भाषा शिक्षण का महत्व: समाज-संस्कृति का सेतु और व्यक्तित्व का निर्माण 1 Wonderful संपादकीय लेख – अभिषेक कांत पाण्डेय

Amit Srivastav

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भाषा शिक्षण का महत्व केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि वह एक जीवंत माध्यम है जो वर्तमान की घटनाओं को समझने, उनका विश्लेषण करने और उन्हें भावी पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे प्रभावी साधन है। साहित्यकार वर्तमान घटनाक्रम को अपनी दृष्टि से प्रस्तुत करता है और वह दृष्टिकोण हर व्यक्ति तक पहुंचता है — चाहे वह वैज्ञानिक हो, सामाजिक कार्यकर्ता हो या राजनीतिक व्यक्तित्व।

गंभीर लेखन में ही समस्याओं के समाधान छिपे होते हैं। यही कारण है कि बालकों और बालिकाओं में भाषा के माध्यम से सामाजिक समझ, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और स्वयं की अभिव्यक्ति का विकास करना शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए।

भाषा शिक्षण का महत्व: समाज-संस्कृति का सेतु और व्यक्तित्व का निर्माण संपादकीय लेख - अभिषेक कांत पाण्डेय

भाषा शिक्षण का महत्व: समाज-संस्कृति का सेतु और व्यक्तित्व का निर्माण संपादकीय लेख – अभिषेक कांत पाण्डेय

आज के नए पाठ्यक्रम में इन बातों का विशेष ध्यान रखा गया है। सामाजिक जीवन, नैतिक मूल्य और व्यावसायिक कुशलता को विकसित करने के लिए भाषा शिक्षण को केंद्र में रखा गया है। शिक्षा के माध्यम से हम भाषा प्राप्त करते हैं, लेकिन भाषा शिक्षण ही उस बोलचाल की भाषा को साहित्यिक, वैचारिक और उन्नत रूप प्रदान करता है। भाषा शिक्षण की महत्ता को कम नहीं आंका जा सकता। यह सामाजिक उत्थान और आत्म-उत्थान दोनों का महत्वपूर्ण कारक है।


जिस प्रकार नदी, पेड़, पहाड़, लोग और उनकी विचारधारा साहित्य में अपना स्थान पाते हैं, उसी प्रकार भाषा और संस्कृति एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़ी हुई हैं। साहित्य छन्नी की तरह कार्य करता है — अशुद्धियों को अलग कर सद्गुणों को अपने में समाहित कर लेता है और आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है।


उदाहरण के लिए, प्रेमचंद की कहानी कफन को लें। यह कहानी सामाजिक शोषण, गरीबी और जमींदारी व्यवस्था की कठोर सच्चाई को इतनी सरल भाषा में प्रस्तुत करती है कि पढ़ने वाला स्वयं सोचने लगता है — क्या हमारी व्यवस्था सही दिशा में जा रही है? इसी प्रकार, सूरदास, तुलसीदास और कबीर की काव्य पंक्तियाँ विद्यार्थियों तथा जनमानस में नैतिक मूल्यों का बीज बोती हैं। भाषा शिक्षण के बिना ये मूल्य केवल किताबों में सिमटकर रह जाते हैं।


भाषा शिक्षक की भूमिका यहाँ सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षक को सामाजिक वातावरण, मानवीय व्यवहार और समसामयिक प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन तथा चिंतन करना चाहिए। वह विद्यार्थियों में चिंतनशील विश्लेषण की क्षमता विकसित करे, ताकि बच्चे स्वयं समाज की समस्याओं को समझ सकें। उदाहरणस्वरूप, यदि कक्षा में किसी बालक को ‘नोटबंदी’ या ‘कोविड महामारी’ जैसे विषय पर निबंध लिखने को कहा जाए, तो वह भाषा के माध्यम से न केवल तथ्य प्रस्तुत करेगा, बल्कि अपनी भावनाओं, आलोचना और समाधान भी व्यक्त करेगा। इस प्रकार भाषा समस्या-समाधान का सशक्त औजार बन जाती है।


भाषा शिक्षण देते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों में कविता, गीत, संगीत और विचार शैली के प्रति रुझान विकसित हो। लिखित भाषा जितनी गौरवशाली इतिहास रच चुकी है, मौखिक भाषा उतनी ही शक्तिशाली है। जब कोई बच्चा स्कूल में ‘माँ’ पर कविता सुनाता है या ‘स्वतंत्रता दिवस’ पर भाषण देता है, तो वह अपनी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाता है। मौखिक भाषा जन-जन तक पहुंचती है और समाज में परिवर्तन लाती है — जैसे महात्मा गांधी की ‘नमक सत्याग्रह’ की भाषण-शैली ने पूरे देश को एकजुट किया।


संक्षेप में, भाषा शिक्षण केवल व्याकरण या शब्दावली का अध्ययन नहीं है। यह समाज को समझने, संस्कृति को संरक्षित करने, व्यक्तित्व को निखारने और समस्याओं का समाधान खोजने का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि हम अपनी शिक्षा प्रणाली में भाषा शिक्षण को प्राथमिकता देते हैं, तो आने वाली पीढ़ी न केवल ज्ञानी बनेगी, बल्कि जागरूक, संवेदनशील और सशक्त नागरिक भी बनेगी। भाषा शिक्षक का दायित्व है कि वह इस जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाए, क्योंकि भाषा ही वह सेतु है जो अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ता है।

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आइए, हम सब मिलकर भाषा शिक्षण को उत्कृष्टता की दिशा में ले चलें — क्योंकि भाषा सिखाना मतलब जीवन सिखाना है।

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