च्यवन ऋषि, सुकन्या और दो अश्विनी कुमारों की यह धार्मिक और पौराणिक कहानी भारतीय धर्म, संस्कार एवम् समाज के जटिल और गूढ़ रहस्यों को उजागर करेगी। यह कहानी- प्रेम, वासना, धर्म और पत्नी धर्म के बीच एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो भारतीय पौराणिक कथाओं में गहराई से जुड़ी हुई है। वासना, धर्म व समर्पण के बीच परिपूर्ण यह पौराणिक कथा-कहानी वास्तव में बहुत ही रोचक व ज्ञानवर्धक होने वाली है।
इस कहानी में पत्नी धर्म की प्रधानता को बताई जा रही है। इस कथा कहानी के मुख्य पात्र ऋषि च्यवन, राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या और सूर्य पुत्र दो अश्विनी कुमार, जिन्हें धर्म ग्रंथों में देवताओं के राज वैद्य के रूप में जाना जाता है।
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इस कहानी में वृद्ध च्यवन ऋषि को अपने से बहुत कम उम्र की युवती से ह्दय वेदन पीड़ा के साथ सुन्दर रुप का एहसास होने पर प्रेम हो गया और ऋषि च्यवन की ह्दय वेदनाओं के फलस्वरूप युवती सुकन्या के घर परिवार सगे-संबंधियों को शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ रही थी, अंततः आधी से कम उम्र की युवती च्यवन ऋषि को बुढापे में पत्नी रुप में प्राप्त हुई। युवती कोई सामान्य युवती नही बल्कि महाराज इक्ष्वाकु के भाई महाराज शर्याति की पुत्री सुकन्या थी। महाराज इक्ष्वाकु से तो आप सब भलीभांति परिचित ही होगें, क्योंकि?
इन्हीं के कुल मे महाराज दशरथ के पुत्र रुप मे भगवान विष्णु अंश श्रीराम का जन्म हुआ था। वर्तमान समय में भी भगवान राम को लेकर विश्व भर में चर्चा और उल्लास का माहौल देखा जा सकता है। भगवान राम के परदादा महाराज इक्ष्वाकु के भाई राजा शर्याति की रूपवान पुत्री सुकन्या से वृद्ध च्यवन ऋषि को एकतरफ़ा प्रेम हो गया और महाराज शर्याति पर च्यवन ऋषि अपने प्रेम को पत्नी रुप में पाने के लिए दबाव बनाने लगे।
दुविधा में पड़े राजा शर्याति अपने राज दरबार में एक आपात बैठक बुलाई और च्यवन ऋषि के जिद्द भरी प्रस्ताव को अपने मंत्रियों के समक्ष रखा, तब सभी मंत्री गणों ने एक ही स्वर में ऋषि की इस प्रस्ताव को ना मानने की बात कही। राजा शर्याति दुविधा और राज्य पर आई विपदा से चिंता मे डूबे हुए थे। इसी बीच पुत्री सुकन्या अपने पिता के पास आई और बड़े ही विनम्र भाव से कही महाराज आप मेरे सुख-दुख की चिंता छोड़ ऋषि का प्रस्ताव मान राज्य की सुरक्षा के लिए अपना दायित्व निभाते हुए मुझे ऋषि को पत्नी रुप में भेंट कर दिजिये।
जिससे राज्य पर मेरे द्वारा आये इस विपदा का समाधान हो सके। मै आपको वचन देती हूं, वृद्ध च्यवन ऋषि से अपने विवाह के पश्चात आपके कुल की मर्यादा को बनाए रखूंगी, आपको कभी कलंकित नही होने दूंगी। इस समय सबसे बड़ी जिम्मेदारी आपको अपने राज्य के प्रजाजनों की सुरक्षा की है। पुत्री की बातों से प्रेरित होकर राजा शर्याति अपनी पुत्री सुकन्या को ले जाकर ऋषि च्यवन से विवाह कर दिए।
पिता के दुखी मन को देखकर सुकन्या ने कहा आप तनिक भी चिंता मत किजिये, मै भलीभाँति अपने पत्नी धर्म का निर्वाह करुंगी कभी भी आपको कलंकित नही होने दूंगी राजा सपरिवार महल को लौट आए। च्यवन ऋषि वृद्ध हो चुके थे सुकन्या की शारीरिक सुख की पूर्ति करने में असमर्थ थे। इसी का लाभ उठा कर दो अश्विनी कुमारों ने सुकन्या के समक्ष अपने प्रेम का प्रस्ताव रख, किसी एक के साथ संभोग करने के लिए कहते हैं। संभोग सुख से वंचित सुकन्या की कहानी यही से अलग मोड़ ले लेती है।
तो क्या है वासना व धर्म रूपी राजा शर्याती की पुत्री, ऋषि च्यवन की पत्नी सुकन्या और सूर्य पुत्र दो अश्विनी कुमारों की पूरी दास्तान जानिए इस कथा में ऋषि च्यवन से इंद्र को पराजित होने तक की अद्भुत कहानी भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज के वंशज संपादक – अमित श्रीवास्तव की कर्म धर्म लेखनी में। तो आइये जानते हैं च्यवन ऋषि कौन थे? च्यवन ऋषि किसके पुत्र थे? पत्नी का नाम क्या था? च्यवन ऋषि का जीवन परिचय, च्यवन ऋषि का आश्रम कहाँ है? च्यवन ऋषि से जुड़ी ऐतिहासिक इतिहास सम्पूर्ण जानकारी यहां एक ही प्लेटफार्म पर।
आपको बता दें यह कथा प्राचीन काल की है, धार्मिक और पौराणिक दृष्टिकोण से सत्य है।
कहानी का प्रारंभ: च्यवन ऋषि परिचय से

धर्म ग्रंथों के अनुसार च्यवन ऋषि ब्रह्माजी के मानस पुत्र भृगु ऋषि के वंशज थे। च्यवन ऋषि अपने कुल के पथ पर अग्रसर एक महान तपस्वी थे। एक समय वर्तमान के मैनपुरी जिले के औचा क्षेत्र के जंगल में तपस्या करते करते अनेकों साल बीत चुका था और उनकी अनेकों साल एक ही स्थान पर घोर तपस्या से शरीर जर्जर हो, दीमक लग चुका था। जंगल में एक कुटिया के समीप पेड़ के नीचे उनका शरीर पूरी तरह दीमक से ढका हुआ मिट्टी की ढेर जैसा प्रतीत हो रहा था।
उस राज्य के राजा शर्याती के मन में जल क्रिडा की इच्छा हुई राजा अपने परिवार जनों सहित मंत्रियों सिपाहियों को साथ लेकर जंगल के समीप नदी में जल क्रिडा के लिए चले गए। राजा अपने कुतुब जनों के साथ नदी में जल क्रिडा करने लगे, उसी बीच पुत्री सुकन्या की इच्छा जंगल देखने को हुई और वो जंगल की ओर चली गई। कुछ दूर जाने पर सुकन्या को एक कुटिया दिखाई दिया, जहां कोई नही था। सुकन्या ने इधर-उधर देखा कि उसकी नज़र एक पेड़ के नीचे मिट्टी जैसी आकृति पर पड़ गई उसने करीब जाकर देखा तो दो चमकदार हीरे जैसा प्रतीत हुआ।
सहमी सुकन्या एक लकड़ी से उस चमकीले भाग को खोदना शुरू किया तभी उसमे से रक्त प्रवाह होने लगा यह देख सुकन्या सहम गयी और वहां से भाग नदी किनारे अपने परिवार जन के पास चली आई। वो चमकते हीरे समान वास्तव में ऋषि च्यवन की दो आंखें थीं, जो सुकन्या के खोदने से फूट चुकीं थीं, किन्तु लंबे समय से समाधि में लीन ऋषि को सुकन्या पर कोई क्रोध नहीं आया, बल्कि ह्दय पीड़ित हुआ। तपस्या के फलस्वरूप राजा के कुतुब जनों कि मल मूत्र बंद होने लगे यहां तक कि राजा के साथ आये हाथी घोड़े मंत्री सिपाही सभी को शारीरिक पीड़ा का अनुभव होने लगा।
राजा शर्याती अपने राज वैद्य से इसका निदान पूछा तो राज वैद्य को कोई रोक दिखाई ही नहीं दे रहा था। राजा शर्याती अपने राज गुरु को बुलाया राज गुरु ने अपनी योग साधना से देखा कि जंगल में तपस्या करते ऋषि च्यवन की आंखें फूट जाने से ह्रदय वेदन पीड़ा हो रही है। राज गुरु ने बताया महाराज आपके किसी करीबी ने तपस्या में लीन ऋषि च्यवन की आंखें फोड़ दी है जिस कारण आप अपने कुतुब जन सहित पीड़ित हैं।
राजा शर्याती को राज गुरु की यह बात सुनकर बहुत दुख हुआ और कहा एक तपस्वी की तपस्या भंग करने और आंखें फोड़ने की दुस्साहस हमारे राज्य का किसने किया। इस बात पर पता कि जाने लगी कि सहमी सुकन्या अपने पिता के पास आकर अनजाने में हुई सारी बात कह सुनाई।
सुकन्या का समर्पण और च्यवन ऋषि से विवाह
सुकन्या अपने पिता राजा शर्याति के पास आई और अनजाने में हुई घटना को बता दी। राजा शर्याति सुकन्या से सारी वृतांत जानकर क्रोधित नही हुए। क्योंकि राजा शर्याति सुकन्या से बहुत प्यार करते थे। राजा शर्याति ऋषि च्यवन के पास गए और अपने पुत्री से हुई अनजाने में गलती की क्षमायाचना करते, ऋषि च्यवन के शरीर पर लगे दीमक को हटाया और अपने हाथों से स्नान करा, ऋषि च्यवन से अपने राज्य के प्रजा जन हाथी घोड़े तक के मल-मूत्र रुक जाने से हो रही पीड़ा को बता निदान पूछा।
ऋषि ने कहा राजन मुझे आपकी पुत्री आप या प्रजाजनों पर कोई क्रोध नहीं है, अब तो मैं अंधा हो चुका हूं, इसलिए हमें एक सहयोगी की आवश्यकता है। ऋषि की इतनी बात सुनकर राजा शर्याति ने कहा ऋषि वर आप इसकी चिंता न करें। मै यही पर आपकी सेवा के लिए अपने सैनिकों को नियुक्त कर देता हूं। तब ऋषि च्यवन ने मुस्कुराते हुए कहा- राजन मुझे आपके सैनिकों की आवश्यकता नहीं, यहां सैनिकों की वजह से हमारे आश्रम की शांति भंग होगी, मुझे यज्ञ-हवन करने में असुविधा होगी, मुझे तो आपकी पुत्री चाहिए।
ऋषि का यह प्रस्ताव सुनकर राजा शर्याति हत्प्रभ हो गए और मन ही मन विचार करने लगे, कि अभी तो मेरी पुत्री अबोध बालिका है, जवानी की दहलीज पर अभी कदम रखने वाली है, भला पुत्री सुकन्या ऋषि च्यवन के साथ कैसे रह पायेगी। तब तक ऋषि च्यवन ने कहा राजन मै चाहता हूं, आप अपनी पुत्री का विवाह मेरे साथ कर दिजिये, ताकि वो हमारी सेवा कर सके। ऋषि की बात से राजा शर्याति चिंता में डूब अपने राजमहल को वापस लौट आये और मंत्रियों से इस ऋषि च्यवन के प्रस्ताव पर मंत्रणा करने के लिए सभा बुलाई।
सभी मंत्रियों ने ऋषि के इस प्रस्ताव को एक साथ नामंजूर करने के लिए कहा, राजा कि दुविधा और बढऩे लगी। तभी सुकन्या अपने पिता महाराज शर्याति के पास आकर कही- पिता जी ऋषि के इस प्रस्ताव को मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। आप मेरी चिंता छोड़कर प्रजाजनों की रक्षा के लिए, मेरा विवाह ऋषि च्यवन से कर दिजिये। इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि राज्य पर आई इस विपदा की कारण मै ही हूं और आप निश्चिंत रहिए आपकी कृति पर कोई आंच नहीं आने दूंगी।
सुकन्या की इस बात को सुनकर राजा शर्याति अपने सहित सभी प्रजाजनों कि मल-मूत्र त्याग न होने से हो रही पीड़ा से मुक्ति के लिए पुत्री सुकन्या और अपने कुतुब जनों के साथ ऋषि च्यवन के आश्रम गये और सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से कर दिये। जब राजा शर्याति अपने परिवार जनों के साथ वापस होने लगे तो विनम्र भाव से सुकन्या ने कहा, पिता जी यह सारे हीरे-जेवरात आप लेते जाईए और बदले में मुझे मृगछाल वस्त्र के रूप में प्रदान किजिए।
अब मुझे इन वस्त्रों और जेवरातों की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अब मैं एक ऋषि पत्नी हूं और मुझे अब ऋषि वस्त्र ही धारण करना चाहिए। रानियों की आंखों से अश्रु धार बहनें लगे, राजा शर्याति मृगछाल प्रदान कर अपने परिवार जनों सहित ऋषि च्यवन से आशिर्वाद ले अपने महल को चले गए।
ऋषि च्यवन के प्रस्ताव को लेकर राजा शर्याति चिंता में पड़े हुए थे, तब सुकन्या को ऋषि च्यवन के प्रस्ताव की सूचना मिली। अपने राज्य पर आये विपदा का कारण खुद को मान सुकन्या अपने पिता के सामने ऋषि च्यवन के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कही और अपने आप को ऋषि च्यवन को समर्पित कर दी। अपने पिता के कर्तब्य की रक्षा और राज्य पर आये विपदा को समाप्त करने के लिए सुकन्या ने ऋषि च्यवन से विवाह करने का निर्णय ली। यह विवाह एक नारी का अपने पति के प्रति समर्पण ही नही, बल्कि अपने पिता के राज्य पर आये विपदा के वक्त राज्य के प्रति निष्ठा और धर्म की भी परिक्षा थी।
ऋषि च्यवन और सुकन्या का दांपत्य जीवन
विवाह के बाद से सुकन्या पूरी निष्ठा और भक्ति भाव से वृद्ध ऋषि च्यवन की सेवा करने लगी। नियमित ब्रह्म काल भोर में ही च्यवन ऋषि को नृत्य कर्म के लिए ले जाती तत्पश्चात स्नान करा कर हवन-पूजन के लिए सम्पूर्ण विधि-विधान से व्यवस्था कर पूजा स्थान पर बैठा पूजा-पाठ में सहयोग करती। जब ऋषि अपनी हवन-पूजन में व्यस्त हो जाते तब जंगल में जाकर तरह-तरह के फल-मूल लाती और ऋषि की हवन-पूजन के बाद आसन पर बैठाकर आहार ग्रहण कराती। जो बच जाता था उसे प्रसाद के रूप में स्यम् ग्रहण करती थी।
रात्रि समय में ऋषि को भोजन करा बिस्तर लगा सुलाकर जो बचा होता था उसे प्रसाद रूप में भोजन कर ऋषि की सेवा करती पैर आदि दबाती। वो चाहती थी ऋषि से वो सुख की प्राप्ति हो जो हर पत्नी को अपने पति से मिलता है जिसके फलस्वरूप ब्रह्म ऋण से भी मुक्ति मिल सके। किन्तु ऋषि वृद्ध हो चुके थे और उस सुख की लालसा खत्म हो चुकी थी।
ऋषि च्यवन अपनी वृद्धावस्था के कारण सुकन्या को शारीरिक सुख प्रदान करने में असमर्थ थे, सुकन्या के भाव को तो समझ रहे थे किन्तु वो सामर्थ नही था कि सुकन्या की वो इच्छा पूरी कर सकें। इसके बावजूद भी सुकन्या निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करते समय व्यतीत कर रही थी।
दो अश्विनी कुमारों का आगमन
एक दिन सुकन्या नियमित दिनचर्या अनुसार नदी स्नान कर रही थी, कि सुर्य पुत्र दो अश्विनी कुमारों का वहां आगमन हुआ। सुकन्या के सुंदर रूप को देखकर अश्विनी कुमारों के मन में कामवासना उत्पन्न हो गई। वहीं खड़े होकर नदी में स्नान कर रही सुकन्या के सुन्दर रूप को निहारने लगे। सुकन्या नदी से बाहर निकली तब अश्विनी कुमारों ने सुकन्या के मार्ग में आकर प्रेम का प्रस्ताव देते हुए पुछा- हे रूपवती कन्या तुम कौन हो? सुकन्या ने कहा- मै राजा शर्याति की पुत्री, च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या हूं।
सुकन्या का परिचय जानकर अश्विनी कुमारों ने अपना परिचय दिया कि हम दोनों सुर्य के पुत्र देवताओं के राज वैद्य अश्विनी कुमार हैं। सुकन्या ने दोनों अश्विनी कुमारों को प्रणाम किया और कहा आप देवताओं के राज वैद्य हैं, आपका हमारी कुटिया में स्वागत है, यही थोड़ी दूर पर हमारी कुटिया है और आप दोनों चलकर जल ग्रहण कर विश्राम कर सकते हैं। अश्विनी कुमारों ने प्रेम का प्रस्ताव देते हुए कहा हे सुकन्या तुम रती से भी अधिक सुंदर हो।
तुम्हारी सुन्दरता के सामने देव लोक की अप्सराएँ भी तुच्छ लगने लगी हैं। तुम बूढ़े ऋषि से शारीरिक सुख भोग पाने में असमर्थ हो, हम दोनों में से किसी एक का चयन कर लो, तुम्हें हम वो सारे सुख देगें जिसकी तुम्हें इस उम्र में आवश्यकता है। सुकन्या ने कहा – मै एक पतिव्रता नारी हूं और आप दोनों देवताओं के राज वैद्यय् हैं, आप के मुख से ऐसी बातें सोभा नही दे रही हैं।
इतना कहकर सुकन्या जाने लगी तब अश्विनी कुमारों ने मार्ग रोककर जोर जबरजस्ती करने लगे तब सुकन्या ने कहा हे सुर्य पुत्र अश्विनी कुमारों आप लोग मेरे मार्ग से हट जाईए, मुझे जाने दिजिये, ऐसी तुच्छ हरकत आप लोग कर रहे हैं, यह सोभा नही दे रही है।
मै पतिव्रता नारी हूं, एक ऋषि की धर्म पत्नी हूं। आप लोग ऐसे ही मुझे विवश करेंगे तो, मैं श्राप देने के लिए बाध्य हो जाऊंगी। मेरे श्राप से आप दोनों बच नहीं पाओगे, क्यूँकि मै कर्म-धर्म, तन-मन से अपने ऋषि पति से बंधी हुई हूं। मुझे पर पुरूष के साथ काम कि इच्छा नही है, आप दोनों मुझे जाने दें।
अश्विनी कुमारों ने कहा हे सुकन्या हम दोनों तुम्हारे रूप पर मोहित काम के वाण से हम व्याकुल हैं तुम्हारे साथ काम की इच्छा है और तुम्हें कामवासना की आवश्यकता है। हम देवताओं के वैध हैं हमारी प्रस्ताव को स्वीकार कर लो तब सुकन्या श्राप देने के लिए ज्यो ही आगे बढ़ी अश्विनी कुमारों ने कहा।
ऋषि च्यवन का पुनरूत्थान
हम दोनों देवताओं के वैद्यय् हैं तुम हमें ऋषि च्यवन के पास ले चलो हम वृद्ध ऋषि को युवा और स्वस्थ कर देगें फिर हम तीनों में से किसी एक का वरण कर अपनी पत्ति रूप में स्वीकार कर अपने जीवन का सारे सुख भोग करना। अश्विनी कुमारों की इस बात पर सुकन्या रूक कर कही आप देवताओं के राज वैद्य है, आपको पुनः कह रही हूं हमारी कुटिया में आपका स्वागत है और सुकन्या अपने कुटिया की ओर चल पड़ी।
अश्विनी कुमार भी कुटिया के बाहर पहुंच खड़े सुकन्या से अंदर आने की अनुमति की प्रतिक्षा करने लगे। सुकन्या ऋषि च्यवन के पास जाकर सारी बात कह सुनाई और कही मै उनके प्रेम का प्रस्ताव ठुकरा दी हूं और वे दोनों अश्विनी कुमारों ने कहा है कि हम दोनों देवताओं के वैधय् हैं आपके पति को युवा और स्वस्थ कर सकते हैं फिर हम तीनों में से अपने पति रूप में स्वीकार कर लेना।
सुकन्या के इस सब बातों को सुनकर ऋषि च्यवन ने कहा कि उन्हें अंदर बुलाओ जब मुझे स्वस्थ कर देगें फिर मुझे पति रूप में वरण कर लेना। सुकन्या कुटिया से बाहर आई और अश्विनी कुमारों को कुटिया में आने के लिए कहा। दोनों अश्विनी कुमार ऋषि च्यवन के पास पहुंच कर चरणों में प्रणाम किया और अपने हाथों का सहारा दे नदी में स्नान कराने के लिए ले चले। साथ-साथ सुकन्या भी नदी तट पर पहुंच गई। दोनों अश्विनी कुमार और ऋषि च्यवन एक साथ नदी में डुबकी लगाकर ऊपर निकलें तो तीनों एक जैसे थे।
सुकन्या के सतित्व की परिक्षा
सुकन्या तीनों को एक रूप में देखकर आश्चर्य चकित हो गई। तीनों ने एक साथ कहा अब हम तीनों में से किसी एक का वरण कर लो। सुकन्या ने आंखें बंद कर मां आदिशक्ति का ध्यान कि और ऋषि च्यवन को आदिशक्ति के ध्यान और अपने तप से पहचान उनके पास गई चरण स्पर्श कर आशिर्वाद ले कही मै इन्हें अपने पत्ति रूप में वरण करती हूं। यह देख अश्विनी कुमारों ने विचार किया यह स्त्री कोई साधारण स्त्री नही है और हमें इसके प्रति कामभाव को त्याग देना चाहिए।
ऋषि च्यवन ने कहा हे अश्विनी कुमारों आपके द्वारा मुझे यह युवा अवस्था और सुंदर रूप मिला है आप जो चाहें मुझसे मांग लें, मै देने के लिए तैयार हूं। अश्विनी कुमारों ने ऋषि च्यवन को प्रणाम किया और कहा हे ऋषिवर आप हमे स्वर्णरस प्रदान किजिए। क्यूंकि हमे देवताओं को दी जाने वाली स्वर्ण रस नही मिलती, देवताओं के राजा इंद्र ने हमें स्वर्ण रस प्राप्त नही होने देतें कहते हैं कि आप राज्य वैद्यय् हो आपको स्वर्ण रस नही पीना चाहिए।
ऋषि च्यवन ने कहा ठीक है मै राजा शर्याति के यहां यज्ञ कराऊंगा और उस यज्ञ में सबसे पहले स्वर्ण रस आप दोनों को प्रदान करूंगा।
दोनों अश्विनी कुमार वहां से देव लोक को प्रस्थान कर गयें और ऋषि च्यवन और सुकन्या अपने कुटिया को चले आये। अब ऋषि च्यवन युवा सुकन्या के सम उम्र के हो चुके थे दोनों का जीवन बहुत सुखमय व्यतीत होने लगा।
सुकन्या शारीरिक सुख से वंचित जरुर थी, लेकिन अपनी पत्नी धर्म के प्रति दृढ़ संकल्प थी। देवताओं के राजवैद्य सुर्य पुत्र दो अश्विनी कुमारों से प्रेम वासना भरें प्रस्ताव के बावजूद अपने धर्म का पालन कि। अपने को किसी भी प्रकार से उनके प्रेम मोह या काम वासना के जाल में फंसने नही दिया। यह एक नारी के चरित्र और उसका अपने पत्ति के प्रति समर्पण भाव की उच्चतम परिक्षा थी।
राजा शर्याति का सुकन्या से मिलन और दुविधा
अपनी पुत्री का विवाह कर वृद्ध ऋषि च्यवन मुनि को सौंपे सुकन्या को कईयों वर्ष बीत चुका था राजा शर्याति अपने राज कार्य में व्यस्त रहते थे। एक दिन महारानी ने कहा हे महाराज पुत्री का विवाह किये वृद्ध च्यवन ऋषि से कईयों साल बीत गए कोई खोज खबर भी लेने आप नही जा रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं वृद्ध ऋषि स्वर्ग सिधार गयें हों और अपनी पुत्री लज्जा वस वहीं अकेली कुटी में अपने भाग्य को कोसते लज्जा वस नही आ रही हो। राजा शर्याति का मन ग्लानि से भर गया और तुरंत जंगल जाने की तैयारी कर पुत्री सुकन्या से मिलने निकल पड़े।
जब राजा शर्याति कुटिया पर पहुंचे तो वहां देखा उनकी पुत्री शर्याति एक युवा रूपवान युवा साधू के साथ मग्न है। यह देखकर राजा शर्याति का मन पीड़ा से भर गया और सुकन्या को भला-बुरा सुनाने लगे। सुकन्या अपने पिता की बातों को बीच में ही रोकते हुए कहा कि हे पिता जी मै ऐसा कोई भी पाप नहीं की हूं आप धैर्य धारण किजिए और यहां आसन पर बैठिए। आप जिन्हें हमारे साथ देख रहे हैं ये हमारे पत्ति च्यवन ऋषि ही हैं।
पुत्री की बातों पर पिता को विश्वास नहीं हो रहा था तब ऋषि च्यवन ने कहा कि यह सब सुकन्या के पत्नी धर्म पालन का ही परिणाम है जो मै सुकन्या के सम रूपवान और उम्र का हो गया हूं। हे राजन आप धैर्य धारण करें मै ऋषि च्यवन ही हूं। ऋषि के बातों पर भी राजा को विश्वास नहीं हो रहा था तब राजा ने कहा मै कैसे मान लू की आप हमारे जमाता च्यवन ऋषि ही हैं तब च्यवन ऋषि ने वो बातें राजा शर्याति को बताया जो सिर्फ उन दोनों के बीच ही थी अन्य किसी को पता नहीं था।
ऋषि च्यवन और सुकन्या ने सारी बातें राजा से बताई और ऋषि च्यवन ने कहा हे राजन मै दोनों अश्विनी कुमारों को वचन दिया हूं आपके यहां यज्ञ कराकर उसमे मै उन्हें सोम रस प्रदान करुंगा। राजा शर्याति ने कहा हे मुनि आप शीघ्र ही यज्ञ की सामग्री लिखवा दिजिये मै यज्ञ की तैयारी करू और यज्ञ संपन्न कर अश्विनी कुमारों को सोम रस प्रदान किजिए।
कुछ समय में ही यज्ञ का आरम्भ हुआ और सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया। ऋषि च्यवन ने जब अश्विनी कुमारों को सोम रस देने के लिए बढे़ त्योही देवताओं के राजा इंद्र ने रोका और कहा हे ऋषि वर क्या आपको पता नहीं है ये हम देवताओं के वैध हैं और इन्हें हम सोम रस पीने से मना किए हैं। ऋषि ने कहा कि इंद्र सोम रस कोई मादक पदार्थ नही है जो ये नही पी सकते। मै इन्हें वचन दिया हूं कि मै आप दोनों को सोम रस पीने के लिए दूंगा।
ऋषि के इस बात पर इंद्र क्रोधित होकर बोले अगर आप हमारे आदेश का उल्लंघन करेगें तो मै आपके प्राण हरने के लिए बाध्य हो जाऊंगा फिर भी ऋषि नही माने तब इंद्र ने अपना वज्रास्त का आह्वान किया। ऋषि ने कहा आप मुझे रोक कर देख लें और ऋषि च्यवन ने अपने तपोबल से इंद्र को स्तम्भित कर दिया। इंद्र के वज्र को रोक कर च्यवन ऋषि ने अग्नि से कृतिका को पुरूष रूप में उत्पन्न किया जो मद रूपी दानव आकार मे था जिसे च्यवन मुनि ने आदेश दिया कि इस इंद्र का भक्षण करो।
अग्नि से उत्पन्न कृतिका जब इंद्र की ओर बढ़ने लगा तब इंद्र गुरु बृहस्पति का आवाह्न किए तुरंत देवताओं के गुरु बृहस्पति वहां उपस्थित होकर कहे हे इंद्र यह अग्नि से उत्पन्न ऋषि द्वारा कृतिका है इसे पराजित करने की सांहस आप देवताओं में नही न ही हम इसे रोक सकते हैं इसलिए आप ऋषि च्यवन से छमा मांग लो और अश्विनी कुमारों को ऋषि द्वारा दिए गए वचन को पूरा करने दो। गुरु बृहस्पति की आज्ञा से इंद्र ने ऋषि च्यवन से अपने अहंकार को भूलाकर कृतिका को रोकने के लिए कहा और अश्विनी कुमारों पर लगाये गये प्रतिबंध को हटा लिया।
च्यवन ऋषि ने कृतिका को चार भागों में विभाजित कर दिया और एक एक भाग चार जगहों में स्थापित किया। जिसमें कृतिका का एक भाग वेश्यावृत्ति में, दूसरा जूआ में, तीसरा मद यानी मदिरा में, चोथा हिंसा में बांट दिया इस प्रकार मद रूपी दानव इस कलयुग में चारों भाग मे उपस्थित है।
च्यवन ऋषि सुकन्या और अश्विनी कुमार की पौराणिक कथा का उद्देश्य

यह ऋषि च्यवन सुकन्या और अश्विनी कुमार की पौराणिक कहानी में सुकन्या की निष्ठा और समर्पण की महत्ता को उजागर किया गया है। यह कहानी धर्म, वासना और पत्नी धर्म के बीच के संतुलन को प्रस्तुत करती है। शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति से वंचित सुकन्या ने दो अश्विनी कुमारों के उस संभोग प्रस्ताव को ठुकरा दी सुकन्या संकल्पित थी कि धर्म और निष्ठा ही जीवन के सबसे बड़े मूल्यवान वस्तु है। दृढ़ संकल्प और समर्पण ने पत्ति को नया जीवन ही नहीं दिया बल्कि एक आदर्श नारी का दर्जा दिया जो आज समाज के लिए उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।
इस कहानी को ध्यान से पढ़ें होगें तो यह कहानी आपको यह शिक्षा देंगी कि जीवन में शारीरिक सुख भोग से भी बड़ी चीजें हैं, और धर्म व निष्ठा का पालन ही सच्चे जीवन का आधार है।
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