jindagi jhand hai phir bhi ghamand hai — आज की जिंदगी बड़ी तेज हो गई है। इतनी तेज कि आदमी को खुद समझ नहीं आता कि वह जिंदगी जी रहा है या जिंदगी उसे जी रही है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है, रात आंख बंद होने से पहले आखिरी बार भी मोबाइल ही देखा जाता है। बीच के पूरे दिन में नौकरी, पढ़ाई, करियर, प्रेम, शादी, परिवार, ईएमआई, ऑनलाइन शॉपिंग, सोशल मीडिया, रील, स्टेटस और न जाने कितनी छोटी-बड़ी चिंताएं आदमी को अपने-अपने तरीके से खींचती रहती हैं।
बाहर से देखने पर हर व्यक्ति अपनी जिंदगी में व्यस्त, सफल और खुश दिखाई देता है, लेकिन भीतर की कहानी पूछिए तो किसी की नौकरी परेशान कर रही है, किसी का प्रेम, किसी का विवाह, किसी का बजट और किसी का मोबाइल डेटा। फिर भी चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है और सोशल मीडिया पर लिखा होता है—“लाइफ इज ब्यूटीफुल।” सच पूछा जाए तो आज का मनुष्य शायद दुनिया का पहला ऐसा प्राणी है जो परेशान होकर भी अपनी परेशानी की सबसे सुंदर फोटो खींचकर दुनिया को दिखाता है।
यही इस लेख की शुरुआत है—“जिंदगी झंड है, फिर भी घमंड है।” यह केवल एक मजाकिया वाक्य नहीं, बल्कि आज की जीवनशैली का एक ऐसा हास्यपूर्ण आईना है जिसमें युवक-युवती, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, नौकरीपेशा व्यक्ति और सोशल मीडिया पर सक्रिय हर इंसान अपनी कोई न कोई तस्वीर देख सकता है।
यहां “झंड” शब्द जिंदगी की परेशानियों, उलझनों, भागदौड़ और छोटी-बड़ी विडंबनाओं की ओर इशारा करता है और “घमंड” उस दिखावे की ओर, जिसमें हम अपनी वास्तविक परेशानियों के बावजूद दुनिया के सामने खुद को बिल्कुल व्यवस्थित, खुश और सफल दिखाने में लगे रहते हैं।
जेब में पैसे कम हों तो भी नई घड़ी चाहिए, घर में बहस चल रही हो तो भी सेल्फी फोटो चाहिए, नौकरी से मन परेशान हो तो भी “हसल मोड ऑन” लिखना है और प्रेम में मन टूटा हो तो भी प्रोफाइल पर मुस्कुराती हुई तस्वीर लगानी है। यानी जिंदगी चाहे अंदर से कितनी भी उलझी हो, बाहर से स्टेटस हमेशा शानदार होना चाहिए।
आज के युवक-युवतियों की प्रेम कहानी भी अपने आप में किसी हास्य-व्यंग्य से कम नहीं है। कभी प्रेम पत्र लिखे जाते थे, अब लंबे चैट संदेश लिखे जाते हैं। पहले प्रेमिका के घर के बाहर घंटों इंतजार होता था, अब ऑनलाइन आने का इंतजार होता है। पहले यह चिंता रहती थी कि चिट्ठी पहुंची या नहीं, अब यह चिंता रहती है कि संदेश “सीन” हुआ या नहीं। पहले किसी के चेहरे की मुस्कान प्रेम का संकेत होती थी, अब किसी पोस्ट पर लगाया गया दिल भी रिश्ते की दिशा तय कर देता है।
प्रेम पहले भी जटिल था, लेकिन आधुनिक तकनीक ने उसमें इतनी सुविधाएं जोड़ दी हैं कि अब प्रेम करने के साथ-साथ डिजिटल जासूसी भी करनी पड़ती है। कौन ऑनलाइन है, किसने किसकी पोस्ट लाइक की, किसकी स्टोरी देखी, किसे फॉलो किया और किसे फॉलो बैक किया—इन सबका हिसाब कई रिश्तों में भावनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। फिर वही प्रेम जब विवाह में बदलता है तो कहानी और भी मनोरंजक हो जाती है।
शादी से पहले युवक कहता है—“तुम जो चाहोगी, मैं करूंगा।” युवती कहती है—“आप जहां ले जाएंगे, मैं चली जाऊंगी।” दोनों को लगता है कि उनका प्रेम दुनिया की हर समस्या से बड़ा है। शादी के बाद पता चलता है कि असली युद्ध तो इस बात पर होना है कि टीवी का रिमोट किसके पास रहेगा, बाजार से क्या आएगा, खर्च कितना होगा, छुट्टी कहां मनाई जाएगी और रात को एसी का तापमान कितने डिग्री पर रखा जाएगा। शादी से पहले जो दो लोग एक-दूसरे के बिना एक पल नहीं रह सकते थे, वही शादी के बाद पांच मिनट की शांति के लिए अलग-अलग कमरों में मोबाइल लेकर बैठ जाते हैं।
लेकिन मजे की बात यह है कि कुछ देर बाद फिर वही पूछते हैं—“चाय बनाऊं?” या “खाना खाया?” शायद यही दाम्पत्य जीवन की असली सुंदरता है कि तकरार के बीच भी अपनापन पूरी तरह समाप्त नहीं होता।इस लेख में प्रेम का मजाक उड़ाने के लिए प्रेम की बात नहीं की गई है और विवाह को छोटा दिखाने के लिए दाम्पत्य जीवन की नोकझोंक नहीं लिखी गई है। बल्कि उद्देश्य उन छोटी-छोटी परिस्थितियों में हास्य तलाशना है जिनसे हम सब किसी न किसी रूप में गुजरते हैं।
पति-पत्नी की बहस, प्रेमी-प्रेमिका की नाराजगी, दोस्तों की ऑनलाइन दोस्ती, युवाओं की करियर चिंता, सोशल मीडिया का दिखावा, ऑनलाइन खरीदारी की आदत, फिटनेस का अधूरा संकल्प, रविवार की खुशी और सोमवार का दुख—ये सब हमारे समय की ऐसी तस्वीरें हैं जिन पर गंभीरता से सोचने से पहले मुस्कुराया जा सकता है। कई बार खुद पर हंस लेना भी जीवन को हल्का करने का एक अच्छा तरीका होता है।
इस लेख की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसका व्यंग्य किसी एक युवक, किसी एक युवती, किसी एक पति या किसी एक पत्नी पर नहीं है। हम सब इस कहानी के पात्र हैं। कभी हम वह प्रेमी हैं जो घंटों रिप्लाई का इंतजार करता है, कभी वह प्रेमिका जो “ठीक है” के पीछे पूरी नाराजगी छिपा देती है, कभी वह पति जो बाजार जाने से बचने के लिए अचानक बहुत जरूरी ऑफिस का काम खोज लेता है और कभी वह पत्नी जो “कुछ नहीं चाहिए” कहकर वापस आते समय पांच चीजें खरीदने की सूची पकड़ा देती है।
कभी हम सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी को छोटा समझते हैं और कभी अपनी जिंदगी की दो अच्छी तस्वीरें डालकर दूसरों को यह भ्रम दे देते हैं कि हमारे यहां सब कुछ शानदार चल रहा है।
इसीलिए इस लेख को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि बीच-बीच में अपने ऊपर लागू करके देखना भी जरूरी है। अगर किसी प्रसंग पर आपको लगे कि “अरे, यह तो मेरे साथ भी होता है”, तो समझ लीजिए कि व्यंग्य सफल हो गया। अगर किसी पति को पढ़ते हुए अपनी पत्नी की याद आए और पत्नी को पढ़ते हुए अपने पति की, तो लेख ने अपना काम कर दिया। अगर कोई प्रेमी-प्रेमिका यह पढ़कर अपना पुराना चैट बॉक्स खोल दे और कोई पति-पत्नी अपनी पिछली बहस याद करके हंस दें, तो इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी।
क्योंकि जिंदगी आखिर इतनी गंभीर भी नहीं कि हर बात पर बहस की जाए। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हंसकर छोड़ देना चाहिए। कुछ नाराजगियां ऐसी होती हैं जिन्हें एक कप चाय खत्म कर देती है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें जीतने से ज्यादा जरूरी साथ रहना होता है। और कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जिनमें हजारों शब्दों से ज्यादा प्रभावी एक छोटा-सा वाक्य होता है—“लोग पास रहकर भी हमारे ना बन सके,और तुम दूर होकर भी हमारी जान बन गई।
”कभी-कभी दूरी केवल किलोमीटर की होती है, दिलों की नहीं। और कभी-कभी दो लोग एक ही कमरे में रहकर भी एक-दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं। इसलिए आधुनिक जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती केवल सुविधा प्राप्त करना नहीं, बल्कि उन रिश्तों को बचाए रखना है जिनके कारण सुविधाओं का कोई अर्थ बनता है।और शायद इसी भाव को एक और शायरी सबसे अच्छी तरह कहती है—“कैसे कहूँ इस दिल के लिए कितने ख़ास हो तुम,फ़ासले तो क़दमों के हैं, लेकिन हर पल दिल के साथ हो तुम।”
तो आइए, आज की इस भागती-दौड़ती, मोबाइल में उलझी, रीलों में मुस्कुराती, ईएमआई में फंसी, प्रेम में पिघलती और विवाह में कभी-कभी उलझती जिंदगी पर थोड़ा हंसते हैं। दूसरों पर कम और खुद पर थोड़ा ज्यादा। क्योंकि आखिर जिंदगी चाहे जितनी झंड क्यों न हो, अगर उसमें हंसी बची हुई है, अपने लोग बचे हुए हैं और किसी के साथ बैठकर बेवजह मुस्कुराने की वजह बची हुई है, तो जिंदगी अभी पूरी तरह खराब नहीं हुई है।
जिंदगी झंड है—तो क्या हुआ, दिल में अरमान अभी भी हैं।
जेब में पैसे कम सही, मगर सपने तमाम अभी भी हैं।
रिश्तों में थोड़ी खटपट है, मगर प्यार का नाम अभी भी है।
दुनिया चाहे कुछ भी कहे, अपने होने का घमंड अभी भी है।
JINDAGI JHAND HAI PHIR BHI GHAMAND HAI

जिंदगी झंड है, फिर भी घमंड है: आज के युवक-युवतियों और दम्पतियों की डिजिटल प्रेमकथा
आज की जिंदगी भी बड़ी अजीब चीज है। सुबह आंख खुलती है तो सबसे पहले भगवान का नाम लेने से पहले मोबाइल का नाम लिया जाता है। आंखें पूरी तरह खुली नहीं होतीं, लेकिन उंगलियां इतनी सक्रिय हो चुकी होती हैं कि मोबाइल का लॉक खुल चुका होता है। कभी-कभी तो लगता है कि आधुनिक मनुष्य की आत्मा शरीर में बाद में प्रवेश करती है और मोबाइल की स्क्रीन पहले उसके हाथ में प्रवेश कर जाती है।
बिस्तर पर पड़ा हुआ युवक मोबाइल में नोटिफिकेशन देख रहा है, युवती मोबाइल में संदेश देख रही है, पति मोबाइल में ऑफिस देख रहा है और पत्नी मोबाइल में पति की ऑनलाइन गतिविधि देख रही है। घर में चार लोग हों या दो लोग, लेकिन बातचीत फिर भी मोबाइल के माध्यम से होती है। पति सामने बैठा है और पत्नी लिख रही है—“कहाँ हो?” पति जवाब देता है—“यहीं हूँ।” पत्नी फिर पूछती है—“तो रिप्लाई क्यों नहीं कर रहे?” पति सामने बैठा मोबाइल में टाइप कर रहा है—“अभी तो कर रहा हूँ।”
आधुनिक प्रेम का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि दो लोग एक ही सोफे पर बैठे हैं, लेकिन एक-दूसरे को व्हाट्सऐप पर “गुड मॉर्निंग” भेज रहे हैं। जिंदगी में समस्याएं इतनी हैं कि आदमी के पास दुखी होने का समय नहीं है, फिर भी वह इंस्टाग्राम पर ऐसी फोटो डालता है जिसमें देखकर लगता है कि धरती पर इससे सुखी प्राणी पैदा ही नहीं हुआ।
चेहरे पर फिल्टर, तस्वीर में मुस्कान, कैप्शन में “लिविंग माय बेस्ट लाइफ” और असल जिंदगी में बिजली का बिल, ईएमआई, नौकरी का तनाव, घरवालों की चिंता और महीने की पच्चीस तारीख आते-आते बैंक बैलेंस का अंतिम संस्कार। सच यही है—जिंदगी झंड है, फिर भी घमंड है।

आज का युवक प्रेम में भी बड़ा आधुनिक है। पहले प्रेमी प्रेमिका को चिट्ठी लिखता था और डाकिए का इंतजार करता था। अब प्रेमी ऑनलाइन है और प्रेमिका भी ऑनलाइन है, फिर भी दोनों एक-दूसरे से पूछते हैं—“तुम ऑनलाइन होकर भी मुझे रिप्लाई क्यों नहीं कर रहे?” पहले प्रेम में इंतजार होता था, अब “सीन” होता है। पहले प्रेम में धड़कन बढ़ती थी, अब ब्लू टिक देखकर रक्तचाप बढ़ता है।
पहले प्रेमी कहता था—“तुम्हारी याद आती है।” आज प्रेमी कहता है—“तुमने मेरी स्टोरी देखी और रिएक्ट क्यों नहीं किया?” पहले प्रेम में फूल भेजे जाते थे, अब रील भेजी जाती है। पहले कोई शेर सुनाता था तो सामने वाला प्रभावित होता था, अब चार सेकंड की रील देखकर पूरा रिश्ता तय हो जाता है। और फिर वही रिश्ता सात दिन बाद इस सवाल पर खड़ा हो जाता है—“तुम बदल गए हो।”
बेचारा युवक सोचता है कि आखिर सात दिन में उसने क्या बदल दिया? लड़की कहती है—“पहले तुम मेरी हर पोस्ट लाइक करते थे।” युवक कहता है—“अब भी करता हूँ।” लड़की मोबाइल दिखाकर कहती है—“तीन घंटे बाद।” बस, प्रेम का मामला समाप्त। अदालत में कोई गवाह नहीं चाहिए, केवल स्क्रीनशॉट पर्याप्त है।
आज के प्रेम की एक विशेषता यह है कि प्रेम जितना गहरा है, उसका पासवर्ड उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से कहते हैं—“मैं तुम पर पूरा भरोसा करता हूं।” अगले ही वाक्य में—“अपना फोन दो।” सामने वाला फोन देने में दो सेकंड देर कर दे तो भरोसा सीधे आईसीयू में चला जाता है।
फिर शुरू होती है जासूसी। किसने लाइक किया? किसने कमेंट किया? किसकी पोस्ट पर दिल लगाया? किसकी स्टोरी देखी? किसने तुम्हें फॉलो किया? तुमने उसे फॉलो बैक क्यों किया? उसने तुम्हारी फोटो पर “नाइस” क्यों लिखा? और तुमने उसके “नाइस” का जवाब “थैंक्यू” क्यों दिया? आधुनिक प्रेम में प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण उसका डिजिटल ऑडिट हो गया है।
पहले प्रेमिका पूछती थी—“मुझसे कितना प्यार करते हो?” अब पूछती है—“मेरे लिए फोन का पासवर्ड क्या रखोगे?” युवक कहता है—“तुम्हारा जन्मदिन।” लड़की खुश हो जाती है। फिर फोन खोलती है तो पता चलता है कि पासवर्ड जन्मदिन नहीं, जन्मदिन के साथ दो अंक और एक विशेष चिन्ह है। प्रेम वहीं से संदिग्ध घोषित हो जाता है।
कभी-कभी लगता है कि आज के युवक-युवतियों को प्रेम नहीं, बल्कि प्रेम का प्रदर्शन पसंद है। दो लोग कॉफी पीने जाते हैं तो पहले कॉफी नहीं पीते, उसकी फोटो लेते हैं। फिर कप की फोटो, फिर हाथ की फोटो, फिर सामने बैठे व्यक्ति की आधी फोटो, फिर टेबल की फोटो, फिर बिल की फोटो और अंत में कॉफी ठंडी हो जाती है। कैफे में बैठकर प्रेम करने से ज्यादा मेहनत इस बात पर होती है कि फोटो में प्रेम दिखाई दे।
सामने वाला पूछता है—“कॉफी कैसी है?” जवाब आता है—“रुको, पहले फोटो ले लेने दो।” जीवन भी कुछ ऐसा ही हो गया है। हम जीवन जीने से पहले उसका स्क्रीनशॉट लेना चाहते हैं। हमें भूख लगी है तो खाना खाने से पहले फोटो चाहिए। यात्रा पर गए हैं तो दृश्य देखने से पहले सेल्फी चाहिए। मंदिर गए हैं तो दर्शन से पहले स्टेटस चाहिए। शादी में गए हैं तो वर-वधू से पहले अपनी फोटो चाहिए। और जब घर लौटते हैं तो पता चलता है कि हमने पूरा दिन कैमरे में देखा, आंखों से नहीं।
प्रेम में भी शायरी का अपना अलग ही महत्व है। आज का युवक प्रेमिका को देखकर गंभीरता से कहता है—
“लोग पास रहकर भी हमारे ना बन सके,
और तुम दूर होकर भी हमारी जान बन गई।”
प्रेमिका मुस्कुराकर कहती है—“वाह!” फिर पांच मिनट बाद पूछती है—“लेकिन तुम ऑनलाइन होकर भी रिप्लाई क्यों नहीं कर रहे?” प्रेमी सोचता है कि जिस दूरी को उसने शायरी में रोमांटिक बना दिया था, वही दूरी अब व्हाट्सऐप के दो नीले टिकों में अपराध बन चुकी है।
कभी प्रेमी को लिखना पड़ता है—
“कैसे कहूँ इस दिल के लिए कितने ख़ास हो तुम,
फ़ासले तो क़दमों के हैं, लेकिन हर पल दिल के साथ हो तुम।”
और उधर प्रेमिका जवाब देती है—“इतनी अच्छी शायरी कहाँ से कॉपी की?” प्रेमी कहता है—“दिल से।” लड़की कहती है—“झूठ मत बोलो, मैंने यही शायरी कल प्रिति की रील में देखी थी।” प्रेम की पूरी कविता वहीं समाप्त हो जाती है।
आज का प्रेम वास्तव में बहुत सुविधाजनक हो गया है। मिलने के लिए शहर पार करने की आवश्यकता नहीं, वीडियो कॉल है। रूठने के लिए कमरे से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, “लास्ट सीन” बंद कर दीजिए। बात नहीं करनी तो “नेटवर्क प्रॉब्लम” है। झगड़ा करना है तो लंबा मैसेज लिख दीजिए। मनाना है तो 💐 फूलों की जगह इमोजी भेज दीजिए। प्रेम जताना है तो दिल ♥️ वाला इमोजी। गुस्सा करना है तो लाल 😡 चेहरा। रोना है तो टूटे हुए दिल 💔 वाला इमोजी। आदमी के पास भावनाएं पूरी हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने के लिए अब चेहरे 😉 से अधिक इमोजी काम करते हैं।
और जब यही युवक-युवती शादी कर लेते हैं, तब प्रेम की डिजिटल कहानी का दूसरा अध्याय शुरू होता है। विवाह से पहले लड़की कहती है—“मैं तुम्हारे साथ कहीं भी रह लूंगी।” लड़का कहता है—“तुम साथ हो तो झोपड़ी ही महल है।” विवाह के बाद दोनों किराए के मकान में प्रवेश करते हैं। लड़की कहती है—“यहाँ अलमारी छोटी है।” लड़का कहता है—“महल भी छोटा पड़ जाता है।” लड़की जवाब देती है—“फिर मेरे कपड़े कहाँ जाएंगे?” लड़का पहली बार समझता है कि प्रेम में कही गई उपमाएं गृहस्थ जीवन में लागू नहीं होतीं।
शादी से पहले लड़का कहता है—“तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा।” शादी के बाद पत्नी पूछती है—“वह फ्रिज लेना है।” पति कहता है—“अभी बजट नहीं है।” पत्नी तुरंत पुरानी फाइल खोल देती है—“शादी से पहले आपने क्या कहा था?” पति कहता है—“वह भावनात्मक स्थिति थी।” पत्नी कहती है—“अब आर्थिक स्थिति है।” यही वह क्षण होता है जब प्रेम का दर्शन अर्थशास्त्र में बदल जाता है।
आज के पति-पत्नी का सबसे बड़ा संघर्ष प्रेम नहीं, मोबाइल है। पति मोबाइल देख रहा है तो पत्नी कहती है—“मुझसे ज्यादा जरूरी क्या है?” पति मोबाइल रख देता है। पांच मिनट बाद पत्नी खुद मोबाइल में व्यस्त हो जाती है। पति पूछता है—“अब?” पत्नी कहती है—“मैं जरूरी काम कर रही हूँ।” पति पूछता है—“क्या?” पत्नी कहती है—“ऑनलाइन सेल देख रही हूँ।” पति चुप हो जाता है, क्योंकि वह जानता है कि इस विषय पर आगे तर्क करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।
शादी के बाद पति को दो प्रकार के वाक्यों से सबसे अधिक डर लगता है—“आपसे कुछ बात करनी है” और “कुछ नहीं।” इन दोनों वाक्यों में से दूसरा अधिक खतरनाक है। पत्नी कहती है—“कुछ नहीं।” पति जानता है कि अभी बहुत कुछ होने वाला है। वह चुपचाप पानी पीता है, मोबाइल दूर रखता है और मानसिक रूप से आगामी बहस के लिए स्वयं को तैयार करता है।
पत्नी पूछती है—“आपको पता है मैं क्यों नाराज़ हूँ?” पति कहता है—“नहीं।” पत्नी कहती है—“यही तो समस्या है।” पति सोचता है कि अगर उसे कारण नहीं पता तो समाधान कैसे बताए? लेकिन वैवाहिक जीवन में तर्क से अधिक महत्वपूर्ण अनुमान होता है।
पति-पत्नी की बातचीत का एक अलग ही व्याकरण है। पत्नी कहती है—“जहाँ मन हो वहाँ चले जाइए।” पति खुश होकर दोस्तों के साथ जाने की तैयारी करता है। जैसे ही जूते पहनता है, पत्नी पूछती है—“सच में जा रहे हैं?” पति समझ जाता है कि “जहाँ मन हो” का अर्थ “कहीं मत जाइए” था। पति कहता है—“नहीं, मैं तो आपके साथ बैठूंगा।” पत्नी कहती है—“अब बैठने की क्या जरूरत है?” पति समझता है कि इस भाषा का शब्दकोश पृथ्वी पर उपलब्ध नहीं है।
इसी प्रकार पत्नी कहती है—“आपको जो ठीक लगे करिए।” पति यदि सच में अपनी इच्छा के अनुसार कुछ कर दे तो अगले तीन दिन तक उसे यह सुनना पड़ सकता है कि “आपको मेरी बात की कोई परवाह ही नहीं।” पति सोचता है कि अभी तो आपने कहा था जो ठीक लगे करिए। लेकिन विवाह के बाद यह समझ आ जाता है कि पत्नी के वाक्य का शाब्दिक अर्थ नहीं, भावार्थ समझना चाहिए। समस्या यह है कि भावार्थ की परीक्षा रोज होती है और जिंदगी में पाठ्यक्रम कभी समाप्त नहीं होता और स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल नही था कि समुचित जानकारी रहे।
आज के दम्पतियों की एक और बड़ी समस्या है—ऑनलाइन शॉपिंग। पत्नी मोबाइल लेकर बैठती है और कहती है—“बस देख रही हूँ।” पति निश्चिंत हो जाता है। दो दिन बाद घर में पार्सल आता है। पति पूछता है—“यह क्या है?” पत्नी कहती है—“कुछ नहीं, बस एक छोटी-सी चीज है।” छोटी-सी चीज खोलने पर उसमें एक ऐसी वस्तु निकलती है जिसके बारे में पति को पता ही नहीं कि घर में इसकी आवश्यकता कब उत्पन्न हुई।
पत्नी समझाती है—“यह बहुत जरूरी था।” पति पूछता है—“पहले कैसे चल रहा था?” पत्नी कहती है—“तब यह था ही नहीं।” पति फिर चुप। आधुनिक बाजार ने गृहस्थी को ऐसा बना दिया है कि जरूरत की परिभाषा अब वस्तु के उपलब्ध होने के बाद तय होती है।
पति भी कम नहीं है। वह पत्नी की खरीदारी पर प्रश्न उठाता है और रात को चुपके से ऑनलाइन अपने लिए कोई गैजेट ऑर्डर कर देता है। पत्नी पार्सल देखकर पूछती है—“यह क्या है?” पति कहता है—“बहुत जरूरी है।” पत्नी कहती है—“कितने का?” पति कहता है—“बहुत सस्ता था।” पत्नी कहती है—“अगर सस्ता था तो पहले क्यों नहीं बताया?” पति समझ जाता है कि अब घर में आर्थिक संसद का विशेष सत्र बुलाया जाएगा।
आज के युवक-युवतियों की सबसे बड़ी आकांक्षा है—स्वतंत्र जीवन। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ भी बड़ा मनोरंजक है। लड़का कहता है—“मुझे अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीनी है।” लड़की कहती है—“मुझे किसी की रोक-टोक पसंद नहीं।” फिर दोनों प्रेम में पड़ते हैं और अचानक पूछना शुरू कर देते हैं—“कहाँ हो?”, “किसके साथ हो?”, “कब आओगे?”, “फोन क्यों नहीं उठाया?”, “मेरी फोटो पर कमेंट क्यों नहीं किया?” यानी स्वतंत्रता की शुरुआत प्रेम से होती है और समाप्ति लोकेशन शेयरिंग पर।
करियर भी आज के युवाओं की जिंदगी में कम हास्य नहीं लाता। युवक कहता है—“मुझे अपनी पसंद का काम करना है।” फिर नौकरी लगती है और सुबह अलार्म बजते ही वह तकिए से कहता है—“तुम ही मेरे सच्चे दोस्त हो।” रविवार को आदमी ऐसा खुश होता है जैसे स्वतंत्रता संग्राम जीत लिया हो।
सोमवार की सुबह लगता है जैसे किसी ने व्यक्तिगत शत्रुता के कारण सोमवार का आविष्कार किया हो। ऑफिस में बॉस पूछता है—“यह काम अभी तक क्यों नहीं हुआ?” युवक मन में कहता है—“क्योंकि मैं इंसान हूं, सर्वर नहीं।” लेकिन मुंह से निकलता है—“सर, अभी कर देता हूं।” फिर वही युवक शाम को सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है—“हसल, ग्रोथ और सक्सेस।” अंदर से आत्मा कहती है—“भाई, पहले घर चल।”
युवतियों की अपनी परेशानियां हैं। समाज कहता है कि करियर बनाओ, आत्मनिर्भर बनो, फिट रहो, सुंदर दिखो, परिवार संभालो, रिश्ते निभाओ, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहो और मुस्कुराती भी रहो। परिणाम यह होता है कि सुबह योग की फोटो, दोपहर ऑफिस की मीटिंग, शाम कॉफी, रात ऑनलाइन शॉपिंग और बीच में दस बार यह विचार कि “मैं कर क्या रही हूँ?” फिर कोई पूछता है—“कैसी हो?” जवाब आता है—“बिल्कुल ठीक।” आधुनिक जीवन में “बिल्कुल ठीक” कई बार वह वाक्य है जिसके पीछे बहुत लंबी कहानी छिपी होती है।
आज की पीढ़ी फिटनेस के मामले में भी बड़ी गंभीर है। सोमवार को जिम की सदस्यता ली जाती है। मंगलवार को नए जूते खरीदे जाते हैं। बुधवार को जिम का बैग तैयार किया जाता है। गुरुवार को जिम जाने की रील देखी जाती है। शुक्रवार को शरीर में दर्द की कल्पना की जाती है। शनिवार को आराम किया जाता है। रविवार को कहा जाता है—“अगले सोमवार से पक्का शुरू करूंगा।” शरीर वही रहता है, लेकिन फिटनेस का इरादा हर सप्ताह नया हो जाता है। कभी-कभी लगता है कि आज के युवाओं के पास जिम जाने से ज्यादा जिम जाने की योजना होती है।
इसी तरह किताब पढ़ने का भी फैशन है। किताब खरीदी जाती है, उसकी फोटो ली जाती है, कॉफी के साथ रखी जाती है, सोशल मीडिया पर पोस्ट की जाती है—“रीडिंग टाइम।” किताब खुलती है, दो पन्ने पढ़े जाते हैं और फिर मोबाइल की घंटी बजती है। किताब कहती है—“मुझे भी पढ़ लो।” मोबाइल कहता है—“पहले मुझे देख लो।” और आधुनिक मनुष्य मोबाइल को चुन लेता है। फिर शाम को वह ज्ञान की कमी पर चिंतित होता है।
दोस्तों की दुनिया भी बदल गई है। पहले दोस्त घर आकर घंटों बैठते थे। अब दोस्त ग्रुप में सैकड़ों संदेश भेजते हैं और महीनों मिलते नहीं। ग्रुप का नाम “भाई लोग” है, उसमें पचास सदस्य हैं, लेकिन जब किसी को वास्तविक मदद चाहिए तो सभी का मोबाइल अचानक नेटवर्क क्षेत्र से बाहर हो जाता है। कोई रात में लिखता है—“भाई, बहुत जरूरी काम है।” दस लोग संदेश पढ़ते हैं। तीन लोग ऑनलाइन रहते हैं। दो लोग स्टिकर भेजते हैं। एक लिखता है—“क्या हुआ?” और बाकी अगले दिन पूछते हैं—“भाई, सब ठीक?” आधुनिक मित्रता में संवेदना तेज है, सहायता कभी-कभी धीमी।
प्रेमी-प्रेमिका की लड़ाई भी अब बड़ी व्यवस्थित हो गई है। पहले झगड़ा होता था तो सामने बैठकर बात होती थी। अब लड़ाई के लिए अलग-अलग डिजिटल हथियार हैं। पहले “हम्म” आता है। फिर “ठीक है।” फिर “कोई बात नहीं।” फिर “जैसा तुम्हें ठीक लगे।” फिर “गुड नाइट।” और अंत में “सीन।”
इन पांच शब्दों के बाद प्रेमी को पता चल जाता है कि आज रात नींद आना कठिन है। वह फोन हाथ में लेकर बैठा रहता है और सोचता है कि गलती कहाँ हुई। फिर मित्र से पूछता है। मित्र कहता है—“भाई, लड़की है, समझना मुश्किल है।” लड़की अपनी सहेली से पूछती है। सहेली कहती है—“लड़का है, समझना मुश्किल है।” और दोनों की समस्या का समाधान कोई नहीं करता।
कभी-कभी प्रेम में इतनी शायरी होती है कि लगता है दोनों साहित्य अकादमी खोल देंगे। लड़का लिखता है—
“तुम्हारे बिना ये शाम अधूरी लगती है,
तुम्हारे बिना हर बात अधूरी लगती है,
तुम सामने रहो तो जिंदगी खूबसूरत लगती है,
तुम दूर रहो तो हर सांस जरूरी लगती है।”
लड़की जवाब देती है—
“बातें तो बहुत करते हो जनाब,
अब यह बताओ, मिलने कब आ रहे हो?”
यहीं से कविता व्यवहारिक जीवन में प्रवेश करती है।
शादी के बाद शायरी का स्वरूप भी बदल जाता है। पहले पति कहता था—
“तुम मुस्कुरा दो तो बहार आ जाए,
तुम पास आओ तो प्यार आ जाए।”
शादी के कुछ साल बाद वही पति कहता है—
“तुम मुस्कुरा दो तो डर लगता है,
कहीं कोई नया खर्चा न आ जाए।”
पत्नी भी पीछे नहीं रहती। पहले कहती थी—
“आप साथ हों तो हर रास्ता आसान है।”
अब कहती है—
“आप साथ हों तो बाजार का बिल भी आधा नहीं होता।”
यही गृहस्थी की कविता है। इसमें छंद नहीं होता, लेकिन खर्च जरूर होता है।
आज की दाम्पत्य जिंदगी में “क्वालिटी टाइम” का भी बड़ा महत्व है। पति-पत्नी सप्ताहांत पर तय करते हैं कि आज मोबाइल दूर रखकर एक-दूसरे के साथ समय बिताएंगे। दोनों मोबाइल टेबल पर रखते हैं। पांच मिनट बाद पति पूछता है—“तुम्हारा फोन वाइब्रेट हुआ क्या?” पत्नी कहती है—“नहीं।” दस मिनट बाद पत्नी पूछती है—“आपके फोन पर नोटिफिकेशन आया क्या?” पति कहता है—“नहीं।” पंद्रह मिनट बाद दोनों बेचैनी में मोबाइल उठा लेते हैं।
फिर दोनों कहते हैं—“आजकल मोबाइल बहुत खराब चीज हो गई है।” और अगले आधे घंटे तक मोबाइल पर यही खोजते हैं कि मोबाइल से छुटकारा कैसे पाया जाए।
सोशल मीडिया ने रिश्तों को एक और अद्भुत बीमारी दी है—तुलना। किसी की शादी की तस्वीर देखी और अपना विवाह साधारण लगने लगा। किसी की विदेश यात्रा देखी और अपना शहर छोटा लगने लगा। किसी का नया घर देखा और अपना घर पुराना लगने लगा। किसी की कार देखी और अपनी बाइक बेकार लगने लगी। किसी का फिट शरीर देखा और अपना शरीर शिकायत करने लगा। किसी का खुश परिवार देखा और लगा कि हमारे घर में ही समस्याएं हैं।
लेकिन कोई यह नहीं देखता कि सोशल मीडिया पर लोग अपनी जिंदगी का पूरा सच नहीं, चुना हुआ दृश्य दिखाते हैं। फिर भी हम दूसरों के दस सेकंड देखकर अपनी पूरी जिंदगी का फैसला करने बैठ जाते हैं।
यही कारण है कि आज आदमी के पास पहले से अधिक सुविधाएं हैं, लेकिन संतोष कभी-कभी कम दिखाई देता है। घर में फ्रिज है, टीवी है, इंटरनेट है, मोबाइल है, ऑनलाइन भोजन है, ऑनलाइन खरीदारी है, ऑनलाइन मनोरंजन है, ऑनलाइन बातचीत है—बस ऑफलाइन शांति थोड़ी कम है। आदमी दुनिया के दूसरे छोर पर बैठे व्यक्ति से सेकंडों में बात कर सकता है, लेकिन पास बैठे अपने व्यक्ति से बात करने के लिए समय निकालना कठिन हो गया है।
युवक-युवतियों की सबसे बड़ी विडंबना यह भी है कि वे रिश्ते में “स्पेस” चाहते हैं। लड़का कहता है—“मुझे थोड़ा स्पेस चाहिए।” लड़की कहती है—“ठीक है।” अगले दस मिनट में लड़की पूछती है—“तुम कहाँ हो?” लड़का कहता है—“स्पेस में।” लड़की कहती है—“बहुत मजाक सूझ रहा है?” लड़का कहता है—“तुमने ही तो स्पेस कहा था।” फिर दोनों समझ जाते हैं कि प्रेम में स्पेस की परिभाषा गणित से भी कठिन है।
दाम्पत्य जीवन में एक और प्रसिद्ध शब्द है—“समझौता।” विवाह से पहले दोनों कहते हैं—“हम एक-दूसरे को समझेंगे।” विवाह के बाद पता चलता है कि समझने से ज्यादा समझौता करना पड़ता है। टीवी पर क्या चलेगा, यह समझौता। एसी का तापमान क्या होगा, यह समझौता। बाहर खाना है या घर का, यह समझौता। मायके जाना है या ससुराल, यह समझौता। छुट्टी कहाँ बितानी है, यह समझौता। बच्चों का स्कूल कौन सा होगा, यह समझौता। और अंत में दोनों थककर कहते हैं—“तुम्हारी खुशी में मेरी खुशी है।” इस वाक्य का अर्थ कई बार यह होता है कि “ठीक है, तुम जीत गए।”
फिर भी विवाह की सबसे सुंदर बात यही है कि तमाम झगड़ों के बावजूद दोनों साथ रहते हैं। सुबह जो व्यक्ति रात में नाराज़ होकर दूसरी ओर मुंह करके सोया था, वही सुबह चाय पूछता है। रात को जिसने कहा था “मुझसे बात मत करना”, वही सुबह पूछता है—“नाश्ता करोगे?” शायद यही प्रेम का असली रूप है। प्रेम केवल गुलाब, शायरी और रोमांटिक संदेश नहीं है।
प्रेम वह भी है जब सामने वाला नाराज़ हो और फिर भी उसकी दवा समय पर रख दी जाए। प्रेम वह भी है जब पत्नी बिना पूछे पति की पसंद की सब्जी बना दे। प्रेम वह भी है जब पति थककर लौटे और पत्नी कहे—“पहले आराम कर लो।” प्रेम वह भी है जब दोनों अपनी-अपनी कमियों के साथ एक-दूसरे को स्वीकार करते हुए जिंदगी आगे बढ़ाते हैं।
लेकिन आधुनिक आदमी को यह साधारण प्रेम कम दिखाई देता है। उसे हर चीज बड़ी चाहिए—बड़ी कार, बड़ा घर, बड़ा मोबाइल, बड़ी पार्टी, बड़ी फोटो, बड़ा स्टेटस। कभी-कभी वह भूल जाता है कि जिंदगी की असली खुशी छोटी चीजों में छिपी होती है। साथ बैठकर चाय पीना, बिना मोबाइल के बात करना, बारिश देखना, बेवजह हंसना, किसी पुराने गीत पर मुस्कुरा देना, घर लौटते समय पसंद की चीज ले आना—इनमें कोई फिल्टर नहीं होता, कोई लाइक नहीं होता, लेकिन इनमें जिंदगी होती है।
और फिर भी हमारा घमंड कम नहीं होता। जेब में पांच सौ रुपये हों और ऑनलाइन कारों की रील देखकर लगता है कि अगली गाड़ी अपनी ही होगी। घर की छत टपक रही हो और हम सोशल मीडिया पर लिखते हैं—“ड्रीम होम इन प्रोग्रेस।” बैंक में बैलेंस कम हो और ऑनलाइन कार्ट में बीस सामान पड़े हों। नौकरी का भविष्य अनिश्चित हो और स्टेटस—“बॉर्न टू रूल।” रिश्ते में रोज झगड़ा हो और प्रोफाइल पर—“हैप्पी कपल।” यही तो आधुनिक जीवन का हास्य है—अंदर कुछ और, बाहर कुछ और।
हम सब किसी न किसी रूप में यही कर रहे हैं। कोई अपनी आर्थिक परेशानी छिपा रहा है, कोई रिश्ते की समस्या, कोई नौकरी का तनाव, कोई अकेलापन, कोई भविष्य की चिंता। लेकिन फोटो में मुस्कान बनी हुई है। हम कहते हैं—“सब बढ़िया है।” शायद इसलिए क्योंकि आज के समय में यह मान लेना कठिन है कि हम परेशान हैं। हमें डर लगता है कि कहीं लोग हमें कमजोर न समझ लें। इसलिए जिंदगी चाहे जितनी झंड हो, घमंड बनाए रखना जरूरी समझते हैं।
लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा मजाक यही है कि अंत में किसी को याद नहीं रहता कि किसके पास कितना महंगा मोबाइल था, किसने कितने फॉलोअर बनाए, किसकी फोटो पर कितने लाइक आए और किसने कितने ब्रांड पहने। याद रहता है कि किसने मुश्किल समय में साथ दिया। किसने बिना कहे बात समझी। किसने हमारी गलती पर भी हमें छोड़ नहीं दिया। किसने हमारे बुरे समय में हमारे साथ चाय पी। किसने हमारे चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपी थकान पहचान ली।
इसलिए आज के युवक-युवतियों को प्रेम करना है तो थोड़ा कम दिखाइए, थोड़ा अधिक निभाइए। पति-पत्नी को साथ रहना है तो कभी-कभी मोबाइल नीचे रखिए और एक-दूसरे की आंखों में देखिए। दोस्ती निभानी है तो केवल जन्मदिन की स्टोरी मत लगाइए, जरूरत पड़ने पर पहुंच भी जाइए। परिवार चाहिए तो केवल पारिवारिक फोटो मत खींचिए, परिवार के साथ बैठिए भी। जिंदगी चाहिए तो केवल उसकी तस्वीर मत बनाइए, उसे जीइए भी।
और हां, शायरी जरूर कीजिए। प्रेम में शायरी का अपना आनंद है। कभी अपने साथी से कहिए—
“लोग पास रहकर भी हमारे ना बन सके,
और तुम दूर होकर भी हमारी जान बन गई।
दुनिया ने रिश्तों के कितने नाम रख दिए,
हमने तुम्हें बस अपना मान लिया।”
फिर थोड़ी देर बाद अगर सामने वाला पूछे—“आज सब्जी कौन लाएगा?” तो शायरी को वहीं विराम देकर बाजार चले जाइए। क्योंकि प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण कभी-कभी यही होता है कि इंसान अपनी रोमांटिक कविता छोड़कर घर की जरूरत पूरी करने निकल पड़े।
और यदि दूरी सचमुच बहुत हो तो यह भी कह सकते हैं—
“कैसे कहूँ इस दिल के लिए कितने ख़ास हो तुम,
फ़ासले तो क़दमों के हैं, लेकिन हर पल दिल के साथ हो तुम।
रास्ते चाहे कितने भी लंबे क्यों न हो जाएँ,
मेरी हर धड़कन में आज भी पास हो तुम।”
लेकिन प्रेम में एक सावधानी भी जरूरी है—यह शायरी भेजने के बाद यदि सामने वाला पूछे “कल मिलने आ रहे हो?” तो “देखते हैं” मत लिखिए। वरना अगली शायरी आपके खिलाफ इस्तेमाल हो सकती है।
आज के दम्पतियों की जिंदगी में हास्य इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यदि पति-पत्नी हर बात को गंभीरता से लेने लगें तो घर अदालत बन जाएगा। कभी पति की भूल पर पत्नी हंस दे, कभी पत्नी की गलती पर पति मुस्कुरा दे। कभी दोनों अपने पुराने झगड़े याद करके खुद पर हंसें। क्योंकि जिंदगी में बहुत सारी समस्याएं ऐसी होती हैं जिन्हें हल करने से पहले उन पर हंसना सीखना पड़ता है। जिस घर में हंसी बची रहती है, वहां रिश्ते पूरी तरह बूढ़े नहीं होते।
आज की पीढ़ी को प्रेम चाहिए, लेकिन ऐसा प्रेम जो उसकी स्वतंत्रता भी रखे, उसकी निजता भी रखे, उसके सपनों को भी सम्मान दे और साथ भी निभाए। विवाह चाहिए, लेकिन ऐसा विवाह जिसमें पति पत्नी एक-दूसरे के मालिक नहीं, साथी हों। करियर चाहिए, लेकिन ऐसा करियर जिसमें इंसान खुद को खो न दे। पैसा चाहिए, लेकिन ऐसा पैसा जो जीवन को आसान बनाए, जीवन का अर्थ न बन जाए। सोशल मीडिया चाहिए, लेकिन इतना नहीं कि वास्तविक जिंदगी की आवाज दब जाए।
अंततः बात बहुत सीधी है। जिंदगी किसी की पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है। किसी की नौकरी में परेशानी है, किसी के व्यापार में, किसी के रिश्ते में, किसी के परिवार में, किसी के सपनों में। कोई प्रेम में परेशान है, कोई विवाह में, कोई विवाह के बाद प्रेम खोज रहा है और कोई प्रेम से बचकर विवाह की तैयारी कर रहा है। कोई शादी करना चाहता है, कोई शादी से डर रहा है और कोई शादी के बाद सोच रहा है कि आखिर उसने इतना आत्मविश्वास कहाँ से जुटाया था।
फिर भी जिंदगी चलती रहती है। सुबह आती है। चाय बनती है। मोबाइल बजता है। ऑफिस जाना होता है। बच्चे स्कूल जाते हैं। पति-पत्नी फिर किसी छोटी बात पर बहस करते हैं। दो घंटे बाद कोई चाय लेकर सामने बैठ जाता है। शाम को कोई पूछता है—“खाना खाओगे?” रात को दोनों अपने-अपने मोबाइल देखते हुए सो जाते हैं। सुबह फिर वही कहानी शुरू होती है।
यही जिंदगी है—थोड़ी हंसी, थोड़ा गुस्सा, थोड़ा प्यार, थोड़ा खर्च, थोड़ी चिंता, थोड़ा दिखावा, थोड़ी शायरी और बहुत सारा इंतजार।
इसलिए अगर आज आपकी जिंदगी भी थोड़ी झंड है तो परेशान मत होइए। पड़ोसी की जिंदगी देखकर यह मत समझिए कि केवल आपकी जिंदगी में समस्या है। उसकी भी जिंदगी में समस्याएं हैं, बस उसकी फोटो में दिखाई नहीं दे रही हैं।
जिस दम्पति को देखकर आपको लगता है कि उनका प्रेम आदर्श है, संभव है फोटो लेने के पांच मिनट बाद वे इस बात पर बहस कर रहे हों कि फोटो किसने खराब की। जिस युवक को देखकर लगता है कि वह बहुत सफल है, संभव है वह रात को भविष्य की चिंता में सो नहीं पाता हो। जिस युवती की हर तस्वीर में आत्मविश्वास दिखाई देता है, संभव है वह भी कई बार अपने मन से लड़ रही हो।
इसलिए दूसरों की जिंदगी की चमक से अपनी जिंदगी का मूल्य मत तय कीजिए। अपनी हंसी बचाइए, अपने रिश्ते बचाइए, अपने लोगों को समय दीजिए और जब बहुत ज्यादा तनाव हो तो थोड़ी देर खुद पर भी हंस लीजिए।
क्योंकि आखिरकार—
जिंदगी झंड है, फिर भी घमंड है,
जेब खाली है, फिर भी ब्रांड है।
रिश्तों में रोज थोड़ा बवाल है,
फिर भी स्टेटस पर सब कमाल है।
दिल में दर्द है, चेहरे पर मुस्कान है,
यही तो आज के इंसान की पहचान है।
और प्रेमियों के लिए अंतिम शायरी—
“तुम साथ रहो तो हर मौसम सुहाना लगता है,
तुम रूठो तो अपना घर भी बेगाना लगता है।
लड़ते हैं तुमसे तो लगता है तुम अपने हो,
वरना हर किसी से भला कौन इतना नाराज़ होता है।”
पति-पत्नी के लिए—
“रिश्ता वही नहीं जिसमें कभी तकरार न हो,
रिश्ता वह है जिसमें तकरार के बाद भी प्यार हो।
कभी तुम जीतो, कभी हम हार जाएँ,
बस इतना हो कि दोनों फिर साथ बैठ जाएँ।”
और आज के उन युवक-युवतियों के लिए जो अभी प्रेम में हैं—
“न ऑनलाइन होने से प्यार बढ़ता है,
न हर संदेश से रिश्ता बनता है।
कभी फोन छोड़कर सामने बैठो,
तभी पता चलेगा कौन सच में अपना बनता है।”
आखिर में बस इतना ही—मोबाइल चार्ज कर लेना, क्योंकि जिंदगी चाहे जितनी झंड हो, कल फिर अलार्म बजेगा। ऑफिस जाना होगा। पत्नी पूछेगी—“आज जल्दी आना।” पति कहेगा—“हां।” पति कहेगा—“आज खर्च कम करना।” पत्नी कहेगी—“हां।” दोनों अपनी-अपनी बात पर मुस्कुराएंगे और शाम तक दोनों भूल जाएंगे कि सुबह क्या वादा किया था।
फिर रात आएगी। घर शांत होगा। मोबाइल हाथ में होगा। सोशल मीडिया पर दुनिया खुश दिखाई देगी। और शायद उसी समय पति-पत्नी एक-दूसरे की तरफ देखकर सोचेंगे—“चलो, जिंदगी जैसी भी है, अपनी है।”
यही सबसे बड़ी बात है।
जिंदगी झंड हो सकती है,
लेकिन अगर अपने लोग साथ हों,
तो वही जिंदगी घमंड करने लायक भी बन जाती है।

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