सरकारी स्कूलों के मर्जर के नाम पर शिक्षा को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। भाजपा सरकार की उपलब्धियां सामाजिक अन्याय, जानिए इसका गरीबों, समाज और न्याय व्यवस्था पर क्या गहरा असर पड़ रहा है? श्री चित्रगुप्त वंश अमित श्रीवास्तव की व्यंग्य और कटाक्षपूर्ण कर्म-धर्म शैक्षणिक पालिटिक्स लेखनी में।
भारत, वह देश जहां नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षा के प्राचीन केंद्रों ने विश्व को ज्ञान का प्रकाश दिया, आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां शिक्षा को बाजार की भेंट चढ़ाया जा रहा है। सरकारी स्कूल, जो कभी गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए आशा का एकमात्र स्रोत थे, अब “मर्जर” के नाम पर व्यवस्थित रूप से समाप्त किए जा रहे हैं। देश का भावी भविष्य – बच्चों की शिक्षा, सरकार की नाकामी से निजीकरण कि ओर अग्रसर है। मध्यम और गरीब वर्ग में आय का स्रोत कम होता जा रहा है, कृषि या नौकरी से हो रही आय आर्थिक विकास को घटा लोगों को हाशिए पर ला रही है।
ऐसे मे सरकारी स्कूलों को धीरे-धीरे बंद कर देश का भावी भविष्य खासकर मध्यम और गरीब वर्ग के बच्चों को आने वाले समय में सरकार निरक्षर बनाने का रास्ता साफ कर रही है। यह मर्जर कोई साधारण प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि शिक्षा को पूंजीपतियों के हाथों में सौंपने, सामाजिक असमानता को गहराने, और गरीब को हाशिए पर धकेलने और मध्यम वर्ग को गरीबी के पायदान पर खड़ा करने का एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। और हमारी “चालाक” जनता? वह इस तमाशे को “विकास” का रंग देकर तालियां बजा रही है, यह भूलकर कि इसका खामियाजा हमारी अगली पीढ़ियां भुगतेंगी।
जब महंगाई चरम पर होगी, कमाई खाने भर की नहीं हो पायेगी, और शिक्षा केवल अमीरों की बपौती बन जाएगी, तब यह जनता अपनी चुप्पी पर पछताएगी। सबसे दुखद यह है कि न्यायपालिका, जो संविधान की रक्षक मानी जाती है, इस मर्जर के खिलाफ अनिवार्य शिक्षा पर बुलडोज़र न चलाने की सलाह देने की जगह सरकार की नीतियों का समर्थन करती है। याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज सरकार का समर्थन, न्याय की कुर्सी सम्भालने वाले लगता है अपनी अपनी प्रमोशन की ख्वाहिश पूरी कराने, सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनने की अंदरूनी आश्वासन पर सरकार के मनमानी को सही करार दे रहे हैं।
वो क्या समझेंगे गरीबी की मार झेल रही गाँव की गरीब जनता का हाल, बडे-बडे घराने से जो प्राइवेट स्कूलों से पढ़कर न्याय की कुर्सी सम्भाले हुए हैं। न्यायालय की मेहरबानी से सरकार की मनमानी को और बल मिल रहा है। यह लेख भाजपा सरकार की उपलब्धियों में सरकारी स्कूलों के मर्जर के इस गंभीर मुद्दे का विस्तृत विश्लेषण करता है, इसके सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक प्रभावों पर प्रकाश डालता है, और कोर्ट के आदेशों पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष के साथ भाजपा सरकार की इस नीति की आलोचना करता है।
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भाजपा सरकार की उपलब्धियां
मर्जर का सच: शिक्षा का अंत, असमानता की शुरुआत
सरकारी स्कूलों का मर्जर, जैसा कि सरकार इसे कह रही है, “संसाधनों का बेहतर उपयोग” और “कम छात्रों की समस्या का समाधान” है। लेकिन यह तर्क केवल एक भ्रामक आवरण है, जो जमीनी हकीकत को छिपाने का प्रयास करता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां पहले हर एक किलोमीटर पर एक सरकारी स्कूल हुआ करता था, अब मर्जर के बाद बच्चे लम्बी दूरी पर जाकर पढ़ने को मजबूर होगें।
गरीब और दलित समुदायों के लिए, जिनके पास न तो निजी वाहन हैं और न ही अतिरिक्त संसाधन, यह दूरी शिक्षा का अंत है। खासकर लड़कियों की शिक्षा पर इसका घातक प्रभाव पड़ेगा। जिससे बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ नारा सिर्फ एक नारा रह जायेगा। सुरक्षा और सामाजिक रूढ़ियों के कारण माता-पिता उन्हें दूर के स्कूलों में भेजने से हिचकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ड्रॉपआउट दर में भारी वृद्धि होगी।
मर्जर का दूसरा पहलू है शिक्षकों और संसाधनों की कमी। सरकारी स्कूल पहले से ही शिक्षक संकट से जूझ रहे थे। प्राइमरी स्कूलों में शायद ही कहीं पाँच कक्षाओं के लिए पाँच अध्यापक एक हेडमास्टर एक चपरासी हो जो आवश्यकता है। तमाम प्राइमरी स्कूलों में एक दो अध्यापक ही हैं, उनसे गैर शैक्षणिक कार्य लिया जाता है। ऐसी स्थिति में दोषी खुद सरकार है जो जानबूझकर शिक्षा को ध्वस्त करने का नया नया तरीका अख्तियार कर रही है।
कई स्कूलों में एक शिक्षक को कई कक्षाएं और विषय पढ़ाने पड़ रहे हैं। एक ही शिक्षक से गणित, विज्ञान, और हिंदी पढ़ाने की उम्मीद करना शिक्षा का मजाक उड़ाने जैसा है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में शौचालय, पीने का पानी, पुस्तकालय, और खेल के मैदान जैसी बुनियादी सुविधाएं पहले ही न के बराबर थीं। अब मर्जर के नाम पर स्कूलों को बंद कर, सरकार ने इन बच्चों के लिए शिक्षा के अंतिम दरवाजे को भी बंद कर दिया है।
यह नीति रेलवे में जनरल बोगी को हटाकर एसी कोच बढ़ाने की नीति से अलग नहीं है। जैसे रेलवे में गरीब यात्रियों की दुर्दशा को अनदेखा किया जा रहा है, वैसे ही शिक्षा में गरीब बच्चों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। यह एक स्पष्ट संदेश है— सरकार का “विकास” केवल अमीरों के लिए है।
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साक्षरता का ढोंग: आंकड़ों का खेल और कोर्ट की अनदेखी
2014 से पहले, कांग्रेस सरकार ने “सर्व शिक्षा अभियान” और “राइट टू एजुकेशन (RTE)” जैसे कार्यक्रमों के जरिए साक्षरता को बढ़ावा देने की कोशिश की थी। इन योजनाओं ने लाखों बच्चों, खासकर वंचित समुदायों के बच्चों, को स्कूलों तक पहुंचाया। लेकिन 2014 में सत्ता बदलते ही भाजपा सरकार ने रातोंरात दावा कर दिया कि भारत “पूरी तरह साक्षर” हो चुका है।
साक्षरता मिशन योजना के अंतर्गत जो अशिक्षित युवाओं बुजुर्गों को शिक्षित करने का शिक्षा प्रेरको द्वारा अभियान था धराशायी हो गया। यह दावा इतना हास्यास्पद है कि इसे सुनकर हंसी और गुस्सा दोनों आते हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता की दर चिंताजनक है। बैंकों में अंगूठा लगाने वालों की लंबी कतारें, सरकारी दफ्तरों में निरक्षरता के कारण लोगों की परेशानी, अगुठा टेक ग्राम प्रधानों की लम्बी कतारें और डिजिटल युग में भी फॉर्म भरने में असमर्थता—ये सब इस दावे की पोल खोलते हैं।
साक्षरता अभियान को बंद करना और सरकारी स्कूलों के बजट में कटौती करना एक स्पष्ट संदेश देता है— सरकार का ध्यान अब शिक्षा को जन-कल्याण का साधन बनाने के बजाय इसे निजी क्षेत्र के हवाले करने पर है। लेकिन सबसे शर्मनाक बात यह है कि जब कुछ नागरिकों और संगठनों ने इस मर्जर के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो न्यायपालिका ने भी इस मुद्दे पर ढुलमुल रवैया अपनाया। कई हाई कोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में मर्जर के खिलाफ याचिकाएं दायर की गईं, और कुछ मामलों में कोर्ट ने स्कूलों को बंद करने पर रोक लगाने के आदेश भी दिए।
फिर जो न्यायालय इस पर सरकार से सवाल पूछ मुसीबत खड़ा करता दिखा, हफ्ते भर मे कोर्ट का रवैया बदला सरकार के खिलाफ दाखिल याचिकाओं को खारिज कर सरकार की नीतियों की सराहना की जो चिंताजनक है। सरकार पर कोर्ट की मेहरबानी से सरकार को बल मिल रहा है। और अब अपने को गरीबों का मसीहा कहने वाले गाँव की प्राइमरी स्कूलों को बंद करने की राह पर चलने लगे हैं। ऐसी हालात में जनता ताली बजाने में मस्त है, उम्मीद करता हूँ जल्द ही गरीब बच्चों के अनिवार्य शिक्षा पर बुलडोज़र आसानी से चलने वाली है।
जिन बच्चों के हाथों में किताब कांपी होना चाहिए उनके हाथों में बकरी की रस्सी दिखेगी। फर्क सिर्फ इतना होगा जो स्कूलों में बच्चे बहुत मुस्किल से दिखाई देते हैं वो खेत खलियान मे मुर्गी या बकरी चराने का काम करेंगे। रोजगार बढ़ेगा बेरोजगारी घटेगी। सर्व शिक्षा अभियान का जो लक्ष्य था सबको साक्षर करना वो निरक्षर कर दिन दूना रात चौगुनी जल्द ही पूरी हो जायेगी।
यहां कटाक्ष करना बनता है— जब कोर्ट के आदेश कागज के टुकड़ों से ज्यादा प्रभावी नहीं रह जाते, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? कोर्ट, जो संविधान का रक्षक होने का दावा करता है, इस शिक्षा के संकट में मूकदर्शक क्यों बना हुआ है? क्या कोर्ट के लिए केवल बड़े-बड़े कॉरपोरेट मामले और राजनेताओं की याचिकाएं ही महत्वपूर्ण हैं? जब लाखों बच्चों का भविष्य दांव पर हो, तब कोर्ट की यह निष्क्रियता एक तरह से सरकार की मनमानी को मौन समर्थन देने जैसी है।
यह स्थिति उस नाटक की याद दिलाती है, जहां जज साहब तो आदेश दे देते हैं, लेकिन उसे लागू करने की जिम्मेदारी किसी और पर छोड़ देते हैं, और अंत में हार जनता की ही होती है।
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पूंजीपतियों का खेल: शिक्षा का निजीकरण और सामाजिक संरचना का पतन
शिक्षा का निजीकरण आज भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। निजी स्कूलों की फीस लाखों में है, कोचिंग सेंटरों ने शिक्षा को एक उद्योग बना दिया है, और किताबों-यूनिफॉर्म की कीमतें मध्यम वर्ग को भी हांफने पर मजबूर कर रही हैं। सरकारी स्कूलों का मर्जर इस निजीकरण को और बढ़ावा देगा। जब सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, तो अभिभावकों के पास गांव-गांव चल रहे निजी स्कूलों के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। लेकिन इन निजी स्कूलों की फीस, अतिरिक्त शुल्क, और अन्य खर्चे इतने ज्यादा हैं कि गरीब परिवार तो इस दौड़ में कहीं नहीं ठहरते।
पूंजीपति इस स्थिति का पूरा फायदा उठायेंगे। बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने अब स्कूल, यूनिवर्सिटी, और कोचिंग सेंटर खोल रहे हैं, जहां शिक्षा एक व्यवसाय है, न कि सामाजिक जिम्मेदारी। यह निजीकरण केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है,— यह एक सामाजिक संरचना को बदलने की प्रक्रिया है। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे एक विशेष प्रकार की जीवनशैली, भाषा, और अवसरों से परिचित होते हैं, वहीं सरकारी स्कूलों में सुविधाओं से वंचित बच्चे इनसे कोसों दूर रह जाते हैं। यह एक नई तरह की “सामाजिक जाति व्यवस्था” को जन्म दे रहा है, जहां शिक्षा और अवसर जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति के आधार पर तय हो रहे हैं।
इस पूंजीवादी खेल में सरकार की भूमिका अहम रोल निभा रही है। निजी स्कूलों को जमीन, टैक्स छूट, और अन्य सुविधाएं दी जा रही हैं, जबकि सरकारी स्कूलों को ताले लगाए जा रहे हैं। यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा लगता है, जहां शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से बाहर कर उसे केवल अमीरों की बपौती बनाया जा रहा है। और कोर्ट? वह भी इस खेल में कहीं न कहीं मूकदर्शक बनकर रह गया है। जब मर्जर के खिलाफ आदेशों को पारित नही करता उल्टे सरकार की नीतियों का समर्थन करता तो यह साफ है कि पूंजीपतियों के इस खेल में गरीब का बच्चा केवल एक आंकड़ा है, जिसकी कोई कीमत नहीं।
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जनता की चप्पी: एक और ऐतिहासिक भूल
भारत की जनता को अपनी “चालाकी” पर बड़ा गर्व है। वह हर नीति को तौलती है, लेकिन जब विरोध करने की बात आती है, तो वह चुप्पी साध लेती है। इतिहास इसका गवाह है। जब अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बंद की और नेताओं की पेंशन बरकरार रखी, तो जनता ने कोई जोरदार विरोध नहीं किया। आज बिना पेंशन रिटायर होने वाले कर्मचारी आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, और कईयों के लिए वृद्धाश्रम ही अंतिम ठिकाना बन रहा है। ठीक यही गलती अब सरकारी स्कूलों के मर्जर के साथ दोहराई जा रही है।
जब स्कूल बंद हो रहे हैं, और बच्चे पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं, तब जनता की चुप्पी एक और ऐतिहासिक भूल साबित होगी। यह चुप्पी उस समय और घातक हो जाएगी, जब अगली पीढ़ी निरक्षरता और गरीबी के दलदल में फंस जाएगी। वह हमसे सवाल करेगी— “आपने क्यों नहीं बोला? क्यों नहीं रोका, जब शिक्षा को लूटा जा रहा था? क्यों तालियां बजाईं, जब हमारे भविष्य को बेचा गया?” और तब हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा।
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शिक्षा की महंगाई और अगली पीढ़ी का भविष्य
महंगाई पहले ही चरम पर है। कमाई खाने भर की नहीं बच रही, और शिक्षा की कीमत आसमान छू रही है। निजी स्कूलों की फीस लाखों में है, कोचिंग सेंटरों का खर्च अलग, और किताबों-यूनिफॉर्म की लागत ने मध्यम वर्ग को भी तोड़ दिया है। गरीब परिवारों के लिए यह स्थिति असहनीय है। सरकारी स्कूलों का मर्जर इस संकट को और गहरा कर रहा है, क्योंकि यह शिक्षा के अंतिम दरवाजे को भी बंद कर रहा है।
जब सरकारी स्कूल पूरी तरह बंद हो जाएंगे, और शिक्षा पूंजीपतियों के हाथ में होगी, तब अगली पीढ़ी का क्या होगा? वह पीढ़ी, जो आज के बच्चों की होगी, निरक्षरता और गरीबी के दलदल में फंस जाएगी। बिना शिक्षा के, वह नौकरियों की दौड़ में पीछे रह जाएगी। बेरोजगारी, गरीबी, और सामाजिक असमानता का यह चक्र उन्हें और नीचे धकेलेगा। वह हमसे सवाल करेगी कि हमने सरकार की गलत नीतियों का विरोध क्यों नहीं किया? वह हमें कोसेगी कि हमने उनकी शिक्षा का सौदा क्यों होने दिया? और हम, अपनी इस चुप्पी के लिए, उनके सामने जवाबदेह होंगे।

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सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: एक गहराती खाई
सरकारी स्कूलों का मर्जर केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव गहरे और दूरगामी हैं। शिक्षा का अभाव सामाजिक गतिशीलता को रोकता है। जब गरीब बच्चे शिक्षा से वंचित रहते हैं, तो वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के अवसर खो देते हैं। यह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी असमानता को बढ़ाता है। अमीर और गरीब के बीच की खाई, जो पहले से ही चौड़ी है, और चौड़ हो जाएगी।
इसके अलावा, शिक्षा का निजीकरण सामाजिक संरचना को भी बदल रहा है। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे एक विशेष प्रकार की जीवनशैली, भाषा, और अवसरों से परिचित होते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों से सुविधाओं के अभाव में बच्चे इनसे कोसों दूर रहते हैं। यह एक नई तरह की “सामाजिक जाति व्यवस्था” को जन्म दे रहा है, जहां शिक्षा और अवसर जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति के आधार पर तय हो रहे हैं।
आर्थिक रूप से प्रभावित होने पर, देश के लिए भी यह नुकसानदह है। एक शिक्षित कार्यबल किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। आने वाले समय में जब लाखों करोड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित रहेगें, तो वे उत्पादक कार्यबल का हिस्सा नहीं बन पायेंगे। इससे न केवल बेरोजगारी बढ़ेगी है, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति भी बाधित होगी। सरकार का दावा कि गरीबी खत्म हो गई है, तब और खोखला लगता है जब हम देखते हैं कि शिक्षा और रोजगार के अवसर केवल अमीरों तक सिमट रहे हैं।

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राजनीति का दोहरा चरित्र और कोर्ट की नाकामी
सरकारी स्कूलों के मर्जर की नीति को राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देखना जरूरी है। यह नीति केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, यह एक बड़े राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है। सरकार की नीतियां—चाहे रेलवे में जनरल बोगी हटाना हो, सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बंद करना हो, मानदेय कर्मियों की अनदेखी करना हो, या सरकारी स्कूलों का मर्जर—एक ही दिशा में इशारा करती हैं, निजीकरण और पूंजीपतियों को बढ़ावा। यह एक ऐसी व्यवस्था की ओर ले जा रहा है जहां सरकार की जिम्मेदारी कम होती जा रही है, और नागरिकों को बाजार के भरोसे छोड़ दिया जा रहा है।
इसके पीछे एक राजनीतिक गणित भी काम कर रहा है। गरीब और मध्यम वर्ग, जो सरकारी स्कूलों और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पर निर्भर हैं, अक्सर अपनी आवाज उठाने में असमर्थ होते हैं। उनकी चुप्पी और निष्क्रियता को सरकार अपनी नीतियों की स्वीकृति के रूप में देखती है। दूसरी ओर, निजीकरण से लाभान्वित होने वाले पूंजीपति और उच्च वर्ग सरकार के समर्थन में खड़े रहते हैं। यह एक खतरनाक चक्र है, जहां गरीब की आवाज दबाई जा रही है।
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मार्गदर्शी सरकार या भटकाव का रास्ता?
एक मार्गदर्शी सरकार वह होती है जो अपने नागरिकों के भविष्य को सुरक्षित करे, खासकर सबसे कमजोर वर्गों को। शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें हर नागरिक का अधिकार हैं। लेकिन जब शिक्षा को बाजार के हवाले किया जा रहा हो, जब सरकारी स्कूलों को बंद करके निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा हो, तब यह मार्गदर्शन नहीं, बल्कि भटकाव है। सरकार का दावा है कि वह “विकास” कर रही है, लेकिन यह विकास किसके लिए है? पूंजीपतियों के लिए, जो शिक्षा को एक व्यवसाय बना रहे हैं, न कि उस गरीब बच्चे के लिए, जो स्कूल बंद होने के बाद बकरी चराने व मजदूरी करने को मजबूर है?

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जनता की जिम्मेदारी: चुप्पी तोड़ने का समय
भारत की जनता को अब अपनी “चालाकी” छोड़कर जागना होगा। इतिहास हमें सिखाता है कि चुप्पी कभी समाधान नहीं होती। जब पेंशन बंद हो गई, तो जनता की चुप्पी ने आज के रिटायर कर्मचारियों को वृद्धाश्रम की ओर धकेल दिया। अगर आज हम सरकारी स्कूलों के मर्जर पर चुप रहे, तो कल हमारी अगली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
यह समय है सवाल उठाने का, विरोध करने का, और शिक्षा को बचाने का। हमें पूछना होगा—
– क्यों सरकारी स्कूलों को ताले लगाए जा रहे हैं??
– क्यों शिक्षा को बाजार के हवाले किया जा रहा है??
– क्यों गरीब के बच्चे को पढ़ने का हक छीना जा रहा है??
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निष्कर्ष: शिक्षा को बचाने की पुकार
सरकारी स्कूलों का मर्जर सिर्फ स्कूलों का बंद होना नहीं, बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ी के भविष्य का अंत है। यह सामाजिक असमानता को बढ़ाने, गरीब को हाशिए पर धकेलने, और पूंजीपतियों को सशक्त करने की योजना है। और जब कोर्ट के आदेश भी इस अन्याय को रोकने में असमर्थ दिखते हैं, तो यह साफ है कि अब जनता को ही मैदान में उतरना होगा।
आज, सड़कों को अपनी अपनी जाकर को बचाकर, और हर मंच पर इस अन्याय के खिलाफ बोलना होगा। शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, और इसे बचाने की जिम्मेदारी हमारी है। अगर हम आज चुप रहे, तो कल हमारी संतान हमें कोसेंगी। वे पूछेंगी कि जब उनके भविष्य को लूटा जा रहा था, हम कहां थे। और तब हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा। उठिए, बोलीए, और इस मर्जर के तमाशे को रोकिए। क्योंकि अगर हमने आज आवाज नहीं उठाई, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। शिक्षा को बचाएं, अपने बच्चों का भविष्य बचाएं। गोदीमीडिया का बहिष्कार करें, निस्पक्ष, निर्भिक, बेदाग लेखक पत्रकारों की लेख समाचार पढे़ और देखे।
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आपका लिखा असत्य नही हो सकता है आप बिल्कुल सत्य लिखते हैं आप ने जो लिखा है वो दिख रहा है।
सत्य लेखनी है आपकी सर जी प्रणाम
निस्पक्ष सुस्पष्ट जानकारी के लिए धन्यवाद सर जी प्रणाम
निस्पक्ष लेखनी को अधिक से हमने शेयर किया।