भगवान धन्वंतरि को समर्पित धनत्रयोदशी कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष के त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का पर्व दीपावली की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन से दीपोत्सव का पर्व शुरू होता है और बड़ी दीपावली को भव्य रूप दीपावली पर्व के साथ समापन होता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड समेत राज्यों में छठ पूजा तक दीपोत्सव का पर्व मनाया जाता है।
यह धनतेरस का त्योहार मुख्य रूप से धन और आरोग्यता की कामना से जुड़ा है। “धनतेरस” शब्द में “धन” का अर्थ है धन-संपत्ति और “तेरस” का अर्थ त्रयोदशी तिथि से है। इसे धन त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज के वंशज अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म लेखनी में धनतेरस से जुड़ी पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं का विवरण यहाँ धनतेरस की शुभ कामनाओं के साथ प्रस्तुत है।
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पौराणिक कथा और महत्व
धनतेरस का पर्व भगवान धन्वंतरि से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया। मंथन से कई अद्भुत वस्तुएँ प्राप्त हुईं, और अंत में अमृत कलश के साथ भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। वे चिकित्सा विज्ञान के देवता माने जाते हैं और आयुर्वेद के जनक भी कहे जाते हैं। इस दिन उनकी पूजा से स्वास्थ्य, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है।

इस वर्ष धनतेरस का पर्व
इस वर्ष धनतेरस का पर्व मंगलवार, 18 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा, जो कार्तिक माह की त्रयोदशी तिथि के दिन आता है। अगले दिन, 19 अक्टूबर, उदया तिथि भी त्रयोदशी है, इसलिए कहीं-कहीं दोनों दिन धनत्रयोदशी पर्व मनाया जायेगा। इस दिन सोने, चांदी, और बर्तनों की खरीदारी का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इसे समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है।
धनतेरस का शुभ मुहूर्त
धनतेरस की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त मंगलवार शाम 6:31 बजे से 8:44 बजे तक है। प्रदोष काल शाम 5:38 बजे से 8:13 बजे तक रहेगा। 19 अक्टूबर रविवार को भी सुबह 10:31 बजे से दोपहर 1:15 बजे तक खरीदारी का शुभ समय है।
धनतेरस की कथा: यमदीपदान का महत्व
एक कथा के अनुसार, हिम नामक राजा के पुत्र की कुंडली में चौथे दिन मृत्यु का योग था। उनकी पत्नी ने सोने-चाँदी के आभूषणों को द्वार पर जमा किया और दीयों को जलाकर पहरा दिया। जब यमराज उनके पास पहुँचे, तो आभूषणों के प्रकाश से वे भ्रमित हो गए और बिना कुछ लिए ही वापस लौट गए। इस दिन को यमदीपदान के रूप में मनाया जाता है।
समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि का प्रकट होना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमरता प्राप्त करने के लिए संधि की और मिलकर समुद्र मंथन करने का निश्चय किया। मंदराचल पर्वत को मथनी और नाग वासुकी को रस्सी के रूप में प्रयोग कर मंथन किया गया। मंथन के दौरान कामधेनु, कल्पवृक्ष, रत्न, लक्ष्मी जी, और अन्य दिव्य वस्तुएँ प्राप्त हुईं। अंततः अमृत कलश के साथ भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए।
आयुर्वेद के जनक: भगवान धन्वंतरि
भगवान धन्वंतरि ने मानव जाति को आरोग्यता का उपहार दिया और आयुर्वेद के सिद्धांतों की स्थापना की। चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद में भगवान धन्वंतरि का विशेष स्थान है। उन्हें आयुर्वेद का जनक माना जाता है, और धनतेरस पर उनकी पूजा स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से की जाती है।
धनतेरस पर खरीदी का महत्व

धनतेरस पर सोना, चाँदी, बर्तन, आभूषण, झाड़ू और घर के नए सामान खरीदने की परंपरा है। इसे समृद्धि और स्थिरता का प्रतीक माना गया है। इस दिन इलेक्ट्रॉनिक सामान और वाहन भी खरीदे जाते हैं। झाड़ू की खरीदारी के लिए विशेष ध्यान रखना चाहिए, और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बुधवार को झाड़ू खरीदना शुभ माना गया है। उपरोक्त दिए गए लिंक पर क्लिक किजिये पढ़िए जानिए धनतेरस पर झाड़ू खरीदने से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी।
ऐतिहासिक दृष्टि से धनतेरस
धनतेरस का इतिहास भारत की समृद्ध संस्कृति से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में इसे व्यापारिक और आर्थिक उन्नति का प्रतीक माना जाता था। इस दिन आभूषणों और धातुओं की खरीदारी का विशेष महत्व था। इस परंपरा का आधुनिक युग में भी अनुसरण किया जाता है।
धन्वंतरि पूजा और आरोग्यता का प्रतीक
चिकित्सा और स्वास्थ्य से जुड़ी इस परंपरा के माध्यम से लोग स्वस्थ जीवन और रोगों से दूर रहने का संकल्प लेते हैं। धनत्रयोदशी के दिन धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है इस पर्व पर स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना भगवान धन्वंतरि से की जाती है।
आधुनिक युग में धनतेरस का महत्व
आधुनिक समय में धनतेरस न केवल धार्मिक बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बन गया है। बाजारों में इस दिन कई छूट और विशेष ऑफर्स मिलते हैं, और इसे आर्थिक उन्नति का दिन माना जाता है।

धनतेरस पर्व पर लेखनी का निष्कर्ष
धनतेरस का पर्व समृद्धि, सुख, और स्वास्थ्य का प्रतीक है। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा से स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि का महत्व चिकित्सा और आरोग्य में दर्शाता है, जिससे यह पर्व विशेष महत्व रखता है।
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