I News National (North East) के विशेष स्टूडियो में प्रसारित एक इंटरव्यू इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस इंटरव्यू में सामाजिक कार्यकर्ता एवं मानवाधिकार से जुड़ी हस्ती रजनी शाह से हिंदुत्व, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा, महिला आत्मनिर्भरता, मानवाधिकार सेवाएं और international human rights organization (IHRO) जैसे संवेदनशील और समकालीन मुद्दों पर सीधे सवाल पूछे गए। एंकर और वक्ता के बीच संवाद तीखा होने के बावजूद पूरी तरह तथ्यात्मक और वैचारिक दायरे में रहा।

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क्या रजनी शाह मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा के हिंदुत्व की समर्थक हैं?
इंटरव्यू का सबसे चर्चित प्रश्न यही रहा। इस सवाल पर रजनी शाह ने किसी राजनीतिक व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध से स्वयं को स्पष्ट रूप से अलग रखते हुए यह कहा कि हिंदुत्व को एक राजनीतिक औजार के रूप में देखने के बजाय उसे सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों के संदर्भ में समझना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि किसी मुख्यमंत्री या सरकार के कार्यों का मूल्यांकन नारे या विचारधारा के नाम पर नहीं, बल्कि नीतियों के सामाजिक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। यह उत्तर उन दर्शकों के लिए महत्वपूर्ण रहा जो हर सामाजिक कार्यकर्ता को किसी न किसी राजनीतिक खांचे में फिट करने की कोशिश करते हैं।

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एक महिला आत्मनिर्भरता का रास्ता कैसे बना सकती है?
महिला सशक्तिकरण पर पूछे गए सवाल के जवाब में रजनी शाह ने आत्मनिर्भरता को केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित न रखते हुए उसे शैक्षिक, मानसिक और सामाजिक आत्मबल से जोड़ा। उन्होंने कहा कि जब तक महिलाएं निर्णय लेने की क्षमता, अपने अधिकारों की समझ और सामाजिक दबावों से मुक्त सोच विकसित नहीं करतीं, तब तक वास्तविक आत्मनिर्भरता संभव नहीं है। उनका यह कथन खासतौर पर उत्तर-पूर्व भारत की सामाजिक संरचना के संदर्भ में प्रासंगिक माना गया।
ह्यूमन राइट्स से आप क्या समझते हैं और आपकी भूमिका क्या है?
इंटरव्यू के तीसरे हिस्से में मानवाधिकारों पर गंभीर चर्चा हुई। रजनी शाह ने स्पष्ट किया कि ह्यूमन राइट्स कोई पश्चिमी अवधारणा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का सार्वभौमिक सिद्धांत है। उन्होंने यह भी कहा कि मानवाधिकार सेवाओं से जुड़ना केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर पीड़ितों की आवाज़ बनना है—चाहे वह महिला उत्पीड़न का मामला हो, अल्पसंख्यक अधिकारों का प्रश्न हो या सामाजिक भेदभाव का।
IHRO (INTERNATIONAL HUMAN RIGHTS ORGANIZATION) का महत्व
IHRO के महत्व पर बोलते हुए रजनी शाह ने कहा कि यह दस्तावेज़ केवल संयुक्त राष्ट्र का काग़ज़ नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए नैतिक दिशा-सूचक है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर सरकारें और समाज IHRO की भावना को समझ लें, तो कई सामाजिक संघर्ष अपने आप कम हो सकते हैं। यह टिप्पणी खासकर उन देशों के संदर्भ में अहम मानी गई जहाँ मानवाधिकारों को राजनीतिक सुविधा के अनुसार परिभाषित किया जाता है।

मानव सेवाओं और अधिकारों में वर्तमान भूमिका
अंतिम प्रश्न में उनसे पूछा गया कि वे वर्तमान में मानव सेवाओं और अधिकारों के क्षेत्र में क्या भूमिका निभा रही हैं। इसके जवाब में उन्होंने खुद को “संघर्षरत आवाज़ों के साथ खड़े एक साधारण माध्यम” के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी विचारधारा को थोपना नहीं, बल्कि संवाद, संवैधानिक मूल्यों और मानवीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना है।
I News National का यह इंटरव्यू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें न तो भावनात्मक उकसावे की भाषा है और न ही राजनीतिक प्रचार। रजनी शाह के उत्तर यह संकेत देते हैं कि आज के समय में सामाजिक विमर्श को हां या ना के खांचे से बाहर निकालकर समझ, संतुलन और संवेदनशीलता के साथ देखना ज़रूरी है। यह इंटरव्यू उन दर्शकों के लिए खास है जो हिंदुत्व, मानवाधिकार और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को शोर नहीं, सोच के साथ समझना चाहते हैं। amitsrivastav.in पर मिलती है हर तरह की सुस्पष्ट जानकारी बेल आइकॉन को दबा एक्सेप्ट करें एप्स इंस्टाल करें।
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