Sex Positions सेक्स पोजीशन का गुप्त रहस्य वो गुप्त ज्ञान जो कभी आम लोगों को नहीं बताया गया — पूर्ण दांपत्य सुख और आत्मिक मिलन का प्रतिबंधित मार्गदर्शक amitsrivastav.in
लेखक: अमित श्रीवास्तव
विषय सूची
भूमिका
भाग 1 — छुपा हुआ इतिहास
अध्याय 1: वो गुप्त शास्त्र जो सदियों तक छुपाए गए
अध्याय 2: कामसूत्र का असली रहस्य जो किताबों में नहीं मिलता
भाग 2 — तांत्रिक गोपनीयता
अध्याय 3: तंत्र के गुरु-शिष्य परंपरा में गुप्त रखे गए आसन-रहस्य
अध्याय 4: शिव-शक्ति का वो मिलन जिसे साधारण लोगों से छुपाया गया
अध्याय 5: कुंडलिनी जागरण का वर्जित मार्ग
भाग 3 — धार्मिक वर्जनाएं और सच्चाई
अध्याय 6: पुराणों में छुपे संकेत जिन्हें आज तक किसी ने नहीं समझाया
अध्याय 7: गृहस्थ धर्म का वो पहलू जिस पर कोई खुलकर बात नहीं करता
भाग 4 — विज्ञान का चौंकाने वाला सच
अध्याय 8: शरीर के वो रहस्य जो डॉक्टर भी नहीं बताते
अध्याय 9: आसनों का वैज्ञानिक प्रभाव — शोध जो आम जनता तक नहीं पहुंचा
अध्याय 10: वो गलतियां जो 90% जोड़े करते हैं, अनजाने में
भाग 5 — ज्योतिष का छुपा हुआ ज्ञान
अध्याय 11: आपकी कुंडली में छुपा यौन-अनुकूलता का राज़
अध्याय 12: वो शुभ-अशुभ समय जो कोई पंडित नहीं बताता
भाग 6 — व्यावहारिक गुप्त मार्गदर्शिका
अध्याय 13: आधारभूत आसन समूह — सामने से मिलन की मुद्राएं
अध्याय 14: पीछे से मिलन की मुद्राएं — ऊर्जा-प्रवाह और गहनता
अध्याय 15: बैठी हुई मुद्राएं — निकटता और नियंत्रण का संतुलन
अध्याय 16: उन्नत तांत्रिक मुद्राएं — ऊर्जा-संचरण की गहनतम अवस्था
अध्याय 17: आसनों की सुरक्षा-मार्गदर्शिका — किसे क्या सावधानी बरतनी चाहिए
अध्याय 18: आयु और स्वास्थ्य के अनुसार सही आसन का चयन
अध्याय 19: दंपति संवाद और सहमति — सुख का सबसे बड़ा रहस्य
भाग 7 — अंतिम सत्य
अध्याय 20: वो तकनीकें जो तांत्रिक गुरु केवल विवाहित शिष्यों को सिखाते थे
अध्याय 21: निष्कर्ष — पूर्ण दांपत्य सुख का द्वार खोलना
भूमिका
मानव जीवन में दांपत्य संबंध केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह आत्मा, मन और शरीर के त्रिवेणी संगम का सबसे गहरा अनुभव है। सदियों से भारतीय ऋषियों, तांत्रिक गुरुओं और आयुर्वेदाचार्यों ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया, परंतु समाज की झूठी शर्म और संकीर्ण सोच ने इस ज्ञान को सामान्य जन-मानस से दूर रखा। परिणाम यह हुआ कि आज भी लगभग 90% दंपति अपने दांपत्य जीवन में पूर्ण संतुष्टि और आत्मिक जुड़ाव नहीं पा सकते, क्योंकि उन्हें सही, वैज्ञानिक और सुरक्षित जानकारी कभी नहीं मिली।
यह पुस्तक उस अंधकार को दूर करने का एक ईमानदार प्रयास है — तंत्र शास्त्र की गहराई, पुराणों में छुपे संकेत, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के प्रमाण और ज्योतिष शास्त्र के अनुकूलता सिद्धांतों को एक साथ जोड़कर, ताकि हर पाठक अपने जीवन-साथी के साथ एक ऐसा संबंध बना सके जो केवल शारीरिक न हो, बल्कि आत्मिक और स्थायी हो।
इस पुस्तक में प्रत्येक आसन का वर्णन शरीर-रचना विज्ञान, स्वास्थ्य-लाभ, सावधानियों और ऊर्जा-प्रवाह की दृष्टि से किया गया है — शब्दों में इतनी स्पष्टता के साथ कि पाठक बिना किसी भ्रम के समझ सके। जहाँ आवश्यक है, वहाँ चित्रों के माध्यम से शारीरिक स्थिति और मुद्रा को सरल रूप में समझाया गया है, ताकि पारिवारिक दृष्टिकोण से जानकारी वैज्ञानिक और शिष्टाचार के साथ बनी रहे।
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भाग 1 — छुपा हुआ इतिहास
अध्याय 1: वो गुप्त शास्त्र जो सदियों तक छुपाए गए
भारतीय सभ्यता संसार की उन प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है जिसने दांपत्य संबंधों को केवल भोग नहीं, बल्कि जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक — “काम” — मानकर इसका विधिवत शास्त्रीय अध्ययन किया। महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित कामसूत्र इसी परंपरा का सबसे प्रसिद्ध प्रमाण है, परंतु यह एकमात्र ग्रंथ नहीं था। कोक्कोक द्वारा रचित “रतिरहस्य”, कल्याणमल्ल का “अनंग रंग”, और अनेक तांत्रिक ग्रंथ इस विषय पर गहन विवेचना करते थे कि दांपत्य मिलन शरीर, मन और आत्मा तीनों को किस प्रकार प्रभावित करता है।
इन ग्रंथों में आसनों का वर्णन केवल शारीरिक आनंद के लिए नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच शारीरिक अनुकूलता, स्वास्थ्य-संतुलन और भावनात्मक निकटता बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया था। समय के साथ जब विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय समाज में यौन-विषयों पर खुलकर बात करना “अश्लील” और “अनैतिक” घोषित कर दिया गया, तब यह समृद्ध ज्ञान-परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती गई।
मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण खजुराहो और कोणार्क के शिल्प, जो कभी इस ज्ञान को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करते थे, आज केवल पर्यटन-स्थल बनकर रह गए हैं, जबकि उनके पीछे छुपा गहन शास्त्रीय ज्ञान आम जनता की पहुंच से बाहर हो गया। यह पुस्तक इसी लुप्त होती परंपरा को पुनः जीवित करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है।
अध्याय 2: कामसूत्र का असली रहस्य जो किताबों में नहीं मिलता
अधिकांश लोग कामसूत्र को केवल एक “आसन-पुस्तक” मानते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि मूल कामसूत्र के सात अधिकरणों (भागों) में से आसनों का वर्णन केवल एक छोटे भाग — “साम्प्रयोगिक अधिकरण” — में मिलता है। शेष ग्रंथ में प्रेम, विवाह, गृहस्थ जीवन के नियम, पति-पत्नी के बीच संवाद, और सामाजिक व्यवहार जैसे विषयों की गहन चर्चा है। अनुवादकों और बाजार की मांग ने इस ग्रंथ को केवल “आसन-सूची” के रूप में प्रस्तुत करके इसकी वास्तविक गहराई को छुपा दिया।
वात्स्यायन का मूल उद्देश्य यह था कि पति-पत्नी शारीरिक मिलन से पहले एक-दूसरे के मन, स्वभाव और शारीरिक क्षमता को समझें, ताकि मिलन बलपूर्वक या असंतुलित न हो, बल्कि परस्पर सहमति और आनंद पर आधारित हो। Best Sex Positions अगले बृहद विस्तृत रूप से लिखी जा रही बुक में हम कामसूत्र के उन मूल सिद्धांतों को सामने लाएंगे जो अधिकतर लोकप्रिय संस्करणों में पूरी तरह छोड़ दिए गए — जैसे “चतुष्षष्टि कला” (64 कलाएं) की अवधारणा, जिसमें आसन केवल एक अंश है, और बाकी 63 कलाएं जीवन-साथी के साथ भावनात्मक व सामाजिक तालमेल बनाने से जुड़ी हैं।
भाग 2 — तांत्रिक गोपनीयता
अध्याय 3: तंत्र के गुरु-शिष्य परंपरा में गुप्त रखे गए आसन-रहस्य
तंत्र शास्त्र भारतीय अध्यात्म की उस शाखा का नाम है जिसने शरीर को साधना का माध्यम माना, न कि साधना में बाधा। जहां वैदिक परंपरा में इंद्रिय-निग्रह पर बल दिया गया, वहां तांत्रिक परंपरा ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि यदि शरीर की ऊर्जाओं को सही दिशा और सही विधि से प्रयोग किया जाए, तो वही शरीर मोक्ष का द्वार बन सकता है। इसी कारण तांत्रिक ग्रंथों में मैथुन को “पंचमकार” की साधनाओं में सम्मिलित किया गया — परंतु यह ज्ञान कभी सार्वजनिक रूप से नहीं सिखाया गया।
गुरु अपने शिष्य को तभी यह विद्या देते थे जब वे आश्वस्त हो जाते थे कि शिष्य इसका दुरुपयोग नहीं करेगा और इसे भोग-वासना के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए अपनाएगा। यही कारण है कि अधिकांश तांत्रिक आसन-विधियां मौखिक परंपरा (गुरु-शिष्य परम्परा) में ही सीमित रहीं और लिखित रूप में बहुत कम संरक्षित हो सकीं। जो थोड़ा-सा लिखित ज्ञान बचा भी, वह संस्कृत की जटिल संकेत-भाषा में इस प्रकार छिपाकर लिखा गया कि सामान्य पाठक उसे पढ़कर भी उसका वास्तविक अर्थ न समझ सके।
अगले बुक Best Sex Positions में हम लेखक अमित श्रीवास्तव उन तांत्रिक आसनों के मूल सिद्धांतों को सरल भाषा में प्रस्तुत करेंगे, जिनका उद्देश्य केवल शारीरिक सुख नहीं, बल्कि दोनों साथियों की ऊर्जा को संतुलित और उन्नत करना था।
अध्याय 4: शिव-शक्ति का वो मिलन जिसे साधारण लोगों से छुपाया गया
भारतीय तंत्र-दर्शन के केंद्र में शिव और शक्ति का सिद्धांत है — शिव को चेतना (पुरुष तत्व) और शक्ति को ऊर्जा (स्त्री तत्व) के रूप में देखा गया है। तांत्रिक मान्यता के अनुसार, जब पति-पत्नी शारीरिक रूप से मिलते हैं, तो यह घटना केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से शिव और शक्ति के मिलन के समान मानी गई — जिसमें पुरुष की स्थिर चेतना और स्त्री की गतिशील ऊर्जा एक-दूसरे में विलीन होकर एक उच्चतर अनुभव का निर्माण करती हैं।
इसी सिद्धांत के आधार पर तांत्रिक आसनों की रचना इस उद्देश्य से की गई थी कि दोनों साथियों के शरीर की ऊर्जा-वाहिनी नाड़ियां (विशेष रूप से इड़ा और पिंगला) आसन के दौरान परस्पर संतुलन में आ सकें। साधारण जनमानस से यह ज्ञान इसलिए दूर रखा गया क्योंकि बिना उचित समझ के इसे केवल कामुकता समझ लिया जाता, जबकि इसका वास्तविक प्रयोजन आध्यात्मिक उन्नति था। इस अध्याय में हम बताएंगे कि किस प्रकार सही आसन और सही मनोदशा के साथ यह प्राचीन सिद्धांत आज के दंपतियों के लिए भी शारीरिक स्वास्थ्य और भावनात्मक गहराई दोनों ला सकता है।
अध्याय 5: कुंडलिनी जागरण का वर्जित मार्ग
कुंडलिनी को शरीर के मूलाधार चक्र में सोई हुई आध्यात्मिक ऊर्जा माना जाता है, जिसके जागरण से साधक को असाधारण अनुभवों की प्राप्ति होती है। तांत्रिक परंपरा में यह विश्वास प्रचलित रहा है कि कुछ विशेष आसन और श्वास-नियंत्रण की विधियां, जब दांपत्य मिलन के दौरान अपनाई जाती हैं, तो वे कुंडलिनी ऊर्जा को जागृत करने में सहायक हो सकती हैं। यह मार्ग “वर्जित” इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें शारीरिक मुद्रा, श्वास और मानसिक एकाग्रता का ऐसा संयोजन आवश्यक है जिसे बिना सही मार्गदर्शन के अपनाना असंतुलन पैदा कर सकता है।
इसी सावधानी के कारण गुरुजन इसे केवल परिपक्व और अनुशासित शिष्यों को ही सिखाते थे। इस अध्याय में हम उन बुनियादी सिद्धांतों को सुरक्षित और व्यावहारिक ढंग से समझाएंगे — जैसे उचित श्वास-लय, मानसिक एकाग्रता, और शरीर की स्थिरता — जिनसे सामान्य दंपति भी बिना किसी जोखिम के अपने मिलन को अधिक गहरा और ऊर्जावान अनुभव बना सकते हैं।
भाग 3 — धार्मिक वर्जनाएं और सच्चाई
अध्याय 6: पुराणों में छुपे संकेत जिन्हें आज तक किसी ने नहीं समझाया
भारतीय पुराण-साहित्य में दांपत्य जीवन और यौन-संबंधों का उल्लेख प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से किया गया है, जिसका अर्थ समझने के लिए गहन अध्ययन आवश्यक है। शिव पुराण में शिव-पार्वती के मिलन का वर्णन, देवी भागवत में शक्ति के विभिन्न रूपों की उपासना, और स्कंद पुराण में कार्तिकेय की उत्पत्ति से जुड़ी कथाएं — इन सभी में गहराई से देखा जाए तो सृजन, ऊर्जा-संतुलन और दांपत्य मिलन के मौलिक सिद्धांत छिपे मिलते हैं।
उदाहरण के लिए, अर्धनारीश्वर स्वरूप — जिसमें शिव के शरीर का आधा भाग पुरुष और आधा भाग स्त्री रूप में दर्शाया गया है — यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि यह गहन संदेश देता है कि पुरुष और स्त्री तत्व वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं, अलग नहीं। पुराणकारों ने जानबूझकर इन गूढ़ सत्यों को सीधी भाषा में नहीं लिखा, क्योंकि तत्कालीन समाज में यह विषय सार्वजनिक चर्चा के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था।
अगले प्रकाशित बुक में हम इन पौराणिक कथाओं का गहन विश्लेषण करके यह दिखाएंगे कि किस प्रकार प्राचीन ऋषियों ने कथा और प्रतीक के माध्यम से दांपत्य-मिलन के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को संरक्षित रखा।
अध्याय 7: गृहस्थ धर्म का वो पहलू जिस पर कोई खुलकर बात नहीं करता
सनातन धर्म में जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है, जिनमें “गृहस्थ आश्रम” को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यही आश्रम बाकी तीनों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास) का आधार है। गृहस्थ धर्म में दांपत्य संबंध को केवल संतानोत्पत्ति का साधन नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की सिद्धि का माध्यम माना गया है। मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जिस दंपति के बीच शारीरिक और भावनात्मक सामंजस्य होता है, वही गृहस्थ जीवन को सफलतापूर्वक निभा पाता है और आगे आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है।
परंतु समाज में धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि धर्म और यौन-सुख परस्पर विरोधी विषय हैं, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है — प्राचीन ऋषियों ने कभी भी दांपत्य-सुख को धर्म-विरुद्ध नहीं माना, बल्कि इसे विवाहित जीवन का स्वाभाविक और आवश्यक अंग स्वीकार किया। अगले सीरीज़ बुक Best Sex Positions फिगर बुक मे हम यह स्पष्ट करेंगे कि किस प्रकार धर्मशास्त्रों की सही समझ दंपतियों को अपराध-बोध से मुक्त करके एक स्वस्थ, संतुलित और आनंदपूर्ण दांपत्य जीवन जीने की दिशा दिखा सकती है।
भाग 4 — विज्ञान का चौंकाने वाला सच
अध्याय 8: शरीर के वो रहस्य जो डॉक्टर भी नहीं बताते
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मानव शरीर की संरचना और यौन-क्रिया के शरीरक्रियात्मक (फिजियोलॉजिकल) पहलुओं पर व्यापक शोध किया है, परंतु सामान्य डॉक्टर अपने सीमित परामर्श-समय में इन विषयों पर विस्तार से बात नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, बहुत कम लोग जानते हैं कि पुरुष और स्त्री के जननांगों की संरचना में सूक्ष्म भिन्नताएं होती हैं, जिनके कारण एक ही आसन अलग-अलग दंपतियों के लिए अलग-अलग स्तर का सुख या असुविधा उत्पन्न कर सकता है।
इसी प्रकार, महिलाओं में जी-स्पॉट (G-spot) की स्थिति, पुरुषों में उत्तेजना और स्खलन-नियंत्रण से जुड़ी शारीरिक प्रक्रिया, तथा दोनों साथियों की रीढ़ की हड्डी, कूल्हे के जोड़ों और मांसपेशियों की लचक (फ्लेक्सिबिलिटी) — ये सभी कारक यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सा आसन किसी विशेष दंपति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रहेगा।
इसका विस्तृत अध्ययन हम लेखक अमित श्रीवास्तव अगले सीरीज़ Best Sex Positions बुक में शरीर-रचना विज्ञान के इन पहलुओं को सरल भाषा में समझाएंगे और फिगर के माध्यम से भी यह दिखाएंगे कि शारीरिक संरचना की सही समझ किस प्रकार दांपत्य-जीवन में असुविधा और असंतोष को दूर करके पूर्ण संतुष्टि की ओर ले जा सकती है।
अध्याय 9: आसनों का वैज्ञानिक प्रभाव — शोध जो आम जनता तक नहीं पहुंचा
विश्व भर के चिकित्सा-शोध संस्थानों में यौन-स्वास्थ्य पर हुए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि विभिन्न आसन केवल सुख का साधन नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। कुछ आसन हृदय-गति और रक्त-संचार को बढ़ाकर हल्के व्यायाम के समान लाभ देते हैं, कुछ आसन रीढ़ की हड्डी और कूल्हे के जोड़ों की लचक बढ़ाने में सहायक होते हैं, जबकि कुछ आसन दोनों साथियों के बीच आंख से आंख का संपर्क बनाए रखकर मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन हार्मोन (जिसे “प्रेम-हार्मोन” भी कहा जाता है) के स्राव को बढ़ाते हैं, जिससे भावनात्मक जुड़ाव गहरा होता है।
यह शोध-आधारित जानकारी सामान्यतः चिकित्सा-पत्रिकाओं और शोध-पत्रों में सीमित रहती है, जो आम पाठक की पहुंच से बाहर होती है। अगले बुक में हम इन वैज्ञानिक निष्कर्षों को सरल और व्यावहारिक भाषा में प्रस्तुत करेंगे, ताकि हर पाठक यह समझ सके कि कौन-सा आसन किस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य, मांसपेशियों की मजबूती और भावनात्मक निकटता में योगदान देता है।
अध्याय 10: वो गलतियां जो 90% जोड़े करते हैं, अनजाने में
चिकित्सा-परामर्शदाताओं और यौन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुभव से यह बात सामने आती है कि अधिकांश दंपति दांपत्य-मिलन के दौरान कुछ सामान्य परंतु महत्वपूर्ण गलतियां दोहराते रहते हैं, जिनके कारण उन्हें अपेक्षित संतुष्टि नहीं मिल पाती। इनमें सबसे प्रमुख गलती है — पूर्व-उत्तेजना (फोरप्ले) की अवधि को अत्यंत कम रखना, जिसके कारण शारीरिक तैयारी पूरी नहीं हो पाती और असुविधा उत्पन्न होती है।
दूसरी सामान्य गलती है शरीर की सही स्थिति और सहायक सहारे (जैसे तकिए या दीवार) का उपयोग न करना, जिससे मांसपेशियों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और आसन का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। तीसरी गलती है दोनों साथियों के बीच संवाद की कमी — अपनी असुविधा या पसंद को खुलकर न बताना, जिससे एक साथी को असंतोष का अनुभव होता रहता है।
इस अध्याय को ध्यान में रखते हुए हम इन सामान्य गलतियों को विस्तार से अगले बुक Best Sex Positions में समझाएंगे और प्रत्येक के लिए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करेंगे, ताकि पाठक इन्हें सुधारकर अपने दांपत्य-जीवन को अधिक संतोषप्रद बना सकें।
भाग 5 — ज्योतिष का छुपा हुआ ज्ञान
अध्याय 11: आपकी कुंडली में छुपा यौन-अनुकूलता का राज़
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में विवाह से पूर्व कुंडली-मिलान की परंपरा सदियों से चली आ रही है, परंतु अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि इस मिलान में केवल स्वभाव और पारिवारिक सामंजस्य ही नहीं, बल्कि शारीरिक और यौन-अनुकूलता के सूक्ष्म संकेत भी छिपे होते हैं। जन्म-कुंडली में सप्तम भाव (विवाह और दांपत्य-जीवन का भाव) और अष्टम भाव (गुप्त इंद्रियों तथा गहन आकर्षण का भाव) का विशेष अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है।
मंगल ग्रह शरीर की ऊर्जा, उत्साह और शारीरिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि शुक्र ग्रह आकर्षण, कोमलता और भावनात्मक निकटता का कारक माना जाता है — इन दोनों ग्रहों की स्थिति और आपसी दृष्टि-संबंध यह दर्शाती है कि दो व्यक्तियों के बीच शारीरिक तालमेल किस स्तर का हो सकता है। जिन दंपतियों की कुंडली में मंगल और शुक्र के बीच शुभ संबंध होता है, उनमें प्रायः शारीरिक ऊर्जा और भावनात्मक गहराई का बेहतर संतुलन देखा जाता है, जबकि प्रतिकूल स्थिति में सचेत प्रयास और समझ की अधिक आवश्यकता होती है।
अध्याय 12: वो शुभ-अशुभ समय जो कोई पंडित नहीं बताता
ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद दोनों में यह मान्यता प्रचलित है कि समय (काल) का प्रभाव केवल बाहरी कार्यों पर ही नहीं, बल्कि दांपत्य-मिलन की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। तिथि, नक्षत्र, और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर कुछ समय अत्यंत अनुकूल माने गए हैं, जबकि कुछ समय — जैसे अमावस्या, कुछ विशेष श्राद्ध-तिथियां, या स्त्री के मासिक-धर्म काल — को धर्मशास्त्रों में वर्जित बताया गया है। इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य और ऊर्जा-संतुलन से जुड़े व्यावहारिक कारण भी माने गए हैं।
इसी प्रकार, दिन के कुछ प्रहर (जैसे ब्रह्म-मुहूर्त के बाद का समय) शरीर और मन दोनों के लिए अधिक शांत और ऊर्जावान माने गए हैं, जो दांपत्य-मिलन के लिए अधिक अनुकूल परिणाम देते हैं। सामान्यतः पंडित या ज्योतिषी सार्वजनिक रूप से इन विषयों पर खुलकर चर्चा नहीं करते, क्योंकि यह विषय सामाजिक रूप से संवेदनशील माना जाता है। इस अध्याय को हम इन शुभ-अशुभ समयों के पीछे के धार्मिक, ज्योतिषीय और स्वास्थ्य-संबंधी तर्कों को स्पष्ट रूप से अगले बुक में प्रस्तुत करेंगे, ताकि पाठक अपने जीवन में इनका व्यावहारिक उपयोग कर सकें।

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भाग 6 — व्यावहारिक गुप्त मार्गदर्शिका
अध्याय 13: आधारभूत आसन समूह — सामने से मिलन की मुद्राएं
इस समूह में वे आसन सम्मिलित हैं जिनमें पति-पत्नी एक-दूसरे के सम्मुख रहते हैं, जिससे आँखों का सीधा संपर्क बना रहता है और भावनात्मक निकटता सर्वाधिक होती है। इस स्थिति में पत्नी पीठ के सहारे लेट जाती है और घुटनों को मोड़कर पैरों को स्वाभाविक रूप से ऊपर या बगल में रखती है, जबकि पति उसके ऊपर इस प्रकार स्थित होता है कि उसका भार अपनी बांहों और घुटनों पर संतुलित रहे, न कि पूरी तरह पत्नी के शरीर पर।
इस मुद्रा का सबसे बड़ा शारीरिक लाभ यह है कि इसमें रीढ़ की हड्डी पर कम दबाव पड़ता है, जिससे यह गर्भावस्था के आरंभिक महीनों में भी, चिकित्सक की सलाह अनुसार, अपनाई जा सकती है। तांत्रिक दृष्टिकोण से यह मुद्रा शिव-शक्ति के प्रत्यक्ष सम्मुख-मिलन का प्रतीक मानी गई है, जिसमें दोनों साथियों की ऊर्जा सीधे नेत्रों और हृदय-चक्र के माध्यम से आदान-प्रदान होती है।
सावधानी की दृष्टि से यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जिन दंपतियों में से किसी को कमर या घुटने की समस्या हो, उन्हें तकिए का सहारा लेकर मुद्रा को समायोजित करना चाहिए, ताकि जोड़ों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। 64 भिन्न-भिन्न प्रकार के Sex Positions अधिक बिस्तार से जानने के लिए पढ़िए हमारी Sex Education में प्रकाशित सीरीज़ Best Sex Positions बुक।
इस समूह का एक अन्य प्रचलित रूप वह है जिसमें पत्नी अपने पैरों को पति के कंधों की दिशा में ऊपर उठाकर रखती है। इस स्थिति से प्रवेश-कोण में परिवर्तन आता है, जिससे शारीरिक उत्तेजना की तीव्रता बढ़ जाती है, परंतु इसके लिए पत्नी के कूल्हे और जांघों की मांसपेशियों में पर्याप्त लचक आवश्यक है। जिन महिलाओं को यह लचक स्वाभाविक रूप से नहीं होती, उनके लिए धीरे-धीरे योगाभ्यास द्वारा जांघ और कूल्हे की मांसपेशियों को तैयार करना उपयुक्त रहता है, जिसका विस्तृत विवरण हम अगले बुक में सुरक्षा-मार्गदर्शिका के अंतर्गत प्रस्तुत करेंगे।
अध्याय 14: पीछे से मिलन की मुद्राएं — ऊर्जा-प्रवाह और गहनता
इस समूह के आसनों में पति-पत्नी एक ही दिशा में उन्मुख होते हैं, जिसमें पत्नी आगे की ओर तथा पति पीछे की ओर स्थित रहता है। इस मुद्रा में शारीरिक प्रवेश की गहनता स्वाभाविक रूप से अधिक होती है, जिसके कारण इसे तांत्रिक ग्रंथों में विशेष ऊर्जा-संचरण के लिए उपयुक्त माना गया है — इस स्थिति में मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों के बीच ऊर्जा-प्रवाह अधिक प्रत्यक्ष रूप से अनुभव होता है, ऐसा तांत्रिक साधकों का मत रहा है।
शारीरिक दृष्टि से यह मुद्रा पीठ के निचले हिस्से में हल्का खिंचाव उत्पन्न कर सकती है, अतः जिन व्यक्तियों को पीठ में पुरानी अकड़न या स्लिप-डिस्क की समस्या रही हो, उन्हें यह मुद्रा अपनाने से पूर्व सावधानी बरतनी चाहिए, या तकिए का सहारा लेकर घुटनों व कमर को उचित सहारा देना चाहिए।
इस मुद्रा में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें आँखों का सीधा संपर्क नहीं बन पाता, जिसके कारण भावनात्मक निकटता बनाए रखने के लिए स्पर्श और वाणी का सहारा लेना विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है — जैसे पति द्वारा पत्नी की पीठ, कंधे या केश को स्पर्श करते रहना, ताकि शारीरिक निकटता के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी बना रहे।
इस समूह का एक कोमल रूप वह है जिसमें दोनों साथी करवट लेकर एक-दूसरे से सटे हुए लेटते हैं। यह मुद्रा शारीरिक रूप से सबसे कम श्रम-साध्य है, इसलिए इसे विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए उपयुक्त माना गया है जिनमें से कोई गर्भावस्था के अंतिम महीनों में हो, अस्वस्थ हो, या अधिक शारीरिक श्रम न कर सकता हो। धीमी गति और लंबी अवधि के मिलन के लिए यह मुद्रा विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है, जिसमें शारीरिक थकान की तुलना में भावनात्मक और ऊर्जात्मक अनुभव अधिक प्रधान रहता है।
अध्याय 15: बैठी हुई मुद्राएं — निकटता और नियंत्रण का संतुलन
बैठी हुई मुद्राओं का विशेष महत्व यह है कि इनमें दोनों साथियों के शरीर एक-दूसरे के अत्यंत निकट रहते हैं, जिससे त्वचा-से-त्वचा का स्पर्श अधिकतम होता है और गति की तीव्रता दोनों साथी मिलकर नियंत्रित कर सकते हैं। इस समूह की सबसे प्रचलित मुद्रा में पति किसी स्थिर सतह — जैसे कुर्सी, पलंग के किनारे या तकिए के सहारे — पर बैठता है, जबकि पत्नी उसकी गोद में मुख-सम्मुख होकर बैठती है और अपने पैरों को उसकी कमर के इर्द-गिर्द या पीठ के पीछे रखती है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि गति की गति और गहनता पूर्णतः पत्नी के नियंत्रण में रहती है, जिससे वे अपनी शारीरिक सुविधा और उत्तेजना के अनुसार लय निर्धारित कर सकती हैं — यह विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए उपयुक्त है जहां पत्नी को अधिक नियंत्रण और आराम की आवश्यकता होती है।
तांत्रिक दृष्टिकोण से यह मुद्रा “यब-युम” नामक प्रसिद्ध तिब्बती-तांत्रिक आसन से गहन संबंध रखती है, जिसमें दोनों साथी हृदय-चक्र और अनाहत ऊर्जा के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए माने जाते हैं। इस मुद्रा में लंबे समय तक स्थिर रहकर, बिना जल्दी किए, केवल श्वास और आलिंगन के माध्यम से ऊर्जा का आदान-प्रदान करना — यही तांत्रिक साधना की मूल भावना है।
इस समूह में एक अन्य उपयोगी रूप वह है जिसमें पत्नी पति की गोद में इस प्रकार बैठती है कि उसकी पीठ पति की छाती की ओर रहे। यह स्थिति उन दंपतियों के लिए विशेष रूप से अनुकूल है जो शारीरिक श्रम को न्यूनतम रखते हुए भी गहन निकटता चाहते हैं, क्योंकि इसमें पति की बांहें पत्नी के शरीर को सामने से आलिंगन में ले सकती हैं, जिससे स्पर्श और सुरक्षा का भाव दोनों साथ अनुभव होते हैं। जिन दंपतियों में से किसी के घुटने या कमर में पुरानी चोट हो, उन्हें बैठने के लिए ठोस और स्थिर आधार का चयन करना चाहिए, ताकि संतुलन बनाए रखने में अतिरिक्त शारीरिक श्रम न करना पड़े।
अध्याय 16: उन्नत तांत्रिक मुद्राएं — ऊर्जा-संचरण की गहनतम अवस्था
उन्नत तांत्रिक मुद्राओं की विशेषता यह है कि इनमें शारीरिक गति की तीव्रता को न्यूनतम रखा जाता है, तथा श्वास, दृष्टि और मानसिक एकाग्रता को अधिकतम महत्व दिया जाता है। इस समूह की केंद्रीय मुद्रा में दोनों साथी परस्पर मुख-सम्मुख इस प्रकार बैठते या लेटते हैं कि उनकी रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और दोनों की आंखें खुली रहकर एक-दूसरे की आंखों में देखती रहें।
इस अवस्था में शारीरिक हलचल को यथासंभव धीमा रखा जाता है, तथा दोनों साथी समकालिक (सिंक्रोनाइज़्ड) दीर्घ श्वास लेने का अभ्यास करते हैं — यह क्रिया तांत्रिक परंपरा में “सह-श्वास साधना” कहलाती है, जिसका उद्देश्य दोनों के प्राण-ऊर्जा को एक ही लय में लाना है। इस मुद्रा को अपनाने के लिए दोनों साथियों में पर्याप्त अभ्यास और मानसिक अनुशासन आवश्यक है, क्योंकि यह पारंपरिक तीव्र-गति मिलन से भिन्न अनुभव है और आरंभ में कुछ दंपतियों को इसे अपनाना कठिन प्रतीत हो सकता है।
इसी समूह की एक और मुद्रा में दोनों साथी करवट लेकर एक-दूसरे के सम्मुख इस प्रकार लेटते हैं कि उनके हृदय-स्थल एक-दूसरे के निकट रहें, तथा दोनों अपनी बांहों से एक-दूसरे को पूर्ण आलिंगन में रखते हैं। इस मुद्रा में शारीरिक श्रम अत्यंत कम होता है, इसलिए इसे विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए अनुशंसित किया जाता है जो लंबी अवधि तक बिना थकान के गहन भावनात्मक और ऊर्जात्मक अनुभव चाहते हैं।
तांत्रिक ग्रंथों में इस अवस्था को साधना की उच्चतम अवस्था माना गया है, जहां शारीरिक सुख धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला जाता है और दोनों साथियों के बीच एक गहन, शांत और ध्यानपूर्ण अनुभव प्रधान हो जाता है।
अध्याय 17: आसनों की सुरक्षा-मार्गदर्शिका — किसे क्या सावधानी बरतनी चाहिए
किसी भी आसन को अपनाने से पूर्व यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक शरीर की क्षमता और सीमा भिन्न होती है, इसलिए जो मुद्रा एक दंपति के लिए सहज है, वह दूसरे के लिए असुविधाजनक हो सकती है। जिन व्यक्तियों को कमर दर्द, स्लिप-डिस्क या रीढ़ की हड्डी संबंधी कोई पुरानी समस्या हो, उन्हें ऐसी मुद्राओं से बचना चाहिए जिनमें रीढ़ को अत्यधिक मोड़ने या भार सहने की आवश्यकता पड़ती हो — इनके स्थान पर करवट वाली या तकिए के सहारे वाली मुद्राएं अधिक उपयुक्त रहती हैं।
जिन्हें घुटने या कूल्हे के जोड़ों में गठिया अथवा पुरानी चोट हो, उन्हें बैठी हुई या पैर मोड़कर की जाने वाली मुद्राओं में तकिए या नरम गद्दे का अतिरिक्त सहारा लेना चाहिए, ताकि जोड़ों पर सीधा दबाव न पड़े। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, या हाल में हुई किसी बड़ी शल्य-क्रिया से गुजरे व्यक्तियों को शारीरिक श्रम अधिक मांगने वाली मुद्राओं से बचना चाहिए और चिकित्सक से परामर्श लेकर ही दांपत्य-मिलन की गतिविधि निर्धारित करनी चाहिए।
इस अध्याय का मूल संदेश यह है कि कोई भी आसन तब तक श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता जब तक वह दोनों साथियों के शरीर के लिए सुरक्षित और सहज न हो — सुंदरता या रोमांच से अधिक महत्वपूर्ण है शारीरिक सुरक्षा।
अध्याय 18: आयु और स्वास्थ्य के अनुसार सही आसन का चयन
युवावस्था में शरीर की लचक और सहनशक्ति अधिक होती है, इसलिए इस अवस्था में दंपति अधिकतर मुद्राओं को सहजता से अपना सकते हैं, परंतु आयु बढ़ने के साथ जोड़ों की लचक और सहनशक्ति में स्वाभाविक कमी आती है, जिसके अनुसार मुद्राओं का चयन भी बदलना आवश्यक हो जाता है। मध्यम आयु के दंपतियों के लिए वे मुद्राएं अधिक उपयुक्त रहती हैं जिनमें शारीरिक भार संतुलित रूप से बंटा हो और अचानक झटकेदार गति की आवश्यकता न हो — जैसे करवट वाली या बैठी हुई मुद्राएं।
गर्भावस्था के दौरान मुद्रा-चयन विशेष सावधानी की मांग करता है: आरंभिक महीनों में अधिकतर सामान्य मुद्राएं चिकित्सक की सहमति से अपनाई जा सकती हैं, परंतु मध्य और अंतिम महीनों में पेट पर सीधा दबाव डालने वाली मुद्राओं से पूर्णतः बचना चाहिए और करवट वाली मुद्राओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी प्रकार, जिन दंपतियों में से किसी को मधुमेह, थायरॉइड या अन्य दीर्घकालिक बीमारी हो, उनके लिए यह उचित रहता है कि वे शारीरिक ऊर्जा-स्तर के अनुसार ही मिलन की अवधि और मुद्रा तय करें, न कि केवल इच्छा के आधार पर।
अध्याय 19: दंपति संवाद और सहमति — सुख का सबसे बड़ा रहस्य
इस पूरी पुस्तक में वर्णित सभी आसन, तकनीकें और सिद्धांत तभी सार्थक हो सकते हैं जब पति-पत्नी के बीच खुला और ईमानदार संवाद स्थापित हो। अधिकांश दांपत्य असंतोष का मूल कारण गलत आसन नहीं, बल्कि यह होता है कि दोनों साथी अपनी इच्छा, असुविधा या सीमा को एक-दूसरे से खुलकर नहीं बता पाते। इसका मुख्य कारण संकोच, सामाजिक संस्कार, या यह भय होता है कि खुलकर बात करने से साथी को बुरा लग सकता है।
परंतु वास्तविकता यह है कि जो दंपति एक-दूसरे से अपनी पसंद, नापसंद और शारीरिक सीमाओं के विषय में सहजता से बात कर पाते हैं, वे अधिक गहन और संतोषप्रद दांपत्य-जीवन का अनुभव करते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि मिलन से पूर्व और पश्चात दोनों साथी शांत वातावरण में एक-दूसरे से बात करने का समय निकालें, बिना किसी निर्णय या आलोचना के भाव के। सहमति केवल एक बार की स्वीकृति नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण में परस्पर समझ और सम्मान की निरंतर प्रक्रिया है — यही वह मूल तत्व है जो किसी भी आसन या तकनीक से अधिक दांपत्य-सुख का निर्धारण करता है।

भाग 7 — अंतिम सत्य
अध्याय 20: वो तकनीकें जो तांत्रिक गुरु केवल विवाहित शिष्यों को सिखाते थे
तांत्रिक परंपरा में यह मान्यता रही है कि शारीरिक मिलन से जुड़ी गहन ऊर्जा-साधनाएं केवल उन्हीं शिष्यों को सिखाई जाती थीं जो विवाहित हों और जिनके बीच स्थायी, विश्वासपूर्ण संबंध स्थापित हो चुका हो — क्योंकि इन तकनीकों के लिए आवश्यक है कि दोनों साथी एक-दूसरे के शरीर और मन को गहराई से समझें, जो केवल अल्पकालिक या अनिश्चित संबंधों में संभव नहीं।
इनमें से एक प्रमुख तकनीक है श्वास का समकालिकरण — जिसमें दोनों साथी मिलन के दौरान अपनी श्वास की गति को धीरे-धीरे एक समान लय में लाने का अभ्यास करते हैं, जिससे शरीर की उत्तेजना नियंत्रित रहती है और अनुभव की अवधि तथा गहनता दोनों बढ़ती है। दूसरी तकनीक है दृष्टि-साधना — जिसमें मिलन के दौरान दोनों साथी बिना पलक झपकाए एक-दूसरे की आंखों में देखते रहने का अभ्यास करते हैं, जिससे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और शारीरिक अनुभव के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी गहरा होता है।
तीसरी तकनीक है मूलाधार-बंध — एक सूक्ष्म मांसपेशी-नियंत्रण अभ्यास, जिसे नियमित योगाभ्यास द्वारा विकसित किया जा सकता है, और जो शारीरिक सहनशक्ति तथा नियंत्रण दोनों में सुधार लाता है। इन तकनीकों को सीखने के लिए धैर्य और निरंतर अभ्यास आवश्यक है, और इन्हें अपनाने से पूर्व यह समझना ज़रूरी है कि इनका उद्देश्य तीव्र क्षणिक सुख नहीं, बल्कि दीर्घकालिक, गहन और संतुलित दांपत्य-अनुभव है।
अध्याय 21: निष्कर्ष — पूर्ण दांपत्य सुख का द्वार खोलना
इस पुस्तक की यात्रा में हमने तंत्र, धर्म, विज्ञान और ज्योतिष — चार भिन्न परंतु परस्पर पूरक दृष्टिकोणों से दांपत्य-मिलन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है। यह स्पष्ट हो चुका है कि आसन केवल शारीरिक क्रियाएं नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के अनुभव, अध्ययन और आध्यात्मिक चिंतन का सार हैं, जिन्हें समाज की झूठी शर्म ने अनावश्यक रूप से गुप्त और वर्जित बना दिया।
सच्चाई यह है कि जो दंपति अपने शरीर, अपनी भावनाओं और अपने साथी की आवश्यकताओं को वैज्ञानिक समझ, धार्मिक सम्मान और आध्यात्मिक गहराई के साथ अपनाते हैं, वे न केवल शारीरिक सुख, बल्कि जीवन-भर चलने वाला भावनात्मक और आत्मिक जुड़ाव भी प्राप्त करते हैं।
यह पुस्तक किसी को उत्तेजित करने के लिए नहीं, बल्कि दंपतियों को शिक्षित करने और उन्हें उनके अपने शरीर तथा संबंध की गहरी समझ देने के लिए लिखी गई है। इसका अगला भाग विस्तृत जानकारी के साथ इस सीरीज़ बुक में हिंदी अग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। यदि यह पुस्तक एक भी दंपति के जीवन में समझ, संवाद और संतोष ला सके, तो इसका उद्देश्य पूर्ण रूप से सफल माना जाएगा।
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