क्या स्त्री को समझा जा सकता है? प्रेम, मोक्ष और अद्वैत दर्शन के आलोक में जानिए क्यों स्त्री चेतना ज्ञान नहीं, साधना है। तंत्र से उपनिषद तक का दुर्लभ विश्लेषण पढ़ें देवी कामाख्या की मार्गदर्शन में लेखक संपादक अमित श्रीवास्तव की लेखनी से, जिसमें ऐतिहासिक उदाहरण, उद्धरण, मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और समकालीन संदर्भ शामिल हैं।
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स्त्री एक विषय नहीं, एक अनंत पाठ है -भाग 3: धर्म, दर्शन और पुरुष स्त्री चेतना
भूमिका: समझ से परे, साथ चलने की शर्त – श्रृंखला का समापन, पूर्व भागों का विस्तृत अवलोकन, इस भाग की रूपरेखा और दार्शनिक महत्व।

इस लेख-श्रृंखला के पहले दो भागों में हमने स्त्री को एक अनंत पाठ के रूप में समझने की एक व्यापक और बहुस्तरीय यात्रा की है, जो भारतीय दर्शन, धर्म, समाजशास्त्र और पुरुष चेतना की सीमाओं को गहराई से खंगालती है। भाग-1 में हमने वैदिक काल की विदुषी स्त्रियों—जैसे गार्गी वाचक्रवी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, घोषा, अपाला और विश्ववारा—के माध्यम से स्त्री चेतना की बौद्धिक और आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छुआ।
हमने देखा कि कैसे ऋग्वेद के सूक्तों जैसे ऋग्वेद 1.179 में लोपामुद्रा का सूक्त में स्त्री मंत्रद्रष्टा हैं, बृहदारण्यक उपनिषद में ब्रह्मविद्या की जिज्ञासु गार्गी का प्रश्न: “यह आकाश किसमें ओता-प्रोत है?” और पुराणों में दुर्गा, काली, चामुंडा जैसे रूपों में शक्ति और विनाश की प्रतीक (देवी महात्म्य में दुर्गा का महिषासुर वध)। इन रूपों ने पुरुष भय को उजागर किया, जहां पूजा एक सूक्ष्म नियंत्रण का माध्यम बन जाती है—देवी को ऊंचा बिठाकर संवाद समाप्त करना। हमने पाश्चात्य दर्शन से तुलना की, जैसे सिमोन द बोउवार की “द सेकंड सेक्स” में स्त्री को सामाजिक निर्माण के रूप में देखा गया।
लेकिन भारतीय सांख्य दर्शन में वह प्रकृति यानी सक्रिय तत्व है, जहां पुरुष निष्क्रिय साक्षी है। भाग-1 ने पुरुष चेतना की सीमाओं को स्पष्ट किया, जो स्त्री को object बनाने की कोशिश में असफल होती है, और समाजशास्त्रीय दृष्टि से भूमिकाओं (माता, पत्नी) में बंधी स्त्री को विश्लेषित किया।

भाग-2 में हम तंत्र परंपरा को केंद्र में रखकर आगे बढ़े, जहां स्त्री को साधना के केंद्र में स्थापित किया गया। हमने शक्तिपीठों जैसे कामाख्या (योनि पीठ), ज्वालामुखी (जिह्वा पीठ) और कालीघाट का विस्तृत विश्लेषण किया, जहां योनितत्व पवित्र है और कुलार्णव तंत्र में कहा गया— “शक्ति के बिना शिव शव हैं।” कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया को विस्तार से समझा, जहां स्त्री तत्व मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा है, और पांच ‘म’ (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) देह को पार करने के साधन हैं।
हमने पुरुष चेतना की सीमाओं का और गहन विश्लेषण किया, जो स्त्री को भूमिकाओं—माता, पत्नी, बहन, बेटी—में बांधती है, और समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा कि बोलती स्त्री समाज को असहज क्यों करती है, क्योंकि वह पुराने पाठ को फाड़ देती है। आधुनिक संदर्भों में नारीवादी आंदोलनों जैसे #MeToo (भारत में तनुश्री दत्ता का केस), मीटू और भारतीय स्त्री नेतृत्व (रानी लक्ष्मीबाई के 1857 विद्रोह से इंदिरा गांधी की राजनीति और ममता बनर्जी की समकालीन भूमिका तक) को शामिल किया।
भाग-2 ने स्त्री को जीवित प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया, जहां परिवर्तन पुरुष स्थिरता को चुनौती देता है, और मनोविज्ञान से लिंक किया जैसे फ्रायड का एनिग्मा vs जंग का एनिमा।
अब, भाग-3 में हम उस अंतिम बिंदु तक पहुंचते हैं जहां प्रश्न निर्णायक रूप से उठता है: क्या स्त्री को समझना आवश्यक भी है? या फिर स्त्री के साथ चलना, बदलना और स्वयं को प्रश्नांकित करना ही एकमात्र संभव मार्ग है? यह विमर्श अब सामाजिक या मनोवैज्ञानिक सीमाओं से बाहर निकलकर गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक हो जाता है। क्योंकि जब ज्ञान की सीमाएं स्पष्ट हो जाती हैं—जैसे उपनिषदों का “नेति नेति” (बृहदारण्यक उपनिषद 2.3.6: ब्रह्म को परिभाषित नहीं किया जा सकता)—तब साधना आरंभ होती है।
यहां हम मोक्ष की अवधारणा को केंद्र में रखेंगे, जहां स्त्री न केवल साथी है बल्कि मुक्ति का द्वार भी। हम अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य के विवेक चूड़ामणि से उदाहरण), तंत्र (विज्ञान भैरव तंत्र से कुंडलिनी), प्रेम की स्त्री साधिकाओं (मीरा, अक्का महादेवी, लल्लेश्वरी, अंडाल, सहजो बाई) और पाश्चात्य दर्शन से तुलना (डेकार्ट vs बोउवार, नीत्शे vs वेल) करेंगे। हम पुरुष-स्त्री द्वैत के भ्रम को तोड़ेंगे, प्रेम को मोक्ष का माध्यम बनाएंगे, और साथ चलने को एकमात्र उपाय बताएंगे।

इस भाग की रूपरेखा पिछले दो भागों से थोड़ा विस्तृत है: पहले हम द्वैत के भ्रम का दार्शनिक आधार, ऐतिहासिक विकास और मनोवैज्ञानिक निहितार्थ विश्लेषित करेंगे; फिर प्रेम और मोक्ष की तुलना, स्त्री साधिकाओं के जीवन और रचनाओं का गहन अध्ययन; स्त्री को मार्ग/लक्ष्य के रूप में देखेंगे तंत्र और अद्वैत के संदर्भ में; 33% passing marks के अर्थ को दार्शनिक, वैज्ञानिक और साहित्यिक नजरिए से गहराई से समझेंगे; साथ चलने के उपाय को व्यावहारिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उदाहरणों से समृद्ध करेंगे; स्त्री की मुक्ति पर चर्चा करेंगे ऐतिहासिक और समकालीन संदर्भों से।
और अंत में अनंत पाठ के निष्कर्ष के साथ श्रृंखला समाप्त करेंगे, लेकिन आगे की दिशा सुझाएंगे। हम ऐतिहासिक संदर्भ (प्राचीन मेसोपोटामिया से मध्यकालीन भक्ति तक), उद्धरण (उपनिषद, तंत्र ग्रंथ, भक्ति कवयित्रियों की रचनाएं), समकालीन उदाहरण (नारीवाद, मनोविज्ञान, राजनीति, #MeToo, शिक्षा दर), तुलनात्मक विश्लेषण (भारतीय vs पाश्चात्य, प्राचीन vs आधुनिक) और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि (फ्रायड, जंग, फ्रॉम) से समृद्ध करेंगे।
यह श्रृंखला का समापन है, लेकिन अनंत पाठ की तरह यह समाप्ति नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का संकेत है—मानव चेतना के विस्तार का, जहां स्त्री केंद्र में है। इस भाग का दार्शनिक महत्व यह है कि यह पुरुष को विनम्रता सिखाता है, और स्त्री को उसकी अनंतता की याद दिलाता है।
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पुरुष–स्त्री द्वैत का भ्रम:
दार्शनिक आधार, ऐतिहासिक विकास, मनोवैज्ञानिक निहितार्थ और वैश्विक तुलना
मानव सभ्यता के विकास में स्त्री और पुरुष को दो विरोधी ध्रुवों में बांटने की प्रवृत्ति सदैव रही है, जो एक गहन दार्शनिक भ्रम का परिणाम है। पुरुष को तर्क, शक्ति, बुद्धि, नियंत्रण, स्थिरता और वर्गीकरण का प्रतीक माना गया, जबकि स्त्री को भावना, कोमलता, करुणा, रहस्य, परिवर्तन और अनंतता का। यह द्वैत सुविधाजनक था, क्योंकि इससे सत्ता संरचनाएं स्पष्ट हो जाती थीं—पुरुष शासक, विचारक, निर्णयकर्ता और सभ्यता का ‘मानक’, जबकि स्त्री अधीन, सहयोगी, प्रेरणा स्रोत या वर्जित।
लेकिन यह द्वैत एक भ्रम है, जो मानव चेतना की मूल एकता को नजरअंदाज करता है। भारतीय दर्शन का मूल स्वर द्वैत नहीं, अद्वैत है। बृहदारण्यक उपनिषद (अध्याय 1, ब्राह्मण 4, मंत्र 3) में कहा गया है: “एकोऽहं बहुस्याम्”—एक ही चेतना (ब्रह्म) अनेक रूपों में प्रकट होती है, जैसे एक बीज से वृक्ष। स्त्री और पुरुष इसी एक चेतना की दो अभिव्यक्तियां हैं, न कि दो शत्रु पक्ष। यह अवधारणा शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में और गहराती है, जहां ब्रह्म निर्गुण है, लेकिन सगुण रूप में पुरुष (शिव) और स्त्री (शक्ति) के रूप में प्रकट होता है—अर्धनारीश्वर रूप में एकता।
यह भ्रम कहां से आता है? पुरुष चेतना की मूल सीमा से, जो स्थिरता, वर्गीकरण और नियंत्रण पर आधारित है। पुरुष स्वयं को ‘मानक चेतना’ मान लेता है और स्त्री को उसका ‘विकरण’ या विचलन। सांख्य दर्शन में पुरुष साक्षी (निष्क्रिय चेतना) है और प्रकृति (स्त्री तत्व) क्रिया (सक्रिय), लेकिन पुरुष-प्रधान व्याख्याओं ने पुरुष को प्रधान मान लिया। कपिल मुनि की सांख्यकारिका (श्लोक 19-21) स्पष्ट कहती है कि पुरुष प्रकृति के बिना असहाय है, क्योंकि प्रकृति के तीन गुण (सत्व, रजस, तमस) सृष्टि चलाते हैं।
लेकिन समाज ने इसे उलट दिया—प्रकृति को नियंत्रित करने योग्य बनाया। पाश्चात्य दर्शन में यह भ्रम और स्पष्ट है। रेने डेकार्ट का “कोगिटो एर्गो सुम” (मैं सोचता हूं, इसलिए हूं) पुरुष बुद्धि को केंद्र में रखता है, जबकि स्त्री को देह के रूप में objectified करता है—द्वैतवाद (माइंड vs बॉडी)। अरस्तू ने स्त्री को “अपूर्ण पुरुष” कहा, और प्लेटो की गुफा सिद्धांत में स्त्री छाया है, पुरुष सत्य की खोजकर्ता। सिमोन द बोउवार की “द सेकंड सेक्स” (1949) में यह विश्लेषित है कि पुरुष खुद को subject मानता है, स्त्री को other—एक निर्माण जो समाज थोपता है, जैसे जेंडर भूमिकाएं।
लेकिन भारतीय अद्वैत में शंकराचार्य (विवेक चूड़ामणि, श्लोक 108) कहते हैं कि ब्रह्म एक है, माया (प्रकृति, स्त्री) उसकी लीला है—लीला को समझने की बजाय जीने की जरूरत है। समस्या तब पैदा होती है जब पुरुष इस लीला को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, बजाय उसमें भाग लेने के, जैसे तंत्र में मैथुन साधना।
ऐतिहासिक विकास में देखें तो यह भ्रम प्राचीन सभ्यताओं से शुरू होता है। मेसोपोटामिया में इन्नाना (सुमेरियन देवी, 4000 ईसा पूर्व) सृष्टि, युद्ध, प्रेम और विनाश की देवी थी, लेकिन बाद में पुरुष देवताओं (जैसे एनकी या मर्दुक) ने उसे अधीन किया—एपिक ऑफ गिलगमेश में इन्नाना की शक्ति को सीमित किया गया। प्राचीन मिस्र में आइसिस (स्त्री) जीवन, जादू और पुनरुत्थान की देवी थी, लेकिन ओसिरिस (पुरुष) के साथ द्वैत बनाया गया, जहां आइसिस सहायक है।
ग्रीक मिथकों में एथेना (बुद्धि) पुरुष जैसे है, लेकिन एफ्रोदाइट (प्रेम) वर्जित। भारत में वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) में स्त्री समान थी—ऋग्वेद 10.85 (विवाह सूक्त) में स्त्री-पुरुष समान हैं, लेकिन उत्तर वैदिक काल में मनुस्मृति (200 ईसा पूर्व, अध्याय 5, श्लोक 148) ने स्त्री को संरक्षण में बांध दिया: “पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने”। मध्यकाल (8वीं-18वीं शताब्दी) में भक्ति आंदोलन ने इसे चुनौती दी—मीरा ने राजबंधन तोड़े, लेकिन पितृसत्ता बनी रही।
औपनिवेशिक काल (19वीं शताब्दी) में ब्रिटिश कानूनों ने इसे और मजबूत किया, जैसे सती प्रथा पर बहस जहां स्त्री को पीड़ित माना गया, लेकिन राजा राम मोहन रॉय जैसे सुधारकों ने इसे तोड़ा। 20वीं शताब्दी में गांधी ने स्त्री को शक्ति कहा, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में वे सहायक रहीं।
मनोवैज्ञानिक निहितार्थ में, यह भ्रम फ्रायड के ओडिपस कॉम्प्लेक्स से जुड़ा है, जहां स्त्री मां रूप में other है। लेकिन जंग का एनिमा (पुरुष में स्त्री तत्व) इस द्वैत को तोड़ता है—एनिमा रचनात्मकता का स्रोत है, लेकिन दमित होने से भ्रम पैदा होता है। एरिक एरिकसन का आइडेंटिटी क्राइसिस जेंडर भूमिकाओं से जुड़ा है। समकालीन संदर्भ में, यह द्वैत #MeToo आंदोलन (2017 से, भारत में 2018) में दिखता है, जहां स्त्री की आवाज (जैसे तनुश्री दत्ता vs नाना पाटेकर) पुरुष द्वैत को चुनौती देती है—वह कहती है कि मैं other नहीं, subject हूं।
लेकिन पुरुष भ्रम में फंसकर इसे संघर्ष मानता है, जबकि यह एकता की पुकार है। मनोविज्ञान में, कार्ल जंग का एनिमा (पुरुष में स्त्री तत्व) इस द्वैत को तोड़ता है, लेकिन फ्रायड का पेनिस एन्वी इसे मजबूत करता है। आधुनिक भारत में, स्त्री शिक्षा दर (एनएफएचएस-5: 72%) बढ़ी है, लेकिन कार्यबल भागीदारी (25%) कम—यह द्वैत का परिणाम है, जहां घरेलू भूमिकाएं बंधन हैं।
राजनीति में ममता बनर्जी या मायावती जैसे उदाहरण द्वैत को तोड़ते हैं, लेकिन मोदी युग में जेंडर गैप (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम रिपोर्ट 2023: भारत 127वें स्थान पर) बरकरार है। वैश्विक तुलना में, स्कैंडिनेवियन देशों में जेंडर समानता (आइसलैंड नंबर 1) द्वैत कम है, लेकिन मध्य पूर्व में (जैसे सऊदी अरब) मजबूत।
इस द्वैत का परिणाम मोक्ष की खोज में बाधा है। पुरुष मोक्ष को अलगाव मानता है—संसार से पलायन, इंद्रियों पर विजय, जैसे योग दर्शन में पतंजलि का समाधि (योगसूत्र 1.2: “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”)। लेकिन स्त्री मोक्ष को समावेशन मानती है—संसार में पूर्ण उपस्थिति, जहां देह और भावना मुक्ति के भाग हैं। यही अंतर साधना की दिशा बदल देता है।
पुरुष की साधना अक्सर त्याग पर आधारित होती है, जैसे रामकृष्ण परमहंस का वैराग्य या बुद्ध का महापरिनिर्वाण (महापरिनिर्वाण सुत्त), लेकिन स्त्री की साधना प्रेम पर, जैसे मीरा का कृष्ण-भक्ति या अक्का महादेवी का शिव-समर्पण। यहां पुरुष भ्रम स्पष्ट है: वह स्त्री को समझने की बजाय उसे अपनी साधना में फिट करने की कोशिश करता है, जो असंभव है क्योंकि स्त्री अनंत है, और उसकी चेतना परिवर्तन की है।

प्रेम बनाम मोक्ष:
स्त्री साधिकाओं का दृष्टिकोण, ऐतिहासिक उदाहरण, रचनाओं का विश्लेषण और पाश्चात्य-भारतीय तुलना
पुरुष के लिए मोक्ष अक्सर संसार से पलायन का पर्याय है—एकांत, तपस्या, इंद्रियों पर विजय, जहां ज्ञान (विवेक) प्रधान है और प्रेम बाधा। लेकिन स्त्री के लिए मोक्ष संसार में पूर्ण उपस्थित होना है, जहां प्रेम मुक्ति का माध्यम बन जाता है। यही कारण है कि स्त्री की आध्यात्मिक यात्रा त्याग से नहीं, समावेशन से गुजरती है—देह, भावना, संबंधों और दैनिक जीवन को शामिल करके।
मीरा, अक्का महादेवी, लल्लेश्वरी, अंडाल, सहजो बाई—इन स्त्रियों ने प्रेम को ही मोक्ष बना लिया। उनका ईश्वर कहीं दूर नहीं था; वह देह, नृत्य, गीत, विद्रोह और दैनिक अनुभव में उपस्थित था। यह दृष्टिकोण पुरुष-केंद्रित मोक्ष को चुनौती देता है, जहां प्रेम अक्सर कामना या माया माना जाता है।
मीरा बाई (1498-1546) का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है। मेवाड़ की राजकुमारी होने के बावजूद उन्होंने कृष्ण को पति माना और समाज की बंधनों को तोड़ा—राजपरिवार के दबाव, जहर की कोशिशों के बावजूद। उनकी भजन “मैं तो गिरिधर के घर जाऊंगी” में प्रेम घर छोड़ने का साहस देता है, और “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” में प्रेम धन (मोक्ष) है। मीरा कहती हैं: “प्रेम की डोर से बंधी हूं, मोक्ष की क्या जरूरत?” यह स्त्री चेतना की ताकत है, जो प्रेम को अलगाव नहीं, एकीकरण मानती है।
मीरा का जीवन विद्रोह था—राजपरिवार छोड़कर संतों के साथ नृत्य, गिरिधर नागर के साथ रास, जो तंत्र की तरह देह को साधना बनाता है। इतिहासकारों जैसे रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, मीरा भक्ति आंदोलन की स्त्री आवाज हैं, जो पुरुष साधकों (जैसे तुलसीदास के रामचरितमानस में सीता का त्याग) से अलग हैं। मीरा की रचनाएं (लगभग 200 भजन) प्रेम को आध्यात्मिक विद्रोह बनाती हैं—जाती, वर्ग और लिंग बंधनों से मुक्ति।
अक्का महादेवी (1130-1160, कर्नाटक) ने नग्न होकर शिव की खोज की—देह को वर्जना नहीं, मुक्ति का माध्यम बनाया। उनकी वचन (कन्नड़ में, लगभग 430): “ओ चेन्ना मल्लिकार्जुन (शिव), तू मेरा पति है, मैं तेरी पत्नी—यह संसार हमारा घर है।” यहां मोक्ष संसार से बाहर नहीं, उसके भीतर है—प्रेम घर है। अक्का ने राजा कौशिक से विवाह किया लेकिन त्याग दिया, क्योंकि प्रेम शिव में था। नग्नता प्रतीक है—समाजी बंधनों से मुक्ति, जैसे तंत्र में वामाचार। लिंगायत संप्रदाय (बसवन्ना द्वारा स्थापित) में शामिल होकर उन्होंने देह को पार किया, और उनकी वचन शैव दर्शन का सार हैं—द्वैत से अद्वैत।
लल्लेश्वरी (लल्ला योगीश्वरी, 1320-1392, कश्मीर) की वाख (कश्मीरी में, लगभग 285): “शिव ही शक्ति है, शक्ति ही शिव—द्वैत कहां?” उन्होंने प्रेम को अद्वैत बनाया। लल्ला ने बाल विवाह के दमन से मुक्त होकर योगिनी बनीं—सास की प्रताड़ना से जंगल में तपस्या। उनके गीत कश्मीरी शैव दर्शन (त्रिक शास्त्र) का सार हैं, जहां प्रेम कुंडलिनी जैसा है। अन्य उदाहरण: अंडाल (8वीं शताब्दी, तमिलनाडु) ने विष्णु से विवाह रचाया, तिरुप्पावई में प्रेम में विलीन हुईं—“नारायणन मुरारी”। सहजो बाई (18वीं शताब्दी, राजस्थान) ने कहा: “प्रेम ही परमात्मा है, त्याग क्या?” उनकी दोहे प्रेम को मोक्ष बनाते हैं।
पुरुष साधक ने अक्सर इंद्रियों को जीतने की बात की, जैसे शंकराचार्य का “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” (ब्रह्मजिज्ञासा) या पतंजलि योगसूत्र (2.54) में प्रत्याहार (इंद्रिय निग्रह)। लेकिन स्त्री साधिका ने उन्हें पार करने की—तंत्र की तरह, जहां देह साधना है। यह सूक्ष्म अंतर पूरी साधना की दिशा बदल देता है—पुरुष अलगाव, स्त्री समावेशन।
पाश्चात्य में, नीत्शे का “ओवरमैन” (थस स्पोक जरथुस्त्रा) पुरुष केंद्रित है, जहां मोक्ष व्यक्तिगत शक्ति है, लेकिन स्त्री जैसे जोसेफाइन बेकर (नृत्य में मुक्ति, 1920s) या सिमोन वेल (प्रेम में ईश्वर, “ग्रेविटी एंड ग्रेस”) ने प्रेम को मोक्ष बनाया। आधुनिक में, ओप्रा विंफ्रे की “आध्यात्मिक यात्रा” प्रेम (सेवा, ओप्रा बुक क्लब) पर आधारित है, मलाला यूसुफजई की शिक्षा मुक्ति प्रेम (समाज, लड़कियों के अधिकार) से जुड़ी है।
यह अंतर पुरुष भ्रम को उजागर करता है: वह मोक्ष को लक्ष्य मानता है (अंतिम बिंदु, जैसे निर्वाण), जबकि स्त्री उसे यात्रा (प्रक्रिया, जैसे लीला)। प्रेम में स्त्री अनंत है, क्योंकि प्रेम सीमाएं तोड़ता है। महाभारत में द्रौपदी का प्रेम पांच पतियों से है—द्वैत से अद्वैत। राधा-कृष्ण की लीला (भागवत पुराण) में राधा मोक्ष नहीं मांगती, वह प्रेम में विलीन है—रासलीला में देह आध्यात्मिक है।
पुरुष के लिए यह समझना कठिन है, क्योंकि वह नियंत्रण चाहता है। लेकिन प्रेम में समर्पण है, जो स्त्री चेतना की कुंजी है। समकालीन मनोविज्ञान में, एरिक फ्रॉम की “द आर्ट ऑफ लविंग” (1956) प्रेम को कला मानती है, जो स्त्री दृष्टि से मेल खाती है—प्रेम सीखा जाता है, समझा नहीं। जॉन बोल्बी का अटैचमेंट थ्योरी प्रेम को सुरक्षा मानता है, लेकिन स्त्री प्रेम में मुक्ति।
स्त्री: मार्ग या लक्ष्य?
तंत्र और अद्वैत में उसकी भूमिका, ऐतिहासिक, समकालीन विश्लेषण और वैश्विक उदाहरण
पुरुष सभ्यता ने स्त्री को या तो साधन बनाया, या पुरस्कार—एक ऐसा द्वंद्व जो उसकी स्वतंत्र सत्ता को नकारता है, और मोक्ष की खोज को विकृत करता है। वह या तो यात्रा का माध्यम बनी (जैसे पुराणों में आदर्श पत्नी रूप, जहां सीता राम की साथी है लेकिन अग्निपरीक्षा में त्याग करती है, रामायण में लंका विजय का साधन), या अंत में मिलने वाला लक्ष्य (जैसे स्वर्ग की अप्सराएं या महाभारत में द्रौपदी का स्वयंवर, जहां वह पांडवों की जीत का पुरस्कार है)।
दोनों ही स्थितियों में उसकी स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो गई, क्योंकि वह पुरुष की साधना का हिस्सा बन जाती है—समझने की वस्तु, न कि साथी। लेकिन तंत्र इस भ्रम को तोड़ता है। वहां स्त्री न मार्ग है, न लक्ष्य—वह स्वयं यात्रा है। और यात्रा को जीया जाता है, समझा नहीं—अनुभव से मोक्ष।
तंत्र में शक्ति साधना का मूल है। कुलार्णव तंत्र (अध्याय 2, श्लोक 10) कहता है: “शक्ति पूजा बिना मुक्ति नहीं।” यहां स्त्री गुरु हो सकती है (जैसे मत्स्येंद्रनाथ की शिष्या मैनावती, जो गोरखनाथ को ज्ञान देती हैं, और नाथ परंपरा की आधार), साधक हो सकती है (जैसे तंत्र की कौल मार्ग में स्त्री साधिकाएं, जहां वामाचार में स्त्री केंद्र है), और साध्य भी (शक्ति रूप में, जहां देवी मुक्ति है)। यह पूर्णता का संकेत है—द्वैत से अद्वैत।
कुंडलिनी जागरण में शक्ति (स्त्री) मूलाधार चक्र से (योनि क्षेत्र, जहां कामना है) सहस्रार (शिव, जहां निर्वाण है) तक की यात्रा है, जहां सात चक्रों (मूलाधार: स्थिरता, स्वाधिष्ठान: रचनात्मकता, मणिपुर: शक्ति, अनाहत: प्रेम, विशुद्ध: अभिव्यक्ति, आज्ञा: अंतर्दृष्टि, सहस्रार: एकता) को पार करती है। प्रत्येक चक्र स्त्री चेतना के एक पक्ष को दर्शाता है—अनाहत में प्रेम मोक्ष का द्वार है।
लेकिन पुरुष भ्रम में इसे यौनिकता तक सीमित कर देता है, जबकि तंत्र चेतना का विस्तार है—पांच ‘म’ (मद्य: जागृति, मांस: देह, मत्स्य: प्रवाह, मुद्रा: मुद्रा, मैथुन: एकाकार) देह को पार करने के साधन हैं। विज्ञान भैरव तंत्र (श्लोक 1-112) में 112 ध्यान विधियां हैं, जहां स्त्री साथी है।
अद्वैत में भी स्त्री माया है, जो ब्रह्म को प्रकट करती है। रामकृष्ण परमहंस (1836-1886) ने काली को मां और साथी दोनों माना—उनकी साधना में स्त्री केंद्र थी, जहां काली प्रेम में प्रकट हुई। शंकराचार्य की सौंदर्य लहरी (श्लोक 1) में शक्ति को शिव की शक्ति कहा गया “शिव: शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुम”। ऐतिहासिक में, तंत्र की स्त्री साधिकाएं जैसे साहिबा (सूफी परंपरा में, 12वीं शताब्दी, जहां स्त्री प्रेमी है और फरिदुद्दीन अत्तार की “कॉन्फ्रेंस ऑफ द बर्ड्स” में प्रेम यात्रा है), या तिब्बती वज्रयान में तारा देवी (बौद्ध तंत्र, जहां तारा करुणा है)।
मध्यकालीन भारत में सहजिया वैष्णव परंपरा (15वीं शताब्दी, बंगाल) में स्त्री को साधना का माध्यम माना गया—राधा रूप में। आधुनिक में, तंत्र-प्रभावित विचारक जैसे ओशो (रजनीश, 1931-1990) कहते हैं: “स्त्री देह मुक्ति का द्वार है—उसे समझो नहीं, अनुभव करो।” उनका “तंत्र: द सुप्रीम अंडरस्टैंडिंग” तंत्र को प्रेम बनाता है।
लेकिन समाज भयभीत है, क्योंकि यह पुरुष नियंत्रण को चुनौती देता है—जैसे भारत में तंत्र को “काला जादू” माना जाता है। समकालीन में, योगा और माइंडफुलनेस मूवमेंट में स्त्री केंद्रित तंत्र (जैसे कंडलिनी योगा क्लासेस, अमेरिका में पॉपुलर) बढ़ रहे हैं, जहां स्त्री यात्रा है—जैसे अमांडा गॉर्मन की कविता में स्त्री शक्ति। वैश्विक उदाहरण: अफ्रीकी योरुबा परंपरा में ओशुन (स्त्री देवी, प्रेम और नदी) यात्रा है, न कि लक्ष्य।
स्त्री यहां अनंत पाठ है—हर साधना में नया अर्थ, नया चक्र खुलता है। पुरुष जब उसे मार्ग या लक्ष्य बनाता है, तब फंसता है; तंत्र में वह साथी है, अद्वैत में अभिव्यक्ति।
Passing Marks का अंतिम अर्थ:
ज्ञान की सीमा, अनंतता की स्वीकृति, दार्शनिक, वैज्ञानिक और साहित्यिक निहितार्थ
जब कहा जाता है कि पुरुष पूरी उम्र स्त्री को पढ़ ले, फिर भी पास नहीं हो सकता, 33% पासिंग मार्क्स भी नहीं ला सकता—तो इसका अर्थ स्त्री की श्रेष्ठता नहीं, बल्कि ज्ञान की सीमा है। पास होने का अर्थ होता है—समाप्ति, प्रमाणपत्र, निश्चितता, जहां परीक्षा खत्म होती है और ज्ञान पूरा माना जाता है। लेकिन स्त्री कभी समाप्त नहीं होती। वह जीवन की तरह है—नदी की तरह बहती हुई, बदलती हुई, पुनः रचती हुई, हर अनुभव में नया रूप। पुरुष की असफलता यहीं है कि वह पूर्णविराम खोजता है, जबकि स्त्री अल्पविराम है—एक विराम जो नया वाक्य, नया अर्थ, नई संभावना शुरू करता है।
दार्शनिक रूप से, यह ग्रीक विचारक हेराक्लाइटस के “पैंथा रेई” (सब बहता है, 500 ईसा पूर्व) से मेल खाता है—स्त्री परिवर्तन है, पुरुष स्थिरता। उपनिषदों में “नेति नेति” (बृहदारण्यक 2.3.6)—स्त्री को परिभाषित नहीं किया जा सकता, वह ब्रह्म की तरह अनिर्वचनीय है। आधुनिक भौतिकी में हाइजेनबर्ग की अनिश्चितता सिद्धांत (1927) जैसा—स्त्री को मापने (समझने) से वह बदल जाती है, क्योंकि अवलोकन प्रभावित करता है।
पुरुष भ्रम में फंसकर परीक्षा लेता है, लेकिन स्त्री पाठ है, परीक्षक नहीं। क्वांटम फिजिक्स में जैसे पार्टिकल-वेव द्वैत, स्त्री दोनों है—स्थिर और गतिशील, समझ से परे। साहित्यिक में, शेक्सपियर का “एज यू लाइक इट” में जैक्स का “ऑल द वर्ल्ड्स ए स्टेज”—स्त्री भूमिकाओं में है, लेकिन अनंत। भारतीय साहित्य में, रवींद्रनाथ टैगोर की “चित्रा” में स्त्री अनंत जिज्ञासा है।
यह अर्थ मोक्ष में घुलता है: मोक्ष ज्ञान से नहीं, स्वीकृति से। पुरुष जब असफलता स्वीकार करता है, तब सीखना शुरू होता है। जैसे जेन बौद्ध में “शून्यता” (नागार्जुन की माध्यमिक कारिका)—खालीपन जहां समझ समाप्त होती है, अनुभव शुरू। पाश्चात्य में जाक देरिदा का डीकंस्ट्रक्शन (1967)—परिभाषाएं तोड़ना, अर्थ अनंत। पुरुष जब passing marks त्यागता है, तब मोक्ष मिलता है—जैसे बौद्ध में बोधिसत्व जो दूसरों के लिए रहता है।
साथ चलना: एकमात्र उपाय –
विनम्रता, प्रेम, जिज्ञासा, व्यावहारिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उदाहरण
यदि कोई उपाय है, तो वह है—साथ चलना। प्रश्न पूछते हुए, उत्तर न पाते हुए, असमंजस में रहते हुए भी। साथ चलने का अर्थ है—यह स्वीकार करना कि हर पन्ना तुम्हारे लिए नहीं खुलने वाला। कुछ पन्ने केवल अनुभव के लिए होते हैं, व्याख्या के लिए नहीं। यही विनम्रता प्रेम को हिंसा से, और जिज्ञासा को नियंत्रण से बचाती है।
भारतीय दर्शन में यह “सहयात्रा” है—जैसे राम-सीता की (रामायण), जहां सीता मोक्ष की कुंजी है, लेकिन स्वतंत्र (वनवास में निर्णय)। तंत्र में मैथुन साधना साथ चलना है—एकाकार होना, जहां देह चेतना बनती है। पाश्चात्य में जीन-पॉल सार्त्र का अस्तित्ववाद (बीइंग एंड नथिंगनेस) साथी को other नहीं, साथी मानता है—प्रेम स्वतंत्रता है। आधुनिक में, फेमिनिस्ट थ्योरी जैसे बेल हुक की “ऑल अबाउट लव” (2000) साथ चलने को मुक्ति मानती है—प्रेम राजनीति है।
व्यावहारिक में, दांपत्य जीवन में साथ चलना—जैसे आधुनिक जोड़ों में जहां स्त्री करियर (जैसे भारत में 30% महिला CEO) और घर संभालती है, पुरुष समर्थन करता है (पितृत्व अवकाश)। मनोवैज्ञानिक रूप से, जॉन गॉटमैन की रिलेशनशिप थ्योरी (1999) में “भावनात्मक बिड” साथ चलना है—प्रतिक्रिया देना। आध्यात्मिक में, सूफी रूमी की “मसनवी” में प्रेम साथ चलना है—“प्रेमी और प्रेम एक”। साथ चलना पुरुष को बदलता है—वह नियंत्रक से सहयात्री बनता है, और स्त्री अनंत रहती है। समकालीन में, LGBTQ+ मूवमेंट में साथ चलना जेंडर द्वैत तोड़ता है।
स्त्री और मुक्ति:
स्वतंत्र सत्ता, पुरुष की भूमिका, ऐतिहासिक, समकालीन संदर्भ और वैश्विक दृष्टि
स्त्री की मुक्ति पुरुष से अलग होने में नहीं, बल्कि स्वयं को किसी भी परिभाषा में न बांधने में है। जब स्त्री स्वयं को पढ़ने लगती है, तब पुरुष अप्रासंगिक नहीं होता—पर निर्णायक भी नहीं रहता। यह वह क्षण है, जहां स्त्री स्वयं subject और पाठक—दोनों बन जाती है। जैसे वर्जीनिया वुल्फ की “अ रूम ऑफ वन्स ओन” (1929)—स्त्री को अपना कमरा (चेतना) चाहिए, जहां वह लिखती है।
भारतीय में, सावित्रीबाई फुले (1831-1897) ने शिक्षा से मुक्ति ली, दलित स्त्रियों को पढ़ाया—पुणे में पहला लड़कियों का स्कूल। आधुनिक में, अरुंधति रॉय (“द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स”) या तसलीमा नसरीन (“लज्जा”) अपनी लेखनी से मुक्त हैं—धार्मिक कट्टरवाद से लड़ती हैं। मुक्ति में स्त्री अनंत है, पुरुष उसका साक्षी—जैसे तंत्र में शिव शक्ति का साक्षी है। वैश्विक में, मलाला (नोबेल 2014) शिक्षा मुक्ति है, ग्रेटा थुनबर्ग पर्यावरण। पुरुष की भूमिका सहयोगी है—जैसे जोतिबा फुले सावित्रीबाई के साथ।

स्त्री एक विषय नहीं भाग 3…… सीरीज़ लेख अंतिम निष्कर्ष:
अनंत पाठ – श्रृंखला का समापन, आगे की दिशा और चेतना विस्तार का आमंत्रण
स्त्री कोई अध्याय नहीं, पूरी पुस्तक भी नहीं—वह लेखन की प्रक्रिया है। और जो प्रक्रिया होती है, वह कभी पूरी नहीं होती। इसलिए जो पुरुष यह स्वीकार कर लेता है कि वह कभी ‘पास’ नहीं होगा—वही वास्तव में सीखना शुरू करता है। इस श्रृंखला में हमने वेद से तंत्र तक की यात्रा की, पुरुष भ्रम को उजागर किया, और स्त्री को अनंत चेतना माना। यह समापन नहीं, आमंत्रण है—स्त्री के साथ चलने का, चेतना विस्तार का।
लेख से सम्बंधित अपने विचारों को कमेंट बॉक्स में व्यस्त करें आप पाठकों के विचारों को पढ़कर विश्व पटल पर सार्वजनिक कर आगे लेखनी में समाहित करने उस पर अपने विचार व्यक्त करने का प्रयास करूँगा। अंत में विश्व की सम्पूर्ण नारी शक्ति को नमन देवी कामाख्या की कृपा सदैव बनी रहे। amitsrivastav.in पर उपलब्ध लेख अच्छा लगा तो लाइक शेयर और कमेंट करें।
Conclusion:> प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा आज भी समाज में स्वस्थ संबंध और परिपक्व दृष्टिकोण के लिए महत्वपूर्ण है।Disclaimer:> यह सामग्री केवल सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से है, न कि किसी भी प्रकार की यौन क्रिया को प्रोत्साहित करने हेतु।
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