Kamandal Politics 1990 का दशक भारतीय राजनीति का सबसे उथल-पुथल वाला दौर था। एक तरफ मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने से जाति-आधारित सामाजिक न्याय (Mandal Politics) की लहर उठी, तो दूसरी तरफ राम मंदिर आंदोलन और हिंदुत्व की राजनीति (Kamandal Politics) ने इसका जवाब दिया।
‘कमंडल’ शब्द हिंदू संन्यासियों द्वारा इस्तेमाल होने वाले जलपात्र (कमंडलु) से लिया गया है, जो प्रतीकात्मक रूप से धार्मिक पहचान और हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया। यह शब्द इसलिए चुना गया क्योंकि यह ‘मंडल’ से तुकबंदी करता था और राजनीतिक विमर्श में इसे एक मजबूत काउंटर-नैरेटिव के रूप में इस्तेमाल किया गया।
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कहानी शुरू होती है 7 अगस्त 1990 से, जब प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद में घोषणा की कि मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण दिया जाएगा। यह फैसला देश में तूफान ला दिया। उत्तर भारत के शहरों में छात्रों, खासकर ऊपरी जातियों के युवाओं ने भयंकर विरोध किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने 19 सितंबर 1990 को खुद को आग लगा ली, जो विरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। सड़कों पर आगजनी, रेल रोको, कॉलेज बंद, और लगभग 200 आत्मदाह के प्रयास हुए, जिनमें से 62 मौतें हुईं। यह आंदोलन मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के युवाओं का था, जो महसूस कर रहे थे कि उनकी मेरिट और भविष्य खतरे में पड़ गया है।
इस पूरे उथल-पुथल के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने एक चतुर राजनीतिक कदम उठाया। उन्होंने मंडल की जाति-आधारित राजनीति का जवाब हिंदू एकता और राम मंदिर के मुद्दे से दिया। BJP के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा शुरू की।
यह यात्रा करीब 10,000 किलोमीटर लंबी थी, जिसमें 10 राज्यों से गुजरते हुए लाखों लोग शामिल हुए। यात्रा के दौरान लोग आडवाणी के रथ पर सिक्के फेंकते, उनके पैर छूते, और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाते। यह यात्रा हिंदुत्व की राजनीति को जन-जन तक पहुंचाने का सबसे बड़ा जनसंपर्क अभियान था।

रथ यात्रा का उद्देश्य स्पष्ट था—
– मंडल से उपजे जातिगत विभाजन का मुकाबला हिंदू एकता से करना।
– राम जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण का मुद्दा गरमाना।
– वोट बैंक को मजबूत करना, खासकर उन हिंदुओं का जो जाति से ऊपर उठकर धार्मिक पहचान में एकजुट हो सकें।
यात्रा के दौरान कई जगह दंगे हुए, लेकिन इसका प्रभाव जबरदस्त था। बिहार में मुलायम सिंह यादव सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन इससे यात्रा और ज्यादा चर्चित हो गई। BJP ने इस आंदोलन से उत्तर भारत में अपनी स्थिति मजबूत की। 1991 के चुनाव में पार्टी ने भारी बढ़त हासिल की।
6 दिसंबर 1992 को कूटरचित तरीके से निर्मित बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने इस आंदोलन को चरम पर पहुंचा दिया। कारसेवकों की भीड़ ने मस्जिद ढहा दी, जिससे देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़के। इस घटना ने हिंदुत्व को एक नया आयाम दिया, लेकिन साथ ही BJP को भी राजनीतिक चुनौतियां दीं। फिर भी, लंबे समय में यह आंदोलन BJP को 1998 में सत्ता तक ले गया और 2014 में मोदी युग की शुरुआत हुई।
कमंडल आंदोलन की असली सफलता यह रही कि यह मंडल की राजनीति को चुनौती देने में कामयाब रहा। जहां मंडल ने ओबीसी और दलित वोटबैंक को मजबूत किया (जैसे लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव), वहीं कमंडल ने हिंदू वोट को एकजुट किया। यह दौर मंडल बनाम कमंडल के नाम से जाना गया।

आज भी यह कहानी प्रासंगिक है। राम मंदिर का निर्माण 2024 में पूरा हुआ, जो कमंडल की राजनीति की सबसे बड़ी जीत मानी जाती है। लेकिन जाति जनगणना और आरक्षण की बहस आज भी मंडल की याद दिलाती है। यह दो विरोधी विचारधाराओं की कहानी है, जो एक-दूसरे को मजबूत करती रहीं और भारतीय लोकतंत्र को नया आकार देती रहीं।
यह आंदोलन सिर्फ मंदिर या आरक्षण का नहीं था—यह पहचान की राजनीति का युग था, जो आज भी जारी है। amitsrivastav.in पर उपलब्ध है दुर्लभ से दुर्लभ जानकारी बेल आइकॉन को दबा एक्सेप्ट करें एप्स इंस्टाल करें और अपनी-अपनी मनपसंद लेखनी पढ़ें।
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