भाजपा के 11 साल: पांच बड़ी चूकें जो साख को ठेस पहुंचाने में माहिर साबित हुईं

Amit Srivastav

भाजपा के 11 साल में नोटबंदी से लेकर जीएसटी, बेरोजगारी, संस्थाओं के दुरुपयोग और उत्तराधिकार संकट तक पांच बड़ी चूकें, जिन्होंने पार्टी की साख को ठेस पहुंचाई। पढ़ें व्यंग्यात्मक विश्लेषण।

अहा, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की केंद्र सरकार ने 2014 से 2025 तक सत्ता की कुर्सी पर विराजमान रहते हुए ऐसे ऐतिहासिक कदम उठाए कि लगता है इतिहास खुद शर्मा जाए। 
उपलब्धियों के बीच कुछ ऐसी नीतिगत और रणनीतिक “मास्टरस्ट्रोक” भी थे, जो सरकार की छवि को इतना चमकाने में लगे कि आखिरकार वह फीकी पड़ गई। अखबारी नजरिए से देखें तो ये पांच बड़ी गलतियां नहीं, बल्कि “क्रांतिकारी प्रयोग” थे, जिन्होंने जनता का भरोसा इतना डगमगाया कि अब लोग वोट डालने से पहले दो बार सोचते हैं—क्या पता कल फिर कोई “सुधार” आ जाए।

व्यंग्य की भाषा में कहें तो भाजपा ने सत्ता को एक रियलिटी शो बना दिया, जहां हर एपिसोड में एक नया ट्विस्ट, और जनता दर्शक बनकर तालियां बजाती रही, लेकिन अंत में बिल चुकाने का समय आया तो सबके चेहरे उतर गए। आइए, इन “महान भूलों” पर एक नजर डालें, जहां सरकार ने सोचा था कि वह अर्थव्यवस्था को उड़ान दे रही है, लेकिन असल में जमीन पर गिरा दिया।

भाजपा के 11 साल
1. नोटबंदी का गलत अंदाजा: एक रात में अमीर से गरीब बनाने का जादू

भाजपा के 11 साल

ओह, 8 नवंबर 2016 की वह यादगार रात! जब प्रधानमंत्री ने टीवी पर आकर घोषणा की कि 500 और 1000 के नोट अब कागज के टुकड़े हैं, तो लगा जैसे काला धन खुद भागकर सरेंडर कर देगा और आतंकवाद वाले अपनी बंदूकें बेचकर घर चले जाएंगे। लेकिन, क्या हुआ? 86 प्रतिशत मुद्रा रातोंरात बेकार हो गई, और अर्थव्यवस्था ऐसी ठप हुई कि लगता था किसी ने ब्रेक की बजाय क्लच दबा दिया हो। छोटे व्यापारी और दिहाड़ी मजदूर तो जैसे सरकार के इस “डिजिटल इंडिया” के पहले शिकार बने—बैंकों की लाइनों में खड़े-खड़े कईयों ने अपनी कमाई से ज्यादा समय गंवाया, और कुछ ने तो जीवन ही।

जीडीपी की वृद्धि 2016-17 में 8.2 प्रतिशत से गिरकर 7.1 प्रतिशत पर आ गई, जैसे कोई हवाई जहाज उतरते-उतरते क्रैश हो गया हो। और रिजर्व बैंक की रिपोर्ट? 99.3 प्रतिशत नोट वापस आ गए, मतलब काला धन तो छोड़िए, सफेद धन भी बैंकों में जमा हो गया, लेकिन सरकार का लक्ष्य? वह तो अधूरा रहा, जैसे कोई जादूगर स्टेज पर आकर कहे, “अब देखिए जादू,” और फिर कुछ न करे। व्यंग्य से कहें तो नोटबंदी ने साबित किया कि सरकार को लगता था जनता कैशलेस होकर उड़ान भरेगी, लेकिन असल में वह पैदल चलने को मजबूर हो गई।

बाद में जीएसटी ने इस जख्म पर नमक छिड़का, लेकिन वह अलग कहानी है। कुल मिलाकर, यह एक ऐसा फैसला था जो इतिहास में “महान गलती” के रूप में दर्ज हो गया, जहां इरादा नेक था, लेकिन अमल इतना बुरा कि आज भी लोग पुराने नोट देखकर हंसते हैं।

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2. जीएसटी की जटिल शुरुआत: कर सुधार या कर बोझ का नया अवतार

वाह, 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू हुआ, और सरकार ने इसे “वन नेशन, वन टैक्स” का तमगा दिया, जैसे यह कोई सुपरहीरो फिल्म हो जहां सारे कर दुश्मन एक होकर लड़ रहे हों। लेकिन, जटिल स्लैब सिस्टम—5%, 12%, 18%, 28%—और तकनीकी खामियां इतनी थीं कि छोटे व्यापारी इसे देखकर सिर पकड़ लेते थे। एक सर्वे में 60 प्रतिशत व्यापारियों ने कहा कि अनुपालन बोझिल है, मतलब फाइलिंग करना इतना मुश्किल कि लगता था आईआईटी का एंट्रेंस एग्जाम देना पड़ रहा हो।

ऊंची कर दरों ने उपभोक्ताओं पर ऐसा दबाव डाला कि महंगाई बढ़ी, और लोग सोचने लगे कि पहले तो वैट और एक्साइज अलग-अलग थे, लेकिन कम से कम समझ में आते थे। बाद में सुधार तो हुए, जैसे स्लैब कम किए गए और पोर्टल अपग्रेड हुए, लेकिन शुरुआती गलतियां इतनी बड़ी थीं कि सरकार की आलोचना हवा में नहीं, तूफान में बदल गई। व्यंग्यात्मक नजर से देखें तो जीएसटी ने साबित किया कि सरकार को लगता था यह कर क्रांति होगी, लेकिन असल में यह कर “क्रांति” बन गई जहां व्यापारी क्रांतिकारी बनकर विरोध करने लगे।

नोटबंदी के बाद यह दूसरा झटका था, जहां अर्थव्यवस्था को “सुधारने” के नाम पर इतना सुधार दिया गया कि वह बीमार पड़ गई। आज भी जीएसटी को याद करके लोग हंसते हैं कि कम से कम अब टैक्स चोरी करने वाले भी डिजिटल हो गए हैं, लेकिन सरकार की साख? वह तो टैक्स रिटर्न की तरह लेट हो गई।

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3. बेरोजगारी का बढ़ता संकट: 2 करोड़ नौकरियां का वादा जो हवा में उड़ गया

2014 के चुनाव में “हर साल 2 करोड़ नौकरियां” का नारा इतना जोरदार था कि लगता था युवा भारत रॉकेट की स्पीड से आगे बढ़ेगा। लेकिन, हकीकत? सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के डेटा से पता चला कि 2019 में बेरोजगारी दर 7.6 प्रतिशत तक पहुंच गई, जैसे कोई सपना टूटकर बिखर गया हो। हां, 2023-24 में यह 3.2 प्रतिशत तक घटी, लेकिन युवा बेरोजगारी (15-24 साल) 17 प्रतिशत के आसपास घूमती रही, मतलब युवा तो जैसे डिग्री लेकर बेरोजगार घूम रहे थे।

स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसे कार्यक्रम लॉन्च हुए, लेकिन प्रभाव? इतना कम कि लगता था ये सिर्फ पोस्टर और विज्ञापनों के लिए बने थे। व्यंग्य से कहें तो सरकार ने सोचा था कि युवा स्टार्टअप खोलकर अमीर बनेंगे, लेकिन असल में वे सरकारी नौकरियों के लिए धक्के खाते रहे। महामारी ने तो इस संकट को और बढ़ाया, जहां लाखों नौकरियां गईं, और सरकार “आत्मनिर्भर भारत” का नारा देकर खुश हो गई।

लेकिन जनता? वह तो असंतोष में उबल रही थी, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान आंदोलन ने बेरोजगारी को और हवा दी। कुल मिलाकर, यह वादा एक ऐसा चेक था जो बाउंस हो गया, और अब युवा सोचते हैं कि अगली बार वोट देने से पहले रिज्यूमे भेजें या नहीं।

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4. संस्थाओं पर दुरुपयोग का छींटा: ईडी और सीबीआई का “निष्पक्ष” खेल

वाह रे लोकतंत्र! प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई जैसी संस्थाओं को सरकार ने इतना “सक्रिय” बनाया कि लगता था वे विपक्षी नेताओं के लिए स्पेशल टास्क फोर्स हैं। 2014-2022 के बीच ईडी के 121 प्रमुख छापों में 80 प्रतिशत विपक्षी नेताओं पर थे, जैसे कोई स्क्रिप्टेड ड्रामा हो जहां हीरो हमेशा जीतता है। सरकार तो कहती है कि ये कानूनी कदम हैं, लेकिन जनता पूछती है—क्या सारे भ्रष्टाचार सिर्फ विपक्ष में हैं? इससे संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठे, और भरोसा इतना कम हुआ कि लोग अब ईडी को “इलेक्शन ड्यूटी” कहने लगे।

व्यंग्यात्मक रूप से देखें तो यह एक ऐसा खेल था जहां रेफरी खुद प्लेयर बन गया, और विपक्ष को रेड कार्ड मिलता रहा। मीडिया में भी यह छींटा पड़ा, जहां कुछ चैनल सरकार की तारीफ करते थकते नहीं, लेकिन असल सवाल दब जाते। इससे न सिर्फ विपक्ष कमजोर हुआ, बल्कि लोकतंत्र की साख भी दागदार हो गई। आज कल लोग मजाक में कहते हैं कि ईडी का मतलब “एनफोर्समेंट फॉर डेमोक्रेसी” है, लेकिन असल में यह डेमोक्रेसी को ही एनफोर्स कर रही है।

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5. नेतृत्व का उत्तराधिकार संकट: मोदी के बाद कौन? एक अनसुलझी पहेली

भाजपा ने नरेंद्र मोदी के चेहरे पर इतनी निर्भरता दिखाई कि लगता था पार्टी एक व्यक्ति की छाया है। उनके बाद कोई मजबूत राष्ट्रीय चेहरा नहीं उभरा—अमित शाह घरेलू मामलों के मास्टर हैं, योगी आदित्यनाथ यूपी के “बुलडोजर” वाले, लेकिन स्पष्ट उत्तराधिकारी? वह तो जैसे गुमशुदा है। गठबंधन सरकार चलाने में यह कमी चुनौती बन रही है, जहां सहयोगी दल अपनी मांगें मनवाते रहते हैं। विपक्ष में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने नई ऊर्जा भरी, और भाजपा को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ा, जैसे कोई बॉलीवुड फिल्म जहां विलेन हीरो बन जाता है।

व्यंग्य से कहें तो भाजपा ने सोचा था मोदी इटरनल हैं, लेकिन समय ने साबित किया कि हर राजा के बाद उत्तराधिकारी चाहिए, वरना राज्य डगमगा जाता है। अब पार्टी अंदरूनी कलह से जूझ रही है, और जनता देख रही है कि अगला चेहरा कौन होगा—या फिर वही पुराना चेहरा नए मेकअप में?

भाजपा के 11 साल
क्या है आगे की राह? एक व्यंग्यात्मक सलाह

भाजपा ने डिजिटल इंडिया, बुनियादी ढांचा और विदेश नीति में प्रगति की, जहां रोड्स इतने चमकदार बने कि लगता था अमेरिका से उधार लिए हैं, और विदेशी नेता मोदी जी के साथ सेल्फी लेने आते रहते हैं। लेकिन महंगाई, बेरोजगारी और संस्थागत विश्वास की कमी ने राह इतनी मुश्किल बना दी कि अब सत्ता की कुर्सी फिसलती लगती है। लेकिन घबराईए मत अभी भाजपा जायेगी नही तब तक भाजपा की सरकार रहेगी जब तक देश का पूरा मध्यम वर्ग गरीब नहीं हो जाता और कटोरा लेकर रोड पर नही आ जाता तब तक। मध्यम वर्ग अपने खर्चों में दिनरात कटौती कर रहा है फिर भी बैलेंस नही बन रहा है।

विपक्ष इन मुद्दों को भुनाने में जुटा है, खासकर बिहार जैसे चुनावी राज्यों में जहां नीतीश कुमार “पलटीमार” बनकर सबको चौंका देते हैं। समय रहते नेतृत्व और नीतियों में सुधार ही भाजपा को बचाएगा, वरना जनता अगले चुनाव में कहेगी—”अबकी बार, व्यंग्य सरकार!” व्यंग्य से कहें तो भाजपा ने 11 साल में साबित किया कि सत्ता संभालना आसान है, लेकिन जनता का दिल जीतना? वह तो अभी भी पेंडिंग है।

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