देवरिया जनपद की मझगांवा पीएचसी के अंतर्गत आने वाले लाहिलपार उपकेंद्र में वर्षों से उपेक्षित जीवन बिता रहे नेटुवा समुदाय के लोगों तक आखिरकार स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच ही गईं। यह समुदाय जो बाग-बगैचों, खुली जगहों और अस्थायी झोपड़ियों में निवास करता है, अब तक मुख्यधारा की कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा है।
न उनके पास पक्की छत है, न शुद्ध पेयजल की सुविधा, न शिक्षा, और न ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता। ऐसे में जब मझगांवा प्रभारी चिकित्साधिकारी ने गंभीरता से इस समुदाय की स्थिति पर संज्ञान लिया और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को निर्देशित कर उन्हें टीकाकरण के लिए तैयार किया, तो यह न केवल स्वास्थ्य विभाग की बड़ी उपलब्धि रही, बल्कि समाज के सबसे वंचित वर्ग तक सरकारी योजनाओं की पहुँच सुनिश्चित करने का प्रेरणादायक उदाहरण भी बन गया।

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खुले में रहकर वर्षों से टीकाकरण से वंचित
लाहिलपार में रहने वाले नट परिवारों की जीवनशैली काफी अलग है। ये लोग पारंपरिक रूप से खानाबदोश प्रवृत्ति के होते हैं, जिनका स्थायी निवास नहीं होता। बाग-बगिचों में टेंट, प्लास्टिक की चादरों या लकड़ी के अस्थायी शेड बनाकर रहना इनकी नियति रही है। न बिजली, न स्वच्छता की सुविधा और न ही स्वास्थ्य के प्रति किसी प्रकार की चेतना – यही इनकी वास्तविकता है। वर्षो से इनके बच्चे न तो स्कूल जा पा रहे हैं और न ही कभी किसी सरकारी टीकाकरण अभियान में शामिल हो पाए थे। गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल तो दूर, सामान्य स्वास्थ्य जांच भी उपलब्ध नहीं होती थी।
एएनएम की सूझबूझ और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की पहल—
इस उपेक्षित समुदाय की दुर्दशा को सबसे पहले प्रकाश में लाया लाहिलपार उपकेंद्र की एएनएम (ऑक्सीलरी नर्स मिडवाइफ) श्यामली देवी ने। उन्होंने गांव में कार्यरत आशा बहुओं – सुनीता देवी, संगीता देवी तथा वार्ड आया आराधना श्रीवास्तव के साथ मिलकर एक विशेष बैठक में इस मुद्दे को उठाया। यह बैठक वीएचएनडी (Village Health Nutrition Day) के अंतर्गत VHWs और ANMs की एकत्रित बैठक थी, जिसमें यूनिसेफ, डब्ल्यूएचओ, तथा वीपीएम जैसे संगठन के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। प्रभारी चिकित्साधिकारी ने जब यह मुद्दा गंभीरता से सुना तो तुरंत टीम गठित कर कार्यवाही का आदेश दिया।
अभियान की शुरुआत: टीकाकरण के लिए चलाया गया विशेष संवाद—
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जब लाहिलपार उपकेंद्र से रवाना होकर बाग-बगिचों की ओर कदम बढ़ाए तो यह मात्र एक चिकित्सा कार्यवाही नहीं, बल्कि समाज के हाशिए पर रह रहे समुदाय को उनके अधिकार दिलाने की शुरुआत थी। टीम में यूनिसेफ के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर अरसद जमाल, ब्लॉक कोऑर्डिनेटर आलोक सिन्हा, बीएचडब्लू धीरज कुमार, सीएचओ अर्चना यादव, राकेश शर्मा, अरविंद सिंह, राम लखन, आशा कार्यकर्ता और अन्य स्टाफ शामिल थे। इन सभी ने नट परिवारों को उनके बच्चों और गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण के महत्व को समझाया। कई लोगों ने पहले टीका लगवाने से इंकार कर दिया, लेकिन बार-बार संवाद और प्रेमपूर्वक समझाने पर समुदाय धीरे-धीरे तैयार हुआ।

- कौन-कौन से टीके लगाए गए और क्यों जरूरी हैं?
- स्वास्थ्य टीम ने बच्चों को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत विभिन्न टीके लगाए। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं—
- बीसीजी (BCG) – यह टीका टीबी (तपेदिक) से बचाव के लिए दिया जाता है और जन्म के तुरंत बाद लगाना जरूरी होता है।
- ओपीवी (Oral Polio Vaccine) – पोलियो से बचाव के लिए।
- हेपेटाइटिस बी – यकृत रोग से सुरक्षा के लिए।
- पेंटावैलेंट वैक्सीन – डिप्थीरिया, टेटनस, काली खांसी, हेपेटाइटिस बी और हिब बैक्टीरिया से रक्षा करता है।
- एमआर (MR) वैक्सीन – खसरा और रुबेला से बचाव।
- डीपीटी बूस्टर – बच्चों को 16-24 महीने और 5-6 साल की उम्र में टेटनस, डिप्थीरिया और काली खांसी से सुरक्षा के लिए।
- टीटी (टेटनस टॉक्सॉइड) – गर्भवती महिलाओं को टेटनस से बचाने के लिए।
- इन टीकों की वजह से बच्चों में गंभीर बीमारियों की संभावना बेहद कम हो जाती है और यह उनकी दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुरक्षा की नींव रखता है। वहीं गर्भवती महिलाओं को उचित समय पर टेटनस और आयरन की गोलियों की भी खुराक दी गई।
क्या प्रदेश सरकार दे रही है पर्याप्त सुविधाएं?
यह एक बड़ा सवाल है कि जब तक मझगांवा प्रभारी चिकित्साधिकारी और स्वास्थ्य विभाग की स्थानीय इकाई सक्रिय नहीं होती, तब तक यह अभियान असंभव ही था। यह इस बात को दर्शाता है कि प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई योजनाएं जमीन तक तब ही पहुँच पाती हैं जब स्थानीय प्रशासन उन्हें गंभीरता से लागू करे। नट परिवारों जैसे घुमंतू समुदायों के लिए विशेष रणनीति की आवश्यकता है, क्योंकि ये लोग न तो जनगणना में शामिल होते हैं, न ही किसी योजना का लाभ उठा पाते हैं। इनके बच्चों के पास कोई आधार कार्ड नहीं, माता-पिता को कोई पहचान पत्र नहीं, और न ही कोई स्वास्थ्य कार्ड।
यदि प्रदेश सरकार वास्तव में इन परिवारों को बीमारियों से सुरक्षित रखना चाहती है, तो केवल टीकाकरण अभियान ही नहीं, इनके लिए विशेष स्वास्थ्य पुनर्वास योजना, चलंत मोबाइल क्लीनिक, सामुदायिक शिक्षा अभियान, और स्थायी आश्रय योजना की भी आवश्यकता है। तभी जाकर इस तरह के समुदायों की जमीनी स्थिति बदली जा सकती है।
हालांकि इस विशेष अभियान ने नट समुदाय के बीच एक नई शुरुआत की है, लेकिन यह केवल पहला कदम है। स्वास्थ्य विभाग को इन परिवारों की निगरानी में रखकर बच्चों के फॉलो-अप टीकाकरण, पोषण, और मातृ-स्वास्थ्य देखभाल पर निरंतर ध्यान देना होगा। साथ ही स्कूल शिक्षा विभाग को इनके बच्चों की नामांकन प्रक्रिया आरंभ करनी चाहिए, जिससे वे सामाजिक विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकें। लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार गरीबों का स्कूल प्राइमरी स्कूल बंद ही करना शुरू कर दिया है तो इन बच्चों को शिक्षा सुविधा कहां से मुहैया होगी।
यूनिसेफ, डब्ल्यूएचओ, और अन्य स्वास्थ्य संगठनों को चाहिए कि वे इन समुदायों पर विशेष अध्ययन कर उनके लिए अनुकूल रणनीति तैयार करें, क्योंकि एक ही प्रकार की नीति सभी के लिए लागू नहीं हो सकती।
एक संवेदनशील पहल की मिसाल
मझगांवा पीएचसी की यह पहल न केवल एक प्रशासनिक सफलता है बल्कि यह बताती है कि यदि इच्छा हो तो समाज के सबसे वंचित तबके तक भी योजनाओं को पहुँचाया जा सकता है। नट परिवारों के बच्चों का टीकाकरण सिर्फ स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि मानवाधिकार की रक्षा भी है। यह एक उदाहरण है कि जब चिकित्सा विज्ञान और मानवीय संवेदना मिलकर काम करते हैं, तो बदलाव संभव होता है।
यह अभियान यह भी दर्शाता है कि सरकार, समाज, और संगठनों को मिलकर काम करना होगा ताकि हर नागरिक, चाहे वो किसी भी जाति, समुदाय, या स्थिति में हो – उसे जीवन की बुनियादी सुविधा मिल सके। नट समुदाय के लिए यह टीकाकरण अभियान एक नई उम्मीद की किरण है – एक ऐसा सूर्योदय जिसमें हर बच्चा, हर महिला, और हर परिवार सुरक्षित, स्वस्थ और सशक्त भविष्य की ओर बढ़ सके।
देवरिया जनपद से दिलीप कुमार की विशेष रिपोर्ट
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बहुत ही बढ़िया जानकारी स्वास्थ विभाग द्वारा सराहनीय कार्य भाई जी देखने को मिल रहा आपके इस लेख से।