बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग | काल भैरव मंत्र, पूजा विधि और उपाय

Amit Srivastav

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग काल भैरव की पूजा विधि, मंत्र और उपाय भगवान बटुक भैरव की पूजा विधि, शक्तिशाली कार्य सिद्धि मंत्र, अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र, कवच पाठ और शत्रु नाशक प्रभावी उपाय जानिए। कालभैरवाष्टमी पर विशेष प्रयोग से असंभव कार्य सिद्ध होंगे और शत्रु परेशान करना छोड़ देंगे। भैरव कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ें।

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग: काल भैरव की पूजा विधि, शक्तिशाली मंत्र, अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र और असफलता को सफलता में बदलने वाले प्रभावी उपाय

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग | काल भैरव मंत्र, पूजा विधि और उपाय

भगवान भैरव की महिमा हिंदू धर्म के अनेक शास्त्रों, पुराणों और तांत्रिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। भैरव जी शिव जी के प्रमुख गणों में प्रमुख स्थान रखते हैं और साथ ही देवी दुर्गा के सबसे विश्वसनीय अनुचर के रूप में भी उनकी पूजा की जाती है। इनकी सवारी एक श्वान (कुत्ता) है, जो उनकी भक्ति और रक्षा शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

चमेली के फूल इनको अत्यधिक प्रिय हैं, इसलिए उपासना में चमेली का विशेष महत्व है। भैरव रात्रि के देवता हैं और उनकी आराधना का सबसे शुभ तथा प्रभावी समय मध्य रात्रि 12 बजे से लेकर 3 बजे तक का मध्य रात्रि काल है। इस समय में की गई पूजा और मंत्र जाप से भक्त की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं तथा जीवन की समस्त बाधाएं दूर हो जाती हैं।

धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शंकर के कालभैरव स्वरूप का आविर्भाव मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्याप्त अष्टमी तिथि को हुआ था। इसी कारण इस तिथि को कालभैरवाष्टमी या कालाष्टमी के नाम से विख्यात किया गया है। इस पावन दिन पर भैरव मंदिरों में भव्य पूजन, श्रृंगार और विशेष अनुष्ठान बड़े धूमधाम से संपन्न होते हैं। भैरवनाथ के अनन्य भक्त इस दिन व्रत रखकर अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं।

मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से प्रारंभ करके प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी को काल भैरव की पूजा, दर्शन और व्रत करने से भीषण संकटों का निवारण होता है, कार्य सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। पंचांगों में इस अष्टमी को कालाष्टमी के नाम से प्रकाशित किया जाता है।

काल भैरव की अनुकंपा प्राप्त करने वाले भक्त और विशेष रूप से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा अन्य अशुभ दशाओं से पीड़ित व्यक्ति को चाहिए कि वे कालभैरवाष्टमी से प्रारंभ करके पूरे वर्ष प्रत्येक कालाष्टमी को व्रत रखें, भैरवनाथ की उपासना करें। दिन भर उपवास रखकर सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में भैरव जी की पूजा कर प्रसाद रूप में भोजन ग्रहण करने से शनि पीड़ा का निवारण होता है और समस्त ग्रह दोष शांत हो जाते हैं।

मंत्रविद्या की प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों से प्राप्त महाकाल भैरव का एक शक्तिशाली मंत्र इस प्रकार है – ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकालभैरवाय नमः। इस मंत्र का कम से कम 21 हजार बार जप करने से बड़ी से बड़ी विपत्ति भी दूर हो जाती है और भक्त को निर्भयता प्राप्त होती है।

साधक को भैरव जी के वाहन श्वान को नित्य कुछ भोजन खिलाने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए, इससे भक्ति पूर्ण होती है। साम्ब सदाशिव की अष्टमूर्तियों में रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस प्रकार अग्नि तत्व के समस्त गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथ भी अग्नि के समान तेजस्वी और जाग्रत हैं। भैरव जी कलियुग के जाग्रत देवता माने जाते हैं। इनका भक्ति भाव से स्मरण करने मात्र से समस्त समस्याएं दूर हो जाती हैं।

इनके आश्रय लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है और भैरवनाथ अपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं। सामान्य व्यक्ति भक्ति भाव से पूजा कर कृपा प्राप्त कर सकता है, किंतु गहन तांत्रिक साधना के लिए पहले गुरु से दीक्षा अवश्य लें। भैरव जयंती के दिन इनका बाल स्वरूप (बटुक भैरव) अत्यंत पूजनीय है और यह शीघ्र फल देने वाला माना जाता है।

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग | काल भैरव मंत्र, पूजा विधि और उपाय

सर्व कार्य सिद्धि के लिए बटुक भैरव का पूर्ण प्रयोग और विधि

बटुक भैरव की प्रसन्नता हेतु उनके कवच पाठ, मूल मंत्र जप और अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र का पाठ अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है। पूर्ण विधि इस प्रकार है – सर्वप्रथम तांत्रोक्त भैरव कवच का पूर्ण पाठ करें, फिर एक माला मूल मंत्र का जप करें, उसके बाद अष्टोत्तर शत नाम के 21 सम्पुटित पाठ करें, पुनः एक माला मंत्र जप करें तथा अंत में क्षमा प्रार्थना के साथ बलि प्रदान करें।

यदि यह संपूर्ण प्रयोग निरंतर 41 दिनों तक विधि-विधान से किया जाए तो व्यक्ति का सबसे कठिन से कठिन और असंभव सा लगने वाला कार्य भी श्री बटुक भैरव की असीम कृपा से अत्यंत शीघ्र सिद्ध हो जाता है।

श्री वटुक भैरव अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र का विशेष महत्व है। यदि कोई साधक इसे मंत्र सहित विधि-विधान से नित्य 21 पाठ करता है तो यह मंत्र सिद्ध हो जाता है और जाग्रत रूप से कार्य करने लगता है। इससे रोग-दोष, आधी-व्याधि का पूर्ण नाश होता है। अभिमंत्रित भस्म या जल किसी रोगी पर छिड़कने से रोग तुरंत दूर हो जाता है तथा किसी भी प्रकार की ऊपरी बाधा, भूत-प्रेत या नजर दोष समाप्त हो जाता है।

यह प्रयोग अत्यंत कृपा करने वाला है। कलियुग में अन्य देवता समय आने पर फल देते हैं, परंतु भगवान वटुक भैरव जिस दिन से पूजे जाते हैं, उसी दिन से अपना प्रभाव दिखाना प्रारंभ कर देते हैं। बटुक भैरव मुख्य रूप से रक्षार्थ हैं और देवी के पुत्र स्वरूप माने जाते हैं।

तांत्रोक्त भैरव कवच का विस्तृत पाठ

ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः | पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु || पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा | … (पूर्ण कवच मूल प्रदान किए अनुसार सभी दिशाओं, ऊर्ध्व, अधः आदि की रक्षा का वर्णन)।

इस आनंददायक कवच का प्रतिदिन पाठ करने से प्रत्येक विपत्ति में सुरक्षा प्राप्त होती है। योग्य गुरु के निर्देशन में अनुष्ठान करने पर साधक सर्वत्र विजयी होता है, यश-मान, ऐश्वर्य, धन-धान्य से पूर्ण होकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है। कवच पाठ भक्त को सभी दिशाओं से सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

बटुक भैरव मूल मंत्र और अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र

मूल मंत्र: ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।
ध्यान: वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्… (पूर्ण ध्यान)।

इसके बाद पूर्ण अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र का पाठ करें जिसमें भैरव जी के विभिन्न रूपों, गुणों और नामों का वर्णन है। मानसिक पूजन में पंच तत्वों से संबंधित समर्पण मंत्रों का उच्चारण करें। स्तोत्र के अंत में फलश्रुति पढ़ें, जिसमें बताया गया है कि इस स्तोत्र के पाठ से दुरित, भूत भय, शत्रु भय, पातक भय, मारी भय, राज भय, अग्नि भय, दुःस्वप्न आदि सभी भयों का नाश होता है।

श्री बटुक बलि मंत्र और पूजा समाप्ति विधि

घर के मुख्य दरवाजे की बाईं ओर दो लौंग तथा गुड़ की डली रखकर दिए गए तीन बलि मंत्रों में से किसी एक का 21 बार जप करें। पाठ से पहले और बाद में वटुक मंत्र की एक-एक माला अनिवार्य है। तेल का दीपक जलाकर सामने लड्डू या गुड़ रखें, पूजा समर्पण के बाद उसे बाहर रख आएं या कुत्ते को खिलाएं। आसन से उठने से पहले भूमि को मस्तक से स्पर्श करें, अन्यथा पूजा का आधा फल इंद्र ले लेते हैं।

शत्रु नाश हेतु शक्तिशाली उपाय

यदि शत्रु आपको परेशान कर रहे हैं तो भैरव अष्टमी पर विशेष उपाय करें। सफेद कागज पर काजल से शत्रु नाम लिखते हुए मंत्र जप करें, शहद की शीशी में डुबोकर मंदिर या पीपल के नीचे गाड़ दें। दूसरा प्रयोग मंगलवार/शनिवार को आटे के दीपक में सरसों, उड़द, सिंदूर, लौंग डालकर 21 बार मंत्र जप के साथ करें। ध्यान और मंत्र सहित पूर्ण विधि का पालन करें। ये प्रयोग शनि, राहु, केतु पीड़ितों के लिए भी अत्यंत लाभकारी हैं।

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इन सभी प्रयोगों को शुद्ध मन, नियमितता और पूर्ण विश्वास के साथ करने पर बटुक भैरव की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। ये उपाय न केवल कार्य सिद्धि देते हैं बल्कि शत्रु नाश, रक्षा और समग्र जीवन उन्नति भी प्रदान करते हैं। amitsrivastav.in पर ऐसे आध्यात्मिक ज्ञान के लिए बने रहें। जय भैरव नाथ! जय बटुक भैरव! सभी भक्तों को भैरव कृपा प्राप्त हो।

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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