भारत में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था के खत्म होने, संविदा नीति की बढ़ती विडंबना और नेताओं की पेंशन संस्कृति पर आधारित यह व्यंग्यात्मक लेख सत्ता, झूठ और जनता की बेबसी का जीवंत चित्रण है। जानें कैसे भाजपा सरकार देश या जनहितैषी नही अपने हितों में काम करती है।
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भूमिका: वादों की फैक्ट्री और जनता की डिलीवरी
कभी भारत में नेता जनता से वादा करता था कि “हम तुम्हें आज़ादी देंगे।”
फिर कहा गया — “हम तुम्हें विकास देंगे।”
अब कहा जाता है — “हम तुम्हें विकास का अनुभव देंगे।”
मतलब, पहले चीज़ मिलती थी, अब उसका अनुभव ही काफी है।
नेता कहते हैं — “देश आगे बढ़ रहा है”, पर जब कोई पूछ लेता है “किधर?”, तो जवाब मिलता है — “सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है भाई, वही काफी है।”
देश के असली कामगार, शिक्षक, क्लर्क, अधिकारी, सफाईकर्मी — सब अब ‘संविदा’ शब्द में समा गए हैं, जैसे कोई गरीब आदमी ‘विकास’ शब्द में गुम हो जाता है।
पहला दृश्य: जब पेंशन गई और संविदा आई— भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की महत्वाकांक्षी योजना— सरकारी कर्मचारी कि पेंशन खत्म संविदा व्यवस्था। देश की सारी सम्पत्ति नेताओं के लिए मनमाना तनख्वाह मनचाहा पेंशन योजना, मनमाफिक लूट सिर्फ़ नेताओं के लिए और जनता के लिए सिर्फ ठेंगा। देश व जनहितैषी तो भाजपा को तब माना जाता जब सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बंद हुआ नेताओं का भी बंद किया गया होता और सरकारी नौकरी संविदा मे बदल गयी नेता भी संविदा के रूप में पांच-दस हजार रूपये जीवन यापन हेतू कार्यरत अवधि तक लेते। यहां तो बाबा जी भी मेज थपथपा मनमाना अपने नेता विरादरी का आय बढ़ाने मे दिख रहे हैं।
एक समय था जब सरकारी नौकरी का मतलब था – इज्ज़त, स्थिरता और बुढ़ापे का सहारा।
फिर एक सुबह आई — और भाजपा आई, भारत के प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी! वाजपेयी ने कहा, “अब नई व्यवस्था होगी, देश को आधुनिक बनाना है।”
आधुनिकता का मतलब निकला — ‘पुरानी पेंशन खत्म, नई चिंता शुरू।’ क्या? बुढ़ापे में मिलेगा वृद्धाश्रम का सहारा, संविदा नाम से नौकरी, भाजपा सरकार की महान उपलब्धियों के साथ अटल की बिदाई तय, देनदारी हुई कम। लेकिन एक लालीपॉप दिखाया था— देश की आर्थिक स्थिति ठीक होगी तो समान काम का मिलेगा संविदा कर्मियों को नियमित बराबर का हक, समान काम समान वेतन।
कांग्रेस की वापसी हुई भाजपा की बनाई व्यवस्था कायम रहा लोगों को लगा फिर भाजपा ही इस व्यवस्था को मूर्त रूप दे सकेगी। 2014 मे भाजपा की वापसी क्योकि बडे-बडे वादों ने जनता का दिल जीत लिया जो अब घोर झूठ सावित हो रहा है। आम जन के लिए कुछ नहीं जो भी है कार्पोरेट जगत और नेताओं के लिए ही है। भारत की आर्थिक स्थिति कभी सुधरेगी ही नहीं, देश कर्ज मे डूब रहा है, नेताओं का पेट इतना बड़ा है, और कार्पोरेट जगत के गिने-चुने पर भाजपा इतना मेहरबान है कि पूरा देश ही हजम कर लेगें, फिर भी पेट भरेगा नहीं। सोचिए जब राजा का ही पेट नहीं भरेगा तो जनता को क्या खाक देगा?
देखिए और सोचिए कैसे भाजपा काग्रेस के शाशन काल मे जो जो विरोध कि खुद सत्ता पाकर वही सब लागू करने मे लगी रहती है और कहती है कि हमने देश व जन हित में किया। तो क्या कांग्रेस उन सब योजनाओं को देश व जन विरोध में तैयार किया जो 2014 से ही दनादन लागू करने मे लगे हो। अब तो आधार पैन लिंक कराने के नाम पर लगभग दो हजार आम जन का कान ऐंठ कर लिया जा रहा है। आधर कार्ड सुधार से लेकर तरह तरह की योजना जैसे जन्म मृत्यु आदि प्रमाण पत्र बनाने के नाम पर आम जन को ही लूटना शुरू हो गया है।
सरकार अपने आय का हजारों स्रोत बना ली है जनता विकास का ढोंग देख रही है और पहले की अपेक्षा सरकार के पास आय भी बढ़ा लेकिन जा कहां रहा है, इसका पता भला कौन करने वाला? कोई पूछे तो इडी और सीबीआई का छापा, देश द्रोही, लूटेरा उसे ही सावित कर गोदीमीडिया से प्रचार करा दिया जायेगा। भाई पूर्वजों ने सच ही कहा है कि राजा को संन्यासी होना ठीक संन्यासी को राजा होना बिल्कुल भी ठीक नहीं रहा। बाँण और छूठ्ठा सांड़ परिवार का हाल क्या जानता?
- कहा गया – “देश की आर्थिक स्थिति सुधारनी है।”
- पर हुआ ये कि देश की हालत तो वहीं की वहीं रही, बस कर्मचारियों की हालत बिगड़ गई और नेताओं की हालत सुधर रही है। कुछ नेताओं के अपने जैसे नीरव मोदी, अडानी, अंबानी वगैरह इस सरकार मे चांदी काट रहे हैं।
- अब कर्मचारी काम तो सरकारी करता है, पर वेतन ऐसा पाता है जैसे किसी ठेके पर मजदूरी कर रहा हो और बस उसके पास परिवार नहीं खुद का ही पेट पालना हो।
- नाम ‘संविदा कर्मी’, काम पूरा सरकारी, और हालात पूरी तरह सरकारी बेरुखी वाले।
- एक संविदा कर्मचारी ने कहा था –
- “प्रधानमंत्री जी, हमारा संविदा काल बढ़ता जा रहा है, पर वेतन नहीं।”
- जवाब मिला – “देश का विकास हो रहा है, तुम आत्मनिर्भर बनो।” बाकी शिक्षित बेरोजगार चाय पकोड़ा बेचो अरे भाई आत्म निर्भर भारत में आम जन से आय का श्रोत ही खत्म हो रहा है और महंगाई चरम पार जा रही है तो बेरोजगार युवाओं के चाय पकोड़ा क्या मोदी जी विदेश सप्लाई होगी। सवाल पूछना लोकतंत्र में कानूनी अधिकार है लेकिन आपके अपनों की नजर में गुनाह बनता जा रहा है। देश में जब स्थाई सत्ता पर काबिज है भाजपा तो थोड़ा आम जन का भी सोचे।
- आत्मनिर्भर, मतलब साफ था — सरकार आत्मनिर्भर, और कर्मचारी आत्मत्यागी।

- दूसरा दृश्य: नेता बिरादरी का पेंशन महोत्सव
- नेता जी का पेंशन सिस्टम बड़ा सुंदर है।
- एक बार चुनाव जीत जाओ, पांच साल संसद में कुर्सी गर्म कर लो — फिर जीवन भर ठंडे AC कमरे में बैठो और पेंशन खाते में आती रहे। पीढ़ी दर पीढ़ी खुशहाल जीवन।
- कर्मचारी बोले – “हमारा क्या?”
- नेता बोले – “देश के लिए त्याग करो।”
- कर्मचारी बोले – “हम त्याग कर रहे हैं।”
- नेता मुस्कुराए – “तो सही दिशा में हो।”
- यह वही नेता बिरादरी है जो कहती है — ‘समान कार्य समान वेतन’,
- लेकिन खुद के लिए नियम अलग — ‘समान पेंशन असमान पद’।
- एक विधायक के लिए पेंशन, एक सांसद के लिए पेंशन, एक मंत्री दो चार बार चुनाव जीतने के बाद पेंशन ही पेंशन जीतना मर्जी नेता बन कर पाओ। अंगुठा टेक हो शिक्षा मंत्री बनो, दवा का नाम पता नहीं है स्वास्थ मंत्री बनो। शैक्षिक योग्यता का स्पष्ट किसी को पता न चले प्रधानमंत्री बन जाओ। लाखों खर्च कर पढ़ाई करने के बाद चाय पकोड़ा बेचने का सलाह या बहुत अच्छा खासा पढ़ाई रही तो संविदा कर्मी कि नौकरी पाकर पांच दस हजार मे जीवन यापन करे जनता।
- नेता कौन बन सकता है? हम लेखक का व्यंग्यात्मक विचार – हिंदुत्व के वजह से मै भाजपाई था लगभग 1990 मे हमारे विद्यालय के गुरु जी विजय दूबे जो आज तक अच्छे छबिधर रहकर भी नेता नही बन सके। आज भी कार्यकर्ता हैं अगर वह दूसरे दलों से भागकर आये होते या गुंडा माफिया होते तो यहां गंगा स्नान करा बीजेपी सांसद विधायक बनवा दी होती लेकिन दुर्भाग्य बेचारे सज्जन व्यक्ति हैं —भाजपा का झंडा ले भाजपाई बने, तभी हम ने भी गुरु जी के सपोर्ट में भाजपा का कार्यकर्ता बना, तबसे भाजपा की जीत हो या हार हो अडिग था। 2014 मे पुरजोर कोशिश किया गया क्योकि गुजरात के तर्ज पर देश का विकास होने वाला नारा था, हर साल करोड़ों युवाओं को रोजगार, गैस सिलेंडर के दाम, डिजल, पेट्रोल, सोना, चांदी सब मंहगा था सस्ता होने का झूठा सपना दिखाई दिया। नोटबंदी हुई उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी, सब नोट उन्हीं लोगों के आदमी पहले बदल बैंक खाली कर रहे थे। बैंक कर्मचारियों पर कार्यवाही होना मोदी जी ने तय कर 2017 मे सत्ता भाजपा के नाम करा दिया। हम सब भरपूर सहयोग किए उसके बाद झूठ पर झूठ सब झूठ दिखाई देने लगा तबतक हमारे उपर एक फर्जी मुकदमा खानदानी सपा से भाजपा मे आया व्यक्ति सांसद रविन्द्र कुशवाहा के भरपूर सहयोग से थाने में लिखा गया। जब कि थाने से लेकर जिले तक को तुरंत पता चल चुका था, कि मनगढ़ंत कहानी है और तहरीर भी नहीं ले रहा था थानाध्यक्ष। जब मुझे मालूम हुआ सांसद से बात हुई तो कहा अरे अमित भाई आप भाजपा का कार्यकर्ता ही रहेंगे क्या? नेता बनना है तो ये सब तो होता ही है। चलिए आपका नाम उस मामले से निकलवा देता हूं। तब मैं मना कर दिया और कहा अब मुझे अपनी पावर दिखा गिरफ्तार भी करवा दो, तब भी मै पत्रकार था। एसपी ने सीओ को मामले का जांच अधिकारी नियुक्त किया। मामला फर्जी है रिपोर्ट लग चला गया। उसके बाद नेताओं का बैकग्राउंड सर्च करना शुरू कर दिया, देखा जो जीतना ज्यादा गुनाहगार वो उतना जल्द बड़ा नेता मै भाजपा कार्यकर्ता का भी कार्य छोड़ निस्पक्ष निस्वार्थ बेदाग लेखन कार्य करता हूं। मुझे न विज्ञापन चाहिए न कोई दलाली यह बात मुझे जानने वाले सब जानते हैं।
- और नेताओं द्वारा सरकारी कर्मचारी के लिए… सिर्फ “पेंशन पर चर्चा।”
- कभी-कभी लगता है —
- नेताओं ने देश को एक विशाल सरकारी कार्यालय बना दिया है,
- जहाँ नेता स्थायी कर्मचारी हैं और जनता संविदा पर।
तीसरा दृश्य: स्वर्ण युग की चमक – और सोने का रेट
1964 में सोना 64 रुपये से भी कम मतलब सस्ता था,
लोग कहते थे — “सोना है तो दुल्हन बनेगी रानी।”
2014 आया तो सोना 22 हजार पहुंच गया — लोगों ने कहा, “चलो थोड़ा महंगा हुआ, पर शादी फिर भी होगी।”
अब 2025 में, सोना सवा लाख पार हो गया — और लोग कहने लगे, “अब तो शादी भी लोन पर होगी।”
नेता जी बोले — “सोना महंगा होना देश की तरक्की का संकेत है।”
अरे भाई! जब आपकी बातों की कीमत गिरी और सोने की बढ़ी,
तो जनता ने तय कर लिया — अब निवेश भावनाओं में नहीं, धातुओं में करेंगे।
कभी-कभी लगता है — भाजपा सरकार ने ‘अच्छे दिन’ का अर्थ गलत पढ़ लिया।
उन्होंने समझ लिया — “अच्छे दिन” का मतलब है नेताओं के लिए अच्छे, जनता के लिए दिन-दिन महंगे। मोदी जी वो बुरे दिन ही लौटा दो अब से वो अधिक अच्छा था, क्योंकि? अब से ज्यादा रोजी रोजगार था, महगाई कम था। झूठ की गठरी बांध शासन कब तक चलाओगे। मोटी पगड़ी झूठ का बोझ उठाने के लिए ही बांध रखे हो क्या? झूठ बोलने की कला मे विश्व विख्यात निकले।

- चौथा दृश्य: झूठ का विश्व रिकॉर्ड
- मोदी जी का आत्मविश्वास प्रशंसनीय है।
- इतना आत्मविश्वास कि झूठ भी सत्य लगने लगता है।
- वो कहते हैं — “मैं झूठ नहीं बोलता, बस सच्चाई देर से आती है।” घोटाले बाजों को जेल भेजने आये आज तक कोई घोटालेबाज मिला ही नहीं एक मिला लालू यादव जिसकी बोलती सत्ता परिवर्तन के बाद भी बंद नही हो रहा था। इसलिए उसे जेल जाना पड़ा बाकी तो सब चोर मौसेरा भाई निकले। एक बात और मोदी जी को लालू यादव का चुनाव जीतने का फार्मूला शायद पसंद आ गया भंडा फोड़ न हो इसलिए जेल भेज बोलती बंद करना पड़ा।
- और जनता, जो टीवी चैनलों से ‘सच्चाई’ खोजती है, उसे कभी नहीं मिलती — क्योंकि हर चैनल पर ‘गुजरात मॉडल’ का विज्ञापन चल रहा होता है।
- मोदी जी कहते हैं — “मेरा सीना 56 इंच का है।”
- जनता सोचती है — “कभी खोलकर देख भी लें, कहीं भीतर पेंशन वालों का दर्द न धड़क रहा हो।”
- कभी-कभी लगता है कि मोदी जी सिर्फ एक नेता नहीं, एक “ब्रांड” हैं —
- जिनका टैगलाइन है: “जो कहता हूं, उसका उल्टा करूंगा — लेकिन मुस्कान वही रखूंगा, ताकि जनता समझ न सके।”
- पाँचवाँ दृश्य: मीडिया का विकास और जनता का पतन
- आज का मीडिया सरकार का सबसे प्रिय ‘संविदा कर्मी’ है।
- काम वही करता है — नेता की छवि को चमकाना।
- हर शाम 9 बजे एंकरों की सेना निकलती है, जैसे कोई युद्ध चल रहा हो —
- पर दुश्मन पाकिस्तान नहीं, जनता की समझ है।
- नेता बोलता है, मीडिया तालियाँ बजाता है।
- नेता झूठ बोलता है, मीडिया कविता बनाता है।
- नेता गलती करता है, मीडिया उसे “रणनीति” बताता है।
- देश के लोग जब रोटी और नौकरी पर बात करना चाहते हैं,
- तो टीवी पर सिर्फ यह आता है — “आज प्रधानमंत्री ने मच्छर मारा, जनता ने कहा वाह रे हनुमानजी का अवतार!”
- छठा दृश्य: संविदा कर्मी का स्वप्न
- एक संविदा शिक्षक सपना देखता है कि एक दिन उसे स्थायी नौकरी मिलेगी।
- पर जब जागता है, देखता है कि सरकार ने उसका पद ही ‘आउटसोर्स’ कर दिया है।
- एक क्लर्क सोचता है — “अब तो वेतन बढ़ेगा।”
- पर सरकार कहती है — “डिजिटल इंडिया में क्लर्क की जरूरत नहीं, अब AI करेगा।”
- कभी-कभी लगता है कि सरकार धीरे-धीरे जनता को भी संविदा पर रख देगी।
- मतदान का अनुबंध भी शायद अगले चुनाव में कहे —
- “हर मतदाता पांच साल के संविदा पर रहेगा, अगर सही वोट नहीं दिया तो पेंशन जब्त शायद वो 5 किलो फ्री राशन।” सत्ता तो मिलती ही रहेगी भला सत्ता से अब कौन हटाने वाला लालू फार्मूला जिंदाबाद जो है।
- सातवाँ दृश्य: विकास की परिभाषा – स्लोगन बनाम सच्चाई
- नेता कहते हैं — “देश आत्मनिर्भर बन रहा है।”
- पर जब नौकरी नहीं मिलती, तो वही आत्मनिर्भरता बेरोजगारी कहलाती है।
- कहा गया — “हर हाथ को काम मिलेगा।”
- हुआ — “हर हाथ को ऐप डाउनलोड करने की जिम्मेदारी मिली।”
- ‘डिजिटल इंडिया’ में हर समस्या का समाधान एक ऐप है —
- बस ऐप में बिजली नहीं, पानी नहीं, रोजगार नहीं —
- पर समीक्षा जरूर है — “आपका अनुभव कैसा रहा?” नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर बता सकते हैं।
- जनता कहती है — “महंगाई बढ़ रही है।”
- सरकार जवाब देती है — “देश का GDP बढ़ रहा है।”
- अब कौन समझाए इन्हें कि जनता रोटी खाती है, GDP नहीं।
- आठवाँ दृश्य: राजनीति बनाम जनसेवा
- कभी राजनीति का मतलब था ‘सेवा’।
- अब राजनीति का मतलब है ‘सेवा-शुल्क’।
- जिसे देखो वही अपने कार्यकाल का लाभांश बढ़ा रहा है —
- भले ही जनता घाटे में चली जाए।
- नेता का बंगला बड़ा हो रहा है,
- कर्मचारी का घर छोटा,
- नेता का पेंशन खाता मोटा,
- कर्मचारी का बैंक बैलेंस सूखा।
- नेता कहते हैं — “हमारे पास दृष्टि है।”
- जनता कहती है — “हमारे पास दृष्टांत हैं।”
- नौवां दृश्य: नया भारत या नया बहाना?
- “नया भारत” हर भाषण में आता है,
- पर पुराने सवाल वही हैं —
- नौकरी कहाँ है?
- पेंशन क्यों गई?
- संविदा कब तक चलेगी?
- सोना कब सस्ता होगा?
- सरकार कहती है — “सब कुछ अच्छा है, बस जनता नकारात्मक हो गई है।”
- अब जनता को यह समझना है कि लोकतंत्र में अगर सवाल पूछना नकारात्मक है,
- तो जवाब देना ‘देशद्रोह’ बन जाता है। अभी अभी नेपाल ने वहां की सरकार को जबाब अच्छा दिया जो धीरे-धीरे भारतीयों को भी मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

- दसवाँ दृश्य: निष्कर्ष — व्यंग्य की आत्मा
- नाम बदल देना ही सच्चा विकास है कभी -कभी लगता है कि देश का नाम बदल देना चाहिए —
- “संविदा गणराज्य भारत।”
- जहाँ हर चीज़ ठेके पर है —
- नेतृत्व, मीडिया, न्याय, और उम्मीदें भी।
- नेता अपनी पेंशन का हकदार है,
- जनता अपने हक की भीख मांगती है।
- और फिर भी, हर चुनाव में यही जनता ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ में अपना वोट जोड़ती है।
- क्योंकि इस देश में झूठ अगर लाउडस्पीकर पर बोला जाए,
- तो वह सत्य की तरह सुनाई देता है।

समापन: जनता की विनम्र प्रार्थना। लेखक भगवान श्री चित्रगुप्त जी के देव वंश-अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म लेखनी से।
प्रिय नेताओं,
अब बस करिए —
हमने आपकी “अच्छे दिनों” की थाली में बहुत भूख देखी है।
कभी हमारी भी प्लेट में कुछ डाल दीजिए।
पेंशन आपने खा ली, संविदा आपने बांट दी,
सोना आपने महंगा कर दिया,
अब कम से कम सच्चाई तो सस्ती छोड़ दीजिए।
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