धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: परित्याग किसका करें, सम्मान किसका करें?

Amit Srivastav

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धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: जानें किसका सम्मान करें और किसका परित्याग। भारतीय संस्कृति में परिवार को धर्म का आधार माना गया है, पर आज भौतिकवाद और स्वार्थ ने इसकी पवित्रता को चुनौती दी है। इस लेख में शास्त्रों के मार्गदर्शन और व्यावहारिक सुझावों के साथ समझें कि कैसे परिवार में सत्य, प्रेम और नैतिकता को पुनःस्थापित करें। ध्यान रखें पारिवारिक विवाद को कभी बढाएं नहीं सुलझाते हुए जीवन का निर्वाह करें।

भारतीय संस्कृति में परिवार को एक पवित्र तीर्थस्थल माना गया है, जो न केवल सामाजिक जीवन का आधार है, बल्कि आत्मिक और नैतिक विकास का प्रथम केंद्र भी है। यह वह स्थान है, जहाँ व्यक्ति सत्य, धर्म, प्रेम, त्याग, संयम और कर्तव्य जैसे मूल्यों को आत्मसात करता है। हमारे शास्त्रों में परिवार को धर्म का प्रथम आधार कहा गया है, क्योंकि यहीं से व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए एक जिम्मेदार, नैतिक और सजग नागरिक बनने की नींव रखता है।

परिवार वह पाठशाला है, जहाँ माता-पिता गुरु और देवता के समान, भाई-बहन सहयोग और रक्षा के प्रतीक, और जीवनसाथी प्रेम व समर्पण का आधार बनते हैं। किंतु, आधुनिक युग में भौतिकवाद, उपभोक्तावाद, और स्वार्थपरकता ने परिवार की इस पवित्रता को गहरी चोट पहुँचाई है। आज परिवारों में कलह, ईर्ष्या, वर्चस्व की होड़, मानसिक-शारीरिक शोषण, और अनैतिक आचरण जैसी समस्याएँ आम हो गई हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार के रिश्तों को कैसे परखा जाए? किसका सम्मान किया जाए और किसका परित्याग?

यहां परिवार के लिए सन्मार्गी श्री चित्रगुप्त जी महाराज के देव वंश-अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म लेखनी दैवीय प्रेरणा से इस गहन विषय पर विस्तार से विचार करता है, परिवार में धर्म की पुनःस्थापना के लिए व्यावहारिक सुझाव देता है, और समाज के लिए एक आदर्श मार्ग प्रस्तुत करता है। अंत में इस लेख की समीक्षा रिपोर्ट उत्तर प्रदेश पूर्व शिक्षा सचिव विद्याज्ञान आवासीय विद्यालय के परियोजना निदेशक डाँ एस के माहेश्वरी एवं जवाहर नवोदय विद्यालय मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के प्राचार्य डाँ एसपी त्रिपाठी की कलम से प्रस्तुत है।

परिवार: धर्म का तीर्थ या अधर्म का अखाड़ा?

भारतीय दर्शन में परिवार को एक तपोभूमि माना गया है, जहाँ व्यक्ति अपनी आत्मा को निखारता है और जीवन के उच्च आदर्शों को अपनाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्” अर्थात् धर्म का सार गहराई में छिपा है। यह गहराई परिवार में ही निहित है, जहाँ व्यक्ति सत्य और असत्य, कर्तव्य और विकार, भक्ति और भोग के बीच अंतर समझता है। परिवार वह पवित्र मंदिर है, जहाँ प्रेम, विश्वास, संयम और त्याग के बीज बोए जाते हैं, जो आगे चलकर समाज और राष्ट्र को मजबूत करते हैं। यह वह स्थान है, जहाँ बच्चा माता-पिता से संस्कार, भाई-बहनों से सहयोग, और जीवनसाथी से प्रेम व समर्पण सीखता है।

लेकिन आधुनिक युग में, जब भौतिक सुखों की होड़, व्यक्तिगत स्वार्थ, और अहंकार ने मानव मन को जकड़ लिया है, तब परिवार अपनी इस पवित्रता को खो रहा है। आज हम देखते हैं कि परिवारों में कुछ लोग लगातार अधार्मिक और अनैतिक आचरण को बढ़ावा दे रहे हैं। ये आचरण कई रूपों में प्रकट होते हैं—जैसे असत्य बोलना, दूसरों का चरित्र हनन करना, अनावश्यक तानाशाही थोपना, मानसिक या शारीरिक हिंसा करना, ईर्ष्या और वर्चस्व की भावना को पोषित करना, या परिवार की एकता को तोड़ने वाले कार्य करना। जब ये प्रवृत्तियाँ किसी व्यक्ति के स्वभाव का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं, तब परिवार एक तीर्थ न रहकर, एक रणभूमि बन जाता है।

ऐसे में व्यक्ति के सामने एक गंभीर धर्म-संकट उत्पन्न होता है: क्या वह केवल रक्त संबंधों, सामाजिक परंपराओं, या “लोग क्या कहेंगे” जैसे दबावों के कारण इन रिश्तों को ढोता रहे, या धर्म की कसौटी पर निर्णय ले? शास्त्रों का मार्गदर्शन इस संदर्भ में स्पष्ट और दृढ़ है। मनुस्मृति में कहा गया है, “दुर्जनस्य संगः सर्वदा त्याज्यः” अर्थात् दुर्जन का साथ हर हाल में छोड़ देना चाहिए, चाहे वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो। यदि कोई व्यक्ति परिवार में अधर्म को बढ़ावा दे रहा है और उसका आचरण परिवार की शांति, एकता, और नैतिकता को नष्ट कर रहा है, तो उसका साथ देना धर्म नहीं, बल्कि अधर्म में सहभागिता है।

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धर्म और अधर्म की कसौटी
शास्त्रों का मार्गदर्शन: अधर्म का परित्याग, धर्म का पालन धर्म और अधर्म में अंतर

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म की स्थापना के लिए प्रेरित करते हुए धर्म की परिभाषा मे कहा, “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्” (4.7)। अर्थात्, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब धर्म की रक्षा के लिए कदम उठाना आवश्यक है। यद्यपि यह सन्दर्भ कुरुक्षेत्र के युद्ध से संबंधित था, लेकिन इसका सिद्धांत पारिवारिक जीवन पर भी पूरी तरह लागू होता है।

जब परिवार में कोई व्यक्ति बार-बार अधर्म का आचरण करता है—जैसे छल, कपट, क्रूरता, मानसिक या शारीरिक शोषण, या परिवार की एकता को तोड़ने वाले कार्य—तब उसका साथ देना या उसका व्यवहार सहन करना धर्म नहीं, बल्कि अधर्म में सहभागिता है।


याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति सत्य, प्रेम, और संयम से विमुख होकर परिवार को दुख देता है, तो उसका संग त्यागना चाहिए। यह परित्याग हमेशा शारीरिक दूरी का नहीं होता, यह मानसिक, भावनात्मक, और आध्यात्मिक दूरी भी हो सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई माता-पिता अपने बच्चों को केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं का साधन समझते हैं और उनकी भावनाओं, स्वतंत्रता, या आत्मसम्मान को कुचलते हैं, तो बच्चों का कर्तव्य है कि वे अपनी आत्मा की रक्षा के लिए उनसे दूरी बनाएँ।

यह दूरी शारीरिक रूप से घर छोड़ने की नहीं, बल्कि उनके अनुचित व्यवहार को स्वीकार न करने, उनकी गलत माँगों का विरोध करने, या उनकी नकारात्मकता से स्वयं को अलग करने के रूप में हो सकती है।


इसी तरह, यदि कोई जीवनसाथी अपने साथी के प्रति लगातार अपमानजनक, हिंसक, या कपटी व्यवहार करता है, तो उस रिश्ते को केवल “सामाजिक मान्यता” या “परंपरा” के नाम पर ढोना धर्म नहीं है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है, “सज्जन संगति मोक्षस्य मार्गः, दुर्जन संगति बंधनस्य कारणम्” अर्थात् सज्जनों का साथ मोक्ष का मार्ग है, जबकि दुर्जनों का साथ बंधन का कारण बनता है।

यह सिद्धांत परिवार में भी लागू होता है। यदि कोई व्यक्ति—चाहे वह माता-पिता हों, जीवनसाथी हों, या कोई अन्य रिश्तेदार—लगातार अधर्म का आचरण करता है और परिवार की शांति, एकता, और नैतिकता को नष्ट करता है, तो उसका विरोध करना और आवश्यकता पड़ने पर उससे दूरी बनाना धर्म का पालन है।


यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि परित्याग का अर्थ हमेशा रिश्तों को पूरी तरह तोड़ देना नहीं है। कई बार यह परित्याग मानसिक स्तर पर हो सकता है, जैसे कि उस व्यक्ति के नकारात्मक प्रभाव से स्वयं को बचाना, उनकी बातों को दिल से न लगाना, या उनके अनुचित व्यवहार को बढ़ावा न देना। लेकिन यदि स्थिति अत्यंत गंभीर हो—जैसे कि शारीरिक हिंसा, मानसिक शोषण, या बार-बार का अपमान—तब शारीरिक दूरी बनाना भी आवश्यक हो सकता है। यह कदम कठिन हो सकता है, लेकिन यह आत्मा की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए अनिवार्य है।

धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: परित्याग किसका करें, सम्मान किसका करें?

धर्म और अधर्म की कसौटी
सम्मान का आधार: रिश्ता नहीं, चरित्र और गुण

भारतीय संस्कृति में रिश्तों को ईश्वरतुल्य माना गया है। माता-पिता को ब्रह्मा और विष्णु के समान, भाई को रक्षक, और पत्नी को अर्धांगिनी का दर्जा दिया गया है। लेकिन यह सम्मान केवल रिश्ते के नाम पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, आचरण, और गुणों के आधार पर होना चाहिए।

यदि कोई माता-पिता अपने बच्चे को केवल अपनी इच्छाओं का उपकरण समझते हैं और उसकी भावनाओं, स्वतंत्रता, या आत्मसम्मान को कुचलते हैं, तो वे सम्मान के योग्य नहीं। यदि कोई पति अपनी पत्नी को केवल शारीरिक सुख की वस्तु मानता है और उसका मानसिक या शारीरिक शोषण करता है, तो वह पति नहीं, बल्कि अधर्म का प्रतीक है।


रामायण में भगवान राम ने अपनी माता कैकेयी के प्रति सम्मान दिखाया, लेकिन जब उनके आदेश अधर्म की ओर ले गए, तो उन्होंने धर्म का पालन किया। उन्होंने अपने पिता दशरथ के वचन का सम्मान किया, लेकिन अधर्म को कभी स्वीकार नहीं किया। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी पत्नी सीता के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम दिखाया, लेकिन जब समाज के सामने धर्म की स्थापना का प्रश्न आया, तो उन्होंने कठोर निर्णय लिया।

यही सिद्धांत आज के परिवारों में लागू होता है। सम्मान का आधार रक्त संबंध, सामाजिक परंपराएँ, या “लोग क्या कहेंगे” का दबाव नहीं, बल्कि व्यक्ति का चरित्र, सत्यनिष्ठा, और प्रेमपूर्ण व्यवहार होना चाहिए।


उदाहरण के लिए, यदि एक सास अपनी बहू के साथ लगातार अन्याय करती है, उसका अपमान करती है, या उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है, तो “सास है, सहना पड़ेगा” कहना धर्म नहीं, बल्कि पाखंड है। यह पाखंड न केवल उस बहू के लिए दुख का कारण बनता है, बल्कि पूरे परिवार की नैतिकता को कमजोर करता है। इसी तरह, यदि कोई भाई अपने भाई-बहन के प्रति ईर्ष्या, छल, या हिंसा का व्यवहार करता है, तो उसे केवल “रिश्ते” के नाम पर सम्मान देना उचित नहीं है।

सम्मान उन लोगों का होना चाहिए जो परिवार में प्रेम, सेवा, संयम, और सत्य के मार्ग पर चलते हैं। चाहे वे माता-पिता हों, जीवनसाथी हों, या संतान—उनके गुणों और आचरण को देखकर ही सम्मान का निर्णय लिया जाना चाहिए।


परिवार में जो लोग दूसरों के प्रति सहानुभूति, समझ, और समर्पण दिखाते हैं, उनकी बात सुनें, उनके साथ खड़े रहें, और उनके गुणों को अपनाएँ। उदाहरण के लिए, यदि एक माता-पिता अपने बच्चों को प्रेम और स्वतंत्रता के साथ पालते हैं, उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं, और उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, तो वे सम्मान के पात्र हैं। इसी तरह, यदि एक जीवनसाथी अपने साथी के प्रति प्रेम, विश्वास, और समर्पण दिखाता है, तो वह सम्मान का हकदार है। सम्मान का आधार रिश्ते की औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुण और आचरण होना चाहिए।

धर्म और अधर्म की कसौटी
आधुनिक समाज की विडंबना: अधर्म की चकाचौंध में खोया मनुष्य

आज का समाज एक गंभीर नैतिक और आध्यात्मिक संकट से गुजर रहा है। लोग धर्म, नैतिकता, और पारिवारिक मूल्यों की चर्चा को “पुराना”, “उबाऊ”, या “अप्रासंगिक” मानते हैं। सोशल मीडिया, इंटरनेट, और उपभोक्तावादी संस्कृति ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। यदि कोई लेख, वीडियो, या सामग्री परिवार को जोड़ने, नैतिकता को बढ़ावा देने, या आत्मिक उन्नति की बात करती है, तो उसे “समय की बर्बादी” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

लेकिन यदि कोई सामग्री भोग-विलास, कामुकता, या सनसनीखेज विषयों पर आधारित हो, तो वह लाखों लोगों का ध्यान खींचती है। यह सामाजिक और नैतिक अधःपतन का स्पष्ट संकेत है।


उदाहरण के लिए, यदि कोई लेख “पारिवारिक एकता कैसे बनाएँ”, “धर्म और कर्तव्य का महत्व”, “सहनशीलता और प्रेम से परिवार को कैसे मजबूत करें”, या “आत्मिक शांति के लिए संयम का महत्व” जैसे विषयों पर हो, तो उसे कुछ ही लोग पढ़ते हैं। लेकिन “तंत्र-मंत्र से कामुक सुख”, “पार्टनर बदलने के तरीके”, “फिजिकल रिलेशन के फायदे”, या “धन कमाने के शॉर्टकट” जैसे विषयों पर आधारित सामग्री को लाखों व्यूज मिलते हैं।

यह प्रवृत्ति न केवल शहरी समाज में, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से फैल रही है। यह वह मानसिक और नैतिक पतन है, जो हमारी सांस्कृतिक जड़ों को खोखला कर रहा है।


इसके पीछे एक गहरी विडंबना है। आज लोग तात्कालिक सुख, भौतिक उपलब्धियाँ, और सतही मनोरंजन को ही जीवन का लक्ष्य मान रहे हैं। वे यह भूल रहे हैं कि वास्तविक सुख आत्मा की शांति में है, जो केवल धर्म, नैतिकता, और प्रेम के मार्ग से प्राप्त होता है। सोशल मीडिया पर सनसनीखेज और भोगवादी सामग्री की लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि समाज की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं।

लोग उन विषयों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो उनकी निम्न प्रवृत्तियों को संतुष्ट करते हैं, न कि उन विषयों की ओर जो उनकी आत्मा को ऊँचा उठाते हैं। यह आवश्यक है कि शिक्षित युवा, सजग नागरिक, और धार्मिक विचारधारा के लोग इस अधःपतन के खिलाफ आवाज उठाएँ और अपने परिवारों से ही धर्म की पुनःस्थापना शुरू करें।

धर्म और अधर्म की कसौटी
परिवार में धर्म की स्थापना: विस्तृत व्यावहारिक सुझाव

परिवार में धर्म की पुनःस्थापना के लिए कुछ विस्तृत और व्यावहारिक सुझाव निम्नलिखित हैं, जो न केवल परिवार की शांति और एकता को पुनर्जनन करेंगे, बल्कि समाज के लिए भी एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे— इस कलयुग में – पूत कपूत सूने हैं पर ना माता सूनी कुमाता, समय के साथ उलट गया है, आज की माताएं कुमाता और उनके पूत सपूत देखने के लिए भारी संख्या में मिल रहे हैं। पूर्वजों की वैवाहिक परंपरा में दोनों तरफ से प्रमुख था कुल-खानदान के साथ लड़की लड़के का ननिहाल ददियाऊर को भी देखना आज यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।


1. सत्य और खुले संवाद को प्रोत्साहन—
क्या करें: परिवार में सत्य और खुले संवाद का वातावरण बनाएँ। यदि कोई व्यक्ति गलत आचरण कर रहा है, तो उसका विरोध करें, लेकिन प्रेम, शांति, और समझदारी के साथ। उदाहरण के लिए, यदि कोई परिवार का सदस्य बार-बार असत्य बोलता है या दूसरों का अपमान करता है, तो परिवार के अन्य सदस्यों को एकजुट होकर उससे संवाद करना चाहिए। इस संवाद में स्पष्ट रूप से बताया जाए कि उसका व्यवहार परिवार की शांति को नुकसान पहुँचा रहा है।

कैसे करें: नियमित रूप से परिवार में बैठकर चर्चा करें। सप्ताह में एक बार “पारिवारिक सभा” आयोजित करें, जहाँ हर सदस्य अपनी भावनाएँ, शिकायतें, और सुझाव साझा कर सके। इस सभा में किसी को भी अपमानित या नजरअंदाज न किया जाए। संवाद में सहानुभूति और सम्मान का भाव रखें।

उदाहरण: यदि एक सास अपनी बहू के प्रति तानाशाही रवैया अपनाती है, तो बहू को शांतिपूर्वक अपनी बात रखनी चाहिए, और यदि स्थिति न सुधरे, तो अन्य परिवार के सदस्यों (जैसे पति या ससुर) को इस संवाद में शामिल करना चाहिए।


2. सम्मान का आधार गुण बनाएँ—
क्या करें: परिवार में सम्मान केवल रिश्तों के आधार पर न करें, बल्कि व्यक्ति के चरित्र और आचरण को देखें। जो लोग प्रेम, संयम, और सत्य के मार्ग पर चलते हैं, उनका सम्मान करें और उनके साथ समय बिताएँ।

कैसे करें: परिवार में उन लोगों के गुणों की सराहना करें जो धर्म और नैतिकता का पालन करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक माता-पिता अपने बच्चों को प्रेम और स्वतंत्रता के साथ पालते हैं, तो उनकी प्रशंसा करें और उनके साथ समय बिताएँ। यदि कोई परिवार का सदस्य लगातार अनैतिक व्यवहार करता है, तो उसे स्पष्ट रूप से बताएँ कि उसका व्यवहार अस्वीकार्य है।

उदाहरण: यदि एक भाई अपने छोटे भाई-बहन के प्रति सहानुभूति और सहयोग का व्यवहार करता है, तो उसकी प्रशंसा करें और उसे परिवार का “रोल मॉडल” बनाएँ। लेकिन यदि कोई भाई केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए दूसरों का उपयोग करता है, तो उसका विरोध करें और उसके व्यवहार को प्रोत्साहन न दें।


3. अधर्म का विरोध और परित्याग—
क्या करें: यदि कोई व्यक्ति बार-बार अधर्म का आचरण करता है—जैसे कि हिंसा, छल, या मानसिक शोषण—तो उसका विरोध करें। यदि स्थिति सुधरने की कोई संभावना न हो, तो उससे दूरी बनाएँ।

कैसे करें: विरोध हमेशा शांतिपूर्ण और धर्मसम्मत होना चाहिए। पहले व्यक्ति को समझाने का प्रयास करें। यदि वह नहीं मानता, तो परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर उसे सुधारने की कोशिश करें। यदि फिर भी स्थिति नहीं बदलती, तो मानसिक या शारीरिक दूरी बनाएँ।

उदाहरण: यदि कोई पति अपनी पत्नी के प्रति शारीरिक या मानसिक हिंसा करता है, तो पत्नी को पहले उसे समझाने की कोशिश करनी चाहिए। यदि वह नहीं सुधरता, तो परिवार के अन्य सदस्यों या बाहरी सहायता (जैसे काउंसलर या कानूनी सलाह) की मदद लें। यदि स्थिति गंभीर हो, तो अलग रहने का निर्णय लेना भी धर्मसम्मत हो सकता है।


4. आध्यात्मिकता को बढ़ावा—
क्या करें: परिवार में आध्यात्मिकता को बढ़ावा दें। यह न केवल परिवार की एकता को मजबूत करेगा, बल्कि सदस्यों को सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देगा।

कैसे करें: नियमित रूप से परिवार में शास्त्रों का पाठ, ध्यान, या प्रार्थना करें। उदाहरण के लिए, सप्ताह में एक दिन भगवद्गीता, रामायण, या अन्य शास्त्रों का पाठ करें। बच्चों को इन शास्त्रों की कहानियाँ सुनाएँ और उनके नैतिक मूल्यों को समझाएँ।

उदाहरण: परिवार में हर रविवार को एक घंटा “आध्यात्मिक समय” निर्धारित करें, जहाँ सभी मिलकर ध्यान करें, भजन गाएँ, या शास्त्रों की चर्चा करें। यह न केवल परिवार की एकता को बढ़ाएगा, बल्कि बच्चों में नैतिकता और धर्म के प्रति रुचि भी जगाएगा।


5. प्रेम और सहानुभूति का वातावरण—
क्या करें: परिवार में प्रेम और सहानुभूति का वातावरण बनाएँ। एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें और आपसी समझ को बढ़ावा दें।

कैसे करें: परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का अवसर दें। उनकी समस्याओं को सुनें और समाधान ढूँढने में मदद करें। छोटी-छोटी बातों पर प्रशंसा करें और गलतियों को माफ करने की भावना रखें।

उदाहरण: यदि एक बच्चा स्कूल में असफल होता है, तो उसे डाँटने के बजाय उसकी भावनाओं को समझें और उसे प्रोत्साहित करें। इसी तरह, यदि एक जीवनसाथी तनाव में है, तो उसका साथ दें और उसकी बात सुनें।


6. आदर्श प्रस्तुत करें—
क्या करें: स्वयं धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलें। आपका आचरण ही परिवार के अन्य सदस्यों के लिए प्रेरणा बनेगा।

कैसे करें: अपने व्यवहार में सत्य, प्रेम, और संयम को अपनाएँ। उदाहरण के लिए, यदि आप बच्चों को झूठ न बोलने की सलाह देते हैं, तो स्वयं भी हर स्थिति में सत्य बोलें। यदि आप परिवार में शांति चाहते हैं, तो स्वयं शांत और संयमित रहें।

उदाहरण: यदि आप चाहते हैं कि बच्चे समय का पाबंदी रखें, तो स्वयं समय पर काम करें। यदि आप चाहते हैं कि परिवार में प्रेम हो, तो स्वयं प्रत्येक सदस्य के प्रति प्रेम और सम्मान दिखाएँ।


7. बाहरी सहायता का उपयोग—
क्या करें: यदि परिवार में कोई गंभीर समस्या हो, जैसे कि मानसिक शोषण, हिंसा, या गहरे मतभेद, तो बाहरी सहायता लें।

कैसे करें: परिवार के किसी विश्वसनीय व्यक्ति, काउंसलर, या धार्मिक गुरु से सलाह लें। यदि आवश्यक हो, तो कानूनी सहायता भी लें।

उदाहरण: यदि कोई परिवार का सदस्य बार-बार हिंसा करता है, तो परिवार के अन्य सदस्यों को एकजुट होकर उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। यदि वह नहीं मानता, तो पुलिस या कानूनी सहायता लेना उचित हो सकता है।

धर्म और अधर्म पर सुविचार
निष्कर्ष: धर्म की रक्षा परिवार से शुरू होती है

धर्म की रक्षा का प्रारंभ परिवार से होता है, क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ व्यक्ति सबसे पहले नैतिकता, कर्तव्य, और सत्य का पाठ पढ़ता है। आज जब लोग “स्वतंत्रता” और “आत्मनिर्भरता” की बात करते हैं, तब यह समझना महत्वपूर्ण है कि वास्तविक स्वतंत्रता आत्मा की स्वतंत्रता है, न कि स्वच्छंदता। यदि परिवार में कोई व्यक्ति लगातार अधर्म का आचरण करता है—जैसे कि छल, कपट, हिंसा, या मानसिक शोषण—तो उसका साथ देना धर्म नहीं, बल्कि अधर्म में सहभागिता है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है, “अधर्मस्य सहनं पापम्” अर्थात् अधर्म को सहन करना भी पाप है।


इसलिए, परिवार में उन लोगों का सम्मान करें जो सत्य, प्रेम, संयम, और त्याग के मार्ग पर चलते हैं। उनकी बात सुनें, उनके साथ खड़े रहें, और उनके गुणों को अपनाएँ। लेकिन जो लोग अहंकार, छल, या वासना के वशीभूत होकर परिवार की शांति भंग करते हैं, उनका विरोध करें। यह विरोध शारीरिक दूरी, मानसिक दूरी, या भावनात्मक दूरी के रूप में हो सकता है, जो परिस्थिति पर निर्भर करता है। लेकिन यह सुनिश्चित करें कि आप धर्म के पथ पर अडिग रहें।


परिवार समाज की नींव है। यदि परिवार में धर्म, प्रेम, और नैतिकता का वास होगा, तो समाज और राष्ट्र स्वतः ही धर्ममय हो जाएगा। इसलिए, अपने घर को एक तीर्थ बनाएँ, जहाँ सत्य, प्रेम, और सहानुभूति का निवास हो। यह न केवल आपके परिवार, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के पुनर्निर्माण का मार्ग है। धर्म की स्थापना का यह कार्य छोटा नहीं, बल्कि एक महान संकल्प है, जो परिवार से शुरू होकर विश्व को बदल सकता है। अपने परिवार को धर्म का केंद्र बनाएँ, और इस पवित्र यात्रा में एक नया समाज गढ़ें।
लेख की समीक्षा: धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: परित्याग किसका करें, सम्मान किसका करें?

लेखक अमित श्रीवास्तव का लेखनी धर्म और अधर्म की कसौटी…. की समीक्षा डाँ एस के माहेश्वरी की कलम से
यह लेख भारतीय संस्कृति में परिवार की पवित्रता और धर्म के महत्व को रेखांकित करता है, साथ ही आधुनिक युग में परिवारों में बढ़ती अधार्मिक प्रवृत्तियों, जैसे कलह, ईर्ष्या, और शोषण, पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। लेख का उद्देश्य यह समझाना है कि धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार के रिश्तों को कैसे परखा जाए, किसका सम्मान किया जाए, और किसका परित्याग।

यह भारतीय शास्त्रों, विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता, मनुस्मृति, और रामायण, के सिद्धांतों के आधार पर व्यावहारिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। लेख में विस्तृत विश्लेषण, शास्त्रीय उदाहरण, और व्यावहारिक सुझावों के साथ यह बताया गया है कि परिवार को एक तीर्थस्थल के रूप में कैसे पुनर्जनन किया जाए। समीक्षक पूर्व शिक्षा सचिव उत्तर प्रदेश—शिव नाडर फाउंडेशन द्वारा संचालित विश्व स्तरीय “विद्याज्ञान आवासीय विद्यालय” परियोजना निदेशक- एस के माहेश्वरी।

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सामग्री और संरचना समीक्षक— डाॅ0 एसपी त्रिपाठी नवोदय विद्यालय प्राचार्य मिर्जापुर
लेख की संरचना अत्यंत व्यवस्थित और तार्किक है, जो पाठक को विषय की गहराई तक ले जाती है। यह निम्नलिखित प्रमुख खंडों में विभाजित है—


1. परिचय और परिवार का महत्व: लेख की शुरुआत भारतीय संस्कृति में परिवार को तीर्थस्थल के रूप में स्थापित करती है। यह स्पष्ट करता है कि परिवार धर्म का प्रथम केंद्र है, जहाँ व्यक्ति सत्य, प्रेम, और कर्तव्य सीखता है। यह खंड पाठक का ध्यान आकर्षित करता है और विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।


2. आधुनिक संकट: लेख आधुनिक युग में परिवारों में बढ़ती समस्याओं, जैसे भौतिकवाद, स्वार्थ, और अनैतिक आचरण, का विश्लेषण करता है। यह सामाजिक अधःपतन, विशेष रूप से सोशल मीडिया पर भोगवादी सामग्री की लोकप्रियता, को उजागर करता है, जो पाठक को वर्तमान परिदृश्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।


3. शास्त्रीय मार्गदर्शन: लेख श्रीमद्भगवद्गीता, मनुस्मृति, और रामायण जैसे शास्त्रों के उद्धरणों के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि अधर्म का परित्याग और धर्म का पालन परिवार में कैसे किया जाए। यह खंड विशेष रूप से प्रभावशाली है, क्योंकि यह प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में जोड़ता है।


4. सम्मान और परित्याग का आधार: लेख यह स्थापित करता है कि सम्मान का आधार रक्त संबंध नहीं, बल्कि चरित्र और गुण होने चाहिए। यह विचार कि “सज्जन संगति मोक्ष का मार्ग है” को व्यावहारिक उदाहरणों के साथ समझाया गया है, जो पाठक को स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।


5. आधुनिक समाज की विडंबना: लेख सोशल मीडिया और उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव को उजागर करता है, जो नैतिकता और धर्म की चर्चा को “उबाऊ” मानता है। यह खंड सामाजिक चेतना को जगाने में प्रभावी है और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।


6. व्यावहारिक सुझाव: लेख में परिवार में धर्म की स्थापना के लिए सात विस्तृत और व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं, जैसे सत्य और संवाद को बढ़ावा देना, आध्यात्मिकता को प्रोत्साहन, और अधर्म का विरोध। प्रत्येक सुझाव के साथ “क्या करें”, “कैसे करें”, और “उदाहरण” का प्रारूप इसे अत्यंत उपयोगी और कार्यान्वयन योग्य बनाता है।


7. निष्कर्ष: लेख का निष्कर्ष प्रेरणादायक है, जो परिवार को समाज और राष्ट्र की नींव के रूप में स्थापित करता है। यह पाठक को अपने परिवार को धर्म का केंद्र बनाने और समाज के पुनर्निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करता है।

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धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: परित्याग किसका करें, सम्मान किसका करें?

JINDAGI JHAND HAI PHIR BHI GHAMAND HAI: जिंदगी झंड है, फिर भी घमंड है: आज के युवक-युवतियों और दम्पतियों पर 1 हास्यास्पद व्यंग्यात्मक डिजिटल प्रेमकथा

jindagi jhand hai phir bhi ghamand hai — आज की जिंदगी बड़ी तेज हो गई है। इतनी तेज कि आदमी को खुद समझ नहीं आता कि वह जिंदगी जी रहा है या जिंदगी उसे जी रही है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है, रात आंख बंद होने से पहले आखिरी बार … Read more
धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: परित्याग किसका करें, सम्मान किसका करें?

विकसित भारत की संकल्पना के शिल्पकार है नरेंद्र मोदी: September 17 सभा कुंवर कुशवाहा

उत्तर प्रदेश देवरिया। September 17 बृहस्पतिवार को भाटपार रानी मंडल के भाजपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने मंडल अध्यक्ष विशंभर पांडेय की अध्यक्षता में भाटपार रानी उपनगर स्थित हरि ब्रह्मा बाबा के मंदिर में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर स्वच्छता कार्यक्रम के अंतर्गत साफ-सफाई किया। एवं ग्राम पंचायत बेलपार पंडित … Read more
धर्म और अधर्म की कसौटी पर परिवार: परित्याग किसका करें, सम्मान किसका करें?

बॉलीवुड कैलाश खेर सिंगर ने मिस एशिया वर्ल्ड विनर निधि सिंह से की मुलाकात, उज्ज्वल भविष्य की दी शुभकामनाएं

बॉलीवुड कैलाश खेर सिंगर ने मिस एशिया वर्ल्ड वियतनाम विनर निधि सिंह से मुलाकात कर उन्हें उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं। जानिए निधि सिंह की उपलब्धियों, सामाजिक सेवा, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से जुड़ी पूरी खबर। एंकर: बॉलीवुड के मशहूर और लोकप्रिय गायक कैलाश खेर ने मिस एशिया वर्ल्ड वियतनाम की विनर निधि सिंह … Read more
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Sex Positions तंत्र, धर्म, विज्ञान और ज्योतिष के 5000 वर्षों के छुपे राज

Sex Positions सेक्स पोजीशन का गुप्त रहस्य वो गुप्त ज्ञान जो कभी आम लोगों को नहीं बताया गया — पूर्ण दांपत्य सुख और आत्मिक मिलन का प्रतिबंधित मार्गदर्शक amitsrivastav.in लेखक: अमित श्रीवास्तव विषय सूची भूमिका भाग 1 — छुपा हुआ इतिहास अध्याय 1: वो गुप्त शास्त्र जो सदियों तक छुपाए गए अध्याय 2: कामसूत्र का असली … Read more
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माँ की ममता — wonderful महाग्रंथ श्रृंखला खंड 1,2,3

क्या हम सचमुच अपनी माँ को समझ पाए हैं? “माँ की ममता” महाग्रंथ-श्रृंखला — केवल एक पुस्तक नहीं, समाज के आत्ममंथन का दस्तावेज़ है जहाँ माँ पर बहुत लिखा गया है। कविताएँ लिखी गईं, गीत लिखे गए, कहानियाँ लिखी गईं, आँसू बहाए गए, श्रद्धा व्यक्त की गई और माँ को धरती पर ईश्वर का रूप … Read more
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सुखी दांपत्य जीवन: प्रेम, सम्मान और संवाद की संपूर्ण यात्रा

क्या केवल विवाह कर लेना ही सुखी दांपत्य जीवन की गारंटी है?यदि ऐसा होता, तो दुनिया में इतने अधिक वैवाहिक तनाव, बढ़ती दूरियाँ, लगातार होने वाले विवाद, भावनात्मक अकेलापन और टूटते रिश्ते दिखाई नहीं देते। वास्तविकता यह है कि विवाह जीवन की सबसे सुंदर यात्राओं में से एक है, लेकिन यह सबसे चुनौतीपूर्ण यात्राओं में … Read more
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क्या वास्तव में होती हैं अप्सराएँ? mrigakshi apsara का रहस्य, शास्त्रीय परंपरा, तांत्रिक विमर्श और 1 आध्यात्मिक दृष्टि

क्या अप्सराएँ केवल पौराणिक कथा हैं या भारतीय शास्त्रों का गहन प्रतीक? Mrigakshi Apsara मृगाक्षी अप्सरा, वैदिक संदर्भ, शक्ति परंपरा और शोधपरक तंत्र-मंत्र साधना विधि-विधान के साथ विश्लेषण पढ़ें। पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा अप्सरा साधना महाग्रंथ श्रृंखला 64 में प्रथम शिर्षक मृगाक्षी अप्सरा साधना महाग्रंथ mrigakshi apsara mantra सम्पूर्ण विधि-विधान सहित amozan पर eBook एवं … Read more
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बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग | काल भैरव मंत्र, पूजा विधि और उपाय

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग काल भैरव की पूजा विधि, मंत्र और उपाय भगवान बटुक भैरव की पूजा विधि, शक्तिशाली कार्य सिद्धि मंत्र, अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र, कवच पाठ और शत्रु नाशक प्रभावी उपाय जानिए। कालभैरवाष्टमी पर विशेष प्रयोग से असंभव कार्य सिद्ध होंगे और शत्रु परेशान करना छोड़ देंगे। भैरव कृपा प्राप्त … Read more

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