दिल की गहराइयों से: प्यार, दर्द और माफी की अनमोल यात्रा की 1 WONDERFUL कहानी

Amit Srivastav

जिंदगी कभी-कभी ऐसी मुलाकातें करवाती है, जो न सिर्फ दिल को छू लेती हैं, बल्कि हमें सिखाती हैं कि दिल की गहराइयों से प्यार, रिश्ते, और माफी ही जिंदगी का असल खजाना हैं। ये कहानी मेरी है, मेरे दिल की, जो दिल्ली से हैदराबाद की एक फ्लाइट में शुरू हुई और ऊटी की हरी-भरी वादियों में मेरे बिखरे हुए परिवार को फिर से जोड़ गई। ये प्यार, दर्द, स्वार्थ, और माफी की कहानी है, जो हर पल आँसुओं, हँसी, और गहरी भावनाओं से सराबोर है।

मेरा नाम है विहान, मेरी बेटी है अनिका, और मेरा बेटा है आदित्य—जिनकी जिंदगी दिल्ली की चमक, मुंबई की भागदौड़, और ऊटी की सुकून भरी हवाओं में बुनती, टूटती, और फिर से खिलती है। ये मेरी कहानी है, मेरे दिल से निकली, और हर शब्द में मेरी साँसें बसी हैं। आइए, इस कहानी में डूबें, जहाँ हर मोड़ पर भावनाएँ, प्यार, और रोमांच आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

दिल्ली से हैदराबाद की डायरेक्ट फ्लाइट में मैं, विहान, अपनी खिड़की वाली सीट पर बैठा था। बाहर बादल हल्के-हल्के तैर रहे थे, जैसे मेरे मन की उलझनों को सँभालने की कोशिश कर रहे हों। मैं अपनी बेटी अनिका से मिलने जा रहा था, जो हैदराबाद में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी। मेरे मन में एक अजीब-सा मिश्रण था—खुशी का, कि अपनी बेटी की मुस्कान फिर से देखूँगा, और एक गहरा दर्द, जो मेरे बेटे आदित्य की यादों से जुड़ा था।

आदित्य, मेरा लाड़ला, जिसकी हँसी मेरे घर की रौनक थी, जिसकी शरारतें मेरे दिल को सुकून देती थीं। लेकिन चार साल पहले उसकी एक गलती ने मेरे दिल को चूर-चूर कर दिया। उसका नाम लेते ही मेरे सीने में एक तेज़ टीस उठती थी, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से हरा हो गया हो। 


तभी मेरी बगल वाली सीट पर एक महिला आकर बैठी। उसकी शक्ल-सूरत में एक अनोखी गहराई थी—चश्मे के पीछे से झाँकती आँखें, सलीके से बंधे बाल, और एक ऐसी मुस्कान, जो अनजाने में दिल को गले लगा लेती थी। वो किसी कॉलेज की प्रोफेसर या सीनियर प्रोफेशनल लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ममता थी, जो किसी माँ की तरह मेरे टूटे दिल को सहलाने लगी। उसने मुझे देखकर मुस्कुराते हुए पूछा, “हैदराबाद जा रहे हो?”

मैंने मन ही मन सोचा, ये तो दिल्ली-हैदराबाद की डायरेक्ट फ्लाइट है, सवाल थोड़ा बेमानी है। मैंने जवाब नहीं दिया, बस हल्का-सा सिर हिलाकर खिड़की की ओर देखने लगा। मेरे चेहरे का भाव शायद उसे समझ आ गया, क्योंकि वो अपनी ही बात पर खिलखिलाकर हँसने लगी। उसकी हँसी में एक गर्मजोशी थी, जैसे वो इस दो घंटे की उड़ान में मेरे दर्द को बाँटना चाहती हो। 


मैंने उसकी तरफ गौर से देखा। उसकी उम्र शायद 50 के आसपास थी, लेकिन चेहरे पर एक ऐसी चमक थी, जो जिंदगी के तजुर्बों और एक माँ के बेपनाह प्यार की गवाही दे रही थी। उसने फिर से बात शुरू की, “बेटे से मिलने जा रहे हो?” मेरी उम्र—58 साल—शायद उसे ये सवाल पूछने की वजह दे रही थी। मेरे दिल में एक तेज़ टीस उठी।

मैं समझ गया कि उसे इस सफर में कंपनी चाहिए। मैंने धीरे से जवाब दिया, “नहीं, बेटी से।” उसकी आँखों में एक कोमल चमक थी, जैसे वो मेरे दर्द को भाँप रही हो। “और बेटा?” उसने सावधानी से पूछा। मेरे चेहरे पर एक गहरा साया तैर गया। “मुंबई में था,” मैंने काँपती आवाज़ में कहा। उसने तुरंत पकड़ लिया, “था का मतलब?” मेरी आवाज़ में एक कड़वाहट घुल गई। “था का मतलब… था।” 


उसकी भौंहें सिकुड़ीं, और उसने धीरे से पूछा, “क्या वो विदेश चला गया है?” मैंने कहा, “नहीं।” अब उसकी आँखों में उत्सुकता के साथ-साथ एक गहरी सहानुभूति थी। वो थोड़ा रुककर, गंभीर स्वर में बोली, “आई एम सॉरी… क्या वो अब इस दुनिया में नहीं है?” मेरे होंठों पर एक कड़वी मुस्कान तैर गई। “है, पर शायद नहीं है,” मैंने जवाब दिया। उसकी आँखों में हैरानी और दर्द का मिश्रण था। “क्या कोई एक्सिडेंट हुआ था?” उसने धीरे से पूछा। “नहीं,” मैंने कहा, “पर… शायद हाँ। वो एक हादसा ही था।” 


अब वो पूरी तरह से उलझन में थी। उसने मेरी तरफ झुककर, एक माँ की तरह कोमल स्वर में कहा, “विहान जी, मैं आपकी बात समझ नहीं पा रही हूँ। आप हाँ और ना दोनों बोल रहे हो। जरा खुलकर बताइए, क्या हुआ था? मैं आपका दर्द नहीं बढ़ाना चाहती, लेकिन शायद आपकी बात कहने से आपका मन हल्का हो।”

मैंने एक गहरी साँस ली। बाहर बादल अब घने हो रहे थे, और मेरे मन में चार साल पुरानी यादें लहरों की तरह उमड़ने लगीं। मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी नंदिनी का चेहरा तैर गया, जो हमेशा कहती थी, “विहान, हमारे बच्चे हमारी साँसें हैं। उनके बिना हम अधूरे हैं।” मैंने सोचा, शायद इस अनजान महिला को अपनी कहानी सुनाकर मेरा दिल हल्का हो जाए। 

दिल की गहराइयों से आदित्य की कहानी: सपनों का पीछा और प्यार का बवंडर – विहान

मैंने बताना शुरू किया। “मेरा बेटा, आदित्य, मेरी और मेरी पत्नी नंदिनी की जान था। वो हमारा लाड़ला था, हमारी हर साँस में बसा था। उसकी हँसी में एक जादू था, जो पूरे घर को रोशन कर देता था। उसकी शरारतें, उसकी बातें, उसकी छोटी-छोटी जिद—सब कुछ मेरे दिल में बस्ता था। रात को वो मेरे साथ बैठकर क्रिकेट देखता, मेरी बनाई खिचड़ी की तारीफ करता, और नंदिनी की तस्वीर के सामने बैठकर कहता, ‘मम्मी, मैं पापा का ख्याल रखूँगा।’ वो इंजीनियरिंग करने के बाद चार साल पहले मुंबई गया था।

उसे एक नामी कंपनी में जॉब मिली थी। मेहनती था, जिंदादिल था, और उसकी हर बात में एक सपना छिपा होता था। मुंबई की लोकल ट्रेनों में वो रोज आना-जाना करता। शुरू के कुछ महीने सब ठीक था। वो हर हफ्ते फोन करता, अपनी जिंदगी की छोटी-छोटी बातें बताता। कहता, ‘पापा, मुंबई की रफ्तार में मजा है। यहाँ हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है।’ मैं सुनता और सोचता, मेरा बेटा अपनी राह बना रहा है। उसकी आवाज़ में जो जोश था, वो मेरे दिल को सुकून देता था।” 


मैंने रुककर उस महिला की तरफ देखा। उसकी आँखें मेरी बातों में खोई थीं, जैसे वो मेरे दर्द को अपने दिल में जी रही हो। मैंने आगे कहा, “फिर एक दिन, लोकल ट्रेन में उसे एक लड़की मिली। पहले तो यूँ ही नजरें मिलीं। वो रोज़ उसी ट्रेन में मिलने लगी। धीरे-धीरे बातें शुरू हुईं। वो दोनों एक-दूसरे को समझने लगे। बातें दोस्ती में बदलीं, और दोस्ती धीरे-धीरे एक गहरे, बेपनाह प्यार में।

आदित्य ने मुझे एक दिन फोन पर बताया, ‘पापा, मुझे एक लड़की बहुत पसंद है। वो बहुत अच्छी है। उसकी हँसी में मम्मी की तरह जादू है।’ मैंने हँसकर कहा, ‘बेटा, अभी तो करियर बनाओ। प्यार-व्यार बाद में।’ लेकिन आदित्य का दिल उस लड़की के लिए धड़कने लगा था। मैंने सोचा, शायद ये जवानी का जोश है, समय के साथ ठीक हो जाएगा।” 


मेरी आवाज़ काँपने लगी। “फिर एक दिन, अचानक उसका फोन आया। उसने कहा, ‘पापा, मैंने शादी कर ली है। मैं अपनी ससुराल में शिफ्ट हो गया हूँ।’ मैं सुनकर सन्न रह गया। मेरे कानों में जैसे कुछ गूँजने लगा। न उसने बताया कि लड़की कौन है, न ससुराल में कौन-कौन है, न कहाँ है। बस इतना कहा, ‘पापा, मैं खुश हूँ।’ मैंने कुछ नहीं पूछा। शायद इसलिए कि मेरा दिल टूट चुका था। मेरे सामने नंदिनी का चेहरा तैर रहा था। अगर वो जिंदा होती, तो ये सुनकर फिर से मर जाती।” 


महिला की आँखें अब पूरी तरह नम थीं। उसने धीरे से पूछा, “आपकी पत्नी…?” मैंने एक गहरी साँस ली, जैसे उस सवाल ने मेरे सीने में दबा दर्द फिर से जगा दिया। “नंदिनी को छह साल पहले कैंसर ने हमसे छीन लिया। वो आदित्य और अनिका की जान थी। उसकी हर मुस्कान, हर बात, हर लम्हा हमारे लिए अनमोल था। उसकी कमी ने हमें तोड़ दिया, लेकिन मैंने और अनिका ने मिलकर आदित्य को माँ और बाप दोनों का प्यार दिया। उसे पढ़ाया, बड़ा किया, सपनों के पंख दिए। मैंने सोचा था, एक दिन वो मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। लेकिन क्या इसके लिए? कि वो एक दिन हमें बिना बताए, बिना पूछे, अपनी दुनिया बसा ले?” 


मेरी आवाज़ काँप रही थी। “क्या माँ-बाप बच्चों को इसलिए पढ़ाते हैं? क्या औलाद की कोई जिम्मेदारी नहीं होती? मैंने उसे आज़ादी दी, प्यार दिया, लेकिन उसने मेरे विश्वास को तोड़ दिया।” मैं रुक गया। मेरी आँखें नम थीं, और मेरे सामने नंदिनी का चेहरा तैर रहा था। वो हमेशा कहती थी, “विहान, हमारे बच्चे हमारी साँसें हैं। उनके बिना हम अधूरे हैं।” मैंने उस महिला की तरफ देखा। उसका चेहरा भी आँसुओं से भीगा था।


मेरी बात सुनकर वो महिला पूरी तरह भावुक हो गई। उसने काँपती आवाज़ में पूछा, “आपके बेटे का नाम… आदित्य था?” मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा। “हाँ, आदित्य। आप कैसे जानती हैं?” उसने जवाब देने के बजाय अपने पर्स से एक फोटो निकाली और मेरी तरफ बढ़ाई। “क्या ये आदित्य है?” मैंने फोटो देखी—मेरे आदित्य की हँसती हुई तस्वीर, उसी की शरारती मुस्कान, वही बेतकल्लुफ अंदाज़। वो एक खूबसूरत लड़की के साथ था, दोनों हँस रहे थे। पीछे ऊटी की हरी-भरी वादियाँ, नीलगिरी की पहाड़ियों का साया, और झील की चमक थी। मेरे हाथ काँपने लगे। “ये… ये फोटो तुम्हारे पास कहाँ से?” मैंने काँपती आवाज़ में पूछा।


उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। उसकी आँखों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं। वो बोली, “आदित्य बहुत अच्छा लड़का है। मेरी बेटी, काशवी, और आपका बेटा एक-दूसरे से बेपनाह प्यार करते थे। मैंने… मैंने इसका फायदा उठाया।” मैं अवाक् उसे देखता रहा। उसने अपनी बात जारी रखी, “मैंने अपनी बेटी की शादी के लिए घर-जमाई की शर्त रखी। आदित्य उसमें फँस गया। वो आपसे बात करना चाहता था, आपकी सहमति लेना चाहता था। उसने मुझे कई बार कहा, ‘मम्मी, मुझे पापा से बात करनी है। उनकी रजामंदी के बिना मैं शादी नहीं करूँगा।’ लेकिन मैंने उसे रोक दिया। मुझे डर था कि आप शादी से मना कर देंगे।”


उसके शब्द मेरे दिल को चीर रहे थे। “मेरे पति को गुज़रे छह साल हो गए। मेरी इकलौती बेटी, काशवी, ही मेरा सहारा थी। अगर वो भी शादी करके चली गई, तो मुंबई जैसे शहर में मैं अकेली कैसे रहती? मैंने अपने स्वार्थ के लिए ये सब किया। मैंने आदित्य को मजबूर किया कि वो बिना आपको बताए शादी कर ले। आपकी गुनहगार मैं हूँ, आदित्य नहीं।” उसकी आवाज़ में पछतावा था, और आँखों में इतनी शर्मिंदगी कि वो मेरी नजरों से नजरें नहीं मिला पा रही थी। 


मैं खामोश बैठा रहा। मेरा दिमाग जैसे सुन्न हो गया था। चार साल का गुस्सा, दर्द, और बेटे की बेवफाई का अहसास मेरे सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर रहा था। लेकिन साथ ही एक नया सच सामने था—मेरे बेटे ने मुझे नहीं छोड़ा था, उसे मजबूर किया गया था। मेरे सीने में एक तूफान सा उठ रहा था। मैं क्या कहूँ, क्या करूँ—कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी उसकी काँपती आवाज़ ने मेरे विचार तोड़े। “मैंने आपको आपके बेटे से दूर किया था। अब मैं ही उसे आपसे मिलवाऊँगी। हैदराबाद पहुँचते ही मैं आपको आदित्य से मिलवाऊँगी।” 


फ्लाइट लैंड हुई। हम दोनों ने अपना सामान लिया और लगेज बेल्ट की ओर बढ़े। वो, जिसने अपना नाम मालती बताया, लगातार फोन पर किसी से बात कर रही थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी हड़बड़ी थी, जैसे वो किसी बड़े काम को अंजाम देने की जल्दी में हो। मैं अपने विचारों में डूबा था। क्या आदित्य वाकई मुझसे मिलना चाहेगा? क्या मैं उसे माफ कर पाऊँगा? क्या वो अब भी मेरा वही आदित्य है, जो रात को मेरे साथ बैठकर क्रिकेट देखता था, मेरी बनाई खिचड़ी की तारीफ करता था, और नंदिनी की तस्वीर के सामने बैठकर कहता था, “मम्मी, मैं पापा का ख्याल रखूँगा”? 


एयरपोर्ट के बाहर निकलते ही मैंने देखा—सामने आदित्य खड़ा था। वही चेहरा, वही आँखें, लेकिन अब उनमें एक गहरी उदासी और पछतावा था। उसके बगल में एक खूबसूरत युवती थी, जिसके चेहरे पर घबराहट और उम्मीद दोनों झलक रही थी। वो थी काशवी, मेरी बहू। आदित्य मुझे देखते ही मेरे पैरों से लिपट गया। “पापा, मुझे माफ कर दो! मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है। मैं आपसे बात करना चाहता था, लेकिन मैं डर गया। मैंने आपको और मम्मी को धोखा दिया। आप जो सजा देंगे, मुझे मंजूर है।” उसकी आवाज़ काँप रही थी, और आँखों से आँसुओं की धाराएँ बह रही थीं। 


मेरा दिल पिघल गया। मैंने उसे उठाया और गले से लगा लिया। बाप का दिल आखिर बाप का दिल होता है। उसकी गर्मजोशी, उसकी साँसें, और उसका स्पर्श—सब कुछ वही था, जो चार साल पहले था। मेरी आँखें भी नम थीं। मैंने मालती की तरफ देखा। वो मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी मुस्कान में अब जीत नहीं, बल्कि राहत थी। वो जानती थी कि उसने एक परिवार को फिर से जोड़ दिया। तभी आदित्य बोला, “पापा, ये आपकी बहू, काशवी है। चलो, घर चलते हैं। बाकी बातें घर पर करेंगे।” 


काशवी ने झिझकते हुए मेरे पैर छुए। मैंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा, “बेटी, तुम्हें देखकर लगता है, आदित्य ने सही इंसान चुना।” काशवी की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे से कहा, “पापा, मैंने आदित्य को आपसे बात करने के लिए बहुत कहा, लेकिन…” मैंने उसका कंधा थपथपाया। “बेटी, अब सब ठीक है।” हम सब कार में बैठे, और आदित्य ने कार चलानी शुरू की। मैंने कहा, “कार जुबली हिल्स ले चलो। अपनी बहन अनिका से नहीं मिलेगा?” आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “पापा, पहले ऊटी चलते हैं। वहाँ कुछ खास है, जो मैं आपको दिखाना चाहता हूँ।” 

दिल की गहराइयों से: प्यार, दर्द और माफी की अनमोल यात्रा

ऊटी की वादियाँ: प्यार और माफी की नई शुरुआत विहान की जुबानी

कार हैदराबाद से ऊटी की ओर बढ़ रही थी। ऊटी की हरी-भरी वादियाँ, नीलगिरी की पहाड़ियों का साया, झीलों की चमक, और ठंडी हवाएँ मेरे मन को सुकून दे रही थीं। रास्ते में आदित्य ने बताया कि उसने और काशवी ने ऊटी में एक छोटा-सा कॉटेज लिया है, जहाँ वो दोनों छुट्टियों में समय बिताते हैं। “पापा, ये वही जगह है, जहाँ मैंने काशवी को प्रपोज़ किया था,” उसने शरमाते हुए कहा। काशवी ने हँसकर उसका हाथ थामा, और मैंने देखा—उनके बीच का प्यार सच्चा था, गहरा था।


कॉटेज में पहुँचकर मैंने देखा, दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी—मेरी, नंदिनी की, और आदित्य-अनिका की। उस तस्वीर को देखकर मेरी आँखें भर आईं। आदित्य ने कहा, “पापा, मैंने आपको कभी नहीं भुलाया। हर दिन मम्मी की तस्वीर को देखता हूँ और सोचता हूँ, वो मुझसे कितना नाराज़ होंगी। मैंने उनके सपनों को तोड़ा। लेकिन मैं आपसे वादा करता हूँ, अब मैं आपको कभी नहीं छोड़ूँगा।” मैंने उसका हाथ थामा और कहा, “बेटा, प्यार में गलतियाँ हो जाती हैं। लेकिन जो अपनी गलती मान ले, वो असल में बड़ा इंसान होता है। नंदिनी जहाँ कहीं है, वो तुम्हें माफ कर चुकी होगी।”


मालती चुपचाप खड़ी थी। मैंने उससे कहा, “मालती जी, आपने गलती की, लेकिन उसे सुधारने का हौसला भी दिखाया। मैं आपका शुक्रिया अदा करता हूँ।” मालती की आँखें फिर नम हो गईं। “विहान जी, मैंने अपने अकेलेपन के डर में एक परिवार को तोड़ा। लेकिन आज मैं खुश हूँ कि आपका परिवार फिर से एक हो गया।” काशवी ने अपनी माँ का हाथ थामा, और उस पल में मैंने देखा—प्यार और माफी ने हमें फिर से एक कर दिया। 


रात को, ऊटी की झील के किनारे, हम सब बैठे। आसमान में तारे चमक रहे थे, और ठंडी हवा नंदिनी की मौजूदगी का अहसास दिला रही थी। आदित्य ने कहा, “पापा, मैं चाहता हूँ कि अनिका भी यहाँ आए। हम सब फिर से एक परिवार की तरह रहें।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, अनिका को फोन करो। वो अपनी गलतफहमी भूल जाएगी।” 

सवालों का जवाब: प्यार ही असल जीत है – विहान

वापस हैदराबाद लौटते वक्त मेरा मन सवालों से भरा था। क्या मैंने, एक पिता के रूप में, आदित्य की परवरिश में कोई कमी छोड़ी? क्या नंदिनी की कमी ने उसे इतना कमजोर बना दिया कि वो अपने प्यार में बह गया? या फिर मालती ने अपने स्वार्थ के लिए एक परिवार को तोड़ने की साजिश रची? लेकिन ऊटी की ठंडी हवाओं ने मुझे जवाब दे दिया—गुनहगार कोई नहीं था। हर इंसान अपनी परिस्थितियों का गुलाम होता है। मालती ने अपने अकेलेपन के डर में गलती की। आदित्य ने अपने प्यार को बचाने के लिए गलत रास्ता चुना। और मैं, शायद मैंने अपने दुख में आदित्य को समझने की कोशिश ही नहीं की। 


हार्वर्ड की 80 साल की लॉन्गिट्यूडिनल स्टडी ऑन हैप्पीनेस बताती है कि जिंदगी की असल खुशी रिश्तों में होती है। साइकोलॉजी टुडे की एक स्टडी कहती है कि माफी न केवल रिश्तों को जोड़ती है, बल्कि हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर करती है। न्यूरोसाइंस रिसर्च बताता है कि जब हम किसी अपने को गले लगाते हैं, तो हमारा दिमाग ऑक्सीटोसिन रिलीज करता है, जो तनाव कम करता है। और जापान का “इकिगाई” दर्शन सिखाता है कि जिंदगी का मकसद उन छोटे-छोटे पलों में है, जो हमें सुकून देते हैं। 

Click on the link गौतम ऋषि पत्नी अहिल्या देवराज इंद्र और श्री रामचन्द्र जी से जुड़ी एक अलौकिक पौराणिक कथा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


ऊटी की झील के किनारे, जब मैंने आदित्य और काशवी को हँसते हुए देखा, मुझे लगा—यही मेरी जिंदगी का इकिगाई है। अनिका जब अपने भाई से मिलेगी, तो उसकी आँखों की चमक मेरे सारे दुख धो देगी। और नंदिनी, जहाँ कहीं होगी, वो मुस्कुरा रही होगी। 
“जिंदगी प्यार की किताब है। हर पन्ना आँसुओं, माफी, और हँसी से सजा है। इसे रिश्तों के रंगों से और खूबसूरत बनाओ।”

लेखक— विहान श्रीवास्तव
प्रकाशन: amitsrivastav.in
ये कहानी सिर्फ एक पिता और बेटे की मुलाकात की कहानी नहीं है। ये उन अनकहे दर्द, अनसुलझे सवालों, और अनमोल रिश्तों की कहानी है, जो हर परिवार में कहीं न कहीं छिपे होते हैं। क्या विहान और आदित्य का रिश्ता पहले जैसा हो पाएगा? क्या अनिका अपने भाई को माफ कर पाएगी? और क्या मालती का पछतावा उसे अपने अतीत के बोझ से मुक्त कर पाएगा? इन सवालों के जवाब जानने के लिए, इस कहानी के अगले हिस्से का इंतज़ार करें, जहाँ ऊटी की वादियों में एक नया मोड़, नई भावनाएँ, और नया प्यार आपका इंतज़ार कर रहा है।

अपने विचारों को कमेंट बॉक्स मे लिखकर हमें बताएं फिर आगे का भाग बहुत जल्द आप पाठकों को समर्पित होगा।
संपादक —अमित श्रीवास्तव
वेबसाइट amitsrivastav.in

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