देवरिया जनपद के कई इलाकों में इन दिनों आबकारी विभाग की मिलीभगत से शराब बिक्री को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आ रही हैं। विश्वसनीय सूत्रों और स्थानीय नागरिकों की शिकायतों के आधार पर यह जानकारी प्राप्त हुई है कि बङहरा, महुआनी, पड़री मल्ल, गोपलापुर, पेड़ा गली, स्टेशन रोड सहित अनेक स्थानों पर शराब दुकानों पर हर सुबह तीन बजे से ही बिक्री शुरू हो जाती है, जो कि निर्धारित समय का स्पष्ट उल्लंघन है।
आबकारी विभाग की मिलीभगत
इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि इन दुकानों पर शराब की बोतलें अधिकतम खुदरा मूल्य से दस रुपये अधिक दाम पर बेची जा रही हैं। यह स्थिति न केवल अवैध है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कहीं न कहीं अबकारी विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं हो सकता।
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स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई एक-दो दिन की बात नहीं, बल्कि लंबे समय से लगातार चल रही व्यवस्था है। दुकानदार ग्राहक से अधिक दाम वसूलते हैं और यदि कोई विरोध करता है तो उसे शराब देने से मना कर दिया जाता है। लोगों को यह मजबूरी में लेना ही पड़ता है क्योंकि सुबह के वक्त वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं होती। खासतौर से देहात और मजदूरी करने वाले लोग जो सुबह जल्दी काम पर निकलते हैं, वे इस कालाबाजारी के शिकार बनते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इसकी जानकारी अबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन को होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विभागीय अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से इस मुद्दे पर संवाद किया, परन्तु वहां से हर बार केवल आश्वासन ही मिला। जिन अधिकारियों को जनता की समस्याएं सुननी चाहिए, वे या तो मौन हैं या स्थिति को नजरअंदाज कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह सब कुछ सिर्फ लापरवाही का परिणाम है, या फिर इसके पीछे कोई गहरा और संगठित भ्रष्टाचार है। कई जानकारों का कहना है कि शराब की इस अवैध बिक्री से जो अतिरिक्त मुनाफा होता है, वह हर महीने बंटवारे के रूप में ऊपर तक पहुंचाया जाता है, जिससे पूरे नेटवर्क को सुरक्षा प्राप्त होती है।
उत्तर प्रदेश आबकारी नियमावली के अनुसार शराब की बिक्री सुबह 10 बजे से पहले नहीं की जानी चाहिए, और कोई भी दुकानदार अधिकतम मूल्य से ज्यादा रकम नहीं ले सकता। लेकिन देवरिया जिले में इन नियमों की न केवल खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, बल्कि इसे रोजाना का अभ्यास बना दिया गया है। सुबह तीन बजे से ही दुकान के शटर खोल दिए जाते हैं, बाहर लाइनें लगती हैं, और बिना किसी डर के दस रुपये अतिरिक्त लिए जाते हैं। इससे न केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि उपभोक्ताओं के अधिकारों का भी खुला शोषण हो रहा है।
यह भी देखने में आया है कि कई दुकानों पर ठेकेदारों ने ऐसे स्थानीय एजेंट नियुक्त कर दिए हैं जो गली-मोहल्लों में शराब पहुंचाने का कार्य करते हैं। ग्राहक को दुकान से पर्ची देकर इन एजेंटों के पास भेजा जाता है, जहां उसे निर्धारित मूल्य से ज्यादा देकर शराब खरीदनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में विभाग को न तो सही बिक्री का आंकड़ा प्राप्त होता है और न ही सरकार को राजस्व का लाभ मिलता है। इससे शराब माफिया को तो फायदा होता है लेकिन राज्य सरकार को हर महीने लाखों रुपये के राजस्व की क्षति होती है।
इसके अलावा, सुबह-सुबह शराब की बिक्री से स्थानीय सामाजिक वातावरण भी प्रभावित हो रहा है। जब लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी कर रहे होते हैं, तभी मोहल्लों में शराबियों की भीड़ जमा हो जाती है। शराब के नशे में धुत लोग गाली-गलौज करते हैं, कई बार महिलाओं से अशोभनीय व्यवहार भी करते हैं और सड़क पर अराजकता का माहौल बना देते हैं। इससे समाज में असुरक्षा की भावना जन्म लेती है और खासतौर से महिलाओं और बच्चों के लिए वातावरण दूषित हो रहा है।
देवरिया जैसे जिले में जहां आज भी अधिकांश लोग खेती, मजदूरी और दिहाड़ी पर निर्भर हैं, वहां शराब की इस तरह की मनमानी बिक्री से आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर संकट गहरा रहा है। गरीब तबके के लोग जो अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से राशन या दवा खरीदने की सोचते हैं, वे इस महंगी शराब में उलझकर कर्ज के जाल में फंस रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है और यदि प्रशासन ने समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं की, तो आने वाले समय में हालात और भी बिगड़ सकते हैं।
स्थानीय प्रशासन और अबकारी विभाग की चुप्पी से लोगों में रोष बढ़ता जा रहा है। यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यदि विभाग चाहे तो एक दिन में सभी अनियमितताओं पर रोक लगाई जा सकती है। मगर कार्रवाई का अभाव यह दर्शाता है कि विभागीय अधिकारी स्वयं इस प्रक्रिया में किसी न किसी रूप में भागीदार हैं। विभाग को चाहिए कि वह तुरंत एक स्वतंत्र जांच दल गठित कर शराब दुकानों की निगरानी करे, और जिन दुकानों पर ओवररेटिंग या समय से पूर्व बिक्री हो रही है, उनके लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द करे।
अब समय आ गया है कि इस पूरे प्रकरण को केवल ‘स्थानीय मामला’ कहकर न टाला जाए। यह एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है, जो न केवल शासन की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रही है बल्कि समाज के कमजोर वर्गों को तबाह कर रही है। प्रशासन को चाहिए कि वह जनहित को प्राथमिकता देते हुए कार्रवाई करे, न कि मिलीभगत और भ्रष्टाचार को संरक्षण दे। यदि इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह पूरे प्रदेश में एक नकारात्मक संदेश देगा कि भ्रष्ट तंत्र के आगे जनता की कोई सुनवाई नहीं होती।
देवरिया जैसे जिले में जहां सामाजिक और आर्थिक संसाधनों की पहले से ही कमी है, वहां इस प्रकार की अवैध गतिविधियों को रोकना बेहद जरूरी है। यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि समाज के नैतिक और मानवीय ढांचे को सुरक्षित रखने का भी प्रश्न है। यदि जिम्मेदार अधिकारी अब भी मौन रहते हैं, तो यह न केवल उनकी प्रशासनिक नाकामी है बल्कि जनता के विश्वास का भी हनन है। शासन-प्रशासन को तुरंत हरकत में आना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि आने वाले समय में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
देवरिया से दिलीप कुमार की रिपोर्ट

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निर्भिक बेदाग कलम है आपका।
खुलासा खबर लिखने के लिए धन्यवाद।
विभागीय अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत से ऐसा हो सकता है।