तीसरी शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी, मुसलमानों की पीर नानी, हिन्दू – मुस्लिम एकता का प्रतीक

Amit Srivastav

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तीसरी शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी, मुसलमानों की पीर नानी, हिन्दू - मुस्लिम एकता का प्रतीक

हिंगलाज भवानी देवाधिदेव महादेव शिव की अर्धांगिनी सम्पूर्ण जगत की माता सती के इक्यावन शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है। यहां दर्शन मात्र से ही सभी पाप नष्ट हो मोंक्ष का मार्ग सुलभ हो जाता है। मोक्ष की इच्छा है तो पाकिस्तान के बलूचिस्तान आकर हिंगोल के चंद्रकूप पर्वत की गुफा में हिंगलाज भवानी की दर्शन किजिए। 

तीसरी शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी, मुसलमानों की पीर नानी, हिन्दू - मुस्लिम एकता का प्रतीक
हिंगलाज माता का इतिहास – 
वर्तमान में भारत का पड़ोसी मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान जहां हिंदुओं का मंदिर तोड़ दिया जाता है वहीं हिंगोल में चंद्रकूप पर्वत पर हिंगलाज भवानी का एक ऐसा मंदिर है जिसे तोड़ने की साहस किसी आतंकी में नहीं है। सदियों से यहां आकर मुसलमान नानी पीर के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं। एक बार आतंकियों ने इस हिंगलाज शक्तिपीठ मंदिर को तोड़ने के लिए कोशिश की तो वे सब हवा में लटके पाए गए थे। उस भयानक स्थिति को आतंकी आज भी याद करते हैं।
माता सती के इक्यावन शक्तिपीठों में से एक हिंगोल के चंद्रकूप पर्वत पर हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ की देखरेख यहां स्थानीय मुसलमान खुद करते हैं। मुस्लिम इसे बेहद चमत्कारिक नानी पीर मंदिर मानते हैं। यह शक्तिपीठ हिंगोल नदी समीप चंद्रकूप पहाड़ पर स्थित है। सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित यह गुफानुमा मंदिर इतना बड़ा क्षेत्र में है कि भक्त गण देखकर दंग रह जाते हैं। वैसे तो यह मंदिर आदिकाल से है। इतिहास से ज्ञात स्रोतों के अनुसार यह हिंगलाज मंदिर दो हजार वर्ष पहले भी यहीं स्थित था।
नवरात्रि में धूमधाम से लगते हैं मेले- बलूचिस्तान के हिंगोल में हिंगलाज शक्तिपीठ की प्रतिरूप देवी की प्राचीन सर पर मुकुट लगा दर्शनीय प्रतिमा विराजमान है। माता हिंगलाज भवानी की ख्याति सिर्फ कराची और पाकिस्तान ही नहीं अपितु पूरे दक्षिण एशिया में है। दूर्गा चालिसा पाठक इस हिंगलाज भवानी नाम से अनभिज्ञ नही हैं।
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51 शक्तिपीठ लेखनी

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी।।
किन्तु कुछ ही लोगों को इस पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित स्थापित हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ की जानकारी है। इक्यावन शक्तिपीठों का चमत्कारी वर्णन क्रमशः एक-एक कर आप सब पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। पहली प्रस्तुति सती का योनी भाग कामाख्या मंदिर जो नील गीरी, निलांचल पर्वत या कामना पर्वत के नाम से असम राज्य के कामरूप जिले में आप सब जान चुके हैं।
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सृष्टि का केन्द्र विन्दु मुक्ति का द्वार – कामाख्या शक्तिपीठ, त्रिया राज्य-जादूई नगरी आप सब ने शक्तिपीठ लेखक अमित श्रीवास्तव की कलम के माध्यम से प्रकाशित लेख पढ़ा।
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अगले दूसरी शक्तिपीठ लेख में निज मस्तक काट कर नग्न रुप में सहचरीयों सहित अपनी रुधीर पान करती झारखंड राज्य के रजरप्पा में दामोदर भैरवी के संगम स्थल पर छिन्नमस्तिका भवानी को पढ़ा। जो भी व्यक्ति रोग दोष पाप से मुक्त होने की कामना रखते हैं वो यहां दामोदर भैरवी संगम पर स्नान दान करें फिर छिन्नमस्तिका भवानी का आशिर्वाद प्राप्त कर सभी रोग दोष से मुक्त हों। amitsrivastav.in पर उपलब्ध हर मनपसंद लेखनी।
 
तीसरी शक्तिपीठ सती का सिर भाग बलूचिस्तान के हिंगोल में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। हिन्दू शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी तो मुस्लिम नानी पीर के रूप में मानते हैं। इस स्थान का जीवन में सिर्फ एक बार भी दर्शन मात्र से जीवन-मरण चक्र से आत्मा को मुक्ति मिल जाती है। नवरात्रि के दौरान तो यहां पूरे नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। सिंध-करांची के हजारों सिंधी हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं। पाकिस्तानी आतंकियों से भयभीत भारत से भी भक्तगण प्रतिवर्ष एक दो दल यहां दर्शन के लिए निश्चित ही पहुंच जाता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक एक सनातनी हिन्दू चाहे चारों धाम की यात्रा क्यों ना कर ले, शिव की काशी के गंगाजल में स्नान भी क्यों ना कर ले, सारे तिरथ बार बार गंगा सागर एक बार में डूबकी भी क्यो न लगा ले, हरि के द्वार हरिद्वार की यात्रा भी पूरी कर ले, अयोध्या में रामलला का दर्शन कर ले लेकिन अगर वह हिंगलाज भवानी की दर्शन नहीं करता तो उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। यहां स्थानीय परंपरा के मुताबिक जो स्त्रियां इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं, उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान पूर्वक देखा जाता है।
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यहां अंगारों पर चलने की एक परंपरा – मान्यताओं के अनुसार एक बार यहां माता प्रकट होकर वरदान दी थीं कि जो भक्त मेरा चुल चलेगा उसकी हर मनोकामना पुरी होगी। चुल मतलब – एक प्रकार से अंगारों का बाड़ा। जिसे मंदिर के बाहर 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है। इन्हीं अंगारों पर चलकर मन्नतधारी मंदिर में पहुचते हैं। ये माता का चमत्कार ही है कि किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता और उसकी मन्नत जरूर पूरी होती है। हालांकि पिछले कुछ सालों से इस परंपरा पर रोक लगी हुई है।
मान्यता है यहां प्राचीन काल से देवता और संत दर्शन करने आते हैं। आदिकाल से हिंगलाज भवानी के दर्शन की परंपरा रही है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी देवी दर्शन के लिए इस सिद्ध पीठ पर आए थे। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तपस्या किया था। उनके नाम पर आश्रम नामक स्थान अब भी यहां मौजूद है। उल्लेख मिलता है कि इस प्रसिद्ध मंदिर में माता की पूजा करने गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव, दादा मखान जैसे महान आध्यात्मिक संत आ चुके हैं।
बलूचिस्तान हिंगोल के चंद्रकूप पर्वत पर हिंगलाज माता का मंदिर एक खुली गुफा में है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। यहां पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है। इस मंदिर का कोई दरवाजा नहीं, मंदिर की परिक्रमा के लिए श्रद्धालु तीर्थयात्री माता के भक्त गण गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर से निकल जाते हैं। मंदिर के पास ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां स्नान करने आती हैं। यहां शक्तिपीठ रक्षक के रुप में देवाधिदेव महादेव भोलेनाथ, भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में पहले बिघ्न हर्ता मंगल कर्ता श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना कर शक्तिपीठ दर्शन की अनुमति ली जाती है तत्पश्चात शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हिंगलाज भवानी का दर्शन पूजा-अर्चना के बाद शक्तिपीठ के रखवाले भीमलोचन भैरव का दर्शन कर भक्तगण की यात्रा पूर्ण हो जाती है। यहां ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं।
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हिंगलाज माता पाकिस्तान कैसे जाएं

हिंगलाज सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं। एक पहाड़ों के रास्ते तो दूसरा मरूस्थल से होकर हिंगलाज भवानी दर्शन के लिए यात्रियों का जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है फिर लयारी कराची से छह-सात मील चलकर हाव नदी पड़ती है। यहीं से हिंगलाज की यात्रा शुरू होती है। यहीं संकल्प लेकर लौटने तक की अवधि के लिए संन्यास ग्रहण किया जाता है। यहीं पर छड़ी का पूजन होता है और यहीं पर रात में विश्राम करके प्रात:काल हिंगलाज माता की जय जयकारा बोलकर मरुतीर्थ की यात्रा प्रारंभ की जाती है। रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ है चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है हिंगोल में यात्री अपने सिर का बाल मुंडन करा यज्ञोपवीत धारण कर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर की यात्रा यहां से पैदल या छोटी गाड़ियों से करनी पड़ती है। क्योंकि इससे आगे कोई सड़क नहीं है इससे आगे आसापुरा नामक स्थान आता है यहां यात्री विश्राम करते हैं। इसके थोड़ा आगे काली माता का मंदिर है इस मंदिर में आराधना करने के बाद यात्री हिंगलाज माता के दर्शन के लिए रवाना होते हैं। भक्त गण चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं जहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं। इन कुंओं का पवित्र जल ग्रहण करते ही मन शुद्ध हो पिछले जन्मों तक के पाप से मुक्ति मिल जाती है। इसी के आगे हिंगलाज शक्तिपीठ मां का मंदिर है जहां दर्शन करते ही भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
चंद्रकूप पर्वत पर गिरा था माता सती का सिर
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ग्रंथों के मुताबिक जब भोलेनाथ माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो पूरी सृष्टि सहित ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने आदि शक्ति के आदेश पर अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर को इक्यावन भागों में काट दिया। माता सती का सिर भाग चंद्रकूप पर्वत पर स्थापित हुआ जो उस समय भारतीय क्षेत्र में ही था। मान्यता के अनुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था। इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता यह है- कहा जाता है कि हर रात इस स्थान पर ब्रह्मांड की सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते ही हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं।
 

हिंगलाज माता को मुसलमान कहते हैं नानी पीर

जब पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ था उस समय भारत की पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान और ईरान से जुड़ती थी। उस समय से बलूचिस्तान के मुसलमान हिंगलाज देवी की पूजा करते हैं उन्हें ‘नानी’ कहकर लाल कपड़ा, अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र और सिरनी प्रसाद चढ़ाते रहे हैं। मुस्लिम काल में इस मंदिर पर मुस्लिम आतंकियों ने कई हमले किए लेकिन स्थानीय हिन्दू और मुसलमानों ने इस मंदिर को बचाया। कहते हैं कि जब यह हिस्सा भारत के हाथों से निकल गया तब कुछ आतंकवादियों ने इस मंदिर को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया था लेकिन वे चमत्कारिक रुप से हवा में लटके पाए गए। अब कोई भी इस मंदिर को नुकसान पहुंचाने की साहस नही करता। इस शक्तिपीठ की पूजा-अर्चना में स्थानीय बलोच भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। 51 शक्तिपीठों में चौथी शिव की नगरी काशी में विराजमान  मणिकर्णिका घाट पर विशालाक्षी शक्तिपीठ पढ़ने के लिए यहां क्लिक किजिये पढ़िए सभी भक्त जन को शेयर किजिये। 
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