शिव पुराण भाग 1

Amit Srivastav

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“शिव पुराण” हिंदू धर्म के प्रमुख पुराणों में से एक है और यह शिव पुराण भाग 1 भगवान शिव की महिमा का बखान करता है। यह पुराण कई खंडों में विभाजित है और इनमें से पहला भाग शिव पुराण की मुख्य कथाओं और भगवान शिव के महात्म्य का वर्णन करता है।

तो इस श्रावण मास भगवान शिव की महिमा और इनसे जुड़े वृतांत को जानिए भगवान चित्रगुप्त वंशज अमित श्रीवास्तव की कलम से। नियमित हमारे पोस्ट को पढ़ते रहिए एक एक गुण रहस्यों को आप पाठकों तक अपनी लेखनी से प्रदान करना हमारा कर्म और धर्म है तो भगवान शिव के पवित्र श्रावण मास में जानिये शिव से जुड़ी ऐतिहासिक और रहस्यमयी जानकारी। हमारे साइट amitsrivastav.in पर नये हैं तो हर प्रकार की सुयोग्य सुस्पष्ट लेखनी पढ़ने के लिए बेल आइकन को दबा एक्सेप्ट करें यहा प्रमुख विषय हैं-

सृष्टि की उत्पत्ति:

शिव पुराण भाग 1

इस खंड में ब्रह्मांड की उत्पत्ति और सृष्टि के विभिन्न तत्वों का वर्णन किया गया है।
शिव पुराण में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन व्यापक और विस्तृत रूप से किया गया है। यहां सृष्टि की उत्पत्ति के प्रमुख चरणों का संक्षिप्त विवरण दे रहे हैं।

प्रारंभिक शून्यता (प्रलय):

सृष्टि के प्रारंभ में केवल शून्यता थी। इस अवस्था को “प्रलय” कहते हैं। इसमें न तो कोई जीव था, न पृथ्वी, न आकाश और न ही कोई अन्य तत्व।

आदि पुरुष (भगवान शिव) का उद्भव:

प्रलय के बाद, आदि पुरुष भगवान शिव प्रकट होते हैं। वे अनंत, निराकार और अद्वितीय हैं। शिव ही सृष्टि के प्रथम कारण हैं और उन्हीं से सृष्टि का आरंभ होता है।

शिव और शक्ति का मिलन:

भगवान शिव और आदिशक्ति स्वरुपा उनकी शक्ति (पार्वती) के संयोग से सृष्टि की रचना आरंभ होती है। शिव शक्ति के बिना अपूर्ण हैं, और शक्ति के बिना सृष्टि संभव नहीं है। इस संयोग से आद्याशक्ति और परमात्मा का स्वरूप प्रकट होता है।

महत्तत्त्व और पंचमहाभूत:

सदाशिव से महत्तत्त्व (महान तत्व) की उत्पत्ति होती है। यह महत्तत्त्व तीन गुणों – सत्व, रजस और तमस – से मिलकर बना होता है। फिर महत्तत्त्व से पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की उत्पत्ति होती है।

हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) की उत्पत्ति:

शिव की इच्छा से हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति होती है, जिन्हें ब्रह्मा कहा जाता है। ब्रह्मा सृष्टि के निर्माता होते हैं और उन्हीं के द्वारा समस्त जीवों और पदार्थों की रचना होती है।

जीवों और अन्य तत्वों की रचना:

ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की विस्तृत रचना की जाती है। वे देवताओं, मनुष्यों, असुरों, पशु-पक्षियों, और अन्य जीवों की उत्पत्ति कर्ता हैं। इसके साथ ही पर्वत, नदियां, सागर, वनस्पति और अन्य प्राकृतिक तत्वों की रचना भी की जाती है।

समुद्र मंथन और अन्य प्रमुख घटनाएं:

शिव पुराण में सृष्टि की उत्पत्ति के बाद की कई घटनाओं का भी वर्णन है, जैसे कि समुद्र मंथन, शिव का तांडव नृत्य, और शिव के विभिन्न अवतारों की कथाएं।
इस प्रकार, शिव पुराण सृष्टि की उत्पत्ति को शिव की महिमा और उनकी शक्ति के माध्यम से विस्तृत रूप में प्रस्तुत करता है।

शिव की महिमा:

भगवान शिव की महानता और उनकी विभिन्न लीलाओं का वर्णन।
शिव पुराण में भगवान शिव की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। भगवान शिव को महादेव, त्रिलोचन, नीलकंठ, भोलेनाथ आदि कई नामों से पुकारा जाता है। उनकी महिमा का उल्लेख विभिन्न कथाओं और घटनाओं के माध्यम से किया गया है। यहां भगवान शिव की महिमा के कुछ प्रमुख पहलुओं का विवरण दिया गया है।

निर्विकारी और निराकार:

भगवान शिव को निर्विकारी और निराकार कहा गया है। वे सभी गुणों से परे हैं और उनका कोई विशेष रूप या आकार नहीं है। उन्हें आदि और अनंत माना जाता है, जिनका न कोई प्रारंभ है और न कोई अंत।

विनाश और सृजन के देवता:

शिव को संहार का देवता माना जाता है। वे सृष्टि का संहार करते हैं ताकि नई सृष्टि की रचना हो सके। इस कारण उन्हें पुनः सृजनकर्ता भी कहा जाता है। उनका तांडव नृत्य इस संहार और सृजन का प्रतीक है।

त्रिलोचन (तीन नेत्र):

भगवान शिव के तीन नेत्र हैं। उनका तीसरा नेत्र ज्ञान और विध्वंस का प्रतीक है। जब वे तीसरा नेत्र खोलते हैं, तो संहार होता है, लेकिन यह संहार नए सृजन का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

नीलकंठ:

समुद्र मंथन के समय निकले विष को शिव ने पी लिया था ताकि वह संसार को नष्ट न कर सके। इस विष के कारण उनका कंठ नीला हो गया और वे “नीलकंठ” कहलाए। यह घटना उनकी करुणा और संसार की रक्षा के प्रति उनकी समर्पण को दर्शाती है।

अर्धनारीश्वर:

भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप उनकी और देवी पार्वती की एकता को दर्शाता है। यह रूप पुरुष और स्त्री ऊर्जा के समन्वय का प्रतीक है और यह बताता है कि सृष्टि के संचालन के लिए स्त्री व पुरुष का संतुलन आवश्यक है।

भोलेनाथ:

शिव को भोलेनाथ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “भोले स्वामी”। शिव सरल हृदय और करुणावान हैं। अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को वरदान देते हैं।

शिवलिंग:

शिव पुराण भाग 1

शिवलिंग शिव का प्रतीकात्मक रूप है। यह उनके अनादि और अनंत स्वरूप का प्रतीक है। शिवलिंग की पूजा से भक्त भगवान शिव की कृपा प्राप्त करते हैं और उनकी महिमा का अनुभव करते हैं।

कृपा और दया के सागर:

भगवान शिव अपने भक्तों के प्रति अत्यंत कृपालु और दयालु हैं। उनकी भक्ति करने वाले भक्तों को वे जीवन के कष्टों से मुक्त करते हैं और उन्हें मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं।

विभिन्न अवतार:

शिव पुराण में भगवान शिव के विभिन्न अवतारों और उनकी लीलाओं का भी वर्णन है। इन अवतारों के माध्यम से उन्होंने विभिन्न असुरों का वध किया और धर्म की स्थापना की।
भगवान शिव की महिमा अनंत और अपरंपार है। उनकी भक्ति और आराधना से भक्तों को शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

शिवलिंग की पूजा:

शिवलिंग की महत्ता और पूजा विधि का वर्णन।
शिवलिंग की पूजा हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना का एक प्रमुख रूप है। शिवलिंग को शिव के निराकार और अनंत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। शिव पुराण और अन्य शास्त्रों में शिवलिंग की पूजा की महत्ता और विधियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। यहाँ शिवलिंग की पूजा के प्रमुख चरणों और विधियों का विवरण दिया गया है।

शिवलिंग की पूजा विधि:

स्नान और शुद्धिकरण:

  – पूजा करने से पहले स्वयं को स्नान करके शुद्ध करें।
   – स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन को शांत एवं एकाग्र करें।

शिवलिंग का अभिषेक:

   – शिवलिंग को गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, और शर्करा से अभिषेक करें। इसे पंचामृत अभिषेक कहते हैं।
   – इसके बाद, शुद्ध जल से शिवलिंग को स्नान कराएं।

बिल्वपत्र अर्पण:

   – भगवान शिव को बिल्वपत्र अत्यंत प्रिय हैं। तीन पत्तों वाला बिल्वपत्र शिवलिंग पर अर्पित करें। ध्यान रखें कि बिल्वपत्र का उल्टा भाग न हो।

फूल और धतूरा अर्पण:

   – शिवलिंग पर सफेद और अन्य पुष्प चढ़ाएं। धतूरा और आक के पुष्प भी शिव को प्रिय हैं।

चन्दन और भस्म:

   – शिवलिंग पर चन्दन का लेप करें और भस्म अर्पित करें। चन्दन शीतलता का प्रतीक है और भस्म शिव की अर्धनारीश्वर स्वरूप की शक्ति का प्रतीक है।

धूप और दीप:

   – धूप और दीप जलाकर शिवलिंग के सामने रखें। यह पूजा के वातावरण को पवित्र और सुखद बनाता है।

नैवेद्य अर्पण:

   – भगवान शिव को फल, मिठाई, और अन्य नैवेद्य अर्पित करें। उन्हें बेलपत्र, भांग, धतूरा आदि भी चढ़ाएं, जो उन्हें प्रिय होते हैं।

आरती:

   – भगवान शिव की आरती करें। आरती करते समय शिव के मंत्रों और स्तोत्रों का उच्चारण करें। आरती के बाद भगवान से क्षमायाचना करें।

प्रसाद वितरण:

  – पूजा के बाद अर्पित नैवेद्य को प्रसाद रूप में भक्तों के बीच बांटें।

शिवलिंग पूजा के मंत्र:

शिवलिंग की पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण किया जा सकता है:-

ॐ नमः शिवाय:

यह भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र है और अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।

मृत्युंजय मंत्र:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
  उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

शिव पञ्चाक्षर स्तोत्र:

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
  नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नमः शिवाय।।

शिवलिंग पूजा के लाभ:

– शिवलिंग की पूजा से भक्तों के सभी कष्ट और दुख दूर होते हैं।
– जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
– भगवान शिव की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
– मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
शिवलिंग की पूजा भगवान शिव की आराधना का सरल और प्रभावी माध्यम है। इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और भगवान शिव की अपार कृपा प्राप्त होती है।

सती और पार्वती की कथा:

सती के जन्म, उनके तपस्या और भगवान शिव से विवाह की कथा।
शिव पुराण में सती और पार्वती की कथा अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक है। यह कथा भगवान शिव और उनकी पत्नियों सती और पार्वती के संबंध में है। यहाँ दोनों कथाओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।

सती की कथा:

शिव पुराण भाग 1

सती का जन्म और विवाह:

सती का जन्म: सती का जन्म दक्ष प्रजापति और प्रसूति की पुत्री के रूप में हुआ था। सती भगवान शिव की महान भक्त थीं।
विवाह: सती की कठोर तपस्या और भगवान शिव की कृपा से उनका विवाह शिव से हुआ।

दक्ष का यज्ञ:

एक बार दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। सती, जो अपने पिता के यज्ञ में जाने की इच्छा रखती थीं, शिव से अनुमति लेकर वहाँ पहुंचीं।

सती का अपमान:

यज्ञ स्थल पर दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। सती अपने पति के अपमान को सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञ अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।

शिव को अपमानित करने का परिणाम:

शिव का क्रोध:

सती की मृत्यु से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया।

सती का पुनर्जन्म:

सती ने पार्वती के रूप में हिमालय पर्वत के राजा हिमावन और रानी मैना के घर जन्म लिया।

पार्वती की कथा:

पार्वती का जन्म और तपस्या:

पार्वती का जन्म:

पार्वती का जन्म हिमालय और मैना के घर में हुआ। वे सती का पुनर्जन्म थीं और भगवान शिव की आराधना करने के लिए जन्मी थीं।

तपस्या:

पार्वती ने कठोर तपस्या की ताकि वे भगवान शिव को फिर से अपने पति के रूप में प्राप्त कर सकें। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।
विवाह का आयोजन: भगवान शिव और पार्वती का विवाह हिमालय पर्वत पर अत्यंत धूमधाम से हुआ। इस विवाह में सभी देवता, ऋषि-मुनि और अन्य देवी-देवता उपस्थित हुए।

पार्वती की महिमा:

शक्ति का रूप:

पार्वती भगवान शिव की अर्धांगिनी और शक्ति का रूप हैं। वे दुर्गा और काली के रूप में भी पूजित हैं।

पार्वती के संतान:

शिव और पार्वती के दो पुत्र, गणेश और कार्तिकेय, हैं। गणेश विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता हैं, जबकि कार्तिकेय युद्ध और विजय के देवता हैं।

पार्वती और शिव की लीलाएं:

अर्धनारीश्वर:

शिव और पार्वती का अर्धनारीश्वर रूप आधे पुरुष और आधे स्त्री का अद्वितीय समन्वय है, जो यह दर्शाता है कि शिव और शक्ति अविभाज्य हैं।

शिव की तपस्या भंग:

पार्वती ने अपनी तपस्या और भक्ति से शिव की कठोर तपस्या को भंग कर दिया और उन्हें गृहस्थ जीवन में लौटने के लिए प्रेरित किया।
सती और पार्वती की कथा भगवान शिव की महिमा और उनकी अनन्य भक्ति का प्रतीक है। यह कथा हमें भक्ति, प्रेम, और तपस्या के महत्व को समझाती है और भगवान शिव और पार्वती के दिव्य संबंध को प्रकट करती है।

शिव पुराण भाग 1 भगवान शिव का विभिन्न अवतार:

भगवान शिव के विभिन्न अवतारों और उनकी लीलाओं का वर्णन।
शिव पुराण और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान शिव के विभिन्न अवतारों का वर्णन मिलता है। ये अवतार विशेष रूप से संसार के संकटों को दूर करने और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट हुए थे। यहाँ भगवान शिव के कुछ प्रमुख अवतारों का वर्णन किया गया है।

वीरभद्र अवतार:

प्रसंग: दक्ष यज्ञ के समय भगवान शिव ने सती के अपमान और उनकी मृत्यु के बाद अपने क्रोध से वीरभद्र को उत्पन्न किया।
कारण: वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया और दक्ष का वध किया। यह अवतार शिव के क्रोध और उनके अनुयायियों की रक्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

भैरव अवतार:

प्रसंग: ब्रह्मा द्वारा शिव का अपमान करने के बाद भगवान शिव ने भैरव का अवतार लिया।
कारण: ब्रह्मा के पाँचवें सिर को काटने के लिए भैरव का प्रकट होना।
महत्त्व: भैरव को काशी का रक्षक माना जाता है और उनकी पूजा विशेष रूप से तंत्र साधना में की जाती है।

अर्धनारीश्वर अवतार:

प्रसंग: शिव और पार्वती के संयुक्त रूप में अर्धनारीश्वर का अवतार प्रकट हुआ।
कारण: यह अवतार पुरुष और स्त्री ऊर्जा के संतुलन और समन्वय का प्रतीक है।
महत्त्व: यह अवतार यह दर्शाता है कि शिव और शक्ति अविभाज्य हैं और सृष्टि का संचालन दोनों की संयुक्त ऊर्जा से होता है।

नंदी अवतार:

प्रसंग: शिव ने नंदी को अपने गणों का प्रमुख बनाया।
कारण: नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं और शिव के वाहन के रूप में भी जाने जाते हैं।
महत्त्व: नंदी की पूजा शिवलिंग के सामने की जाती है और वे शिव के संदेशवाहक के रूप में माने जाते हैं।

पिप्पलाद अवतार:

प्रसंग: शनि के प्रकोप से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव ने पिप्पलाद का अवतार लिया।
कारण: पिप्पलाद ने अपनी तपस्या से शनि को पराजित किया और भक्तों को उनके प्रकोप से मुक्त किया।
महत्त्व: यह अवतार यह दर्शाता है कि भगवान शिव भक्तों के संकटों को दूर करने के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।

हनुमान अवतार:

प्रसंग: भगवान शिव ने रामभक्ति के लिए हनुमान का अवतार लिया।
कारण: भगवान राम की सहायता और रावण के वध के लिए।
महत्त्व: हनुमान भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं और वे अद्वितीय भक्ति और शक्ति के प्रतीक हैं।

अश्वत्थामा अवतार:

प्रसंग: महाभारत के युद्ध के समय भगवान शिव ने अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया।
कारण: अश्वत्थामा ने युद्ध के अंत में पांडवों के शिविर पर हमला किया।
महत्त्व: यह अवतार युद्ध की वीरता और प्रतिशोध के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

रुद्र अवतार:

प्रसंग: सृष्टि के प्रारंभ में भगवान शिव ने रुद्र के रूप में अवतार लिया।
कारण: ब्रह्मा की तपस्या के बाद भगवान शिव ने रुद्र के रूप में प्रकट होकर सृष्टि की रचना की।
महत्त्व: रुद्र सृष्टि, पालन और संहार के देवता हैं।
भगवान शिव के विभिन्न अवतार उनके विविध रूपों और लीलाओं को प्रकट करते हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने संसार के संकटों को दूर किया और धर्म की स्थापना की। उनकी पूजा और भक्ति से भक्तों को कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में शांति और समृद्धि आती है।
इन कथाओं के माध्यम से “शिव पुराण” हमें भगवान शिव की अपार महिमा और उनके अनन्य भक्तों की भक्ति के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

शिव पुराण भाग 1

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