20 May Deoria: वेतन संकट से जूझ रहे स्वास्थ्य कर्मियों का फूटा गुस्सा, काली पट्टी बांधकर जताया विरोध — “जनता की सेवा करें या परिवार बचाएं?”

Amit Srivastav

20 May Deoria। में एनएचएम कर्मियों, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सीएचओ और डॉक्टरों ने लंबित वेतन के विरोध में काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया। जानिए वेतन संकट, कर्मचारियों की मांग और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाले असर की पूरी रिपोर्ट।

महीनों से लंबित वेतन ने स्वास्थ्य कर्मियों को आर्थिक और मानसिक संकट में धकेला।
देवरिया में स्वास्थ्य कर्मियों का फूटा गुस्सा: महीनों से वेतन नहीं, काली पट्टी बांधकर किया विरोध प्रदर्शन।

20 May Deoria में वेतन संकट से जूझ रहे स्वास्थ्य कर्मियों का फूटा गुस्सा, काली पट्टी बांधकर जताया विरोध — “जनता की सेवा करें या परिवार बचाएं?”


20 May Deoria में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के बीच वेतन भुगतान को लेकर बढ़ता असंतोष अब खुलकर सड़कों तक पहुंच गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत कार्यरत कर्मचारियों, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ), संविदा डॉक्टरों, एएनएम और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों ने काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की। कर्मचारियों का कहना है कि वे लगातार गांव-गांव जाकर लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं देने का कार्य कर रहे हैं,

लेकिन विडंबना यह है कि जिन लोगों के कंधों पर पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जिम्मेदारी टिकी हुई है, वही आज अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। कई महीनों से वेतन लंबित होने के कारण कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है और अब हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कई कर्मियों को कर्ज लेकर घर चलाना पड़ रहा है। विरोध कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि सरकार स्वास्थ्य योजनाओं का प्रचार तो बड़े स्तर पर करती है, लेकिन उन्हीं योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने वाले कर्मचारियों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा।


गांव-गांव जाकर स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले कर्मचारी खुद संकट में
स्वास्थ्य कर्मियों ने बताया कि वे केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर जाकर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का काम करते हैं। टीकाकरण अभियान, गर्भवती महिलाओं की जांच, नवजात बच्चों की देखभाल, संचारी रोग नियंत्रण अभियान, पोषण कार्यक्रम, परिवार नियोजन जागरूकता, डेंगू-मलेरिया सर्वे, आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने का दायित्व इन्हीं कर्मचारियों के कंधों पर होता है। कई बार तेज धूप, बारिश, बाढ़, खराब सड़कें और संसाधनों की कमी के बावजूद स्वास्थ्य कर्मचारी अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं।

कोविड महामारी के दौरान भी इन्हीं कर्मचारियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की सेवा की थी। लेकिन आज वही कर्मचारी समय पर वेतन न मिलने के कारण अपमान और उपेक्षा महसूस कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार हर बार स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होने का दावा करती है, लेकिन यदि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को उनका मेहनताना ही समय पर नहीं मिलेगा तो स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती केवल भाषणों और विज्ञापनों तक सीमित रह जाएगी।


बच्चों की फीस, घर का किराया और दवाइयों तक के लिए परेशान कर्मचारी—
विरोध प्रदर्शन में शामिल कई कर्मचारियों ने अपनी व्यक्तिगत परेशानियां भी साझा कीं। उनका कहना है कि पहले से ही सीमित वेतन में परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था, लेकिन अब लगातार वेतन रुकने से हालात और खराब हो गए हैं। कई कर्मचारियों के बच्चों की स्कूल फीस बकाया हो चुकी है, घर का किराया समय पर नहीं दिया जा पा रहा है और बैंक की ईएमआई भरने में भी दिक्कतें आ रही हैं।

कुछ महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बताया कि उन्हें घर खर्च चलाने के लिए रिश्तेदारों और परिचितों से उधार लेना पड़ रहा है। कई कर्मचारियों ने यह भी कहा कि वे खुद स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत हैं, लेकिन अपने परिवार के इलाज और दवाइयों की व्यवस्था करने में असमर्थ हो रहे हैं। कर्मचारियों के अनुसार मानसिक तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और इसका असर उनके पारिवारिक जीवन पर भी पड़ रहा है। उनका कहना है कि जब व्यक्ति आर्थिक संकट और मानसिक दबाव में होगा तो वह पूरी ऊर्जा और एकाग्रता के साथ जनता को सेवाएं कैसे दे पाएगा।


“बजट नहीं है” कहकर टाला जा रहा मामला, कर्मचारियों में बढ़ रही नाराजगी—
स्वास्थ्य कर्मियों का आरोप है कि उन्होंने कई बार विभागीय अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के माध्यम से अपनी समस्याएं शासन तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन हर बार “बजट की कमी” का हवाला देकर मामले को टाल दिया गया। कर्मचारियों का कहना है कि यह स्थिति नई नहीं है बल्कि लंबे समय से लगातार दोहराई जा रही है। कई कर्मियों ने सवाल उठाया कि जब सरकार नई योजनाओं, प्रचार अभियानों और बड़े आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर सकती है, तो फिर स्वास्थ्य कर्मचारियों के वेतन के लिए बजट की कमी कैसे हो सकती है।

कर्मचारियों का आरोप है कि शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर संवेदनशीलता की कमी दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की पूरी व्यवस्था इन्हीं कर्मचारियों की मेहनत पर चलती है, लेकिन उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। इससे कर्मचारियों के बीच आक्रोश के साथ-साथ असुरक्षा की भावना भी बढ़ती जा रही है।


पूर्व सरकारों से तुलना कर उठे सवाल, “तब समय पर मिलता था वेतन”
प्रदर्शन कर रहे कई कर्मचारियों ने पूर्व की सरकारों का जिक्र करते हुए कहा कि पहले वेतन भुगतान में इतनी अनियमितता नहीं होती थी। उनका कहना है कि समय पर वेतन मिलने से कर्मचारी आर्थिक रूप से स्थिर रहते थे और बिना किसी मानसिक तनाव के काम कर पाते थे। अब स्थिति यह हो गई है कि कर्मचारी हर महीने वेतन आने का इंतजार करते रहते हैं और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रहती है।

कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में कर्मचारियों पर काम का दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा है, लेकिन सुविधाओं और आर्थिक सुरक्षा के नाम पर उन्हें केवल आश्वासन दिए जा रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि लगातार तनाव और असंतोष के बीच किसी भी कर्मचारी से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।


स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं ये कर्मचारी
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे मजबूत आधार जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मचारी ही हैं। आशा कार्यकर्ता, एएनएम, सीएचओ, एनएचएम कर्मी और संविदा डॉक्टर ही वह वर्ग है जो सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं को गांवों और कस्बों तक पहुंचाता है। मातृ मृत्यु दर कम करने से लेकर टीकाकरण अभियान सफल बनाने तक, हर स्तर पर इन कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

कोविड-19 महामारी के दौरान जब लोग अपने घरों से बाहर निकलने से डर रहे थे, तब यही स्वास्थ्य कर्मचारी गांव-गांव जाकर सर्वे कर रहे थे, मरीजों की जांच कर रहे थे और लोगों को जागरूक कर रहे थे। ऐसे कर्मचारियों को समय पर वेतन न मिलना केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए चेतावनी माना जा रहा है। यदि कर्मचारियों का मनोबल टूटेगा तो इसका सीधा असर जनता को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा।

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सरकार से जल्द भुगतान और स्थायी समाधान की मांग
विरोध कर रहे कर्मचारियों ने सरकार से मांग की है कि स्वास्थ्य विभाग के सभी लंबित वेतन का तत्काल भुगतान सुनिश्चित किया जाए और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाए। कर्मचारियों का कहना है कि वे आंदोलन या विरोध नहीं करना चाहते, बल्कि सम्मान और समय पर मेहनताना चाहते हैं ताकि बिना किसी मानसिक तनाव के जनता की सेवा कर सकें।

कर्मचारियों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जा सकता है। फिलहाल देवरिया में शुरू हुआ यह विरोध अब स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और कर्मचारियों की स्थिति पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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