रिश्तों की पहचान: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर

Amit Srivastav

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औरत: पुरुष के रिश्ते का गूढ़ अर्थ

रिश्तों में शारीरिकता और भावनाएं, लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर, शारीरिक संबंध और समाज, शादीशुदा पुरुषों के साथ महिलाओं के शारीरिक रिश्ते जैसे तमाम विचार धारणाएं हमारे भारतीय समाज में रिश्तों और शारीरिक संबंधों को लेकर विकसित और प्रचलित हो चुकी हैं। कुछ रिश्ते समाजिक रूप से होते हैं, उन रिश्तों को तो आसानी से देखा और समझा जा सकता है, लेकिन कुछ रिश्ते अनैतिक या गुप्त रूप से बनाये जाते हैं, उन रिश्तों की पहचान सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जा सकता है। विवाह, प्रेम, शारीरिक संबंधों के बीच परम्परागत एवं आधुनिक दृष्टिकोण का अंतर अब धीरे धीरे बहुत स्पष्ट हो चुका है।

रिश्तों की अहमियत इन हिंदी

रिश्तों की पहचान: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर

आज के इस लेख में, हम भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज के वंशज संपादक – अमित श्रीवास्तव यह बताने की कोशिश करेंगे कि किस प्रकार समाज में लाइफ पार्टनर और सेक्स पार्टनर के बीच की धारणाएं बदली है, समाज में रिश्तों की अहमियत क्या है, सुस्पष्ट हिंदी भाषा में और यह किस तरह से जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित कर रही है। हर व्यक्ति अपने मनोभाव से उत्पन्न शारीरिक रिश्तों से सम्बंधित सवालों का जवाब जानने के लिए उत्सुक रहता है, किन्तु हमारे भारतीय समाज में सेक्सुअल रिश्तों से सम्बंधित जानकारी आदान-प्रदान करने में लोगों को शर्म सी महसूस होती है। हम लेखकों का दायित्व है, समाज के लिए मार्गदर्शी जानकारी प्रदान करना। इसी क्रम में हम चित्रगुप्त वंशज अपनी कर्म धर्म लेखनी को प्रधानता देते हुए, हर तरह की लेखनी समाज में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से देते रहते हैं। आज ऐसे ही तमाम सवालों को ध्यान में रखकर इस लेखनी के माध्यम से तमाम जानकारी दे रहे हैं, तो अंत तक बने रहिए हमारी सरल सुस्पष्ट मधुर भाषिक लेखनी के साथ यहां वो सब जानकारी दी जायेंगी जो जानने के लिए गूगल पर सर्च किया जाता है। इस लेख में बहुत सारे लोगों का ज्ञानवर्धक प्रश्नों के उत्तर समाहित है।
परंपरागत और सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लाइफ पार्टनर और सेक्स पार्टनर एक ही व्यक्ति होता है। विवाह और रिश्ते सेक्स के साथ भावनात्मक संबंधों को भी गहरा करते हैं लेकिन बदलते समय के साथ खासकर इंटेरनेट और सोशल साइट्स के आगमन से रिश्तों और सेक्स को लेकर मान्यताओं में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। आज के समय में यह देखा जा रहा है कि कुछ युवा होती युवतियां, महिलाएं, खासकर एकल, तलाकशुदा यहां तक कि शादीशुदा महिलाएं भी ऐसे पुरुषों के साथ जुड़ रही हैं जो पहले से ही शादीशुदा हैं।

समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है

युवा होती युवतियां उम्र दराज पुरुषों से तो उम्र दराज महिलाएं युवा होते युवकों के साथ जिस्मानी रिस्ता बना रही हैं। इस तरह के रिश्ते कई बार न केवल भावनात्मक और शारीरिक होते हैं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण से भी जटिल हो जाते हैं।
इस आर्टिकल में हम इस बदलते सामाजिक परिदृश्य, महिलाओं और पुरूषों की भूमिका और ऐसे रिश्तों के इमोशनल और सामाजिक परिणामों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं। साथ ही यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि कैसे पुरूष या महिला अक्सर खुद को इस जाल में फंसा लेती हैं, जहां से निकल पाना मुश्किल होता है और इसका उनके जीवन पर क्या असर होता है?

रिश्तों में परंपरागत दृष्टिकोण

प्राचीन समाज में विवाह और रिश्तों की संस्था मजबूत थी। विवाह को केवल शारीरिक संबंधों के रूप में नहीं बल्कि दो परिवारों के बीच एक सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक बंधन के रूप में देखा जाता था। इस बंधन में शारीरिक संबंध केवल एक घटक था जो जीवनसाथी के बीच प्रेम और जुड़ाव को और अधिक गहरा करता था। समाज में यह मान्यता थी कि विवाह के बाहर के शारीरिक संबंध न केवल अनैतिक थे बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से गलत माने जाते थे।

आधुनिक समाज और रिश्तों का स्वरूप

आज के आधुनिक समाज में रिश्तों का स्वरूप बहुत ही बदल चुका है। इंटरनेट, सोशल साइट्स और पश्चिमी प्रभाव के कारण लोग अब रिश्तों को पारंपरिक दृष्टिकोण से हटकर देखने लगे हैं। अब विवाह के बाहर के संबंधों को लेकर समाज में अधिक खुलापन आ चुका है। खासकर शहरी क्षेत्र में महिलाओं और पुरूषों, “दोनों के लिए” अपनी यौनिकता को व्यक्त करना और नये-नये तरह के रिश्ते बनाना अधिक स्वीकार हो गया है।

एकल और तलाकशुदा स्त्रीयों की बदलती सोच

रिश्तों की पहचान: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर

वर्तमान समय में एकल और तलाकशुदा स्त्रियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इसका मुख्य कारण है महिलाओं की स्वतंत्रता, शिक्षा व आत्मनिर्भरता। पिछले समय में महिलाएं पारिवारिक दबाव में रहकर जीवन भर एक ही रिश्ते में बंधी रहती थीं लेकिन अब महिलाएं अपने जीवन जीने का निर्णय स्वयं लेने लगी हैं। इस स्वतंत्रता के साथ कुछ नई चुनौतियां भी आ रही हैं।
महिलाएं शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक तृप्ति की तलाश में ऐसे पुरूषों के साथ जुड़ने लगी हैं, जिनका अपना परिवार व बच्चे हैं। इस तरह के रिश्तों का निर्माण अक्सर सोशल मीडिया साइट्स के माध्यम से हो रहा है, जहाँ अपने पति से नाखुश वो जरूरतमंद महिलाएं अपने अंगों का खुला अधखुला प्रदर्शन कर पुरूषों को आकर्षित करती हैं और अपने जाल में फंसा कर अपनी आर्थिक व शारीरिक जरूरतों को पूरा करती हैं। यह प्रक्रिया कुछ समय के लिए उन महिलाओं को संतुष्टि प्रदान करती है किन्तु दीर्घकालिक परिणाम अक्सर उलझन भरे होते हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण बालीवुड की एक फिल्म अभिनेत्री राखी सावंत का दे रहे हैं, इस बीडीओ को देखकर शायद समझ आ सके। पैसे और शारीरिक संतुष्टि के लिए कईयों पुरूषों के साथ जाने वाली इस हिन्दू युवती का हस्र क्या हुआ है? लिखने में शर्म आ रही है, आज मुस्लिम कंट्री में फंसी फिल्म अभिनेत्री राखी सावंत भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वहां से निकाल अपने जन्म भूमि भारत लाने की गुहार लगा रही है। इस बीडीओ में राखी सावंत खुद से फातिमा बनी “पैसे और शारीरिक भूख शांत करने की खातिर” आदिल खान दुर्रानी से प्रेग्नेंट होकर हज करने गयी उस समय की यह बीडीओ है।

इमोशनल बाँन्डिंग: विश्वास और धोखा

कई बार ऐसे रिश्तों में महिलाएं सिर्फ़ शारीरिक संतुष्टि के लिए नही जुड़ती, बल्कि वे इमोशनली भी इन पुरूषों के साथ बंध जाती हैं। वो यह मानने लगती हैं कि यह रिश्ता सिर्फ़ हम दोनों के बीच है और इस बारे में किसी को पता नही चलेगा। उन औरतों का यह मानना उनकी बहुत बड़ी भूल है, क्योंकि? नाजायज़ जिस्मानी संबंध कभी छूपती नही है। और कभी-कभी उस नाजायज़ जिस्मानी सम्बन्ध का लाभ कुछ युवाओं द्वारा गिरोह बना कर या अकेले भी उठा लिया जाता है, जो अक्सर रेप कांड के रूप में समाज के सामने आ जाती है। अक्सर देखा गया है, जब कोई नाजायज़ जिस्मानी सम्बन्ध बना रहा होता है और उस पर किसी अन्य व्यक्ति की नज़र होती है, तब रंगे हाथ पकड़े जाने की स्थिति में बदनामी या पिटाई से बचने बचाने के लिए पकड़ने वाला व्यक्ति भी जिस्मानी सम्बन्ध बना किसी से न कहने कि बात कह किनारे हो जाता है, तो कहीं विरोध होने पर औरत द्वारा मामला रेप का रूप भी ले लेता है।
जो पुरूष या महिला अपने जीवन साथी या परिवार को धोखा दे देकर किसी गैर-गैर के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं वह किसी का भी सच्चा साथी नही हो सकते। ऐसे लोग केवल अपनी कामुकता को प्रधानता देते हैं। एक दूसरे पर “बालीवाल फुटबाल ट्राफी जीत” की तरह खुशी मनाते हैं। अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए इन रिश्तों को बनाए रखते हैं। गर्व होता है कि एक औरत या एक पुरुष हम पर फ़िदा है, भले ही उनकी अपनी शादीशुदा जिंदगी चल रही होती हो या भविष्य खराब हो रहा होता हो।

लाइफ पार्टनर का मतलब

सामाजिक रूप से शादी-ब्याह द्वारा पती पत्नी के रिश्ते में बंधा पार्टनर जीवनभर का साथ निभाने वाला लाइफ पार्टनर होता है। एक दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी होता है। यह लाइफ पार्टनर स्थाई रूप से सेक्स पार्टनर भी होता है। लाइफ पार्टनर के साथ पूरी जिन्दगी बिताने की योजना बनाई गई होती है इसी कारण लाइफ पार्टनर के साथ शारीरिक मानसिक और भावनात्मक जुड़ाव कहने का मतलब सब कुछ शामिल होता है। सिर्फ लाइफ पार्टनर के साथ ही न केवल शारीरिक जुड़ाव रहता है बल्कि एक मजबूत मानसिक व भावनात्मक बंधन होता है।

सेक्स पार्टनर का मतलब

रिश्तों की पहचान: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर

सेक्स पार्टनर जो अस्थाई क्षणिक समय के लिए यौनसुख देने वाला सिर्फ सेक्स पार्टनर होता है उसके साथ कोई भविष्य निर्धारित नहीं हो पाता। यदा-कदा कोई सेक्स पार्टनर जीवन साथी प्रेम विवाह कर भी लेते हैं तो यह आगे चलकर ज्यादातर रिस्ता टूटते हुए देखा जा सकता है। बीच-बीच में वैसे स्त्री पुरुष किसी अन्य के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने लगते हैं जो रिश्ते में दरार पैदा करने का कारण बन सकता है। कुल मिलाकर सेक्स पार्टनर कुछ समय का साथी होता है क्योंकि वैसे लोगों की आदत सी होती है इधर-उधर नज़र डाल शारीरिक संबंध स्थापित करना। सेक्स पार्टनर के साथ रिश्ता अधिकतर शारीरिक होता है और यह संबंध अस्थाई होता है।

लाइफ पार्टनर और सेक्स पार्टनर में अंतर

लाइफ पार्टनर और सेक्स पार्टनर के बीच का अंतर समझना जरुरी है। जहां लाइफ पार्टनर जीवनभर का साथ निभाता है, वहीं सेक्स पार्टनर का रिश्ता अस्थायी तौर पर होता है। समाज में लाइफ पार्टनर और सेक्स पार्टनर के विचार लंबे समय से परिभाषित रहे हैं। पारंपरिक रूप से इन दोनों का मेल एक दूसरे के साथ होता है, खासकर शादीशुदा रिश्तों में। सोशल मीडिया के प्रसार और बदलती सोच के कारण, यह परिभाषा धुंधली होती जा रही है। एकल, शादीशुदा और कई बार शादीशुदा महिलाएं भी ऐसे पुरूषों के साथ इन्वाँल्व हो रही हैं जो पहले से शादीशुदा होते हैं।

महिलाओं की बदलती भूमिका और स्वतंत्रता

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आधुनिक युग में महिलाओं की भूमिका और स्वतंत्रता ने रिश्तों को पुनर्परिभाषित किया है। पहले जहां महिलाएं केवल घर और परिवार तक सीमित रहती थीं, अब वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और अपने रिश्तों को खुद नियंत्रित कर रही हैं। कई महिलाएं अपने जीवन में शारीरिक और भावनात्मक संतुष्टि के लिए अलग-अलग अपनी इच्छा अनुसार पार्टनर के साथ रिश्ते बनाती हैं, भले ही वे समाज की परंपरागत मान्यताओं के विपरीत हों। न ही इन्हें अपनी जाति धर्म का सम्मान करना रहता है न ही समाज क्या कहेगा इसका परवाह रहता। ऐसी ही महिला या पुरुष काफिर कहे जाते हैं। अक्सर न ये घर की होती न घाट की मतलब जीवन नर्क हो जाता है। जिसका जिम्मेदार खुद ही होती हैं।

सोशल साइट्स मीडिया और रिश्तों पर उसका असर

सोशल मीडिया साइट्स ने रिश्तों को पूरी तरह से बदल रहा है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म ने अपरिचित से अपरिचित लोगों को एक दूसरे के करीब ला रहा है। लोग अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने में शर्म नही कर रहे हैं और अपनी यौनिकता को अधिक स्वतंत्र रूप से प्रकट कर रहे हैं। सोशल मीडिया ऐसे रिश्तों को जन्म दे रहा है जो पहले की समाज में स्वीकार नहीं थे।

शादीशुदा पुरुषों के साथ जुड़ने का आकर्षण

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कई बार, शादीशुदा, तलाकशुदा या एकल महिलाएं पहले से शादीशुदा या कुंवारे युवकों के साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं। इसका कारण भावनात्मक और शारीरिक संतुष्टि की तलाश होती है। उन्हें लगता है कि यह रिश्ता उनके जीवन में कोई बड़ा बदलाव ला सकता है, लेकिन अक्सर यह स्थिति उलझन भरी और दर्दनाक साबित होती है।

शातिर पुरूषों के जाल में फंसती महिलाएं

कुछ पुरूष, जो पहले से शादीशुदा होते हैं, महिलाओं को अपने आकर्षण और प्रभाव में फंसाकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं। यह स्थिति उनके अहंकार को संतुष्ट करता है और वे इसे एक “जीत” के रूप में देखते हैं। इस प्रक्रिया में महिलाएं खुद को भावनात्मक रूप से नुकसान पहुँचाती हैं, क्योंकि अंततः इन रिश्तों में उनका कोई भविष्य नहीं होता, मात्र छण भंगुर शारीरिक और मानसिक संतुष्टि हो जाती है। वह भी अगर सेक्स कला की अज्ञानता वश पेट से हो जाती हैं तो एक बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। कभी-कभी समाज में रिश्ते का गूढ़ रहस्य उजागर हो जाता है, तब तरह-तरह के आरोप प्रत्यारोप एक दूसरे पर लगने लगता है।

शातिर महिलाओं द्वारा पुरूषों का शोषण

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हालांकि, यह स्थिति केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। कई पुरूष भी शातिर महिलाओं द्वारा शोषित होते हैं। सोशल साइट्स पर नग्नता, अर्ध नग्नता, शारीरिक प्रदर्शन और आकर्षक का जाल बिछाकर महिलाएं भी पुरूषों से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ उठा रही हैं। जिसमें जिस्मानी रिश्ते तक बनाएं जा रहे हैं। जिस रिश्तों में न कोई जाति देखी जा रही है न अपना धर्म। यहां सोशल मीडिया पर मात्र आकर्षण और धन की प्रधानता का महत्व होता है। स्त्री पुरुष द्वारा कुल और गोत्र बदलने से उत्पन्न शिशुओं में एक अलग बदलाव जिसे दोगलापन कहा जा सकता है वो होता है। यह स्थिति समाज में लैंगिक समानता के नाम पर एक नई चुनौती बनकर उभर रही है।

समाज में पुरूषों और महिलाओं की भूमिका

समाज की नज़र में जब ऐसे रिश्तों का अंत होता है, तब आमतौर पर पुरूष निर्दोष औरत को दोषी करार दिया जाता है। इसका मुख्य कारण समाज में महिलाओं के प्रति दोहरी मानसिकता है। एक तरफ़ महिलाओं को परिवार एवं समाज की धुरी माना जाता है, वहीं दूसरी ओर उनकी स्वतंत्रता और यौनिकता को संदेह भरी नजर से देखा जाता है।

रिश्तों में आत्म-संयम और जागरूकता

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महिलाओं और पुरूषों को यह समझना चाहिए कि ऐसे रिश्ते जो केवल शारीरिक होते हैं भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोण से टिकाऊ नहीं होते उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह आवश्यक है कि वे खुद अपने आप को ऐसे जाल में फंसने से बचाएं और अपने जीवन में एक स्थिर और संतुलित पार्टनर की तलाश करें जो स्थाई हो। जीवन साथी वह व्यक्ति होता है जिसके साथ न केवल शारीरिक बल्कि भावनात्मक और मानसिक संतुलन भी होता है। यह सब संभव तभी है जब बालपन से ही सेक्स एजुकेशन कि शिक्षा पर ध्यान दिया जाए।

समाज की बदलती सोच और भविष्य की चुनौतियां

जैसे जैसे समाज आधुनिक होता जा रहा है, रिश्ते और शारीरिक संबंधों को लेकर समाज की सोच भी बदल रही है। लेकिन इसके साथ ही कई नयी चुनौतियाँ भी उत्पन्न हो रही है। शारीरिक संबंधों के प्रति खुलापन बढ़ रहा है लेकिन यह जरूरी है कि इसे एक संतुलित दृष्टिकोण से देखा जाए।

रिश्तों का अंत: दोषारोपण का खेल

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इन रिश्तों का अंत अक्सर दुखदाई होता है। जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं तो सबसे ज्यादा आघात महिला को ही सहना पड़ता है। पुरूष अपने परिवार के साथ वापस चला जाता है और उस पुरूष के सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। हमारा दोहरी मानसिकता का समाज और परिवार उसे फिर से स्वीकार कर लेते हैं, जबकि महिला को समाज और परिवार के ताने-बाने सहने पड़ते हैं। उस महिला को “गिरी हुई” बुरी महिला समझा जाता है, जबकि पुरूष को निर्दोष ठहराया जाता है। समाज की यह दोहरी मानसिकता सदियों से चली आ रही है। पहल करने में गलती पुरूष की हो चाहें महिला की दोषी महिला को ही ठहराया जाता है।
आधुनिकता की दौड़ में समझदारी से देखा जाए तो कहीं पुरूष तो कहीं महिला दोषी दिखाई देती हैं। महिला कि इच्छा के बगैर पुरूष एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा सकता और पुरुष कि इच्छा के बगैर भी चाहे तो महिला अपनी जरूरत पूरी करने के लिए कदम बढ़ा अपनी जाल में फंसा सकती है। ऐसा अक्सर जरुरतमंद महिला जरुरत पूरी कर सकने वाले पुरूषों के साथ करते देखी जा सकती हैं।

नतीजा: रिश्तों में आत्म-संयम और जागरूकता की जरुरत

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महिलाओं और पुरूषों को यह समझना चाहिए कि ऐसे रिश्ते जो केवल शारीरिक होते हैं, लेकिन भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोण से टिकाऊ नहीं होते, उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह आवश्यक है कि वे खुद को ऐसे जाल में फंसने से बचाएं और अपने जीवन में एक स्थिर और संतुलित पार्टनर की तलाश अपने माता-पिता अभिभावक को करने दें या खुद कर रहे हैं तो जाती गोत्र कुल का ध्यान रखते हुए ही करें। जीवन साथी वो व्यक्ति होता है जिसके साथ न केवल शारीरिक बल्कि भावनात्मक और मानसिक संतुलन भी होता है।
ऐसे मामलों में, महिलाओं और पुरूषों को आत्मसंयम और जागरूकता की आवश्यकता होती है, ताकि वे खुद को किसी धोखेबाज और स्वार्थी के जाल में फंसने से बचा सकें। उन्हें यह भी समझना होगा कि समाज की निगाहों में एक गलत रिश्ता उन्हें ही दोषी बना सकता है। इसलिए अपने फैसले सोच समझकर ही करनी चाहिए। अगर अपनी शारीरिक और मानसिक समस्याओं के लिए किसी अच्छे पार्टनर की तलाश कुछ समय सिर्फ अपनी समस्या समाधान के लिए किया जाता है तो हमारी नजरिए से कोई गलत नहीं है। क्योंकि अज्ञानी पार्टनर शरीर में बीमारियों का जन्म दाता होता है और सही ज्ञानी पार्टनर एक डॉक्टर के साथ ही दवाई-की-दुकान भी होता है। जहां बिना एक रूपये खर्च रामबाण उचित दवा भी सेक्स के द्वारा ही उपलब्ध हो जाती है।

रिश्तों की पहचान: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर

सही सेक्स शारीरिक और मानसिक बीमारियों का सटीक इलाज भी करता है। कुछ ऐसी बीमारी हैं जो सेक्स से स्थाई रूप से ठीक हो जाती हैं लेकिन उसके लिए सेक्स एजुकेशन कि पूरी जानकारी आवश्यक है। आज के समय में सेक्स की बात पर ही नाराजगी या शर्म देखने को मिल रही है। पिछले दिनों में एक मुख्यमंत्री ने स्थानीय भाषा में सेक्स एजुकेशन कि बात रखी तो जैसे राजनीति ही गर्म हो गई। उन विरोधियों से ही सेक्स से फायदे और नुकसान किस स्थिति में क्या हो सकता है पूछ देने पर ना मात्र का ज्ञान नहीं है लेकिन बिरोध करने में आगे दिखाई दे जाते हैं। सही अर्थों में सेक्स की जानकारी बहुत सारे इलाज करने के लिए सहायक है। अच्छा पार्टनर एक डॉक्टर और मेडिकल स्टोर से कम जो बिना एक रूपये खर्च किए अपनी सेक्स ज्ञान से कईयों बीमारियों को सहजता से ठीक कर सकता है। आधा ज्ञान फिर भी अभिमान वाले तो बहुत नजर आ जाते हैं।

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सेक्स का एक स्वस्थ और संतुलित संबंध जीवन में तृप्ति और संतुष्टि ला सकता है। लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी है कि पार्टनर के साथ पारदर्शिता और विश्वास हो। रिश्ते में विश्वास की कमी से शारीरिक संबंध भी लंबे समय तक संतोषजनक नहीं रहते। अच्छे सेक्स पार्टनर को जीवन में एक अच्छे चिकित्सक के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब दोनों पार्टनर एक दूसरे के प्रति समर्पित और ईमानदार हों। पार्टनर एक अच्छे चिकित्सक के साथ ही पूरी होलसेल मेडिकल स्टोर भी होता है अगर सही सेक्सुअल समझदार और ज्ञानी है तब। आज के समय में सेक्सुअल ज्ञान की कमी है, इसलिए सेक्स के प्रति सावधानी भी बरतना जरूरी है, सेक्स एजुकेशन कि अज्ञानतावश पार्टनर का शरीर तमाम बीमारियों से ग्रस्त होता चला जा रहा है। फिर बाहरी डाक्टरों, हास्पीटलों का चक्कर काटना पड़ता है और शरीर अग्रेजी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक दवाईयों पर निर्भर हो जाती है। शरीर दर्द, सर दर्द, सर्दी जुकाम, बुखार, हार्ट समस्या, ब्लड प्रेशर, सुगर, गठिया, लिकोलिया, बच्चेदानी में गांठ आदी गंभीर से गंभीर बीमारियों का घरेलू उपचार सही तरीके से स्थाई रूप में सेक्स से किया जा सकता है। यहां तक कि अपनी इच्छा अनुसार पुत्र पुत्री कि प्राप्ति भी होती है। अगर गर्भ धारण न करना हो तो भी तृप्तिकर सेक्स के बाद भी ठीक उस अंड फर्टिलाइजर के दिन में भी संबंध बनाने से निश्चिंत रहा जा सकता है, कि गर्भ धारण नही होगा। यह सब सही सेक्स कला और सेक्सुअल ज्ञान “सेक्स एजुकेशन” से संभव होता है।

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रिश्तों की पहचान: सेक्स और लाइफ पार्टनर : आर्टिकल का उद्देश्य

रिश्तों की पहचान: समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? लाइफ पार्टनर बनाम सेक्स पार्टनर

लाइफ पार्टनर और सेक्स पार्टनर के बीच का अंतर समझना जरूरी है। जहां लाइफ पार्टनर जीवनभर का साथी होता है, वहीं सेक्स पार्टनर का रिश्ता अस्थायी हो सकता है। इस बदलते सामाजिक परिवेश में पुरूष व महिलाओं को अपने फैसलों को लेकर सतर्क रहना चाहिए। खुद को आत्म सम्मान और आत्म प्रेम के साथ जीने की प्रेरणा देना बेहद जरूरी है। इस आर्टिकल में हमने बताया कैसे सेक्स पार्टनर और लाइफ पार्टनर के विचार बदल रहे हैं। एकल, तलाकशुदा, शादीशुदा महिलाएं अब अधिक स्वतंत्र हो रही हैं, लेकिन इसके साथ ही वे खुद को ऐसे पुरूषों के जाल में फंसा रही हैं, जो पहले से ही शादीशुदा हैं या बेमेल हैं। इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पुरूष और स्त्री को अपनी भावनाओं और रिश्तों को समझना होगा। अगर कोई पुरूष या महिला अपने परिवार को धोखा देकर दूसरी औरत या दूसरे पुरूष के साथ संबंध बना सकता है, तो वह कभी भी किसी का सच्चा साथी नही बन सकता।
इसलिए अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें, गलत रिश्तों में उलझने से बचें और एक ऐसा जीवन साथी का चुनाव करें जो न सिर्फ आपका सेक्स पार्टनर हो बल्कि एक परफेक्ट जीवन साथी के रूप में लाइफ पार्टनर हो।

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