छठ पूजा वैसे तो मुख्य तौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है, लेकिन अब इसकी ग्लोबल पहचान बन चुकी है। लोक आस्था के इस पर्व में उगते और डूबते सूर्य की अराधाना की जाती है। सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। छठ पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है।
पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। कार्तिक महीने में मनाए जाने वाले छठ की अधिक मान्यता है और इसी महीने में लोग इस पर्व को व्यापक रूप से मनाते हैं।
चार दिनों तक चलने वाला यह त्योहार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय से शुरू होता है, जो इस बार मंगलवार यानी 05 नवंबर को पड़ रहा है। नहाय-खाय के दिन 25 अक्टूबर शनिवार को व्रती गंगा या पास के नदी, तलाब में डुबकी या घर स्नान करेंगी और केवल एक बार सात्विक भोजन करेंगी। कार्तिक मास की पंचमी 26 अक्टूबर रविवार को खरना भी कहा जाता है।
इस दिन व्रती शाम को गुड़, चावल की बनी खीर (रसीयाव) और रोटी लौकी की सब्जी प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं। इसके बाद तीसरे दिन इस बार 27 अक्टूबर दिन सोमवार भगवान सूर्य को संध्या में अर्घ्य दिया जायेगा और चौथे दिन 28 अक्टूबर मंगलवार सुबह उगते सूर्य को। खास बात यह है कि खरना के दिन शाम में प्रसाद ग्रहण करने के बाद से करीब 36 घंटे तक यानी उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देने तक व्रती यह व्रत निर्जला करती हैं।
इन चार दिनों में व्रतियों के लिए प्याज, लहसून या किसी तरह का मांसाहारी भोजन वर्जित रहता है।
पंचांग-पुराण के अनुसार संतान की रक्षा के लिए मनाया जाता है यह महापर्व।
सूर्यदेव की करें उपासना
नहाय-खाय के साथ शुरू होगा छठ पूजा – जानिए छठ पूजा शेड्यूल और पूजन सामग्री
छठ पूजा 2025 का शेड्यूल
25 अक्टूबर 2025, मंगलवार – (नहाय-खाय)
26 अक्टूबर 2025, बुधवार – (खरना)
27 अक्टूबर 2025, बृहस्पतिवार – (डूबते सूर्य को अर्घ्य)
28 अक्टूबर 2025, मंगलवार – (उगते सूर्य को अर्घ्य)
पूजन विधि
कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन घर में पवित्रता के साथ कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें ठेकुआ खासतौर पर प्रसिद्ध है। सूर्यास्त से पहले सारे पकवानों को बांस की टोकरी में भड़कर निकट घाट पर ले जाया जाता है। एक मान्यता यह भी है कि छठ पूजा में सबसे पहले नई फसल का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
इसलिए प्रसाद के रूप में गन्ना फल अर्पण किया जाता है। घर व घाट पर गन्नों को खड़ा कर बांधा जाता है और इसके नीचे दीप यथा शक्ति फल सामग्रियों से भरा हुआ मिट्टी के वर्तन में रख जलाये जाते हैं। व्रत करने वाले सारे स्त्री और पुरुष जल में स्नान कर इन डालों को अपने हाथों में उठाकर षष्ठी माता – छठ माता, और भगवान सूर्य को अर्ध्य देते हैं।
सूर्यास्त के पश्चात सब अपने घर लौट आते हैं। अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में फिर डालों में पकवान, नारियल और फलदान रख नदी-नाले तालाब के तट पर सारे वर्ती महिला पुरुष जमा होते हैं और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद छठ व्रत की कथा सुनी जाती है और कथा के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रती अपना व्रत तोड़ते हैं।
छठ पूजा की सामग्री
सूट या साड़ी, बांस की दो बड़ी-बड़ी टोकरियां, बांस या फिर पीतल का सूप, दूध और जल के लिए एक ग्लास, एक लोटा और थाली, 1, 6, 12, 24 गन्ने पत्ते लगे हुए, शकरकंदी और सुथनी, पान और सुपारी, हल्दी, मूली और अदरक का हरा पौधा, बड़ा वाला मीठा नींबू, शरीफा, केला, नाशपाती, पानी वाला नारियल, मिठाई, गुड़, गेहूं, साठी का चिउरा चावल और आटा, ठेकुआ, चावल, सिंदूर, दीपक, शहद और धूप छठ पूजा सामग्री में होनी चाहिए।
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