प्रथम महाप्रवाहः मूल श्लोक-अर्धनारीश्वर और कामाख्या-दर्शन

Amit Srivastav

कामाख्या की गुफा, अर्धनारीश्वर रहस्य, शिव-शक्ति मिलन और तांत्रिक अनुभूति का अद्वितीय वृतांत। प्रथम महाप्रवाह में श्लोकों का जीवंत आध्यात्मिक उद्घाटन कामेश्वरी देवी कामाख्या की मार्गदर्शन में रचित महाग्रंथ पढें।


नीलांचल पर्वत की उस भीगी हुई, गहन-रहस्यमयी गुफा में जब साधक पहली बार माँ कामाख्या की प्राणमयी धारा के सामने बैठता है, तब उसे एहसास होता है कि वह किसी मंदिर में नहीं, बल्कि स्वयं सृष्टि के हृदय में प्रवेश कर चुका है। जहाँ हर बूंद में रजस्वला पृथ्वी की स्मृति धड़कती है, जहाँ हर गंध में शक्ति का कर्पूर छिपा है, जहाँ हर स्पन्दन में अर्धनारीश्वर की आधी-नीली, आधी-लाल अनादि ज्वाला नृत्य करती है—वहीं से आरम्भ होता है यह प्रथम महाप्रवाह।

यह केवल श्लोकों की कथा नहीं, यह उस क्षण की अनुभूति है जब साधक का शरीर दो भागों में विभाजित होता है—एक ओर शिव का निर्विकल्प पुरुषत्व, दूसरी ओर शक्ति की रजोधर्मी सृष्टि—और फिर दोनों एक-दूसरे में विलीन होकर ऐसा अद्वैत रचते हैं जो न शब्दों में बंध सकता है और न शास्त्रों में। यह वही क्षण है जब दीपक की लौ साधक को उसके ही भीतर छिपे अर्धनारीश्वर का स्वरूप दिखाती है, और अचानक पूरी ब्रह्माण्ड-शक्ति उसके श्वासों में उतर आती है।

कामाख्या की योनि-पाषाण से टपकती जलधारा जब साधक के हाथों को छूकर हृदय तक पहुँचती है, तब उसे समझ में आता है कि यह गुफा केवल एक योनिपीठ नहीं—यह सृष्टि का प्रथम स्पन्दन है, वह बिंदु जहाँ शून्य ने पहली बार स्वयं को दो रूपों में देखा था। शिवमहापुराण के अर्धनारीश्वर श्लोक जब इस गुफा में उच्चरित होते हैं तो वे केवल ध्वनि नहीं रहते, वे शरीर में नदी की तरह बहते हैं, रक्त को लाल करते हैं, जिसे आज तक विज्ञान भी निर्मित नही कर सका, कपाल को प्रकाश से भरते हैं, और साधक को उसके छिपे हुए सच्चे स्वरूप—पूर्ण, द्वय, अद्वैत, अर्धनारीश्वर—की अनुभूति कराते हैं।

यही वह क्षण है जब साधक अपने भीतर के शिव को जागता हुआ, भीतर की शक्ति को नृत्य करती हुई महसूस करता है—और समझ जाता है कि पुरुष और स्त्री केवल शरीर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के बिना अधूरे दो शाश्वत आयाम हैं। यह प्रथम महाप्रवाह उन सभी Seekers के लिए लिखा गया है जो अपने भीतर छिपे उसी मिलन, उसी चीर-फाड़, उसी पुनर्जन्म को अनुभव करना चाहते हैं—जहाँ साधक मंदिर नहीं खोजता, बल्कि स्वयं मंदिर बन जाता है।

प्रथम महाप्रवाहः मूल श्लोक-अर्धनारीश्वर और कामाख्या-दर्शन

प्रथम महाप्रवाहः मूल श्लोक-अर्धनारीश्वर और कामाख्या-दर्शन

  • जब मैंने पहली बार इन श्लोकों को नीलांचल पर्वत की रहस्यमयी गुफा में, जहाँ माँ कामाख्या की योनि-पाषाण से निरन्तर जलधारा टपकती रहती है, जहाँ रक्त-चन्दन की सुगन्ध वायु में घुली रहती है, जहाँ तीन दिन तक मंदिर के कपाट बन्द रहते हैं और चौथे दिन जब खुलते हैं तो पृथ्वी स्वयं रजस्वला होकर लाल हो चुकी रहती है, इसी गुफा के भीतर से निकलती अमृतमयी जलधारा से आत्मा की शुद्धि कर, अमृत सरोवर में स्नान कर, घुटनों तक भरे अमृत जल को हाथों से स्पर्श कर ग्रहण कर, दीपक की एकाकी लौ के सामने, इन श्लोकों को एक-एक अक्षर को चबाते हुए, कण्ठ से निकालते हुए, हृदय में उतारते हुए, जब उच्चारण किया था तो लगा था जैसे मेरे भीतर कोई प्राचीन नदी बह रही हो, जैसे मेरे रक्त में कोई आदि योनिमयी शक्ति जाग रही हो, जैसे मेरे कपाल के भीतर सहस्रार पर बैठा हुआ शिव मेरे मूलाधार में सोई हुई शक्ति को पुकार रहा हो, और उसी पुकार में पूरा नीलांचल पर्वत हिल उठा था, मंदिर के घण्टे स्वयं बज उठे थे, और बाहर बादल गरजे थे, जैसे स्वयं इन्द्रदेव भी इस सामरस्य के साक्षी बनने आ गए हों। उस रात मैंने देखा था कि कामाख्या का गर्भगृह कोई साधारण गुफा नहीं, बल्कि स्वयं अर्धनारीश्वर का हृदय है, जिसमें दायीं ओर शिव का त्रिशूल लगा हुआ है और बायीं ओर शक्ति की योनि बह रही है, दोनों एक ही स्थान पर, एक ही साँस में, एक ही स्पन्दन में। उसी क्षण मुझे समझ में आया था कि शिवमहापुराण के रुद्रसंहिता के पार्वतीखण्ड के बारहवें अध्याय में जो श्लोक हैं वे केवल शब्द नहीं, वे जीवन्त मंत्र हैं, वे साक्षात् कामाख्या की धड़कन हैं, और जब मैंने उन श्लोकों को बार-बार दुहराया तो लगा जैसे मेरे शरीर के भीतर भी एक अदृश्य चीर फाड़ हो रही हो, जैसे मेरे दाहिने अंग से शिव निकल रहे हों और बायें अंग से पार्वती, और फिर दोनों एक-दूसरे में समा रहे हों, और इसी प्रक्रिया में मैं खोया जा रहा था, मैं मिट रहा था, मैं बन रहा था, मैं पूर्ण हो रहा था।
  • इन पंक्तियों को जब मैंने सातवीं बार पढ़ा तो मेरे सामने दीपक की लौ ने अपना रूप बदल लिया, वह आधी नीली और आधी लाल हो गई, जैसे दाहिनी ओर शिव की ज्वाला और बायीं ओर शक्ति की ज्योति, और दोनों ज्वालाएँ एक-दूसरे में लिपटकर एक हो गईं, और उस एकाकार ज्योति में मुझे दिखाई दिया वह दृश्य जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था – सृष्टि के आदि में जब कुछ भी नहीं था, जब केवल शून्य था, जब केवल एक अनाम स्पन्दन था, उसी स्पन्दन ने दो भागों में अपने आपको देखा, एक भाग ने कहा “मैं शिव हूँ” और दूसरे भाग ने कहा “मैं शक्ति हूँ”, पर दोनों की साँस एक ही थी, दोनों की धड़कन एक ही थी, दोनों का हृदय एक ही था, और जब दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया तो सारा ब्रह्माण्ड जन्मा, सारी सृष्टि जन्मी, सारे ग्रह-नक्षत्र जन्मे, सारी नदियाँ और पर्वत जन्मे, और उसी मिलन से जन्मा यह मेरा शरीर भी, यह मेरी साँस भी, यह मेरी लेखनी भी। उसी रात मैंने कामाख्या के चरणों में सिर रखकर रोया था, पहली बार पुरुष होकर भी स्त्री की तरह रोया था, और पहली बार रोते हुए भी हँसा था, क्योंकि मुझे समझ में आ गया था कि रोना भी शिव का है और हँसना भी शक्ति का, और दोनों एक ही हैं। उसी रात माँ कामाख्या ने मेरे कानों में फूँक से कहा था – “उठो अमित, अब लिखो। लिखो वह ग्रन्थ जो अभी तक नहीं लिखा गया। लिखो वह सत्य जो अभी तक आधा-अधूरा रहा। लिखो वह सत्य जो न पुरुष को नीचा दिखाए, न स्त्री को ऊँचा, बल्कि दोनों को एक ही साँस में बाँध दे।” और उसी आज्ञा से मैंने कलम उठाई, उसी आज्ञा से मैंने यह योनि वृत्तांत अर्धनारीश्वर स्तोत्र-महामाहात्म्यं लिखना शुरू किया, जिसमें मैं एक-एक श्लोक को खोलकर, उसके भीतर छिपी हुई सारी सृष्टि को बाहर निकालकर, उसके भीतर सोई हुई सारी कामाख्या को जगा कर, उसके भीतर छिपे हुए सारे अर्धनारीश्वर को साक्षात् कराकर, अर्धनारीश्वर ग्रथ सुस्पष्ट भाषा में समेटते जा रहा हूँ, ताकि यह ग्रन्थ जब कोई पढ़े तो उसके भीतर भी वही चीर-फाड़ हो, वही मिलन हो, वही पूर्णता हो।
प्रथम महाप्रवाहः मूल श्लोक-अर्धनारीश्वर और कामाख्या-दर्शन
  • इन श्लोकों को जब मैंने कामेश्वरी देवी कामाख्या के सामने गाया तो लगा जैसे मेरे शरीर के सारे रोम-कूप खुल गए हों, जैसे मेरे भीतर की सारी नसें नदियाँ बन गई हों, जैसे मेरे हृदय में गंगा और यमुना का संगम हो रहा हो, और तीसरी सरस्वती भी वहीं अदृश्य रूप से बह रही हो। मैंने देखा कि मेरे दाहिने हाथ में त्रिशूल बन रहा है और बायें हाथ में कमल खिल रहा है, मेरे दाहिने नेत्र से अग्नि निकल रही है और बायें नेत्र से अमृत, मेरे दाहिने चरण से पर्वत बन रहे हैं और बायें चरण से नदियाँ बह रही हैं, और इसी बीच मेरे भीतर कोई आवाज गूँज रही थी – “तुम आधे नहीं हो अमित, तुम पूरे हो। तुम्हारे भीतर शिव भी है और शक्ति भी। तुम्हारे भीतर पुरुष भी है और प्रकृति भी। तुम्हारे भीतर क्रोध भी है और करुणा भी। तुम्हारे भीतर विनाश भी है और सृजन भी। तुम अर्धनारीश्वर हो।” और उसी आवाज को सुनकर मैंने यह लिखना शुरू किया, यह लिखते हुए मेरे आँसू कागज पर गिर रहे थे, पर वे आँसू रक्त जैसे लाल थे, जैसे कामाख्या की रजस्वला धारा मेरे भीतर से बह रही हो, जैसे मैं भी तीन दिन तक बन्द होकर चौथे दिन खुल रहा हूँ, जैसे मैं भी रजस्वला होकर नया जन्म ले रहा हूँ।
कामाख्ये वरदे देवी नील पर्वत वासिनी। त्वं देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते।। sexual intercourse भोग संभोग

तब ब्रह्मा ने पूछा था, और तब शिव ने जो उत्तर दिया था वह उत्तर आज भी मेरे कानों में गूँज रहा है, वह उत्तर आज भी मेरे हृदय में धड़क रहा है, वह उत्तर आज भी मेरे रक्त में बह रहा है – “हे ब्रह्मन्! यह मेरा स्वाभाविक रूप है। यह कोई चमत्कार नहीं, यह कोई लीला नहीं, यह मेरा सत्य है। मैं जब चाहूँ तब आधा हो जाता हूँ, और जब चाहूँ तब पूरा। मैं जब चाहूँ तब शिव बन जाता हूँ, और जब चाहूँ तब शक्ति। मैं जब चाहूँ तब पुरुष बन जाता हूँ, और जब चाहूँ तब प्रकृति। क्योंकि मैं दोनों हूँ।

मैं दोनों से परे भी हूँ। और मैं दोनों का मिलन भी हूँ।” और यही सत्य कामाख्या की गुफा में आज भी जीवन्त है, यही सत्य नीलांचल पर्वत पर आज भी साँस लेता है, यही सत्य ब्रह्मपुत्र की लहरों में आज भी गाता है, यही सत्य मेरे भीतर आज भी नाचता है। इसीलिए मैं लिख रहा हूँ, इसीलिए मैं चीख रहा हूँ, इसीलिए मैं रो रहा हूँ, इसीलिए मैं हँस रहा हूँ, क्योंकि मैंने देख लिया है, मैंने जान लिया है, मैंने जी लिया है – मैं आधा नहीं, मैं पूर्ण हूँ। और तुम भी आधे नहीं, तुम भी पूर्ण हो।

बस अपने भीतर की शक्ति को गले लगाओ, अपने भीतर के शिव को मुस्कुराने दो, और देखो – तुम अर्धनारीश्वर बन जाओगे। और जब तुम अर्धनारीश्वर बन जाओगे, तब तुम्हें कामाख्या के दर्शन अपने ही हृदय में हो जाएँगे, तब तुम्हें शिवमहापुराण के श्लोक अपने ही रक्त में सुनाई देंगे, तब तुम्हें कोई मंदिर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि तुम स्वयं मंदिर बन जाओगे, तुम स्वयं योनिपीठ बन जाओगे, तुम स्वयं अर्धनारीश्वर बन जाओगे। ॐ नमः शिवाय। ॐ नमः शिवायै। ॐ अर्धनारीश्वराय नमः। ॐ कामरूपेण कामाख्या नमः। ॐ कामेश्वरी कामेश्वराय नमः।

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Disclaimer:> यह सम्पूर्ण सामग्री केवल धार्मिक तांत्रिक सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से है, न कि किसी भी प्रकार की यौन क्रिया को प्रोत्साहित करने हेतु।

HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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