राज्य, समाज और सत्ता का चक्रव्यूह जटिल संरचनाएँ हमेशा कहानियों के माध्यम से ही बेहतर समझ में आती हैं, क्योंकि कहानी वह आईना है जिसमें समाज अपने चेहरे के साथ-साथ अपनी मानसिकता भी साफ़ देख सकता है। सत्ता के इतिहास में, किसी भी युग को उठा लीजिए—राजतंत्र, सामंतवाद, लोकतंत्र, तानाशाही, पूँजीवाद—हर व्यवस्था में जनता को नियंत्रित करने के तरीके अत्यंत कलाकाराना ढंग से विकसित किए गए हैं। कभी धर्म से, कभी भय से, कभी क़ानून से, कभी नैतिकता से, कभी राष्ट्रवाद से, और सबसे बढ़कर—भ्रम से।
और भ्रम पैदा करने की कला में सबसे अधिक निपुण वही शासक कहलाते हैं जिन्हें जनता प्यार से राष्ट्र-नायक, देश-रक्षक, महानायक, या ‘महाराज’ कहने लगती है। इसी भ्रम की अद्भुत लीला को समझाने के लिए दैवीय प्रेरणा से व्यापारी और राजा की यह कहानी जन्म लेती है—साधारण, सरल, हँसने लायक, लेकिन भीतर से इतनी धूर्त राजनीतिक बुद्धि से भरी कि बड़े-बड़े राजनीतिक विज्ञान के विद्वान भी चित्रगुप्त वंशज-अमित श्रीवास्तव की शोध-आधारित कर्म-धर्म लेखनी को पढ़कर कहें—“यह पूरी मानव-सभ्यता का सार है।”
Table of Contents

5 की रोटी 15 में कैसे बिकने लगी और जनता खुश क्यों हुई? सत्ता, व्यापारी और जनता को मूर्ख बनाने की राजनीति पर तीखा व्यंग्यात्मक विश्लेषण पढ़िए।
१. पाँच की रोटी और राजा का चमत्कार—सत्ता का चक्रव्यूह पहली चाल
एक व्यापारी, जिसकी रोज़ी-रोटी साधारण थी, पाँच रुपए की रोटी बेचता था। जो चीज़ पैदा करनी आसान हो, उसका दाम कम होता है—यह अर्थशास्त्र की साधारण गाथा है। लेकिन जो चीज़ पैदा करने में लागत बढ़े, उसका दाम भी बढ़ता है—यह अर्थशास्त्र का नियम है। परंतु राजा के राज में नियम भी राजा की कृपा के बिना लागू नहीं होते।
जब व्यापारी को लगा कि अब आटा, ईंधन, मजदूरी और अन्य खर्च बढ़ गए हैं, तो उसने रोटी का दर दस रुपए करने का सोचा। लेकिन डर लगा कि बिना राजा की अनुमति ऐसा करना अपराध होगा। इसलिए वह डरते-डरते राजा के दरबार पहुँचा।
राजा ने बात सुनी, मुस्कुराया—और वही किया जो सदियों से सत्ता करती आई है। समस्या को बड़ा बनाओ, ताकि समाधान देकर तुम्हें बड़ा दिखाया जाए। राजा ने कहा—
“10 क्यों? सीधे 30 रुपए करो!”
व्यापारी अवाक्। राजा की आँखों में चमक।
यह चमक सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, यह रणनीतिक थी।
राजा को पता था कि जनता तभी उसके दरबार आएगी जब हड़कंप मचेगा। और हड़कंप तभी मचेगा जब कीमतें असहनीय हो जाएँ। तब राजा एक झटके में जनता का ‘रक्षक’ बनकर समाधान दे सकेगा—बिल्कुल ऐसे जैसे एक डॉक्टर ही बीमारी फैलाकर फिर दवा बेच दे।
यह कहानी दरअसल सत्ता का मनोविज्ञान बताती है—
संकट पैदा करो — फिर खुद को उसका उद्धारक बनाओ।
जनता हमेशा उसी को नायक मानती है जो सुनामी के बाद नाव लेकर आए—यह नहीं सोचती कि सुनामी किसने बुलवाई।

२. 30 रुपए की रोटी और जनता की हाय-हाय—सत्ता का मंच तैयार
अगले ही दिन व्यापारी ने दरबार की आज्ञा का पालन करते हुए रोटी 30 रुपए कर दी। शहर में हलचल मच गई। लोग भड़क उठे। गरीब, मजदूर, महिलाएँ, बूढ़े—सबके चेहरे पर चिंता फैल गई।
यही वह समय था जिसका राजा को इंतजार था। जनता दुख में एकजुट होती है, लेकिन समाधान खोजने के लिए हमेशा नेता की तरफ ही देखती है।
लोगों का पहला पड़ाव व्यापारी नहीं था—सीधे राजा।
क्योंकि जनता की मानसिक आदत है कि वह हर संकट का समाधान राजा से ही चाहेगी, चाहे समस्या कहीं से भी आई हो।
यह जनता का स्थायी मनोविज्ञान है—
मुसीबत में पहले दोष ढूँढो, फिर मसीहा ढूँढो।
और मसीहा वही बनता है जिसे जनता सोच ले कि वही सब संभाल सकता है।
राजा ने भीषण क्रोध का नाटक किया—
“उस साहसी व्यापारी को पकड़कर मेरे दरबार में पेश करो!”
और सिपाही व्यापारी को घसीटते हुए दरबार में ले आए।
यह नाटक था पर जनता को वास्तविक लगा।
क्योंकि जनता नाटक और वास्तविकता में फर्क नहीं करती।
उसे सिर्फ दृश्य चाहिए—और जिस दृश्य में शोर ज्यादा हो, वही उसे सच्चा लगता है।
३. राजा का क्रोध—सत्ता का क्लासिक अभिनय
व्यापारी जैसे ही दरबार में आया, राजा गरजा—
“तेरी यह मजाल कि तूने मेरी जनता को भूखा मारने का प्रयास किया! तूने मेरे राज्य में बिना मुझसे पूछे दाम बढ़ाए? तुझे कल से रोटी आधे दाम पर बेचनी होगी, नहीं तो तुम्हारा सिर उतार दिया जाएगा!”
हर शब्द गूँजा।
हर चेहरा खिला।
हर मन ने कहा—“वाह महाराज!”
और यही सत्ता की असली शक्ति है—
दार्शनिक सत्य नहीं, बल्कि नाटकीय प्रस्तुति।
राजा ने वही किया जो हर नेता करता है—
पहले समस्या को बढ़ने दिया,
फिर समाधान का गदा उठाया,
और जनता से जयकार करवाया।
इस नाटक का अद्भुत दृश्य यह था कि जिसे राजा ने ही कीमत बढ़ाने को कहा था, उसी पर क्रोध करके उसने जनता को यह विश्वास दिला दिया कि वह न्यायप्रिय, कठोर और जनता का सच्चा संरक्षक है।
जनता भूल गई कि रोटी पाँच की थी।
जनता सिर्फ यह याद रखेगी कि राजा ने 30 की रोटी 15 कर दी।
यह मनोवैज्ञानिक विजय है।
यही राजनीति की परम कला है।
४. परिणाम — 5 की रोटी 15 में, पर जनता खुश!
- अगले दिन से रोटी 15 रुपए में बिकने लगी।
- राजा ने उसे आधा करने का आदेश दिया था—और 30 का आधा 15 होता है।
- व्यापारी खुश था—पहले 5 मिलते थे, अब 15 मिल रहे हैं।
- राजा खुश था—जनता उसकी जय-जयकार कर रही थी।
- जनता खुश थी—क्योंकि उसे लगा कि बड़ी राहत मिल गई है।
- लेकिन सच्चाई यह थी—
- जनता जितनी अब लुट रही थी, उतनी पहले कभी नहीं लुटी थी।
- और फिर भी वह सबसे ज्यादा खुश थी।
- यह कैसी विडंबना है?
- यह कैसा मनोविज्ञान है?
- यह जनता का वही पुरातन व्यवहार है जिसमें वह अत्याचार को राहत की तरह देख लेती है,
- और राहत को कृपा की तरह,
- और कृपा को राजा का दैवी अधिकार मान लेती है।
५. यह सिर्फ कहानी नहीं—आज के समाज का दर्पण है
- यह व्यंग्य कहानी लगे, पर यह कहानी आज के हर नागरिक, हर देश, हर लोकतांत्रिक तंत्र, हर व्यवस्था की फिट तस्वीर है।
- सिर्फ नाम बदल दें—
- व्यापारी → कॉरपोरेट
- राजा → सरकार
- जनता → हम सब
- और परिदृश्य वही मिलेगा—
- पेट्रोल बढ़ाओ → जनता चीखे → फिर थोड़ा कम करो → जनता खुश
- गैस सिलेंडर 350 से 1200 करो → सब्सिडी 65 → जनता खुश
- टोल 200 करो → त्योहार पर 20 प्रतिशत की छूट → जनता खुश
- बिजली के बिल बढ़ाओ → फिर “समाधान” के नाम पर नकली स्कीम → जनता खुश
- टैक्स बढ़ाओ → फिर चुनाव के समय थोड़ा कम करो → जनता खुश
- हमेशा—
- समस्या बड़े स्तर पर पैदा करो,
- फिर ‘आधा समाधान’ देकर नायक बन जाओ।
- हर बार जनता वही गलती दोहराती है।
- हर बार सत्ता वही खेल खेलती है।
- और हर बार जनता सोचती है—“हम आजाद हैं।”
- लेकिन यह कहानी बताती है कि—
- जनता मुक्त होने की नहीं, ‘नायक खोजने’ की भूखी है।
६. जनता का मनोविज्ञान — समस्या नहीं, नायक चाहिए
मानव मनोविज्ञान कहता है कि जनता को संकट नहीं सताता, संकट का अकेलापन सताता है। उसे लगता है कि वह असहाय है, और एक नायक ही उसे निकाल सकता है।
इसलिए जब रोटी 30 की हुई, जनता व्यापारी के पास नहीं गई—
क्योंकि उसे लगा कि व्यापारी सिर्फ समस्या है,
समाधान सिर्फ राजा है।
यह वही मानसिकता है जो आज भी काम करती है—
पेट्रोल महंगा होने पर लोग पेट्रोल पंप वाले पर नहीं चिल्लाते,
सरकारी कीमतों पर ध्यान नहीं देते,
बल्कि चुनाव के समय “नायक” खोजते हैं जो थोड़ी राहत दे सके।
यह ‘नायक पूजक’ मनोविज्ञान जनता को कभी परिपक्व नहीं बनने देता।
जब तक जनता नायक बनाती रहेगी,
राजा उसे मूर्ख बनाता रहेगा।
७. सत्ता का खेल — लोगों को बेरोजगार और भूखा रखो, फिर दाल-रोटी की राहत पर नायक बनो
- सत्ता को जनता की भूख से ज्यादा कोई हथियार ताकतवर नहीं लगता।
- भूखी जनता झगड़ा नहीं करती।
- भूखी जनता सवाल नहीं पूछती।
- भूखी जनता बस रोटी ढूँढती है—किसी भी कीमत पर, किसी भी शर्त पर।
- और जो उसे रोटी देगा, वही उसका भगवान है।
- राजा ने इसी भूख को खेला।
- पहले कीमतें बढ़वाई,
- फिर आधी करवाई,
- फिर जनता का आशीर्वाद लिया।
- और जनता ने भी राजा को वही चढ़ावा दिया जो भारत में हमेशा दिया गया है—
- जय-जयकार।
- आज भी यही होता है—
- जब महँगाई बढ़ती है, तब जनता गुस्सा रहती है।
- जब थोड़ी राहत मिलती है, तब जनता भावुक हो जाती है।
- और जब राजा मंच पर आता है, जनता भूल जाती है कि 5 की रोटी 15 में खा रही है।
८. व्यापारी की भूमिका — सत्ता का साथी, जनता का स्वामी
व्यापारी इस कहानी में खलनायक नहीं है।
वह सिर्फ सत्ता के खेल का हिस्सा है।
वह वही करता है जो सत्ता कहती है।
उसका काम है लाभ कमाना।
और सत्ता उसे इसके लिए सुरक्षित जगह देती है।
इसलिए वह कीमतें बढ़ाने में भी खुशी से भाग लेता है,
क्योंकि उसे पता है कि राजा जनता को नियंत्रित करेगा।
आज के समय में यह व्यापारी किसी कंपनी, किसी उद्योगपति, किसी निगम, किसी बहुराष्ट्रीय निगम के रूप में होता है।
नीतियाँ उसके हिसाब से बनती हैं,
सरकारी फैसले उसके फायदे के अनुसार लिए जाते हैं।
लेकिन जनता को बताया जाता है—
“यह आपके लिए है… यह विकास है… यह राष्ट्रहित में है…”
क्या यह कहानी इससे अलग कुछ है?
नहीं। यह तो सिर्फ उस खेल का सरल संस्करण है जो हर देश में 24×7 चलता है।
९. लोकतंत्र और जनता की स्मृति — सबसे कमजोर कड़ी
जनता की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी स्मृति है।
जनता को याद नहीं रहता कि पहले रोटी 5 की थी।
उसे सिर्फ यह याद रहता है कि राजा ने उसे 30 से 15 कर दिया।
लोकतंत्र वहीं कमजोर होता है जहाँ जनता भूल जाती है कि असली कीमत क्या थी।
और लोकतंत्र वहीं मजबूत होता है जहाँ जनता पूछती है—
“पहले क्या था?”
“अब क्या हुआ?”
“किसका फायदा हुआ?”
“कौन असली अपराधी है?”
लेकिन जनता यह सवाल नहीं पूछती।
वह सिर्फ दृश्य देखती है—
राजा गुस्से में,
सिपाही व्यापारी को घसीटते हुए,
और फिर जनता का जयकारा—
यही उसकी राजनीति का आधार है।
१०. कहानी का सार — जनता से बड़ा मूर्ख कौन?
इस कहानी का असली व्यंग्य यह नहीं है कि राजा चालाक था।
यह भी नहीं कि व्यापारी लालची था।
बल्कि यह कि जनता खुश थी।
और यह खुशी सबसे दुखद थी।
क्योंकि जनता को समझ ही नहीं आया कि उसे लूटा गया है।
बल्कि उसे लगा कि उसे बचाया गया है।
यही मूर्खता सत्ता का सबसे बड़ा किला है।
सत्ता जनता को मूर्ख इसलिए बना पाती है क्योंकि जनता अपनी मूर्खता को गुण समझती है, और नायक-भक्ति को धर्म।
सदियों से यही चलता आया है—
राजा वही महान है जो जनता को रुलाकर बाद में हँसा सके।
और जनता वही महान है जो अपने ही नुकसान पर ताली बजा दे।
अंतिम निष्कर्ष — जनता की जय नहीं, जनता की समझ की जय हो
यदि जनता समझदार होती,
तो राजा कभी नायक नहीं बनता।
व्यापारी कभी तीन गुना लाभ नहीं कमाता।
और पाँच की रोटी कभी पंद्रह में नहीं बिकती।
यह कहानी सिर्फ एक व्यंग्य नहीं—
यह चेतावनी है।
यह आईना है।
यह समाज का भविष्य है।
जब तक जनता नायक खोजती रहेगी, जनता लुटती रहेगी।
जब तक जनता अपनी स्मृति खोती रहेगी, सत्ता उसका फायदा उठाती रहेगी।
और जब तक जनता अपनी जयकार के स्वर में सोच को दबाती रहेगी,
तब तक राजा और व्यापारी की साझेदारी ऐसे ही फलती रहेगी।

अंतिम पंक्ति —
जनता को मूर्ख बनाने में माहिर को ही जनता कुशल शासक मान लेती है। amitsrivastav.in पर शोध-आधारित लेख – अमित श्रीवास्तव।
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