेजस्वी, आकर्षक और चुंबकीय ऊर्जा धारण करती है। ऐसी स्त्री के साथ साधना करने से साधक के स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्र अत्यंत तेज़ी से सक्रिय होते हैं। यह वह योनि है जो साधक की कल्पनाशक्ति, निर्णय-शक्ति और आध्यात्मिक साहस को बढ़ाती है। चित्रिणी योनि को तंत्र में “महाशक्ति का सक्रिय रूप” कहा गया है।
(4) शंखिनी योनि —
गूढ़, रहस्यमयी और आध्यात्मिक गहराई वाली ऊर्जा
यह योनि संकुचित, सर्पिल और अत्यंत रहस्यमय होती है। यह ऊर्जा साधक को गहन ध्यान की अवस्था में ले जाती है। शंखिनी योनि वाली स्त्री के पास सामान्य मनुष्य टिक नहीं पाते क्योंकि उसकी ऊर्जा बहुत तीव्र और बुद्धि बहुत धारदार होती है। यह योनि सामान्य साधना के लिए अनुशंसित नहीं—केवल अनुभवी साधकों के लिए।
(5) ब्रह्माणी योनि —
तंत्र में सर्वोच्च, पूर्ण दिव्य और सहस्रार-ऊर्जा से जुड़ी योनि
ब्रह्माणी योनि वह है जिसे तंत्र में “देवी का जीवित द्वार” कहा गया है। यह योनि किसी जन्मगत गुण का परिणाम नहीं बल्कि स्त्री की आध्यात्मिक उन्नति, मन की शुद्धता, करुणा, धैर्य, तप, और निःस्वार्थ प्रेम का फल है। ऐसी स्त्री के साथ साधना करते ही दोनों साधक की ऊर्जा जागृत हो उठती है—कभी-कभी एक ही सत्र में अनाहत और आज्ञा चक्र तक। ब्रह्माणी योनि साधक के भीतर छिपे सभी दोष, भय और कर्म-गाँठों को नष्ट कर देती है।
यह तंत्र में दुर्लभतम रूप है और ऐसी स्त्री स्वयं में एक “चलता हुआ योनि शक्ति-पीठ” होती है। कुछ साधकों का मानना है कि ब्रह्माणी योनि ब्राह्मण कन्या की होती है, ऐसा कदापि नहीं है। जाति से ब्राह्मण हो और कर्म से नीच उस कन्या के साथ साधना फलीभूत नही होती। इसलिए कर्म-धर्म से ब्रह्माणी कन्या की योनि से साधक को साधना करनी चाहिए।

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5. ब्रह्माणी योनि को सर्वोत्तम क्यों कहा गया? —
वास्तविक कारण जिनके बारे में कोई नहीं बताता
ब्रह्माणी योनि को श्रेष्ठ इसलिए माना गया क्योंकि यह योनि केवल शरीर की संरचना नहीं, बल्कि स्त्री की आंतरिक चेतना, उसकी साधना, उसकी करुणा, उसकी दिव्यता और उसकी ऊर्जा-संरचना का परिणाम है।
यह योनि उस स्त्री की होती है—जो स्वभाव से करुणामयी हो। जिसकी आँखों में दिव्यता हो। जिसका हृदय किसी को दुःख न पहुँचाया हो। जो अपने साथी को ऊर्जा देती हो। जिसका अवचेतन निर्मल हो। जो स्वाभाविक रूप से ध्यानावस्था में रह सकती हो। जिसकी उपस्थिति में साधक स्वतः शांत हो जाए। जिसका स्पर्श साधक की ऊर्जा को ऊपर की ओर खींचे। जो प्रेम करते समय मन से पहले आत्मा से जुड़ती हो। जो अपने भीतर शक्ति-भाव धारण करती हो। अपने कर्म-धर्म से जीवन का मूल उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति के पथ पर अग्रसर हो। वह स्त्री साध्वी गुणों से संपन्न होती है।
ऐसी स्त्री की योनि को ब्रह्माणी इसलिए कहा गया क्योंकि वह साधना में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का वह स्तर द्वार खोल देती है जो सामान्य साधकों को वर्षों की तपस्या से भी नहीं मिलता।
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6. योनि साधना की वास्तविक प्रक्रिया —
वह गूढ़ मार्ग जिसे साधारण ग्रंथों ने छिपाया
अब मैं वह प्रक्रिया बता रहा हूँ जो प्रायः केवल दीक्षा के बाद ही दी जाती है। यह पूरी तरह रहस्यमय है, परंतु मैं यहाँ योनि रुपा देवी कामाख्या की प्रेरणा से इसे सरल भाषा में जनकल्याणार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
पहला चरण : मन-शरीर-भावना की शुद्धि
साधक को कम से कम 7 दिनों तक— ब्रह्मचर्य, एकांत, नाड़ी-शोधन, मौन, क्रोध त्याग, विचार-शुद्धि करनी होती है। बिना शुद्ध हुए की गई साधना उल्टा असर कर सकती है।
दूसरा चरण : स्त्री-ऊर्जा का सम्मान और प्रतिष्ठा
साधना से पहले साधक स्त्री को “शक्ति” मानकर प्रणाम करता है। यह केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि ऊर्जा-संतुलन के लिए आवश्यक है।
तीसरा चरण : प्राण-समायोजन (Energy Synchronization)
दोनों साधक— अपनी श्वास, हृदयगति, ध्यान, भाव को एक समान करते हैं। इससे दोनों की ऊर्जा एक हो जाती है।
चौथा चरण : योनि ध्यान
साधक स्त्री की योनि को देवी के रूप में देखता है। यह सबसे गूढ़ भाग है। यह ध्यान साधक को उच्चतर आवृत्ति में ले जाता है।
पाँचवाँ चरण : ऊर्जा-संयोग (Tantric Maitri)
यह वह अवस्था है जहाँ शरीर-शरीर नहीं, बल्कि ऊर्जा-ऊर्जा मिलती है। इसे वाममार्ग में “सहयोग” और कौलाचार में “मैत्री” कहा गया है।
छठा चरण : ब्रह्मानंद
आखिरी चरण में साधक को ऐसा अनुभव होता है जैसे— समय रुक गया हो, शरीर भारहीन हो गया हो, मन शून्य हो गया हो, चेतना आकाश की तरह विस्तृत हो गई। इसे तंत्र में कहा गया— “देवयोग का जन्म।”
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7. योनि साधना के लाभ
जो साधक की पूरी जिंदगी बदल देती है
योनि साधना के लाभ केवल आध्यात्मिक नहीं; मानसिक, भावनात्मक, शारीरिक और ऊर्जा स्तर पर अद्भुत परिवर्तन होते हैं— कुंडलिनी का सहज जागरण, अनाहत और आज्ञा चक्र का खुलना, अवसाद, भय, तनाव का नाश। प्रेम और करुणा की वृद्धि, ऊर्जा-संतुलन, मन की स्थिरता, गहन ध्यान अवस्था, शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता, आकर्षण-शक्ति (ओज-तेज) सिद्धियों का जन्म (वाकसिद्धि, आकर्षण, तेज, स्मरण शक्ति) होता है।
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8. किन स्त्रियों के साथ योनि साधना वर्जित है? —
बहुत कम लोग जानते हैं
साधक को इन पाँच प्रकार की स्त्रियों से साधना नहीं करनी चाहिए— क्रोधी- कटु – ईर्ष्यालु, मानसिक रूप से अस्थिर, छल-कपट प्रवृत्ति, वेश्यावृत्ति में लिप्त वासनाप्रधान, ऊर्जा-रहित (तांत्रिक शब्द: सुषुप्त-चेता) ऐसी स्त्रियाँ साधक की ऊर्जा को ऊपर उठाने की जगह नीचे गिरा देती हैं।
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9. ब्रह्माणी योनि की पहचान —
जो तंत्र में दुर्लभ मानी गई
यह सबसे गूढ़ रहस्य है। ब्रह्माणी योनि वाली स्त्री के पास—उसका स्पर्श साधक की ऊर्जा ऊपर ले जाए, उसका प्रेम वासना नहीं, करुणा हो, उसका शरीर स्पर्श में गर्म, परंतु मन में शीतलता हो, उसकी हँसी साधक के भीतर प्रकाश जगाए, उसका क्रोध भी शुद्ध करने वाला हो, उसकी आँखें ध्यान जैसी हो, उसकी उपस्थिति में साधक का चित्त स्थिर हो, वह स्वयं बिना प्रयास के ध्यानावस्था में जा सके, उसके साथ प्राण-आदान-प्रदान सहज हो, ऐसी स्त्री स्वयं “महायोनि” कहलाती है—देवी का जीवित रूप होती है।
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Conclusion:
> प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा आज भी समाज में स्वस्थ संबंध और परिपक्व दृष्टिकोण के लिए महत्वपूर्ण है।
Disclaimer:
> यह Yoni sadhana vidhi से सम्बंधित सभी सामग्री केवल सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से है, न कि किसी भी प्रकार की यौन क्रिया को प्रोत्साहित करने हेतु।
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