यहाँ कोई बिकाऊ नहीं (कविता)

Amit Srivastav

क्या पत्रकारिता अब सत्ता की गुलाम बन चुकी है? Has journalism, share market

इस कविता “यहाँ कोई बिकाऊ नहीं” में सत्ता, पत्रकारिता और आत्मा की आज़ादी के संघर्ष को तीखे शब्दों में उकेरा गया है, जहाँ कलम शैतान जैसे लालच और भ्रष्टाचार के खिलाफ अडिग खड़ी रहती है।

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वह पहले तुम्हारी पत्रकारिता खरीदेगा, 
अगर तुमने न बेची, तो तुम्हें ही खरीद लेगा। 
इस सौदे को कभी स्वीकार न करना, 
वरना तुम्हारा वजूद मिट जाएगा। 
देश की एकता, अखंडता, 
तुम्हारी कलम पर टिकी है। 
सत्ता कईयों को खरीद रही है, 
तौल रही है, मोल-भाव कर रही है। 
वह हर ताकत को अपने में समेटना चाहती, 
शैतान के साथ ठहाके लगाने को।


कल जो बिका था, 
उसका शरीर और आत्मा आपस में झगड़ रहे थे। 
वह एक नहीं, दो हिस्सों में बँटा था— 
एक सत्ता के लिए, दूसरा स्वयं के लिए। 
अचानक उसके रगों में खून उबलने लगा, 
नसें तन गईं, हर कतरा जोश में आया। 
उसके खून ने आत्मा को झकझोरा, 
नई कविता के हवाले से उसने कहा— 
“यहाँ बिकाऊ कोई नहीं!”


लोगों ने सवाल उठाया, “वह बिक गया!” 
दूसरे बोले, “सब बिक गए!” 
तीसरे ने कहा, “एक अभी बचा है, जो नहीं बिका।” 
चौथे ने पुकारा, “एक नहीं, अनेक नहीं बिके!” 
यह बात जब शैतान के कानों तक पहुँची, 
वह क्रोध में लाल हो उठा। 
“बिके हुए की आत्मा मेरे पास है, 
क्या अभी कुछ ही बिके हैं?”


क्रोध में शैतान की आँखें लाल हो गईं। 
जब बिके हुए ने जाना कि वे चुनिंदा हैं, 
उन्होंने भी बगावत कर दी। 
कलम थामे, वे अपने शरीरों की ओर दौड़े। 
बिकी आत्माएँ चीख उठीं, “हम नहीं बिके!” 
तभी पाँचवाँ बोला, “हाँ, कोई नहीं बिका!”


शैतान दौड़ता हुआ आया, 
फिर से लालच बिखेरने लगा। 
बिकी आत्माएँ कलम लिए शैतान की ओर बढ़ीं। 
शैतान घिर गया, 
सारी कलमें उसे खत्म करने को तैयार। 
सदियों पीछे भाग गया शैतान।


कलम आज भी चल रही है, 
ताकि कोई न बने शैतान।

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav

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