देश बेचो राज करो: शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव, जानें सहभागी कौन 10 अध्याय

Amit Srivastav

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शिक्षा नहीं, तमाशा है यह! पढ़िए कैसे ‘देश बेचो राज करो’ की नीति ने भारत की शिक्षा व्यवस्था को बाज़ार और भ्रम का शिकार बना दिया है। आखिर क्यों शिक्षा को बार बार आतताइयों, शासकों द्वारा ध्वस्त किया जाता है? amitsrivastav.in पर निस्पक्ष निर्भिक बेदाग कलम से पढ़िए अपनी हर एक मनपसंद लेखनी।

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शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव – एक संक्षिप्त परिचय

भारत, वह देश जिसकी मिट्टी में ज्ञान की सुगंध बसी थी, जहां नालंदा, तक्षशिला, और विक्रमशिला जैसे शिक्षा के मंदिर विश्व भर के छात्रों और विद्वानों को आकर्षित करते थे। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 5वीं शताब्दी में की थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय भगवान राम से छोटे भाई भरत को दिया जाता है, जिन्होंने इस शहर की स्थापना अपने पुत्र ‘तक्ष’ के नाम पर की थी।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्मपाल ने की थी। इस विश्वविद्यालय को आठवीं शताब्दी के अंत और नौवीं शताब्दी की शुरुआत में स्थापित किया गया था। विक्रमशिला, जो अब बिहार के भागलपुर जिले में स्थित है, यह एक प्रसिद्ध बौद्ध मठ विश्वविद्यालय था। धर्मपाल ने न केवल विक्रमशिला की स्थापना की, बल्कि उन्होंने सोमपुर महाविहार की भी स्थापना की थी। विक्रमशिला विश्वविद्यालय व्याकरण, तर्कशास्त्र, मीमांसा, तंत्र, और विधिवाद जैसे विषयों में पढ़ाई के लिए प्रसिद्ध था।

यह विश्वविद्यालय लगभग चार शताब्दियों तक शिक्षा का केंद्र रहा, लेकिन 13वीं शताब्दी की शुरुआत में बख्तियार खिलजी के आक्रमण में इसे नष्ट कर दिया गया। शिक्षा आज एक अनोखे दौर से गुजर रहा है। यह दौर है “देश बेचो राज करो” का, जहां सत्ता की भूख ने हर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है, और शिक्षा इसकी सबसे बड़ी शिकार बनकर उभरी है। यह कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि एक सरकार का सुनियोजित, भव्य, और व्यवस्थित उध्वस्तीकरण का महोत्सव है, जिसका मंचन बड़े-बड़े वादों, चमकदार नारों, और खोखली नीतियों के साथ किया जा रहा है।

हमारी शिक्षा को ध्वस्त करने वाली यह सिर्फ वर्तमान सरकार ही नहीं है बल्कि प्रचेता के वंश से उत्पन्न तमाम मुस्लिम शासक जो सनातन धर्म को तोड़ने का काम किया और अपने कबीले को बढ़ावा दिया, ने सनातनी शिक्षा को ध्वस्त किया और अपना गुणगान इतिहास के पन्नों में भर कर हमे थमा दिया। 1984 भारत में अल्पमत से बनी वामपंथियों के सहयोग से इंदिरा गांधी की सरकार में शिक्षा का सम्पूर्ण पाठ्यक्रम एक ही झटके में बदल दिया गया।

वहां से सनातनी ऋषि-मुनियों, राजाओं के इतिहास और ज्ञान को पूरी तरह से हटा दिया गया और प्राथमिकता के साथ मुस्लिम शासकों के विचारों को जोड्कर पाठ्यक्रम बनाएं गए जो आज हमे पढ़ाया जाता है। इस ऐतिहासिक लेख में लेखक भगवान श्री चित्रगुप्त जी के देव वंश-अमित श्रीवास्तव इस देश बेचो राज करो के तहत शिक्षा के उध्वस्तिकरण महोत्सव के हर पहलू को विस्तार से देखेंगे, ताकि यह समझा जा सके कि कैसे शिक्षा, जो कभी भारत की आत्मा थी, आज उसकी सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी है। शिक्षा को ध्वस्त करने मे कब कौन सहभागी रहा।

देश बेचो राज करो: शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव, जानें सहभागी कौन 10 अध्याय

प्रथम अध्याय
शिक्षा का स्वर्णिम अतीत और उसका पतन

भारत का शिक्षा इतिहास विश्व के सबसे समृद्ध इतिहासों में से एक है। प्राचीन काल में, जब यूरोप और अन्य महाद्वीप अंधेरे युग में डूबे थे, भारत में नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र थे। नालंदा में लगभग 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 शिक्षक एक साथ अध्ययन और शोध में लीन रहते थे। यहाँ दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, और साहित्य जैसे विषयों पर गहन चर्चाएँ होती थीं। गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं थी, यह जीवन जीने की कला, नैतिकता, और सामाजिक उत्तरदायित्व सिखाती थी। हमारी प्राचीन नैतिकता से भरी-पड़ी धार्मिक आध्यात्मिक सुयोग्य शिक्षा आज की शिक्षा से कोषों दूर कर दिया गया है।


आज, उस गौरवशाली परंपरा को न केवल भुला दिया गया है, बल्कि उसे व्यवस्थित रूप से नष्ट करने का अभियान चल रहा है। “देश बेचो, राज करो” की नीति ने शिक्षा को एक ऐसा क्षेत्र बना दिया है, जहां प्रगति के नाम पर केवल दिखावटी कदम उठाए जाते हैं। सरकारी स्कूलों की हालत देखिए—जर्जर इमारतें, टूटी बेंचें, और शिक्षकों की भयानक कमी। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति ऐसी है कि कई स्कूलों में एक शिक्षक को चार-पाँच कक्षाएँ एक साथ पढ़ानी पड़ती हैं। और अगर शिक्षक नहीं हैं, तो सरकार का जवाब बड़ा सरल है— “आत्मनिर्भर बनो!” लेकिन बिना किताबों, बिना शिक्षकों, और बिना बुनियादी सुविधाओं के यह आत्मनिर्भरता कैसे संभव है?


शिक्षा के इस पतन का एक उदाहरण है प्राथमिक शिक्षा की स्थिति। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1.5 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों में केवल एक शिक्षक है। ग्रामीण क्षेत्रों में 30% स्कूलों में शौचालय की सुविधा तक नहीं है, और 20% स्कूलों में पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। फिर भी, सरकार का दावा है कि “सब पढ़ें, सब बढ़ें”। यह नारा इतना खोखला है कि इसे सुनकर बच्चे भी हँस पड़ते हैं, अगर उनके पास हँसने की ताकत बची हो तो।

द्वितीय अध्याय
निजीकरण का जादू और शिक्षा का बाजारीकरण

इस उध्वस्तीकरण महोत्सव का सबसे चमकदार पहलू है शिक्षा का निजीकरण। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को धीरे-धीरे बंद करने की रणनीति अपनाई गई है। शिक्षा के लिए बजट में आवंटन लगातार कम हो रहा है। 1968 की कोठारी समिति की सिफारिश थी कि जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च किया जाए, लेकिन 2025 तक यह आँकड़ा 3% से भी कम है। दूसरी ओर, निजी स्कूलों और निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किया जा रहा है।


निजीकरण का यह मॉडल इतना शानदार है कि अब शिक्षा केवल उन लोगों के लिए सुलभ होगी, जो मोटी फीस दे सकते हैं। एक औसत निजी स्कूल की वार्षिक फीस कार्पोरेट जगत जैसे ईसाई मिशनरियों, सरकारी शिक्षा और शिक्षकों का उपहास उड़ाने वाला दैनिक जागरण विद्यालय और तमाम बडे-बडे शिक्षा के व्यापारियों की विद्यालयों में 1 लाख रुपये से शुरू होती है, जो एक सामान्य व मध्यम वर्गीय परिवार की सालाना आय से कहीं अधिक है। सरकार और पूंजीपतियों की नजरों में गरीबों के बच्चे? उनके लिए तो मजदूरी ही सबसे अच्छा करियर ऑप्शन है।

सरकार का कहना है कि “स्किल इंडिया” के तहत बच्चों को हुनर सिखाया जा रहा है। लेकिन यह हुनर क्या है? मजदूरी, छोटे-मोटे काम, और बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के नौकरियाँ। मेहनत से काम करो और बस अपने खाने भर का कमा लो, बच्चों को खिलाने के लिए अपने खाने में कंजूसी करनी होगी। पढ़ाई और दवाई कहां से होगी यह विचारणीय विषय है।


स्कॉलरशिप की व्यवस्था को भी इतना जटिल बना दिया गया है कि उसका लाभ केवल कुछ चुनिंदा लोग ही उठा पाते हैं। कई राज्यों में स्कॉलरशिप के लिए आवेदन प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि बच्चे और उनके माता-पिता हार मान लेते हैं। एक उदाहरण लें—उत्तर प्रदेश में स्कॉलरशिप के लिए ऑनलाइन आवेदन करना पड़ता है, जिसमें आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दो से पांच सौ रूपये पहले खर्च होता है फिर यहां वहां की दौड़भाग खर्चा पानी, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा न के बराबर है। फिर भी, सरकार का कहना है कि यह सब “डिजिटल इंडिया” का हिस्सा है।


निजीकरण ने न केवल शिक्षा को महँगा बनाया है, बल्कि इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। कई निजी संस्थान केवल डिग्री बेचने का धंधा चला रहे हैं। इन संस्थानों में न तो योग्य शिक्षक हैं, न ही उचित लैब, और न ही कोई शोध की सुविधा। फिर भी, ये संस्थान हर साल लाखों “डिग्रीधारी बेरोजगार” पैदा कर रहे हैं। यह सरकार के लिए सर दर्द है कि डिग्रीधारी बेरोजगार युवाओं का बड़ा फौज नौकरी मांगता है। गरीब परिवार को राहत देने का अब रास्ता तैयार है, कम बच्चों वाला सरकारी स्कूलों का मर्जर न गरीबों का बच्चा पढ़ेगा न डिग्रीधारी होगा न नौकरी मांगेगा न बेरोजगार होगा।

सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी से व्यवस्थित स्कूलों के बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धाओं में गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे ज्यादातर पीछे हो बेरोजगार हो जाते हैं, वो स्वरोजगार चाय पकौड़ी का दुकान या बकरी और मुर्गी चराने का काम करने मे शर्माते हैं। इसलिए अपने आप को बेरोजगार कहते हैं। सरकारी स्कूलों में संसाधनो का अभाव और प्राइवेट स्कूलों का बढ़ावा, सरकारी स्कूलों से बच्चों के पलायन का कारण है।

सरकार जनहितैषी कदम प्रतिस्पर्धा में पीछे हो रहे बच्चों का पारिवारिक खर्च बचाने के उदेश्य से धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों को बंद करने और निजी स्कूलों का बढ़ावा देने का काम कर रही है। जब बच्चे प्राथमिक शिक्षा ही नही पा सकेगें तो उच्च शिक्षा की डिग्री पाने के लिए डिग्री बेचने वाले विद्यालयों से दूर रहेंगे और उन परिवारों को शिक्षा खर्च से मुक्ति मिल सकेगी, जैसे सुर्य व चंद्र ग्रहण, नहान आदि खर्चीले पर्वो की छुट्टियों को खत्म कर देने से पारिवारिक खर्च मे बचत होने लगी है।

न किसी को सुर्य व चंद्र ग्रहण मालूम हो पाता है न एक आध किलो अनाज का दान करना पड़ता है। नहान की छुट्टी होती थी तो परिवार के एक कमासुत के उपर सबको स्नान करवाने का खर्चा आता था, उसका अब बचत हो जाता है। छुट्टी ही नहीं मिल रहा है तो कैसे स्नान कराने वो अपने परिवार को लेकर बेचारे जा सकेंगे। न जायेगा कोई, न खर्च होगा। वैसे यह सबका साथ सबका विकास का ढोंग, सनातन धर्म की झूठी जय जयकार लगाने वाली सरकार लोगों का खर्च कम कैसे हो सकेगा रह-रह कर कुशल प्रयास कर रही है।

उसी क्रम में प्राइवेट स्कूल का बढ़ावा देकर सरकारी स्कूलों को बंद कर देने वाली महत्वाकांक्षी योजना फलीभूत करवाना चाहती है। ताकि वैसे परिवार के बच्चों को शिक्षा से मुक्ति मिल सके समय से स्वरोजगार मे बच्चे लग जाएं जो मजदूरी के लिए बने हैं। गरीब अनपढ़ रहेगा तो रोजगार युक्त रहेगा। जैसा कि आज भी देखने को मिल जाता है कम या नहीं पढ़ने वाले कोई न कोई रास्ता निकाल कमाई कर लेता है, सुविधाओं के अभाव में किसी तरह से पढें लिखे बेचारे बेरोजगारी का गीत गाते फिरते हैं।

तृतीय अध्याय
नई शिक्षा नीति—वादों का आलम

नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 को सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति के रूप में पेश किया। बड़े-बड़े दावे किए गए—5+3+3+4 का नया ढांचा, समग्र विकास, और डिजिटल शिक्षा का युग। लेकिन हकीकत क्या है? यह नीति लागू करने के लिए न तो पर्याप्त फंडिंग है और न ही इच्छाशक्ति। स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ जैसे बिजली, पानी, और शौचालय तक नहीं हैं, लेकिन ऑनलाइन शिक्षा की बात की जाती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्शन एक सपना है, और स्मार्टफोन तो और भी दूर की बात। फिर भी, सरकार का कहना है कि बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई करें। अगर नेटवर्क नहीं है, तो बच्चे को “आत्मनिर्भर” बनने की सलाह दी जाती है। मोदी ने चाय बेचा था तुम भी चाय बेचो भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकोगे तो अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाओगे। भारत के प्रधानमंत्री का सलाहकार कहलाओगे।


आत्मनिर्भरता के तहत चाय बेचो पकौड़ी छानो और सरकार की गलत नीतियों पर तालियां बजाओ कुछ ही सालों में निजीकरण का मजा चखने के लिए आसानी से मिलेगा। प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ाओ सारी सुविधाएं सरकार मुहैया करायेगी सरकारी स्कूलों से बच्चों का पलायन प्राइवेट स्कूलों की ओर और सरकारी स्कूलों को बंद करने की प्लानिंग सफलतापूर्वक संपन्न होगी फिर वही होगा।

जैसे 350 का गैस सिलेंडर था बहुत महंगा था, गैस की कालाबाजारी रोकने के लिए सब्सिडी प्रक्रिया लागू हुई, अब हजार पार गैस सिलेंडर के दाम सब्सिडी समाप्त। वैसे ही सरकारी स्कूलों को तोड़ने से पहले गैस सब्सिडी की तरह लालीपॉप सरकार दे प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा देने लगी है। यहां प्राइवेट स्कूल में आओ सरकारी सुविधा पाओ! सरकारी स्कूलों को बन्द कर जो आज लालीपॉप दिख रहा है समाप्त हो जायेगा ठीक गैस सिलेंडर की तरह।


NEP का एक और चमकदार पहलू है चार साल के डिग्री कोर्स को तीन साल में और तीन साल के कोर्स को डिप्लोमा में बदल देना। यह इतना शानदार विचार है कि अब डिग्री की कोई कीमत ही नहीं रह गई। नियोक्ता अब पूछते हैं, “यह डिग्री किस यूनिवर्सिटी से है?” और अगर जवाब कोई सरकारी संस्थान है, तो नौकरी मिलने की संभावना और कम हो जाती है। NEP में “मल्टी-डिसिप्लिनरी” शिक्षा की बात की गई है, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश विश्वविद्यालयों में न तो फैकल्टी है और न ही संसाधन।


NEP के तहत “मातृभाषा में शिक्षा” का भी बड़ा शोर मचाया गया। लेकिन यहाँ भी एक पेंच है। मातृभाषा में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा, पाठ्यपुस्तकें तैयार करनी होंगी, और बुनियादी ढांचा विकसित करना होगा। लेकिन इन सबके लिए बजट कहाँ है? सरकार का जवाब वही पुराना है— “आत्मनिर्भर बनो!”

चतुर्थ अध्याय
सांप्रदायिकता का रंग और विचारों का दमन

शिक्षा को सांप्रदायिक रंग देना इस महोत्सव का सबसे खतरनाक पहलू है। शिक्षा अब दो धारी तलवार राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है। प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा देकर गरीबों से शिक्षा को दूर करने का कुचक्र रचा जा रहा है —स्कूलों का मर्जर। यह सुनियोजित साजिश है। शिक्षा पर सरकार का खर्च होता है, खर्च मे बचत करने का और शराब की दुकानों से सबसे ज्यादा आय होता है, शराब के दुकानों को बढ़ावा।

इतिहास की किताबों में छेड़छाड़ आम बात है। मुगल साम्राज्य से शुरू यह खेल निरंतर चल रहा था। ऋषि मुनियों के इतिहास को मुगलों ने हटाकर अपना गुणगान लिखा, जो हमें पढ़ाया जाता है लेकिन सनातन का झंडा उठाने वाली सरकार पुनः सनातनियों के इतिहास को जोड़ने मे असमर्थ है। कारण सरकारें वोट बैंक की राजनीति करती हैं। यहां न किसी नागरिक को सवाल पूछने का हक है न अपने विचारों को व्यक्त करने की आजादी। सवाल पूछने की हिम्मत अब “राष्ट्रविरोधी” होने का सबूत बन चुकी है।


विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र चिंतन को दबाने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है। प्रोफेसरों को धमकाया जाता है, छात्रों को निशाना बनाया जाता है, और कैंपस में विचार-विमर्श की जगह अब “एक देश, एक सोच” का नारा गूंजता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), दिल्ली विश्वविद्यालय, और हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे संस्थान, जो कभी स्वतंत्र चिंतन के गढ़ थे, आज सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने की सजा भुगत रहे हैं। नाम बदल देना ही भाजपा सरकार का वास्तविक विकास है। जैसे जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) अब पीएम विद्यालय के नाम से कर दिया गया है।

देश बेचो राज करो: शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव, जानें सहभागी कौन 10 अध्याय

पंचम अध्याय
शिक्षकों की दुर्दशा, डकैतों की बल्ले-बल्ले

शिक्षक, जो समाज का आधार होते हैं, उनकी हालत इस व्यवस्था में सबसे दयनीय है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती लगभग बंद हो चुकी है। जो शिक्षक हैं, उन्हें न्यूनतम वेतन पर काम करना पड़ता है। कई राज्यों में शिक्षा मित्र “गेस्ट टीचर” या “अतिथि शिक्षक” के नाम पर शिक्षकों को बिना किसी स्थायी नौकरी के काम पर रखा जाता है। इन शिक्षकों को न तो सामाजिक सुरक्षा मिलती है और न ही भविष्य की कोई गारंटी। फिर भी, अगर वे हड़ताल पर जाते हैं, तो उन्हें “राष्ट्र के भविष्य को बर्बाद करने” का दोषी ठहराया जाता है।

ऊंची वेतन पाकर जिस किसी का पेट नहीं भरता अपने अधिनस्थ कम वेतन पाने वालों को तबाह किए रहते हैं, वो राष्ट्र भक्त या राष्ट्र के निर्माता कहे जाते हैं, किसी गुरुजन को हमारी यह कटाक्ष बूरा न लगे इसलिए शिक्षा का उध्वस्तिकरण महोत्सव मे सरकार की सहभागिता बता देते हैं। उन्हें हम शिक्षक नही डकैत कहते हैं— जो बच्चों का हक खाने की कला से परिपूर्ण हैं। उनके ऊपर बडे-बडे नेताओं अधिकारीयों का छत्रछाया भी रहता है। उनके खिलाफ न कार्रवाई हो सकती न किसी को बोलने तक का हिम्मत होता है।

पुख्ता सबूत पर हमने कुछ सालों पहले उत्तर प्रदेश देवरिया जिले से एक जगह की खबर अखबार में प्रकाशित किया था, जिसका शिर्षक था —रोज-रोज एमडीएम की होती है चोरी, कैसे सुधरेगा प्राथमिक विद्यालय। आग बबुला शिक्षिका, सहयोगी नेता, अधिकारी और यहा तक की 340 सलेमपुर लोक सभा का भाजपा सांसद रविन्द्र कुशवाहा पुरजोर कोशिश कर अपने ही विद्यालय के दो शिक्षकों सहित हमारे उपर गंभीर धाराओं में अभियोग पंजीकृत करायी, जिसमें धारा 376 भी शामिल था।

उसके बाद उसी के द्वारा उसी गांव के एक समाजिक युवक फिर सफाई कर्मी पर छेड़छाड़ की गंभीर धाराओं में प्रार्थना पत्र दी गई थी, अब तो पूरा गाँव डरता है, अधिकारी नेता जी हजूरी करते हैं। यह कितना शर्मनाक बात है जो बच्चों को शिक्षित करने चले वो अपने बचाव में अपनी ही इज्जत को उछालें। जांच में प्रधानाध्यापिका द्वारा लगाया गया अपने बचाव में सब आरोप मिथ्या था, फिर भी उसका कुछ नहीं हुआ। कुछ ही सालों में वो शिक्षिका विद्यालय को बर्बाद कर दी है। सब त्रस्त, बच्चों की संख्या नगण्य हो गई लेकिन अधिकारी संज्ञान नहीं लेते जो विद्यालय गांव के बच्चों से भरा रहता था आज मर्जर सूची में शामिल है।

शिक्षकों की कमी का एक उदाहरण लें। केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी स्थायी शिक्षकों की कमी है। कई स्कूलों में एक शिक्षक को कई विषय पढ़ाने पड़ते हैं, जिनमें उनकी विशेषज्ञता भी नहीं होती। इसके बावजूद, सरकार का दावा है कि वह “विश्वस्तरीय शिक्षा” प्रदान कर रही है। यह विश्वस्तरीय शिक्षा ऐसी है कि बच्चे बिना पढ़े पास हो रहे हैं, लेकिन उनके पास कोई स्किल नहीं है।

षष्ठम अध्याय
डिजिटल शिक्षा का ढोंग

डिजिटल शिक्षा को इस सरकार ने ऐसा चमकदार जुमला बनाया है कि सुनने में लगता है मानो भारत रातोंरात सिलिकॉन वैली बन जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 4G कनेक्शन तो दूर, बिजली तक नहीं है। ऑनलाइन क्लास के लिए स्मार्टफोन चाहिए, लेकिन गरीब परिवारों के पास तो दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल है। फिर भी, सरकार का कहना है कि डिजिटल शिक्षा ही भविष्य है। यह भविष्य इतना सुनहरा है कि इसमें केवल वही बच्चे शामिल हैं, जिनके पास स्मार्टफोन और इंटरनेट है। बाकी? वे तो “आत्मनिर्भर” बनें!


कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा का जो तमाशा हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। लाखों बच्चे पढ़ाई से वंचित रह गए, क्योंकि उनके पास न तो स्मार्टफोन था और न ही इंटरनेट। एक सर्वे के अनुसार, 2020-21 में ग्रामीण भारत में 70% बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा का कोई लाभ नहीं मिला। फिर भी, सरकार ने इसे अपनी उपलब्धि के रूप में गिनाया।

सप्तम अध्याय
परीक्षा और नकल का तमाशा

परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए सरकार ने कड़े नियम बनाए हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब पढ़ाई ही नहीं होगी, तो नकल कौन करेगा? कई राज्यों में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम इतने खराब आ रहे हैं कि सरकार को पासिंग मार्क्स कम करने पड़ रहे हैं। लेकिन इसके बजाय कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारी जाए, सरकार ने नया तरीका निकाला—परीक्षा को ही आसान कर दो। अब सवाल इतने सरल होते हैं कि बच्चे बिना पढ़े भी 12वीं तक पास हो जाते हैं। लेकिन इस पास होने का क्या फायदा, जब नौकरी के लिए कोई स्किल ही नहीं है?


परीक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा है। कई राज्यों में पेपर लीक होने की घटनाएँ आम हो गई हैं। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने के बजाय, सरकार इसे विपक्ष की साजिश बता देती है। यह इतना शानदार तर्क है कि जनता चुप हो जाती है, क्योंकि सच्चाई जानने की हिम्मत अब बची ही नहीं। जिस गोरखपुर विश्वविद्यालय से खुद उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शिक्षा ग्रहण किये हैं वहां भी पेपर लीक का रिकार्ड बन चुका है। जिसपर हमनें पहले ही लिखा है।

अष्टम अध्याय
शिक्षा और रोजगार का टूटता तालमेल

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि रोजगार के लिए तैयार करना भी है। लेकिन इस महोत्सव में शिक्षा और रोजगार का तालमेल पूरी तरह टूट चुका है। लाखों युवा हर साल डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन नौकरियाँ नहीं हैं। सरकारी नौकरियों की भर्ती बंद है, और निजी क्षेत्र में केवल वही नौकरियाँ हैं, जो न्यूनतम वेतन पर आधारित हैं। एक सर्वे के अनुसार, 2024 में भारत में 30% से अधिक डिग्रीधारी युवा बेरोजगार थे।


यह बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या भी है। युवा निराश हो रहे हैं, और कई तो डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। लेकिन सरकार का जवाब क्या है? “मेक इन इंडिया” के तहत कुछ शुरू करो। लेकिन बिना पूँजी, बिना संसाधनों, और बिना समर्थन के यह “मेक इन इंडिया” केवल एक नारा बनकर रह गया है।

नवम अध्याय
सामाजिक असमानता का बढ़ता बोझ

शिक्षा का उध्वस्तीकरण केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, यह सामाजिक असमानता को भी बढ़ा रहा है। गरीब और अमीर के बीच की खाई पहले से कहीं ज्यादा गहरी हो गई है। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिला ले रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के बच्चे 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं। दलित, आदिवासी, और अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों के लिए शिक्षा अब एक सपना बन चुकी है।


आरक्षण की नीति इतनी गलत है जिसके लिए भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण व्यवस्था बनाया उन्हें न आरक्षण का लाभ मिला न मिलेगा बल्कि जाती आरक्षण के नाम पर जो सुविधा सम्पन्न हैं उन्हें ही आरक्षण का लाभ मिलते आ रहा है। मोदी ने गरीबी आरक्षण लाया हंसी आती है, जिनका आय आठ लाख सलाना वो उसके पात्र हैं यहां तो ऐसे अनेकों परिवार हैं।

जिनका आय 50 हजार भी नहीं है तो क्या उन्हें इस गरीबी आरक्षण का लाभ मिलेगा? हमारा उत्तर, बिल्कुल नहीं! कई संस्थानों में आरक्षित सीटें खाली रहती हैं, क्योंकि योग्य उम्मीदवारों को मौका ही नहीं दिया जाता। यह सब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, ताकि सामाजिक रूप से वंचित वास्तव में गरीब समुदायों को और पीछे धकेला जा सके।

Pornography and India

दशम अध्याय
भविष्य की तस्वीर

इस महान “शिक्षा उध्वस्तीकरण महोत्सव” का भविष्य क्या है? एक ऐसा भारत, जहां शिक्षा केवल अमीरों की बपौती होगी। एक ऐसा भारत, जहां सवाल पूछना अपराध होगा। एक ऐसा भारत, जहां इतिहास को फिर से लिखकर मिथकों को सत्य माना जाएगा। और एक ऐसा भारत, जहां युवा डिग्री लेकर सड़कों पर भटकेंगे, लेकिन नौकरी नहीं मिलेगी।


लेकिन चिंता न करें, क्योंकि सरकार के पास हर सवाल का जवाब है। अगर शिक्षा नहीं मिल रही, तो “आत्मनिर्भर” बनो। अगर नौकरी नहीं मिल रही, तो “मेक इन इंडिया” के तहत कुछ शुरू करो। और अगर कुछ समझ नहीं आ रहा, तो बस “जय श्री राम” बोलकर चुप हो जाओ। आखिर, यह “देश बेचो राज करो” का युग है, जहां सत्ता ही सर्वोपरि है।

देश बेचो राज करो: शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव।

देश बेचो राज करो – शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव
लेख का निष्कर्ष

यह लेख केवल एक व्यंग्य नहीं है, बल्कि एक कड़वी हकीकत का दर्पण है। शिक्षा का उध्वस्तीकरण कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है। यह रणनीति न केवल शिक्षा को नष्ट कर रही है, बल्कि भारत के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस महोत्सव को चुपचाप देखते रहेंगे? या फिर एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की माँग करेंगे, जो हर बच्चे को समान अवसर दे, जो स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित करे, और जो भारत को फिर से विश्व गुरु बनाए? जवाब आप पर निर्भर है।


“देश बेचो राज करो: शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव” एक तीखा, व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक विश्लेषण है जो भारत में शिक्षा के सुनियोजित पतन की परतें उघाड़ता है। यह लेख दिखाता है कि कैसे सरकारी नीतियाँ, निजीकरण की आंधी, सांप्रदायिकरण, डिजिटल दिखावा, और विचारों का दमन मिलकर भारत की आत्मा – उसकी शिक्षा – को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं।

शिक्षा अब केवल अमीरों की जागीर बनती जा रही है, जबकि गरीब और वंचित समुदायों के बच्चों का भविष्य हाशिये पर है। भाजपा सरकार ने तेल बेच दिया, रेल बेच दिया, बेच दिया हवाईअड्डा। बहुत कुछ बेचकर अब तेजी से शिक्षा को बेचने की पुरजोर कोशिश है, धीरे-धीरे भाजपा सबकुछ बेच देगी, कुछ ही सालों में। देश बेचो राज करो यह लेख न केवल वर्तमान शिक्षा नीति पर प्रश्न खड़ा करता है, बल्कि यह भी पूछता है— क्या हम देश की जनता केवल तमाशबीन बने रहेंगे या बदलाव की माँग करेंगे?

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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देश बेचो राज करो: शिक्षा का भव्य उध्वस्तीकरण महोत्सव, जानें सहभागी कौन 10 अध्याय

क्या वास्तव में होती हैं अप्सराएँ? mrigakshi apsara का रहस्य, शास्त्रीय परंपरा, तांत्रिक विमर्श और 1 आध्यात्मिक दृष्टि

क्या अप्सराएँ केवल पौराणिक कथा हैं या भारतीय शास्त्रों का गहन प्रतीक? Mrigakshi Apsara मृगाक्षी अप्सरा, वैदिक संदर्भ, शक्ति परंपरा और शोधपरक तंत्र-मंत्र साधना विधि-विधान के साथ विश्लेषण पढ़ें। पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा शिर्षक मृगाक्षी अप्सरा साधना महाग्रंथ mrigakshi apsara mantra सम्पूर्ण विधि-विधान सहित amozan पर eBook एवं प्रिंट बुक अल्प मूल्य 99 रूपये में … Read more
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बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग | काल भैरव मंत्र, पूजा विधि और उपाय

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग काल भैरव की पूजा विधि, मंत्र और उपाय भगवान बटुक भैरव की पूजा विधि, शक्तिशाली कार्य सिद्धि मंत्र, अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र, कवच पाठ और शत्रु नाशक प्रभावी उपाय जानिए। कालभैरवाष्टमी पर विशेष प्रयोग से असंभव कार्य सिद्ध होंगे और शत्रु परेशान करना छोड़ देंगे। भैरव कृपा प्राप्त … Read more
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श्री श्री कामाख्या अंबुबाची महाग्रंथ: देवी शक्ति, तंत्र, साधना और सनातन चेतना का 12 दिव्य रहस्य

श्री श्री कामाख्या अंबुबाची महाग्रंथ में देवी कामाख्या, अंबुबाची महापर्व, शक्ति पीठ, तंत्र, साधना, शिव-शक्ति दर्शन, सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का शोधपरक एवं विस्तृत अध्ययन। shri-shri-kamakhya-ambubachi-mahagranth इसे भी पढ़ें: तांत्रिकों की देवी लोना चमारिन की आपबीती इसे भी पढ़ें: गुरु गोरखनाथ का जन्म कब हुआ था — सम्पूर्ण जीवनी क्या आपने कभी सोचा है … Read more
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देवरिया 5 जून: पर्यावरण संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी— सभाकुंवर कुशवाहा

देवरिया 5 जून। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर स्थानीय तहसील क्षेत्र के ग्राम करही भुवन में भाजपा भाटपार रानी मंडल के द्वारा वृक्षारोपण एवं पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और हरित वातावरण को बढ़ावा देना था।इस अवसर पर दर्जनों पौधे लगाए … Read more
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Astro Physics, AI और Robotics की रहस्यमयी दुनिया: क्यों तेजी से बढ़ रहा है युवाओं में विज्ञान सीखने का 1 जुनून?

Astro Physics, AI और Robotics की रहस्यमयी दुनिया क्यों युवाओं को आकर्षित कर रही है? जानिए Black Hole, Space Science, Artificial Intelligence, Robots, Alien Life और भविष्य की तकनीकों का एक विस्तृत शैक्षणिक विश्लेषण। इसे भी पढ़ें: योनि के 64 प्रकार — कामशास्त्र दृष्टिकोण इसे भी पढ़ें: राजा रानी कूपन लॉटरी रिजल्ट — पूरी जानकारी … Read more
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देवरिया में आंगनबाड़ी नियुक्ति विवाद महिला ने डीएम से की निष्पक्ष जांच की मांग

देवरिया जिले के भागलपुर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम गहिला में आंगनबाड़ी कार्यकत्री की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। गांव की निवासी कमलावती सिंह ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया है कि वर्ष 2004 में उन्हें विधिवत चयनित किए जाने के बावजूद बाद में साजिश के तहत कुछ वर्ष बाद हटाकर दूसरी … Read more
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Kisan Sammelan Gwalior In Nidhi Singh: पूर्व ब्लैक कैट कमांडर्स ने 1 राम दरबार भेंट कर किया अभिनंदन

ग्वालियर में आयोजित कृषि सम्मेलन Kisan Sammelan Gwalior में पूर्व ब्लैक कैट कमांडर्स ने निधि सिंह को राम दरबार भेंट कर सम्मानित किया। निधि सिंह ने किसानों को प्राकृतिक खेती, सहकारिता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया। ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल संभाग में आयोजित एक भव्य सहकारिता कृषि सम्मेलन में देश-विदेश में अपनी उपलब्धियों और … Read more
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20 May Deoria: वेतन संकट से जूझ रहे स्वास्थ्य कर्मियों का फूटा गुस्सा, काली पट्टी बांधकर जताया विरोध — “जनता की सेवा करें या परिवार बचाएं?”

20 May Deoria। में एनएचएम कर्मियों, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सीएचओ और डॉक्टरों ने लंबित वेतन के विरोध में काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया। जानिए वेतन संकट, कर्मचारियों की मांग और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाले असर की पूरी रिपोर्ट। महीनों से लंबित वेतन ने स्वास्थ्य कर्मियों को आर्थिक और मानसिक संकट में धकेला।देवरिया में स्वास्थ्य … Read more
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NCF 2023 के संदर्भ में भाषा शिक्षण: गहन अध्ययन, कौशल और रचनात्मकता की तरफ

नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा 2023 (NCF 2023) ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव लाया है। भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि पुरानी रट्टू प्रणाली को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। हिंदी भाषा को अब ‘कोर्स A और B’ के स्थान पर … Read more

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