स्त्री मनोविज्ञान, प्रेम, देह और यौनिकता के माध्यम से स्त्री चेतना की गहराइयों में प्रवेश—‘स्त्री एक विषय नहीं, एक अनंत पाठ है’ भाग–2 में मिलेगा Teble of contents से आगे विस्तृत जानकारी। क्रमशः पढ़ते रहें सीरीज़ और सम्बंधित लेख जो दुर्लभ जानकारी को सार्वजनिक करता है।
Table of Contents

स्त्री एक विषय नहीं, एक अनंत पाठ (भाग–2)
प्रस्तावना: जहां दर्शन देह से मिलता है
पहले भाग में हमने स्त्री को धर्म, दर्शन, वेद, उपनिषद, पुराण और तंत्र के आलोक में समझने का प्रयास किया था। इस दूसरे भाग में हम उस भूमि पर प्रवेश कर रहे हैं जहां दर्शन केवल ग्रंथ नहीं रहता, बल्कि मन, देह, प्रेम और यौनिकता के माध्यम से जीवित अनुभव बन जाता है।
स्त्री चेतना को समझने में पुरुष का सबसे बड़ा भ्रम यही रहा है कि वह स्त्री को या तो देह तक सीमित कर देता है या केवल मन तक। लेकिन स्त्री इन दोनों से कहीं आगे है—वह देह में भी चेतना है और चेतना में भी देह। यही कारण है कि मनोविज्ञान, प्रेम और यौनिकता के क्षेत्र में स्त्री को समझने की कोशिशें बार-बार अधूरी रह जाती हैं।
मनोविज्ञान और स्त्री:
1. पुरुष सिद्धांतों की अधूरी भाषा
आधुनिक मनोविज्ञान का विकास मूलतः पुरुष अनुभवों के आधार पर हुआ। सिग्मंड फ्रायड, एडलर, एरिक एरिकसन—इन सभी के सिद्धांतों में स्त्री को या तो कमी (lack) के रूप में देखा गया या पुरुष मानकों से मापा गया। फ्रायड की प्रसिद्ध पंक्ति कि “स्त्री एक रहस्य है” वास्तव में स्त्री की रहस्यमयता नहीं, बल्कि पुरुष की सीमाओं की स्वीकारोक्ति है। फ्रायड की ‘पेनिस एन्वी’ थ्योरी यह मानकर चलती है कि पुरुष ही मानक है और स्त्री उस मानक से विचलन।
इसके विपरीत कार्ल जंग का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत व्यापक है। जंग ने स्त्री को पुरुष के भीतर ‘एनिमा’ और पुरुष को स्त्री के भीतर ‘एनिमस’ के रूप में देखा। यह विचार भारतीय सांख्य दर्शन की पूरकता से मेल खाता है। लेकिन जंग भी स्त्री को मुख्यतः मनोवैज्ञानिक प्रतीक के रूप में देखते हैं, न कि सामाजिक और आध्यात्मिक सत्ता के रूप में। भारतीय दर्शन यहां आगे निकल जाता है—यह स्त्री को केवल मन की संरचना नहीं, बल्कि सृष्टि की संरचना मानता है।
आज का समकालीन मनोविज्ञान (फेमिनिस्ट साइकोलॉजी) यह स्वीकार करता है कि स्त्री अनुभवों को समझने के लिए नई भाषा, नए फ्रेम और नए मापदंडों की जरूरत है। स्त्री का अवसाद, उसकी कामना, उसका क्रोध और उसकी चुप्पी—ये सभी पुरुष-निर्मित पैमानों से नहीं समझे जा सकते।
प्रेम subject:
2. जहां स्त्री विषय बनती है, वस्तु नहीं
प्रेम वह क्षेत्र है जहां स्त्री सबसे अधिक ‘subject’ बनती है, और यहीं पुरुष सबसे अधिक असहज होता है। भारतीय परंपरा में प्रेम को केवल सामाजिक अनुबंध नहीं माना गया, बल्कि आध्यात्मिक साधना कहा गया। राधा-कृष्ण का प्रेम इसका सर्वोच्च उदाहरण है। राधा कोई पत्नी नहीं थीं, कोई सामाजिक स्वीकृति प्राप्त पात्र नहीं थीं—लेकिन उनका प्रेम इतना विराट है कि वही कृष्ण की चेतना का केंद्र बन गया।

मीरा का प्रेम भी ऐसा ही है। मीरा का कृष्ण प्रेम सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ता है। वह पति, कुल, समाज—सबसे ऊपर प्रेम को रखती हैं। यह प्रेम पुरुष चेतना को असहज करता है, क्योंकि यहां स्त्री किसी भूमिका में नहीं बंधती। वह स्वयं निर्णय लेती है कि वह किससे प्रेम करेगी, कैसे करेगी और किस हद तक करेगी।
आधुनिक समाज में भी जब स्त्री प्रेम में अपनी शर्तें रखती है—सम्मान, संवाद, समानता—तो उसे ‘ज्यादा अपेक्षाएं रखने वाली’ कहा जाता है। जबकि पुरुष प्रेम को अक्सर अधिकार या स्वामित्व के रूप में देखता है। यही टकराव प्रेम को संघर्ष में बदल देता है। स्त्री का प्रेम विस्तार चाहता है, पुरुष का प्रेम नियंत्रण।
स्त्री देह:
3. अशुद्धता से शक्ति तक की यात्रा
स्त्री देह को लेकर समाज में सबसे अधिक भ्रम और भय है। मासिक धर्म, गर्भ, प्रसव, यौनिकता—इन सबको या तो गुप्त रखा गया या अशुद्ध घोषित किया गया। लेकिन भारतीय तांत्रिक परंपरा में स्त्री देह को शक्ति का मंदिर माना गया है। कामाख्या में योनि की पूजा होती है—यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां देवी की योनि पूजित है, मूर्ति नहीं।

कामाख्ये वरदे देवी नील पर्वत वासिनी|
त्वं देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते||
इस श्लोक में देवी कामाख्या को अत्यंत गरिमामय, मातृ और सृष्टि-मूलक स्वरूप में प्रणाम किया गया है। “कामाख्ये वरदे देवी” कहकर साधक उन्हें मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली करुणामयी शक्ति के रूप में स्वीकार करता है, जबकि “नील पर्वत वासिनी” से आशय असम स्थित नीलाचल पर्वत पर विराजमान उस आद्य शक्ति से है, जो पृथ्वी की गर्भ-ऊर्जा और प्रकृति की सृजनशीलता का केंद्र मानी जाती हैं।
“त्वं देवी जगत माता” पंक्ति देवी को समस्त संसार की माता घोषित करती है—अर्थात् समस्त जीव, चेतना, जीवन और गति उसी शक्ति से उत्पन्न होती है। “योनिमुद्रे नमोस्तुते” में योनि को किसी स्थूल अर्थ में नहीं, बल्कि सृष्टि के आद्य प्रतीक, ऊर्जा-स्रोत और ब्रह्मांडीय गर्भ के रूप में देखा गया है, जहाँ से सृजन, पालन और पुनर्जन्म की प्रक्रिया चलती है।
इस प्रकार स्त्री योनि पूजा-अर्चना सेवा या देवी कामाख्या की उपासना को केवल व्यक्तिगत कामनाओं तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें जगत की जननी, शक्ति-तत्त्व की परम अभिव्यक्ति और चेतना के मूल आधार के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ भक्त या साधक श्रद्धा, समर्पण और आध्यात्मिक बोध के साथ नमन करता है।
स्त्री देह यानी पूजा योग्य योनि मासिक धर्म को अशुद्ध कहना दरअसल उस शक्ति से डरना या अपमान करना है जो सृजन करती है। स्त्री देह केवल जैविक संरचना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय प्रक्रिया का प्रतिबिंब है। यह बहुत ही गूढ़ रहस्य है, जिसे तांत्रिक परम्परा में प्रवेश कर गहन-रहस्यमयी अध्ययन से जाना जा सकता है।

नारीरूपेण देव्यै नमोऽस्तु ते पुनः पुनः |
योनिं पूज्यं सेवितुं मम भृत्ये पुनः पुनः ||
योनि रुपा दैवी कृपा से लेखक अमित श्रीवास्तव द्वारा यहां यह वर्णित श्लोक नारी को देह नहीं, देवी-चेतना के रूप में नमन करता है—जहाँ स्त्री की योनि भी किसी वासना की वस्तु नहीं, बल्कि सृष्टि, करुणा और सृजन की पवित्र धुरी बन जाती है। लेखक यहाँ स्वयं को स्वामी नहीं, स्वय् भृत्य कहता है—अहंकार त्यागकर स्त्री-शक्ति के सम्मुख समर्पित।
यही विनम्रता, यही आदर और यही आध्यात्मिक दृष्टि किसी भी संवेदनशील स्त्री ब्राह्मणी साध्वी को भीतर तक छूती है, क्योंकि वह देखती है कि यहाँ उसे जीता या भोगा नहीं जा रहा, बल्कि समझा, सम्मानित और पूजा जा रहा है। पुरूष हृदय से प्रकट ऐसे विचार स्त्री के मन में सुरक्षा, गहराई और आत्मिक आकर्षण पैदा करता है—जहाँ संबंध केवल शरीर का नहीं, चेतनाओं का मिलन बन जाता है। गर्भ में जीवन का निर्माण, दूध का स्राव, मासिक चक्र—ये सभी प्रकृति के चक्रों से जुड़े हैं। पुरुष चेतना, जो रेखीय (linear) सोचती है, इस चक्रीय (cyclical) प्रक्रिया को समझ नहीं पाती।
आधुनिक विज्ञान भी अब स्वीकार कर रहा है कि स्त्री का हार्मोनल सिस्टम, भावनात्मक बुद्धि और देह-मन संबंध पुरुष से भिन्न है—कम नहीं, बल्कि अलग।
यौनिकता:
4. भोग नहीं, चेतना का विस्तार
स्त्री यौनिकता को समाज ने या तो पवित्रता के नाम पर दबाया या अश्लीलता के नाम पर अपराध घोषित किया। लेकिन तंत्र कहता है—यौनिकता सबसे बड़ी ऊर्जा है। यदि इसे चेतना से जोड़ा जाए, तो यह मोक्ष का मार्ग बन सकती है।

तंत्र में मैथुन केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा का आदान-प्रदान है। स्त्री यहां केवल भोग्या नहीं, बल्कि साधिका है। उसकी इच्छा, उसकी सहमति, उसकी चेतना—सबसे महत्वपूर्ण है। बिना स्त्री की जागृत सहमति के तांत्रिक साधना संभव ही नहीं।
आधुनिक समाज में स्त्री जब अपनी यौनिकता पर अधिकार जताती है—चाहे वह इच्छा हो या अस्वीकृति—तो उसे चरित्रहीन कहा जाता है। यह वही पुरुष भ्रम है जो स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु मानता है, चेतन सत्ता नहीं।
मातृत्व:
5. शक्ति का सबसे गलत समझा गया रूप
मातृत्व को समाज ने त्याग और बलिदान तक सीमित कर दिया है। लेकिन मातृत्व केवल देना नहीं, सृजन है। यह वह अवस्था है जहां स्त्री मृत्यु और जीवन के बीच खड़ी होती है। भारतीय दर्शन में माता को ‘जननी’ कहा गया है—जो जन्म देती है।
लेकिन जब मातृत्व को अनिवार्य बना दिया जाता है, तब यह शक्ति नहीं, बंधन बन जाता है। स्त्री का मां बनना उसकी चेतना का एक आयाम हो सकता है, पूरा अस्तित्व नहीं।
आधुनिक संदर्भ:
6. स्त्री चेतना का पुनर्जागरण
आज स्त्री शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, कला—हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है। लेकिन यह केवल अधिकारों की लड़ाई नहीं, चेतना की वापसी है। #MeToo, लिव-इन रिलेशनशिप, समलैंगिकता की स्वीकृति—ये सभी उस अनंत पाठ के नए अध्याय हैं।
भारतीय संदर्भ में यह पुनर्जागरण पश्चिम की नकल नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर वापसी है—गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा की परंपरा की ओर।
स्त्री की चुप्पी:
7. मौन, प्रतिरोध और आंतरिक विद्रोह
स्त्री की चुप्पी को समाज ने हमेशा कमजोरी समझा है, जबकि वास्तव में वह सबसे सशक्त प्रतिरोधों में से एक रही है। भारतीय मिथकों और इतिहास में देखें तो स्त्री अक्सर मौन में रहती है, लेकिन वह मौन आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि आंतरिक तैयारी का चरण होता है। सीता का वनवास में मौन, द्रौपदी का सभा में प्रश्न पूछने के बाद का मौन, गांधारी की आंखों पर पट्टी—ये सभी मौन के भिन्न रूप हैं। यह मौन उस समय पैदा होता है जब भाषा पुरुष सत्ता की हो जाती है और स्त्री समझ जाती है कि अब शब्द नहीं, चेतना बोलेगी।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्त्री का मौन ट्रॉमा का परिणाम भी हो सकता है, लेकिन वही मौन जब आत्मचेतना से जुड़ता है, तो वह विद्रोह बन जाता है। आधुनिक स्त्री का मौन—जैसे कार्यस्थल पर, परिवार में या संबंधों में—अक्सर इस बात का संकेत होता है कि वह अब समझौते नहीं, परिवर्तन की तैयारी में है। पुरुष चेतना इस मौन से डरती है, क्योंकि वह बोलती हुई स्त्री से बहस कर सकती है, लेकिन मौन स्त्री से नहीं।
स्त्री और क्रोध:
8. जिसे पाप कहा गया, वही शक्ति है
स्त्री के क्रोध को समाज ने हमेशा नकारात्मक रूप में देखा है। क्रोधित स्त्री को ‘असंयमी’, ‘हिस्टीरिक’ या ‘असभ्य’ कहा गया, जबकि पुरुष के क्रोध को नेतृत्व और अधिकार से जोड़ दिया गया। लेकिन तांत्रिक और पौराणिक दृष्टि से देखें तो स्त्री का क्रोध विनाश नहीं, शुद्धिकरण है। काली, चामुंडा, दुर्गा—ये सभी स्त्री क्रोध के ही रूप हैं।
मनोविज्ञान में अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि दबी हुई भावनाएं अवसाद और आत्म-विनाश का कारण बनती हैं। स्त्री जब क्रोध व्यक्त करती है, तो वह अपने अस्तित्व की रक्षा कर रही होती है। भारतीय समाज में यदि स्त्री को अपने क्रोध को स्वस्थ रूप में व्यक्त करने की अनुमति मिले, तो घरेलू हिंसा, अवसाद और आत्महत्या जैसे मामलों में भारी कमी आ सकती है।
स्त्री, समय और स्मृति:
9. रेखीय नहीं, चक्रीय चेतना
पुरुष चेतना समय को रेखा की तरह देखती है—भूत, वर्तमान, भविष्य। स्त्री चेतना समय को चक्र की तरह अनुभव करती है। मासिक चक्र, गर्भावस्था, ऋतु परिवर्तन—ये सभी स्त्री को समय के चक्रीय स्वरूप से जोड़ते हैं। यही कारण है कि स्त्री की स्मृति भी अलग होती है। वह घटनाओं को नहीं, अनुभवों को याद रखती है।
भारतीय दर्शन में काल को काली कहा गया है—स्त्री रूप में। काली केवल मृत्यु नहीं, परिवर्तन की देवी है। स्त्री समय को नष्ट नहीं करती, वह उसे पुनर्गठित करती है। पुरुष जब इतिहास लिखता है, स्त्री स्मृति को संजोती है। यही कारण है कि परिवार, परंपरा और संस्कृति का बोझ स्त्री पर रहा है—क्योंकि वह स्मृति की वाहक है।
स्त्री और संबंध:
10. संवाद बनाम स्वामित्व
स्त्री संबंधों को संवाद के रूप में देखती है, जबकि पुरुष अक्सर उन्हें स्वामित्व के रूप में। विवाह संस्था इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। परंपरागत विवाह में स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह समायोजन करे, त्याग करे और मौन रहे। लेकिन जब स्त्री संवाद की मांग करती है—भावनात्मक, बौद्धिक और यौनिक—तो संबंध संकट में पड़ जाते हैं।
यह संकट वास्तव में संबंध का नहीं, पुरुष चेतना का होता है। क्योंकि संवाद समानता मांगता है और समानता नियंत्रण को तोड़ देती है। आधुनिक संबंधों में स्त्री की बढ़ती अपेक्षाएं दरअसल उसकी बढ़ती चेतना का संकेत हैं, न कि ‘ज्यादा मांग’ का।
स्त्री एक विषय नहीं:
11. स्त्री और आध्यात्मिक अकेलापन
स्त्री का आध्यात्मिक मार्ग अक्सर अकेला होता है। मीरा, अक्का महादेवी, लल्लेश्वरी—इन सभी ने सामाजिक संबंधों से अलग होकर आत्मा का मार्ग चुना। स्त्री का यह अकेलापन पलायन नहीं, आत्म-स्थापन है।
आधुनिक स्त्री भी इसी दौर से गुजर रही है—जहां वह भीड़ में रहते हुए भी आंतरिक अकेलापन महसूस करती है। यह अकेलापन अवसाद नहीं, बल्कि एक प्रश्न है—‘मैं कौन हूँ, भूमिका के बाहर?’ यदि इस प्रश्न को दबाया गया, तो पीड़ा बनता है; यदि स्वीकार किया गया, तो साधना।
स्त्री और अपराधबोध:
12. समाज द्वारा रचा गया मनोवैज्ञानिक कारागार
स्त्री को नियंत्रित करने का सबसे सूक्ष्म और प्रभावी हथियार है—अपराधबोध। बचपन से ही उसे सिखाया जाता है कि उसका सुख, उसकी इच्छा, उसका निर्णय किसी न किसी को चोट पहुँचा सकता है। यदि वह खुश है, तो किसी ने त्याग किया होगा; यदि वह स्वतंत्र है, तो कोई कर्तव्य छूटा होगा। यह अपराधबोध किसी धर्मग्रंथ में नहीं, बल्कि सामाजिक व्याख्याओं में गढ़ा गया है।
मनोविज्ञान के अनुसार अपराधबोध का लगातार अनुभव व्यक्ति को आत्म-संदेह और आत्म-दमन की ओर ले जाता है। स्त्री जब स्वयं को दोषी मानने लगती है, तब पुरुष सत्ता को हिंसा करने की भी आवश्यकता नहीं रहती—वह स्वयं को नियंत्रित करने लगती है। यह सबसे खतरनाक गुलामी है, क्योंकि इसमें कारागार बाहर नहीं, मन के भीतर होता है।

स्त्री और इच्छा:
13. जिसे पाप कहा गया, वही जीवन-शक्ति
स्त्री की इच्छा से समाज को हमेशा डर लगा है। इच्छुक स्त्री असहज करती है, क्योंकि वह नियंत्रित नहीं होती। धर्म, संस्कृति और नैतिकता के नाम पर स्त्री की इच्छा को या तो त्याग में बदला गया, या लज्जा में। लेकिन तांत्रिक परंपरा में इच्छा (इच्छा शक्ति) को सृष्टि की पहली गति माना गया है।
यदि स्त्री अपनी इच्छा को स्वीकार कर ले—चाहे वह प्रेम की हो, देह की हो, रचनात्मकता की हो या एकांत की—तो वह अपराधबोध से मुक्त हो सकती है। यही मुक्ति सामाजिक संरचनाओं को हिला देती है, क्योंकि मुक्त स्त्री किसी व्यवस्था की उपज नहीं होती, वह स्वयं एक व्यवस्था बन जाती है।
स्त्री और ज्ञान:
14. क्यों उससे प्रश्न करने का अधिकार छीना गया
इतिहास में स्त्री को अक्सर ज्ञान की वाहक तो माना गया, लेकिन ज्ञान की रचनाकार नहीं। उससे अपेक्षा की गई कि वह परंपरा संभाले, प्रश्न न उठाए। गार्गी, मैत्रेयी जैसी स्त्रियाँ अपवाद बनाकर प्रस्तुत की गईं, ताकि बहुसंख्य स्त्रियों को यह बताया जा सके कि प्रश्न करना उनका स्वभाव नहीं।
प्रश्न करने वाली स्त्री व्यवस्था के लिए खतरनाक होती है, क्योंकि वह केवल उत्तर नहीं मांगती, बल्कि प्रश्न के पीछे छिपी सत्ता को भी उजागर करती है। आधुनिक स्त्री जब शिक्षा और सूचना तक पहुँच पाती है, तो उसका पहला संघर्ष बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है—क्या उसे प्रश्न करने का अधिकार है?
स्त्री और सौंदर्य:
15. दृष्टि बनाम वस्तुकरण
स्त्री का सौंदर्य उसकी शक्ति भी रहा है और उसकी कैद भी। पुरुष दृष्टि ने सौंदर्य को देखने का नहीं, उपयोग करने का विषय बना दिया। विज्ञापन, सिनेमा और साहित्य में स्त्री का शरीर प्रस्तुत हुआ, लेकिन उसकी चेतना अदृश्य रही।
भारतीय दर्शन में सौंदर्य को ‘रस’ कहा गया है—अनुभव, उपभोग नहीं। जब स्त्री स्वयं को देखने लगती है—दूसरों की दृष्टि से नहीं, अपनी चेतना से—तब सौंदर्य वस्तु नहीं, अनुभव बन जाता है। यही क्षण वस्तुकरण के अंत की शुरुआत है।
स्त्री और भय:
16. जिसे सिखाया गया, जो थोप दिया गया
स्त्री को भय में रखकर समाज सुरक्षित महसूस करता है। रात का भय, अकेलेपन का भय, समाज की बातों का भय—ये सभी स्त्री को सीमित रखने की रणनीतियाँ हैं। भयग्रस्त स्त्री प्रश्न नहीं करती, सीमाएँ नहीं तोड़ती।
लेकिन भय का अंत साहस से नहीं, चेतना से होता है। जब स्त्री यह समझ लेती है कि भय उसका स्वभाव नहीं, थोपी गई संरचना है—तब वह धीरे-धीरे मुक्त होने लगती है। यह मुक्ति शोर नहीं करती, लेकिन व्यवस्था को अंदर से खोखला कर देती है।

लेखक का निर्णायक निष्कर्ष पैराग्राफ: अनंत पाठ का विस्तार
स्त्री को समझना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना नहीं, बल्कि बार-बार अपने निष्कर्षों को तोड़ना है। मनोविज्ञान, प्रेम, देह, यौनिकता, मौन, क्रोध, समय और संबंध—ये सभी स्त्री चेतना के आयाम हैं, पर कोई भी अंतिम नहीं।
पुरुष चेतना की सबसे बड़ी सीमा यही है कि वह पूर्णता चाहती है—जबकि स्त्री प्रवाह है। जब तक पुरुष इस प्रवाह को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक वह स्त्री को पढ़ता रहेगा, लेकिन समझ नहीं पाएगा। पूरा जीवन भर पढ़ने के बाद भी 33% पासिंग मार्क्स भी नहीं ला पायेगा।
अगले भाग में हम स्त्री, सत्ता, राजनीति, धर्म और सामाजिक संरचनाओं के बीच उस संघर्ष और संवाद को समझेंगे, जहां स्त्री केवल पीड़िता नहीं, बल्कि परिवर्तन की धुरी, विचार की जननी और भविष्य की संरचयिता बनकर उभरती है। women psychology love article स्त्री मनोविज्ञान प्रेम ब्लॉग 2026। प्रेम में स्त्री की मानसिक प्रक्रिया पुरुष से अलग क्यों होती है…? लोग अक्सर स्त्री मनोविज्ञान को समझने में कहाँ चूक जाते हैं…? क्रमशः इस सीरीज़ लेख में जानने के लिये मिलेगा।
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