चौकीदार चोर है, डरपोक है या हनुमान का अवतार? ऑपरेशन सिंदूर पर मीडिया की 99% झूठ

Amit Srivastav

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चौकीदार चोर है से लेकर हनुमान का अवतार तक, ऑपरेशन सिंदूर के नाम पर सत्ता और मीडिया ने कैसी स्क्रिप्ट रची? इस लेख में पढ़िए कैसे अधूरे सैन्य ऑपरेशन को पूरा प्रचार मिला, और कैसे गोदी मीडिया ने सवालों की जगह जय जयकार चुना। भारतीय सेना और संविधान को नमन दिल से सम्मान करते हुए, श्री चित्रगुप्त जी महाराज के देव वंश-अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म मे सत्ता और मीडिया पर व्यंग्यात्मक लेखनी प्रस्तुत है। जो धर्म ग्रंथ, ऐतिहासिक इतिहास, और समाचारों पर आधारित है।

भारत में युद्ध अब बंदूक और गोली से नहीं लड़े जाते। यहाँ अब युद्ध नैरेटिव से लड़े जाते हैं – शब्दों से, प्रतीकों से, कैमरे की क्लिपिंग से, और सत्ता के निर्देश पर मंचित मीडिया की स्क्रिप्ट से। और यही हुआ ऑपरेशन सिंदूर के साथ – एक ऐसा सैन्य ऑपरेशन, जिसे जितना प्रचार मिला, उससे कहीं कम पारदर्शिता मिली। जहाँ दुश्मन के मारे जाने की ख़बर आई, पर शव नहीं दिखा। जहाँ विजय की घोषणा हुई, पर रणनीति पर पर्दा डाल दिया गया।

और सबसे अहम – जहाँ भारतीय मीडिया ने सवाल पूछने के बजाय, पूरी घटना को एक धार्मिक ग्रंथ की तरह प्रस्तुत कर दिया, लेकिन कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए संदेश को ही दरकिनार कर दी भारतीय मीडिया। युद्ध कि स्थिति में गोपनीयता और पारदर्शिता का अहम भूमिका होती है– हर आलोचक को राक्षस बना दिया गया, हर संदेह को देशद्रोह। जहाँ पूरा देश मोदी के साथ खड़ा था यहां तक कि विपक्ष का हर छोटा-बड़ा नेता, पूरा मुस्लिम समुदाय, सभी धर्म को मानने वाले लोग, समर्थन देते हुए खुलेआम मोदी के पक्ष में खड़े थे कि आतंकवाद का सफाया हो, लेकिन हुआ नहीं आखिर क्यों? डोनाल्ड ट्रम्प का ट्वीट इतना महत्वपूर्ण क्यों?


सिंदूर – श्रृंगार भी, शस्त्र भी… पर सत्य नहीं—
ऑपरेशन सिंदूर का नाम जब सामने आया, तब लगा जैसे ये कोई रामायण की नई कथा है। प्रतीक बहुत मजबूत था – सिंदूर, जो भारतीय नारी की गरिमा का प्रतीक है, उसे आतंकियों ने कुचला था और भारत के प्रधानमंत्री ने इसका बदला लेने का वादा किया था। मगर सवाल है – क्या यह बदला वाकई इतना पूर्ण और सफल था, जितना बताया गया?

न प्रेस कांफ्रेंस, न ब्रीफिंग, न ही ऑपरेशनल सैटेलाइट इमेज। सेना ने मौन साध लिया और मीडिया ने उस मौन को जयघोष में बदल दिया। क्या यह एक रणनीतिक चुप्पी थी? या जानबूझकर चुनी गई स्क्रिप्ट, जिसमें दर्शकों को सिर्फ भावनाओं में बहाना था – तथ्य देने की कोई जरूरत नहीं थी?

चौकीदार चोर है, डरपोक है या हनुमान का अवतार

मीडिया – युद्ध का नया सेनापति या सत्ता का दरबारी जोकर?

जहाँ सेना चुप रही, अपने लक्ष्य के तरफ बढ़ने के लिए निकल रही थी वहाँ मीडिया बोलता रहा जैसे गाँव में क्रिकेट मैच होने जा रहा हो– और खूब बोला। हर चैनल ने अपने खास इंट्रो बनाए – “सिंदूर के लिए युद्ध”, “शहीदों की आत्मा को शांति”, “100 आतंकी खतम!” भारत ने किया पाकिस्तान पर हमला लेकिन क्या किसी पत्रकार ने जाकर ये देखा कि वास्तव में कितने आतंकी मरे? नहीं। किसी ने ये पूछा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को क्या जवाब दिया? नहीं।


बल्कि मीडिया ने सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया – “आप भारत की सेना पर सवाल उठा रहे हैं?” ऐसा लग रहा है जैसे लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी नेशनल मीडिया ने ही ले रखी हो– सत्ता से सवाल पूछना – अब गुनाह बन चुकी है। और मीडिया वही कर रहा है जो एक गद्दार दरबारी करता है – बादशाह के झूठ को सच से ज़्यादा सुंदर दिखाना।

चौकीदार चोर है, डरपोक है या हनुमान का अवतार

चौकीदार का कायांतरण – जब चोर, डरपोक और हनुमान एक ही व्यक्ति बन जाए—
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बदलाव “चौकीदार” के चरित्र में दिखा। कभी उसे ‘चोर’ कहा गया, फिर ‘डरपोक’, अब उसे ‘हनुमान’ कहा जा रहा है। यह रूपांतरण सत्ता के शब्द-जाल की एक अनोखी मिसाल है।


2019 में जब “चौकीदार चोर है” का नारा लगा था, तब सत्ता परेशान थी। लेकिन उस अपमान को ही उसने ब्रांड बना दिया – “मैं भी चौकीदार” कहकर पूरे देश को भ्रम में डाला गया। अब वही चौकीदार बिना कुछ कहे दुश्मन के घर में घुसता है और मीडिया के कैमरे उसे हनुमान बना देते हैं – यानी अब नायक वही है जो मौन है, जो आक्रोश नहीं जताता बल्कि कार्रवाई करता है।


लेकिन असली सवाल यह है – क्या यह सब असली है या केवल एक ‘इमेज मैनेजमेंट’ की चाल है? क्या हनुमान वाकई लंका जला रहे हैं, या किसी स्टूडियो में CGI ग्राफिक्स बन रहे हैं? शायद आधुनिक एआई जेनरेटर एप्स के जरिए सीन तैयार कर दिखाये जा रहे हैं। मैंने रात को फेसबुक पर समय बिताने गया तो भरमार लगी थी, कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री रो रहा है, भारत के आगे जैसे घुटने टेक रहा है। तुरंत उस बीडीओ कि जांच पड़ताल किया तो स्पष्ट हुआ एप्स के जरिए बनाएं गए बीडीओ वायरल हो रहा है। फिर देखा मोदी जी साड़ी पहन ठुमके लगा है, दंग रह गया जानकारी निकाली तो एप्स के जरिए बनाई गई बीडीओ थी।

सब देखकर पता चला एआई और एप्स के जरिए ही पर्दे पर महाभारत से भी भयंकर युद्ध कि सीन दिखाई जा सकती है। मतलब उसी एआई और एप्स का उपयोग से शायद भारतीय मीडिया ने भी अपने स्टुडियो मे बैठे बैठे जैसे लाइभ – “ऑपरेशन सिंदूर” का दृश्य दर्शकों को पूरी पूरी रात दिन दिखाता रहा और जयघोष करता रहा कि भारतीय सेना 100 किलोमीटर पाकिस्तान में अंदर घुसकर पाकिस्तान को दुनिया के नक्से से मिटा दिया। जैसे आसमान मे सेटेलाईट कैमरा लगा हो लाईभ आंखों देखी डायरेक्ट दिखा रहा है।

जो भ्रामक प्रचार मीडिया द्वारा किया गया, बड़ी बड़ी ब्रेकिंग फेक न्यूज दिखाई गई, अगर इस समय प्रधानमंत्री मोदी के जगह इंदिरा गांधी होती तो 10 मई को ही उन सभी मीडिया का लाइसेंस निरस्त कर स्टूडियो में ताला लगा दी होती। यह मै उनकी कुशल युद्ध नीति के आधार पर बता रहा हूं, लेकिन मोदी मीडिया के इस सब गलत व्यान बाजी पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने वाले दिख रहे हैं।

आखिर करें भी क्यों जो गोदीमीडिया है न। अपने बच्चों से कोई गलती भी होती है, तो कोई बाप बच्चों को कठोर सजा देता है क्या? यही तो वो मीडिया है जो चुनावी माहौल पक्ष में बनाता है, शायद इस ऑपरेशन सिंदूर पर भी मोदी के पक्ष में माहौल ही बनाने के लिए फेक खबरों कि भरमार लगी हो, जो पाकिस्तान के लिए एक मजबूत हथियार बन गया कि भारत हमारे उपर हमला कर दिया है हस्तक्षेप करो…. यही मीडिया सरकार से सवाल पूछने के बजाय जनता को गुमराह कर मूर्खों जैसी खबरों दिखा भ्रमित कर जीत दिलाने मे योगदान देता है।

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ऑपरेशन अधूरा है, पर प्रचार पूरा है – सत्ता की सूचनात्मक रणनीति

एक लोकतंत्र में युद्ध जितना ज़रूरी होता है, उतनी ही ज़रूरी होती है पारदर्शिता। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर ने एक नया ट्रेंड शुरू किया – युद्ध करो, लेकिन उसके बारे में सिर्फ उतना बताओ जितना कहानी में फिट बैठता है। न नुकसान की जानकारी, न लागत, न लक्ष्य की पुष्टि। सिर्फ एक स्लोगन – “100 आतंकवादी मारे गए” – जो किसी विज्ञापन की पंचलाइन लगती है।


अंदर की बात यह है कि शायद ऑपरेशन अधूरा था। हो सकता है कि नुकसान ज़्यादा हुआ हो, या लक्ष्य पूरा न हुआ हो। लेकिन उसका प्रचार पूरी तरह तैयार था शायद पहले से ही – कैमरों के लिए, भाषणों के लिए, और चुनावी रैलियों में ‘सिंदूर’ के प्रतीक से वोट बटोरने के लिए।

सवाल है – क्या युद्ध अब प्रचार का साधन बन गया है? क्या अब सैनिकों का बलिदान भी ट्रेंडिंग टॉपिक बन चुका है?

लाशें नहीं दिखतीं, सिर्फ इमेज बनती हैं नेशनल मीडिया के स्टूडियो में पर्दे पर – युद्ध का नया सिद्धांत

पुराने समय में युद्ध के बाद शव लौटाए जाते थे, स्मारक बनते थे, राष्ट्र गम मनाता था। आज के युद्धों में सिर्फ WhatsApp फॉरवर्ड लौटते हैं – “100 मरे, 0 हमारा नुकसान” – और उस पर मीडिया कहता है – “विश्वास रखिए, सरकार है ना।”

लेकिन जो सरकार हर छोटे काम पर प्रेस कांफ्रेंस करती है, वह इतने बड़े ऑपरेशन पर खामोश क्यों है? क्या यह खामोशी रणनीतिक है या डरावनी?

शायद इसलिए क्योंकि लाशें दिखाने से ‘प्रतीक’ कमजोर हो जाता है। अगर लाशें न दिखें, तो दुश्मन का चेहरा भी रहस्य बना रहता है – और कहानी लंबी चलती है। और आज की राजनीति को कहानी चाहिए – लंबी, भावुक, और बहस से परे।

“देशभक्ति” – अब तर्क के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार

ऑपरेशन सिंदूर के बाद जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है, वह है – “तर्क की हत्या”। किसी ने कहा – “क्या ऑपरेशन से अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हुआ?” जवाब – “तुम पाकिस्तान समर्थक हो!” किसी ने पूछा – “क्या सबूत हैं इतने आतंकियों के मारे जाने के?” जवाब – “तुम सेना पर सवाल कर रहे हो?”


अब देशभक्ति का मतलब है – चुप रहो, जयकारा लगाओ। देश के नाम पर हर गलती माफ है, हर झूठ सच है, और हर सवाल देशद्रोह।

“बख्तरबंद हनुमान” बनाम “सूचनाहीन नागरिक” – सत्ता का नया युद्धक्षेत्र

आज सत्ता ने ‘हनुमान’ को बख्तरबंद बना दिया है – जो सिर्फ हमला करता है, और सवालों पर गदा से आलोचकों को कुचलता है। वहीं नागरिक अब ‘सूचनाहीन’ बना दिया गया है – जिसे न तथ्य पता हैं, न संदर्भ, सिर्फ भावनाओं से निर्देशित किया जा रहा है।


इस स्थिति में लोकतंत्र का सबसे बड़ा युद्ध ‘सच बनाम भावनाओं’ के बीच है। और इस युद्ध में जीत हमेशा उस पक्ष की होती है जिसके पास माइक होता है – और माइक फिलहाल ‘गोडी मीडिया’ के हाथ में है।


तो क्या ‘चौकीदार’ अब लोकतंत्र का हनुमान है या उसका अंत?
जब चौकीदार को हनुमान कहा गया, तो लोगों ने जयघोष किया – लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि हनुमान राम के आदेश पर चलते थे, अपने विवेक से नहीं। और राम कौन है इस लोकतंत्र में? जनता।


अगर चौकीदार अब खुद ही आदेश भी देता है, और युद्ध भी लड़ता है, और खुद को हनुमान भी घोषित करता है – तो वह लोकतंत्र का सेवक नहीं, उसका अधिनायक बन चुका है।

चौकीदार चोर है, डरपोक है या हनुमान का अवतार? ऑपरेशन सिंदूर पर मीडिया की 99% झूठ

Click on the link सोचा था धर्म युद्ध का इतिहास बनेगा ऑपरेशन सिंदूर जो 10 मई सुबह प्रकाशित किया उसी साम यह लेख मायूस कर दिया। पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें नीचे गूगल द्वारा दिखाये जा रहे रिलेटेड लेख लिंक पर भी क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

अधूरे ऑपरेशन, संपूर्ण प्रचार, और मौन विरोध

ऑपरेशन सिंदूर एक सैन्य सफलता हो सकती है, लेकिन यह सूचना की दृष्टि से एक लोकतांत्रिक विफलता है। सरकार ने रणनीति बनाई, मीडिया ने महाकाव्य रच डाला, और जनता को सिर्फ प्रतीकों का प्रसाद मिला। सवाल उठाने वालों को गालियाँ मिलीं, और चुप रहने वालों को देशभक्त घोषित कर दिया गया।


इस लेख का उद्देश्य यह नहीं कि सेना के पराक्रम पर प्रश्न उठाया जाए – बल्कि यह कि सत्ता और मीडिया ने उस पराक्रम को प्रचार की भाषा में कैसे बदल डाला। जहाँ ऑपरेशन सिंदूर को राजनाथ योगी आदित्यनाथ जैसे बड़े नेताओं द्वारा धर्म के आधार पर बताया गया वहीं मीडिया धर्म नीति का उल्लंघन कैसे करती रही और उसपर सरकार ने शक्त कार्यवाही अब तक क्यों नहीं कर रही है।


जब युद्ध असली होता है और सूचना नकली – तब लोकतंत्र का असली युद्ध शुरू होता है। जो 10 मई साम से ही सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है कि इंदिरा गांधी ने ऐसा किया मोदी ने कैसा किया। दोनों प्रधानमंत्री कि तुलना जोरदार चल रही है। दोनों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि युद्ध नीति में इंदिरा गांधी का कदम मोदी की अपेक्षा सराहनीय रहा। यह लेखनी थोड़ी खट्टी-मीठी व्यंग्यात्मक है आप अपना विचार नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं।

Click on the link ब्लाग पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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2 thoughts on “चौकीदार चोर है, डरपोक है या हनुमान का अवतार? ऑपरेशन सिंदूर पर मीडिया की 99% झूठ”

  1. एक अलग अंदाज में विश्लेषण जो सोचने को मजबूर कर दे कि सच क्या है? धन्यवाद🙏

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    • बिल्कुल भाई जी प्रस्तुत करने वाला हूँ इसी सीरीज में जो पाठकों को स्पष्ट हो जाएगा।

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