प्रयागराज के माघ मेला क्षेत्र में स्वामी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना केवल किसी एक संत के अपमान, किसी एक प्रशासनिक निर्णय या किसी एक राजनीतिक टकराव की घटना नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे भारतीय सभ्यता, सनातन परंपरा और आधुनिक सत्ता-तंत्र के बीच चल रहे उस गहरे और ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक बनता जा रहा है, जिसमें सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि क्या इस देश में धर्म अपनी स्वतंत्र नैतिक आवाज बनाए रख पाएगा या वह भी सत्ता के प्रचार तंत्र का एक औज़ार बनकर रह जाएगा।
यह विवाद हमें मजबूर करता है कि हम उस मूल प्रश्न पर लौटें जिसे भारत सदियों से पूछता आया है—क्या सत्ता धर्म की मर्यादा में चलेगी या धर्म सत्ता की सुविधा में ढलता चला जाएगा? शंकराचार्य का यह धरना एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना का संघर्ष है जो कहती है कि राजसत्ताएँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन धर्म, नैतिकता और परंपरा की आत्मा किसी भी शासन-प्रणाली से बड़ी और गहरी होती है।
Shankaracharya Avimukteshwarananda’s Dharna: A Civilizational Analysis of the Conflict of Sanatan, Power and Democracy

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प्रयागराज के माघ मेला क्षेत्र में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना अब केवल एक स्थानीय प्रशासनिक विवाद या किसी एक संत के अपमान की घटना भर नहीं रह गया है, बल्कि वह धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र, सनातन धर्म की परंपरा और आधुनिक राजनीतिक सत्ता के बीच चल रहे गहरे वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बनता जा रहा है। बाहर से देखने वाले लोग इसे एक “साधु-संत बनाम सरकार” का मामला समझ सकते हैं।
लेकिन यदि इस पूरे घटनाक्रम को उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पृष्ठभूमि में रखकर देखा जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि यहाँ टकराव दो व्यक्तियों या दो संस्थाओं का नहीं, बल्कि दो दृष्टियों का है — एक वह दृष्टि जो धर्म को सत्ता का उपकरण बनाना चाहती है, और दूसरी वह जो धर्म को सत्ता की मर्यादा तय करने वाली स्वतंत्र नैतिक शक्ति के रूप में देखती है।
शंकराचार्य का पद भारतीय सभ्यता में किसी भी राजनीतिक पद से न तो छोटा है और न ही उसका मोहताज। यह पद आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित उस महान वैदांतिक परंपरा का केंद्र है, जिसने लगभग बारह सौ वर्षों से भारत की बौद्धिक और आध्यात्मिक चेतना को एक सूत्र में बाँध रखा है। जब इस देश में विदेशी आक्रमण हुए, जब मुग़ल सत्ता आई, जब अंग्रेज़ी शासन स्थापित हुआ, तब भी शंकराचार्य परंपरा ने न तो किसी सम्राट से अपनी वैधता की भीख माँगी और न ही किसी गवर्नर जनरल से प्रमाणपत्र लिया।
वह अपनी परंपरा, अपने शास्त्र और अपने मठीय अनुशासन से चलती रही। आज यदि कोई जिला प्रशासन या राज्य सरकार यह तय करने लगे कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि उस पूरी सभ्यतागत परंपरा को कटघरे में खड़ा करने जैसा है, जिसने भारत को केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवित संस्कृति बनाए रखा।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की पिटाई से उत्पन्न धरना जिस अपमान और टकराव से शुरू हुआ, वह बहुत जल्दी उन प्रश्नों तक पहुँच गया जिनसे आज का भारत जूझ रहा है। माघ मेला जैसे पवित्र और ऐतिहासिक आयोजन में उनके रथ को रोका जाना, मौनी अमावस्या जैसे पावन स्नान पर्व पर उनके काफिले को आगे बढ़ने से रोकना, उनके शिविर पर हमला और उनके शिष्यों के साथ पुलिस की बदसलूकी — ये सारी घटनाएँ मिलकर यह बताती हैं कि समस्या केवल किसी एक अधिकारी की भूल या किसी एक दिन की अव्यवस्था नहीं है। यह उस मानसिकता की उपज है जिसमें सत्ता यह मानने लगती है कि अब धार्मिक परंपराएँ भी प्रशासनिक आदेशों और राजनीतिक अनुकूलता के अधीन चलेंगी।
भारतीय इतिहास में तीर्थ, कुंभ, माघ और बड़े धार्मिक मेलों की एक स्पष्ट परंपरा रही है। राजा या शासक का काम होता था सुरक्षा देना, व्यवस्था करना, लेकिन वह कभी यह तय नहीं करता था कि कौन संत वैध है और कौन नहीं। वह कभी यह नहीं कहता था कि कौन किस क्रम में स्नान करेगा और किसे अनुमति नहीं मिलेगी — यह सब संत समाज और धार्मिक परंपराओं के बीच तय होता था।
आज अगर राज्य यह अधिकार अपने हाथ में लेने लगे कि वह तय करेगा कि कौन शंकराचार्य है, कौन महामंडलेश्वर है और कौन केवल “विवादित व्यक्ति” है, तो यह सीधा-सीधा धर्म की स्वायत्तता का अंत होगा। और जब धर्म की स्वायत्तता खत्म होती है, तब लोकतंत्र केवल एक प्रशासनिक ढाँचा बनकर रह जाता है, उसके भीतर की नैतिक आत्मा मरने लगती है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दूसरा बड़ा और केंद्रीय आरोप गौ-रक्षा को लेकर है। यह विषय पिछले एक दशक से भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा है। बड़े-बड़े भाषण हुए, कड़े कानून बने, भावनात्मक नारे लगे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि गाय की हालत आज भी वैसी ही दयनीय है जैसी पहले थी, बल्कि कई जगहों पर और भी खराब हो गई है। सड़कों पर प्लास्टिक खाते हुए मवेशी, बंद पड़ी या नाममात्र चल रही गौशालाएँ, और दूसरी ओर बीफ एक्सपोर्ट के बढ़ते आँकड़े — यह सब मिलकर यह बताता है कि गौ-रक्षा आज एक नैतिक और सभ्यतागत परियोजना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बनकर रह गई है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जब इस विषय पर सवाल उठाते हैं, तो वे किसी पार्टी की आलोचना नहीं कर रहे होते, बल्कि वे उस पूरे समाज से प्रश्न कर रहे होते हैं जिसने अपनी आस्था को नारों में और अपनी करुणा को कानून की किताबों में कैद कर दिया है। गौ-रक्षा कानून से नहीं, आचरण से होती है। और आचरण तब बदलता है जब समाज की चेतना बदलती है, न कि केवल तब जब सरकार कोई अध्यादेश जारी करती है।
इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर और खतरनाक बिंदु वह है, जहाँ मेला प्रशासन ने नोटिस जारी कर शंकराचार्य की पदवी और वैधता पर सवाल उठाया। यह वह क्षण है, जहाँ मामला एक प्रशासनिक टकराव से निकलकर एक संवैधानिक और सभ्यतागत संकट में बदल जाता है। शंकराचार्य की वैधता किसी सरकारी फाइल से नहीं, बल्कि मठीय परंपरा, शास्त्रीय मान्यता और शिष्य-परंपरा से तय होती है। अगर कल कोई अधिकारी यह कहेगा कि फलाँ व्यक्ति शंकराचार्य नहीं है, तो परसों कोई और अधिकारी यह भी तय करने लगेगा कि कौन वेद पढ़ाएगा और कौन नहीं। यह वही रास्ता है जिससे राज्य धीरे-धीरे धर्म का संरक्षक नहीं, बल्कि उसका स्वामी बनने लगता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का इतिहास यह बताता है कि वे किसी एक पार्टी या एक विचारधारा के “सरकारी संत” नहीं रहे हैं। अखिलेश यादव की सरकार के समय गंगा बचाओ आंदोलन में उन पर लाठीचार्ज हुआ, उनके जुलूस रोके गए, उन्हें परेशान किया गया। कांग्रेस के शासनकाल में उन्होंने राम सेतु के मुद्दे पर तीखा विरोध किया, राहुल गांधी को प्रतीकात्मक रूप से “निष्कासित” किया और फर्जी बाबाओं को संरक्षण देने का आरोप लगाया। इसका सीधा अर्थ यह है कि वे सत्ता के नहीं, परंपरा और सिद्धांत के पक्षधर रहे हैं। जो भी सरकार धर्म की मर्यादा में हस्तक्षेप करती है, वे उसके खिलाफ खड़े होते रहे हैं — चाहे वह सरकार किसी भी दल की क्यों न हो।
आज की राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसने “हिंदुत्व” और “हिंदू धर्म” को एक ही अर्थ में प्रस्तुत करने की कोशिश की है, जबकि दोनों के बीच एक गहरा और मौलिक अंतर है। हिंदुत्व एक राजनीतिक परियोजना है, जो पहचान, ध्रुवीकरण और सत्ता की भाषा में बात करती है, जबकि सनातन धर्म एक सभ्यता है, जो करुणा, संयम, सहिष्णुता और आत्मिक अनुशासन की भाषा बोलता है। जब कोई शंकराचार्य सत्ता से सवाल करता है, तो वह हिंदुओं का या हिंदू धर्म का विरोध नहीं कर रहा होता, बल्कि वह हिंदू धर्म को राजनीति के हाथों बंधक बनने से बचाने की कोशिश कर रहा होता है।
आज स्थिति यह बन गई है कि जो साधु सत्ता के मंच पर बैठकर सरकार की प्रशंसा करे, वह “राष्ट्रवादी संत” कहलाता है, और जो सवाल पूछे, वह “विवादित”, “राजनीतिक” या “अराजक” घोषित कर दिया जाता है। यह लोकतंत्र की आत्मा के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। लोकतंत्र की असली कसौटी यह नहीं होती कि वह अपने समर्थकों को कितना सम्मान देता है, बल्कि यह होती है कि वह अपने आलोचकों को कितना सुरक्षित और सम्मानित महसूस कराता है। जब एक शंकराचार्य यह कहने लगे कि उनके जीवन को खतरा है, तो यह केवल एक व्यक्ति की सुरक्षा का प्रश्न नहीं रहता, यह पूरे राज्य की नैतिक स्थिति पर सवाल बन जाता है।
राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के समय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की अनुपस्थिति को राजनीतिक रूप से खूब उछाला गया। उन्हें “विरोधी” और “असहयोगी” के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उनका तर्क साफ था कि वे इस आयोजन को धार्मिक से अधिक राजनीतिक मानते हैं। आज वही राजनीति उनके धरने को भी “राजनीतिक” कहकर खारिज करने की कोशिश कर रही है। यह वही पुराना और सुविधाजनक तरीका है — जो बात असहज हो, जो सवाल चुभता हो, उसे “राजनीति” का लेबल लगाकर खारिज कर दो।
भाजपा जब विपक्ष में थी, तब उसने कांग्रेस पर हिंदू-विरोधी होने का आरोप लगाकर राम मंदिर आंदोलन, सबरीमाला और अनेक धार्मिक मुद्दों को सड़क से संसद तक पहुँचाया था। तब यह सब “आस्था की आवाज” था। आज जब वही सवाल सत्ता से पूछे जा रहे हैं, तो उन्हें “अराजकता”, “साजिश” या “विपक्ष की चाल” कहा जा रहा है। यही लोकतंत्र का दोहरा मापदंड है, और यही वह बिंदु है जहाँ सत्ता धीरे-धीरे अपने नैतिक अधिकार को खोने लगती है।
इस पूरे विवाद का सबसे दुखद पहलू यह है कि इससे हिंदू समाज के भीतर ही एक गहरी वैचारिक दरार पैदा हो रही है — एक तरफ “सरकारी हिंदुत्व” और दूसरी तरफ “परंपरागत सनातन”। अगर यह टकराव इसी तरह बढ़ता गया, तो इसका राजनीतिक नुकसान तो होगा ही, लेकिन उससे कहीं बड़ा नुकसान भारत की सभ्यतागत एकता को होगा। 2027 के चुनाव में इसका असर ब्राह्मण समाज और संत समाज पर पड़ेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ धर्म सिर्फ सत्ता का प्रचार विभाग बनकर रह जाएगा।
समाधान आज भी संभव है, अगर सरकार यह समझे कि संवाद और सम्मान कमजोरी नहीं होते, बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। शंकराचार्य कोई सरकार गिराने नहीं बैठे हैं, वे केवल सम्मान, मर्यादा और धर्म की स्वायत्तता की बात कर रहे हैं। अगर सरकार सच में खुद को हिंदू हितैषी मानती है, तो उसे सबसे पहले हिंदू धर्म की स्वतंत्र और निर्भीक आवाजों का सम्मान करना सीखना होगा।
यह पूरा विवाद अंततः एक ही मूल प्रश्न पर आकर ठहरता है — क्या भारत में धर्म सत्ता का अनुचर बनेगा, या सत्ता धर्म की मर्यादा में चलेगी? इतिहास गवाह है कि जब भी धर्म सत्ता का नौकर बना है, तब सभ्यताएँ भीतर से खोखली हुई हैं। और जब भी संतों, विचारकों और नैतिक आवाजों ने सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत रखी है, तब समाज ने खुद को बचाए रखा है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना सिर्फ एक धरना नहीं है। यह भारतीय सभ्यता की अंतरात्मा की एक लंबी और गंभीर पुकार है, जो कह रही है — सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन धर्म की मर्यादा और सभ्यता की आत्मा शाश्वत होती है।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
शंकराचार्य परंपरा, संत–सत्ता संबंध और धर्म की स्वायत्तता का ऐतिहासिक संघर्ष
यदि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के वर्तमान धरने को केवल एक समकालीन राजनीतिक विवाद के रूप में देखा जाएगा, तो हम उसके वास्तविक अर्थ और उसकी सभ्यतागत गहराई को समझने से चूक जाएँगे। इस पूरे घटनाक्रम को सही तरह से समझने के लिए हमें उस ऐतिहासिक परंपरा की ओर लौटना होगा, जिसकी जड़ें आदि शंकराचार्य के समय से लेकर आज तक फैली हुई हैं। शंकराचार्य परंपरा केवल एक धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक और आध्यात्मिक एकता की वह धुरी रही है, जिसने सदियों तक इस विविधताओं से भरे देश को एक वैचारिक सूत्र में बाँध कर रखा।
आदि शंकराचार्य ने जब चार पीठों — बदरी, द्वारका, पुरी और श्रृंगेरी — की स्थापना की थी, तब उनका उद्देश्य केवल मठों का निर्माण नहीं था, बल्कि पूरे भारत में एक ऐसी वैचारिक और आध्यात्मिक संवाद-परंपरा स्थापित करना था, जो राजनीतिक सीमाओं और राजवंशों से परे जाकर काम करे। यह व्यवस्था किसी राजा की कृपा पर नहीं टिकी थी। राजा आते-जाते रहे, साम्राज्य बनते और टूटते रहे, लेकिन शंकराचार्य परंपरा अपनी आंतरिक अनुशासन और शास्त्रीय मर्यादा के बल पर चलती रही। यही कारण है कि जब आज कोई आधुनिक राज्य या प्रशासनिक अधिकारी इस परंपरा की वैधता पर सवाल उठाता है, तो वह अनजाने में ही उस हजार साल पुरानी सभ्यतागत स्मृति से टकरा जाता है।
भारत के इतिहास में संतों और सत्ता का रिश्ता हमेशा सरल नहीं रहा है। यह रिश्ता कभी सहयोग का रहा है, कभी टकराव का, और कभी एक-दूसरे को नैतिक दिशा दिखाने का। मध्यकाल में कई बार संतों और आचार्यों ने राजाओं को उनकी मर्यादा याद दिलाई। कबीर, तुलसी, नामदेव, गुरु नानक — ये सभी किसी न किसी रूप में सत्ता की सीमाओं को रेखांकित करने वाले नैतिक स्वर थे। वे सत्ता को उखाड़ फेंकने नहीं निकले थे, लेकिन वे यह ज़रूर बताते थे कि सत्ता का काम केवल शासन करना है, आत्मा पर अधिकार जमाना नहीं।
मुग़ल काल में भी यह परंपरा किसी न किसी रूप में जीवित रही। कई बार सत्ता ने संतों को संरक्षण दिया, और कई बार वही सत्ता उनसे असहज होकर उन्हें हाशिए पर धकेलने की कोशिश करती रही। लेकिन एक बात लगभग स्थायी रही — धार्मिक परंपराएँ अपनी आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए संघर्ष करती रहीं। ब्रिटिश काल में भी अंग्रेज़ों ने समझ लिया था कि भारत को सिर्फ प्रशासनिक रूप से नियंत्रित करना काफी नहीं है, उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं को भी धीरे-धीरे अपने प्रभाव में लेना होगा। लेकिन वे शंकराचार्य परंपरा जैसी संस्थाओं को कभी पूरी तरह अपने नियंत्रण में नहीं ले सके, क्योंकि उनकी वैधता का स्रोत सत्ता नहीं, समाज और शास्त्र थे।
1857 के विद्रोह में साधु-संतों और धार्मिक संन्यासियों की भूमिका कोई छोटी नहीं थी। कई अखाड़े और साधु-समूह उस संघर्ष में शामिल हुए, और अंग्रेज़ों ने बाद में इन धार्मिक समूहों को संदेह की दृष्टि से देखना शुरू किया। यही वह क्षण था, जब आधुनिक भारतीय इतिहास में पहली बार राज्य और धार्मिक समाज के बीच एक गहरी अविश्वास की रेखा खिंचनी शुरू हुई। आज का भारत उस औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है, और कभी-कभी वही मानसिकता नए रूप में लौट आती है — जब प्रशासन धर्म को एक “प्रबंधित करने योग्य समस्या” की तरह देखने लगता है।
स्वतंत्रता के बाद संविधान ने धर्म और राज्य के संबंधों को एक संतुलित ढाँचे में बाँधने की कोशिश की। राज्य को धर्म से दूरी बनाए रखने की सलाह दी गई, लेकिन धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी भी दी गई। सिद्धांततः यह एक सुंदर व्यवस्था थी, लेकिन व्यवहार में अक्सर यह संतुलन बिगड़ता रहा। कभी राज्य ने धर्म के नाम पर राजनीति की, और कभी धर्म के कुछ ठेकेदारों ने राजनीति के नाम पर आस्था का उपयोग किया। इस खींचतान में सबसे ज्यादा नुकसान उस वास्तविक धार्मिक चेतना का हुआ, जो न तो सत्ता की दासी बनना चाहती थी और न ही सत्ता पर कब्जा करना चाहती थी।
कुंभ और माघ मेले जैसे आयोजन इस संतुलन की परीक्षा के सबसे बड़े मंच रहे हैं। सदियों से ये आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक संसद की तरह रहे हैं, जहाँ विभिन्न संप्रदाय, अखाड़े, मठ और संत-समुदाय अपनी-अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और बिना किसी केंद्रीय राजनीतिक नियंत्रण के अपनी आंतरिक व्यवस्था से चलते हैं। राजा या शासक का काम केवल सुरक्षा और सुविधा तक सीमित रहता था। लेकिन आधुनिक राज्य धीरे-धीरे इन आयोजनों को “इवेंट मैनेजमेंट” की तरह देखने लगा है, जहाँ सब कुछ प्रशासनिक आदेश और प्रोटोकॉल से नियंत्रित किया जाना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहाँ से आज का टकराव शुरू होता है। जब प्रशासन यह तय करने लगे कि कौन संत किस समय स्नान करेगा, कौन कहाँ शिविर लगाएगा और किसे कौन सा मार्ग मिलेगा, तो वह अनजाने में ही एक ऐसी भूमिका में प्रवेश कर जाता है, जो ऐतिहासिक रूप से उसकी नहीं रही है। और जब वह आगे बढ़कर यह भी तय करने लगे कि कौन शंकराचार्य “वैध” है और कौन नहीं, तो यह धर्म की स्वायत्तता पर सीधा आक्रमण बन जाता है।
“राज्य-प्रायोजित साधु” या “सरकारी संत” की अवधारणा भी इसी प्रक्रिया की एक उपज है। हर दौर की सत्ता चाहती है कि कुछ धार्मिक चेहरे उसके मंच पर बैठें, उसके फैसलों को धार्मिक वैधता प्रदान करें और जनता को यह संदेश दें कि सरकार जो कर रही है, वह धर्मसम्मत है। इसमें अपने आप में कुछ भी गलत नहीं है, यदि यह स्वाभाविक और स्वतंत्र सहमति से हो। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब वही सत्ता उन धार्मिक आवाज़ों को हाशिए पर धकेलने लगे या दबाने लगे, जो उससे असहमत हैं।
आज की मीडिया-संस्कृति इस समस्या को और गहरा बना देती है। जो संत सरकार के साथ मंच साझा करता है, वह “महान संत” और “राष्ट्र की आत्मा” बना दिया जाता है, और जो सवाल पूछता है, वह “विवादित”, “कट्टर” या “राजनीतिक एजेंडे वाला” घोषित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे धर्म की आंतरिक विविधता और स्वतंत्रता समाप्त होने लगती है, और वह एक तरह की सरकारी स्क्रिप्ट में ढलने लगता है।

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शंकराचार्य परंपरा ऐतिहासिक रूप से इस तरह की किसी भी स्क्रिप्ट में ढलने से इनकार करती रही है। यही कारण है कि अलग-अलग कालखंडों में शंकराचार्यों के और राजसत्ताओं के बीच टकराव भी होते रहे हैं। कभी यह टकराव शांति से सुलझ गया, कभी वह लंबा खिंच गया, लेकिन मूल प्रश्न हमेशा वही रहा — धर्म की सीमा क्या है और सत्ता की सीमा क्या है?
आज का विवाद उसी पुराने प्रश्न का नया रूप है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज की सत्ता के पास मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र की एक विशाल मशीनरी है, जिससे वह किसी भी असहमति को “छवि” के स्तर पर ही कमजोर करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन इतिहास बताता है कि छवि की लड़ाइयाँ अंततः स्मृति की लड़ाइयों के सामने टिक नहीं पातीं। और स्मृति में वही बचता है, जो सभ्यता की गहराई से जुड़ा होता है, न कि जो केवल किसी एक चुनावी चक्र का हिस्सा होता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के धरने को इसी दीर्घकालिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह कोई अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं है, बल्कि वह उस लंबे संघर्ष की एक नई कड़ी है, जिसमें धर्म अपनी स्वायत्तता बचाने की कोशिश करता रहा है और सत्ता उसे अपने दायरे में लाने की।
इस संघर्ष का एक और पहलू यह भी है कि आधुनिक भारतीय राज्य खुद एक अजीब दुविधा में फँसा हुआ है। एक तरफ वह खुद को धर्मनिरपेक्ष कहता है, और दूसरी तरफ वह धार्मिक भावनाओं और प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग भी करता है। इस दुविधा का नतीजा यह होता है कि जब कोई वास्तविक धार्मिक आवाज सत्ता से सवाल पूछती है, तो वह उसे या तो “राजनीतिक” कहकर खारिज कर देता है या “कानून-व्यवस्था” का मुद्दा बनाकर दबाने की कोशिश करता है।
लेकिन धर्म की असली भूमिका हमेशा कानून-व्यवस्था से ऊपर की रही है। वह समाज की नैतिक चेतना को जगाने का काम करता है, और कई बार यह काम सत्ता के लिए असुविधाजनक भी होता है। यही असुविधा आज हमें प्रयागराज में दिखाई दे रही है।
यहाँ से यह सवाल और भी गहरा हो जाता है — क्या भारत एक ऐसा राष्ट्र बनता जा रहा है, जहाँ धर्म केवल सत्ता का सजावटी हिस्सा होगा, या फिर वह अपनी उस पुरानी परंपरा को बचा पाएगा, जिसमें संत सत्ता से सवाल पूछ सकते थे और सत्ता को उसकी सीमाएँ याद दिला सकते थे?

यहां आप पढ रहे हैं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवाद निस्पक्ष संपादक एवं लेखक अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म लेखनी।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
हिंदुत्व बनाम सनातन, राजनीति में धर्म का बाज़ारीकरण और भारत के लोकतंत्र की निर्णायक परीक्षा
अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का धरना किसी एक घटना, किसी एक अपमान या किसी एक प्रशासनिक फैसले का परिणाम नहीं है, बल्कि वह उस गहरे और लंबे चल रहे वैचारिक संघर्ष की नवीनतम अभिव्यक्ति है, जिसमें आधुनिक भारतीय राज्य और सनातन परंपरा आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। इस संघर्ष को सही तरह से समझने के लिए हमें उस सबसे संवेदनशील और सबसे अधिक भ्रम पैदा करने वाले प्रश्न की ओर जाना होगा — हिंदुत्व और हिंदू धर्म (सनातन) के बीच का अंतर।
आज की राजनीति में “हिंदुत्व” शब्द का प्रयोग एक राजनीतिक पहचान, एक चुनावी रणनीति और एक सांस्कृतिक ब्रांड की तरह किया जा रहा है। यह एक ऐसी भाषा है, जो मित्र और शत्रु की रेखाएँ खींचती है, जो “हम” और “वे” का विभाजन करती है, और जो अक्सर धर्म को करुणा और आत्मिक अनुशासन से निकालकर शक्ति-प्रदर्शन और भीड़-राजनीति का औज़ार बना देती है। इसके विपरीत, सनातन धर्म की मूल आत्मा इस बात में रही है कि वह जीवन को एक नैतिक, आध्यात्मिक और आत्मानुशासन की यात्रा के रूप में देखता है। वह राज्य को साध्य नहीं, साधन मानता है, और सत्ता को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक अस्थायी व्यवस्था मानता है।
यही कारण है कि जब कोई शंकराचार्य सत्ता से सवाल करता है, तो वह वास्तव में किसी राजनीतिक परियोजना का विरोध नहीं कर रहा होता, बल्कि वह इस बात पर ज़ोर दे रहा होता है कि धर्म की आत्मा को राजनीति के शोर में खोने नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन आधुनिक राजनीति की विडंबना यह है कि वह हर असहज सवाल को “राजनीति” कहकर खारिज कर देना चाहती है, ताकि उसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत ही न पड़े।
आज हम एक ऐसे दौर में पहुँच गए हैं, जहाँ धर्म का भी बाज़ारीकरण हो चुका है। मंदिर, तीर्थ, पर्व और यहां तक कि संत-महात्मा भी कई बार एक “इवेंट” और एक “ब्रांड” की तरह पेश किए जाते हैं। मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया ट्रेंड और राजनीतिक मंचों पर उपस्थिति — यह सब मिलकर धर्म को एक तरह के उत्पाद में बदल देता है, जिसे ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में जो चीज़ सबसे ज्यादा खो जाती है, वह है धर्म की आत्मालोचनात्मक और नैतिक भूमिका।
शंकराचार्य परंपरा ऐतिहासिक रूप से इस आत्मालोचनात्मक भूमिका का सबसे सशक्त प्रतीक रही है। वह समाज और सत्ता दोनों से यह पूछने का साहस रखती रही है कि वे किस दिशा में जा रहे हैं। लेकिन आज वही साहस “विरोध”, “अवरोध” और “अराजकता” के रूप में चित्रित किया जा रहा है। यह सिर्फ एक परंपरा के साथ अन्याय नहीं है, यह पूरे लोकतांत्रिक विचार के साथ अन्याय है।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। वह असहमति को सुनने, उसे सहने और उससे सीखने की क्षमता का भी नाम है। जब सत्ता यह मानने लगती है कि जो भी उससे असहमत है, वह या तो “विकास-विरोधी” है, या “राष्ट्र-विरोधी”, या “एजेंडा चलाने वाला” है, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे एक औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाता है, जिसकी आत्मा भीतर से खोखली हो चुकी होती है। शंकराचार्य जैसे पद पर बैठे व्यक्ति का असुरक्षित महसूस करना इसी खोखलेपन का संकेत है।

इस पूरे विवाद का राजनीतिक असर भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उत्तर भारत की राजनीति में ब्राह्मण समाज और संत-समाज की भूमिका ऐतिहासिक रूप से निर्णायक रही है। यह वर्ग केवल वोट-बैंक नहीं, बल्कि एक तरह से नैतिक और सांस्कृतिक दिशा-निर्देशक की भूमिका भी निभाता रहा है। अगर यही वर्ग यह महसूस करने लगे कि सत्ता उनकी परंपराओं और उनकी स्वायत्तता का सम्मान नहीं कर रही है, तो उसका असर केवल किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह लंबे समय तक राजनीति की दिशा को प्रभावित करेगा।
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से राजनीतिक गणनाएँ शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में शंकराचार्य जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक पद के साथ टकराव कोई छोटा मामला नहीं है। विपक्ष इसे एक उदाहरण के रूप में पेश करेगा कि सरकार “हिंदू हितैषी” होने का दावा तो करती है, लेकिन वास्तविक धार्मिक परंपराओं का सम्मान नहीं करती। और भले ही सत्ता पक्ष इसे “छोटा विवाद” या “प्रशासनिक मुद्दा” बताने की कोशिश करे, लेकिन समाज की स्मृति में ऐसे टकराव बहुत लंबे समय तक रहते हैं।
लेकिन इस पूरे मामले को केवल चुनावी गणित में सीमित करना भी एक तरह की भूल होगी। असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है — हम किस तरह का भारत बना रहे हैं? क्या वह एक ऐसा भारत होगा, जहाँ धर्म केवल सत्ता की शोभा बढ़ाने वाला एक सजावटी तत्व होगा, या वह एक ऐसा भारत होगा, जहाँ धर्म सत्ता को उसकी सीमाएँ याद दिलाने वाली एक स्वतंत्र नैतिक शक्ति बना रहेगा?
इतिहास हमें बार-बार यह सिखाता है कि जब भी किसी सभ्यता में धर्म और नैतिकता सत्ता के अधीन हो जाती है, तब वह सभ्यता धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो देती है। रोमन साम्राज्य से लेकर आधुनिक तानाशाही राज्यों तक, इसके अनगिनत उदाहरण मिलते हैं। भारत की विशेषता हमेशा यह रही है कि यहाँ संत और विचारक सत्ता से सवाल पूछ सकते थे, और सत्ता को यह स्वीकार करना पड़ता था कि वह अंतिम सत्य नहीं है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना इसी परंपरा की एक आधुनिक अभिव्यक्ति है। यह सत्ता को गिराने का प्रयास नहीं है, बल्कि सत्ता को उसकी मर्यादा याद दिलाने की कोशिश है। यह याद दिलाने की कोशिश कि धर्म कोई विभाग नहीं है, जिसे फाइलों और नोटिसों से चलाया जा सके और न ही वह कोई प्रचार-साधन है, जिसे चुनावी मंचों पर इस्तेमाल करके फेंक दिया जाए।
आज भी समय है कि यह विवाद टकराव की जगह संवाद से सुलझाया जाए। सरकार अगर सच में खुद को सनातन और हिंदू परंपरा की संरक्षक मानती है, तो उसे सबसे पहले उन्हीं परंपराओं की स्वतंत्र आवाज़ों का सम्मान करना सीखना होगा। सम्मान और संवाद कमजोरी नहीं होते वे किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान होते हैं।
अंततः यह पूरा प्रकरण हमें एक बहुत गहरे और शायद असहज प्रश्न के सामने खड़ा करता है — क्या हम एक ऐसे राष्ट्र बनना चाहते हैं, जहाँ हर संस्था सत्ता के अधीन हो, या एक ऐसा राष्ट्र, जहाँ कुछ संस्थाएँ सत्ता से बड़ी नैतिक जिम्मेदारी निभाएँ? शंकराचार्य परंपरा हमेशा दूसरी श्रेणी में आती रही है। अगर वह भी पहली श्रेणी में धकेल दी गई, तो शायद हम सिर्फ एक राजनीतिक राज्य बचा पाएँगे, एक सभ्यता नहीं।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं है। यह उस भारत की आत्मा का संघर्ष है, जो सदियों से सत्ता को सम्मान तो देता रहा है, लेकिन उसे कभी ईश्वर का स्थान नहीं दिया। यह उसी भारत की पुकार है, जो आज भी कहना चाहता है — सत्ता क्षणिक होती है, लेकिन धर्म, नैतिकता और सभ्यता की स्मृति शाश्वत होती है।

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