न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक – ज्ञानेंद्र मिश्र

Amit Srivastav

Updated on:

महामहिम राष्ट्रपति ने हाल ही में उच्चतम न्यायालय से कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं, “आमूल-चूल” जिनका उद्देश्य न्यायपालिका की शक्तियों और उसकी कार्यप्रणाली को समझना है। इन प्रश्नों में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उच्चतम न्यायालय की शक्तियां क्या कानूनी प्रक्रियाओं से संबंधित हैं या कानून बनाने के अधिकार पर आधारित हैं?


यह प्रश्न न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और उसकी शक्तियों के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें उजागर करता है।

आमूल-चूल परिवर्तन

तमिलनाडु सरकार का मामला

तमिलनाडु सरकार की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। इस निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने गवर्नर और राष्ट्रपति की शक्तियों को दरकिनार करते हुए 10 कानूनों को बिना उनकी मंजूरी के लागू कर दिया। यह मामला तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु सरकार ने उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने गवर्नर और राष्ट्रपति की शक्तियों को चुनौती दी थी।

तमिलनाडु सरकार का तर्क था कि गवर्नर और राष्ट्रपति की शक्तियों का उपयोग करके राज्य के कानूनों को लागू करने में बाधा उत्पन्न की जा रही है। उच्चतम न्यायालय ने तब यह निर्णय दिया की एक निश्चित समय सीमा के अनुसार यदि राष्ट्रपति सहमति प्रदान नहीं करता है तो कानून अपने आप लागू माना जाए। यह एक अत्यंत खतरनाक की स्थिति की ओर इशारा करता है।


निर्णय की आलोचना
कानूनी जानकारों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय में कई खामियां हैं। उनका कहना है कि किसी भी कानून की अनुपस्थिति में नया कानून बनाने या संविधान में बदलाव करने के लिए कम से कम पांच न्यायाधीशों की पीठ बैठनी चाहिए। लेकिन इस मामले में केवल दो न्यायाधीशों की पीठ ने यह निर्णय दिया, कि न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े करता है। इसके अलावा, यह निर्णय संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध भी हो सकता है, जो कि उच्चतम न्यायालय के लिए ही नहीं वरन् भारत के संपूर्ण संवैधानिक संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती है।


कानून-विदों के दृष्टिकोण से उच्चतम न्यायालय के उपर्युक्त निर्णय के संभावित परिणाम

  • १) गवर्नर के अधिकारों का हनन हुआ है।
  • २) राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता नहीं, कोई भी कानून बनाने के लिए।
  • ३) कानून बनाने के लिए विधायिका भी फिर आवश्यक नहीं।
  • ४) कानून बनाना, संविधान बदलना, संविधान की व्याख्या करना – इस समस्त अधिकार उच्चतम न्यायालय के पास जाता दिख रहा है।
  • ५) जो राष्ट्र या देश एक संविधान के तहत चलता है, यदि उसे संविधान को बनाने, संशोधित करने, बदलने, व्याख्या करने, लागू करने की समस्त जिम्मेदारी उच्चतम न्यायालय की है, तो यहां सीधा-सीधा तय होता है कि यह राष्ट्र उच्चतम न्यायालय चला सकता है।
  • ६) अब क्योंकि उच्चतम न्यायालय संविधान का एकछत्र अधिकारी है, तो कार्यपालिका का अस्तित्व ही पूरी तरह से उच्चतम न्यायालय पर निर्भर है।
  • ७) राष्ट्र की कार्यपालिका फिर मात्र न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह होगी।
  • ८) और यदि सदन की शक्तियां न्यायपालिका अपने हाथों में ले लेती है, तो सदन की आवश्यकता ही नहीं है।
  • ९) यदि सदन की आवश्यकता नहीं है, तो फिर चुनाव का कोई अर्थ नहीं रह जाता, क्योंकि जनप्रतिनिधि अधिकारविहीन संसद में बैठकर करेंगे क्या?
  • १०) अर्थात् लोकतंत्र की आवश्यकता ही नहीं है, जब चुनाव होने ही नहीं।
  • ११) न्यायपालिका पूरे राष्ट्र का संचालन दिल्ली में स्थित उच्चतम न्यायालय में बैठे मात्र दो न्यायाधीशों के विवेक और कलम की ताकत पर करेगी।
  • १२) और कोई भी सामान्य बुद्धि का मालिक भी यह बता सकता है कि यदि राष्ट्र मात्र दो व्यक्तियों द्वारा संचालित किया जा सकता है, तो इसे तानाशाही ही कहा जाएगा।


न्यायपालिका में भ्रष्टाचार
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को सदैव / कई बार दबाया गया है, छुपाया गया है—


टेलीविजन में स्टिंग ऑपरेशन के दौरान पकड़े गए खुले अदालत के भ्रष्टाचार को दबा दिया गया।


तीस्ता सीतलवाड़ मामले में छुट्टी के दिन शाम के वक्त, भरतनाट्यम कार्यक्रम के दौरान ऑडिटोरियम में एक  टेलीफोन के ऊपर बेंच गठित कर दी जाती है और जमानत दे दी जाती है- पता ही नहीं चलता कि किसका टेलीफोन आया और आखिर वास्तव में हुआ क्या था?


अभी कुछ समय पहले जस्टिस वर्मा के निवास से करोड़ों रुपए की नगदी मामले को शुरू के कुछ दिनों दबा कर रखा गया- बाद में उन्हें मुक्त कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज कर शपथ भी दिला दी गई।


मगर लोकतंत्र के दबाव में मजबूरन एक समिति गठित की गई वह भी न्याय व्यवस्था के अंदर काम करने वाले न्यायाधीशों की- हां, घोर आश्चर्य है- इसी व्यवस्था को जांच करने के आदेश दिए गए जिस व्यवस्था ने कुछ दिन पहले ही इस नगदी कांड को दबाया, छुपाया और जस्टिस वर्मा को अपराध मुक्त करते हुए प्रयागराज में न्यायाधीश की शपथ भी दिलवा दी।


मजेदार बात यह है की अभी कुछ दिन पहले ही निशिकांत दुबे मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि- “न्यायाधीश जांच-कर्ता थोड़े ही है?” न्यायाधीश तो मात्र जांच के उपरांत आए तथ्यों के आधार पर सही गलत का निर्णय कर‌आदेश दे सकते हैं- परंतु इस उच्चतम न्यायालय ने उन्हें न्यायाधीशों को -“जो की जांच-कर्ता नहीं है”- जांच करने के आदेश दिए।


अब उससे भी मजेदार बात- जांच भी पूरी हो गई- आनंद का विषय है की द्रुत गति से हुई, किसी को भी जांच के तरीके, गवाही इत्यादि के बारे में कोई भी जानकारी न प्राप्त हुई।


निर्णय भी आ गया और जस्टिस वर्मा अपराधी घोषित किए गए।
मगर विडंबना देखिए की एक अपराधिक कृत्य के अपराधी को उसकी सजा चुनने का अधिकार दिया गया।


जस्टिस वर्मा से कहा गया कि;

आप या तो बाइज्ज़त सेवानिवृत हो जाए
अथवा
महाभियोग का सामना करें

आप क्रिमिनल अपराधी को अपनी सजा चुनने का अधिकार कैसे दे सकतेहैं?

आप क्रिमिनल अपराधी को सेवानिवृत होने का अधिकार कैसे दे सकते हैं?


फिर तो यदि कोई न्यायाधीश बलात्कार अथवा हत्या करता है यह भी एक क्रिमिनल अपराध माना जाएगा– उसे भी इन दो सजाओं में से अपनी पसंदीदा कोई एक सजा का चुनाव करने का अधिकार होगा।


समयाभाव के कारण मैं कॉलेजियम सिस्टम की चर्चा नहीं कर रहा क्योंकि पब्लिक फोरम में बहुत सारी जानकारियां उपलब्ध है और तकरीबन तकरीबन सभी न्यायाधीश के इतिहास उनकी योग्यता के बारे में लोगों को पहले से ही काफी सारी जानकारियां उपलब्ध है। और यह भी चर्चा नहीं कर रहा की क्यों एन. जे. ए. सी.(National judiciary appointment committee) आवश्यक है।

न्यायपालिका में सुधार – आमूल-चूल परिवर्तन

न्यायपालिका की स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। न्यायपालिका को अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और साथ ही साथ अपनी जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी चाहिए।


मुझे तो लगता है कि भारतीय न्यायपालिका की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए महामहिम राष्ट्रपति का यह प्रश्न एक महत्वपूर्ण मोड़ है और यहां से आरंभ होती है उल्टी गिनती – न्यायपालिका जल्द ही लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह होगी, ऐसी अपेक्षा भी है और प्रतीत भी हो रहा है।


अंत में, महामहिम राष्ट्रपति के प्रश्न ने न्यायपालिका की शक्तियों और उसकी जवाबदेही के विषय में एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायपालिका इस पर कैसे प्रतिक्रिया देती है और क्या यह वास्तव में अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए कोई ठोस कदम उठाती है।


खैर, समय का चक्र डोल उठा है उम्मीद है न्याय व्यवस्था अपनी सीमाओं को पहचानेगी और न्याय व्यवस्था में नियुक्तियों व भ्रष्टाचार  के मामलों को ईमानदारी के साथ तय किया जाएगा। amitsrivastav.in निस्पक्ष गूगल टाप वेबसाइट पर मिलता है हर तरह की जानकारी बेल आइकन को दबा एक्सेप्ट करें एप्स इंस्टाल करें अपनी पसंदीदा लेख को अधिक से अधिक लोगों तक शेयर करते रहें।

-ज्ञानेंद्र मिश्र
मुंबई,  16 मई 2025

click on the link ब्लाग पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
कर्म का फलकर्म का फलMarch 24, 2024Amit Srivastav
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

निधि सिंह कौन है? अंतरराष्ट्रीय शांति और सामाजिक जागरूकता को लेकर निधि सिंह की पहल चर्चा में

अंतरराष्ट्रीय शांति और सामाजिक जागरूकता को लेकर निधि सिंह की पहल चर्चा में जाने पूरी जानकारी यहां एक क्लिक में। नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट अंतराष्ट्रीय सहयोग, सामाजिक जिम्मेदारी, मानवीय मूल्यों और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार से जुड़े प्रयासों के बीच निधि सिंह को स्वयंसेवी सेवा से संबंधित एक प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ है। United Nations … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

Journalism पत्रकारिता का संपूर्ण इतिहास: प्राचीन काल से आधुनिक युग तक – गुप्त रहस्यों के साथ विश्लेषणात्मक अध्ययन

पत्रकारिता का संपूर्ण इतिहास: “Journalism” प्राचीन काल से आधुनिक युग तक – गुप्त रहस्यों के साथ विश्लेषणात्मक अध्ययन का रहस्यमयी सफर: प्राचीन काल से गोदी मीडिया तक। फेक न्यूज़ का प्रभाव और भारत में सत्य की जंग। इतिहास और वर्तमान का रोचक विश्लेषण। The Complete History of Journalism: An Analytical Study/Analytical study of the entire … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

JINDAGI JHAND HAI PHIR BHI GHAMAND HAI: जिंदगी झंड है, फिर भी घमंड है: आज के युवक-युवतियों और दम्पतियों पर 1 हास्यास्पद व्यंग्यात्मक डिजिटल प्रेमकथा

jindagi jhand hai phir bhi ghamand hai — आज की जिंदगी बड़ी तेज हो गई है। इतनी तेज कि आदमी को खुद समझ नहीं आता कि वह जिंदगी जी रहा है या जिंदगी उसे जी रही है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है, रात आंख बंद होने से पहले आखिरी बार … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

विकसित भारत की संकल्पना के शिल्पकार है नरेंद्र मोदी: September 17 सभा कुंवर कुशवाहा

उत्तर प्रदेश देवरिया। September 17 बृहस्पतिवार को भाटपार रानी मंडल के भाजपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने मंडल अध्यक्ष विशंभर पांडेय की अध्यक्षता में भाटपार रानी उपनगर स्थित हरि ब्रह्मा बाबा के मंदिर में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर स्वच्छता कार्यक्रम के अंतर्गत साफ-सफाई किया। एवं ग्राम पंचायत बेलपार पंडित … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

बॉलीवुड कैलाश खेर सिंगर ने मिस एशिया वर्ल्ड विनर निधि सिंह से की मुलाकात, उज्ज्वल भविष्य की दी शुभकामनाएं

बॉलीवुड कैलाश खेर सिंगर ने मिस एशिया वर्ल्ड वियतनाम विनर निधि सिंह से मुलाकात कर उन्हें उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं। जानिए निधि सिंह की उपलब्धियों, सामाजिक सेवा, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से जुड़ी पूरी खबर। एंकर: बॉलीवुड के मशहूर और लोकप्रिय गायक कैलाश खेर ने मिस एशिया वर्ल्ड वियतनाम की विनर निधि सिंह … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

Sex Positions तंत्र, धर्म, विज्ञान और ज्योतिष के 5000 वर्षों के छुपे राज

Sex Positions सेक्स पोजीशन का गुप्त रहस्य वो गुप्त ज्ञान जो कभी आम लोगों को नहीं बताया गया — पूर्ण दांपत्य सुख और आत्मिक मिलन का प्रतिबंधित मार्गदर्शक amitsrivastav.in लेखक: अमित श्रीवास्तव विषय सूची भूमिका भाग 1 — छुपा हुआ इतिहास अध्याय 1: वो गुप्त शास्त्र जो सदियों तक छुपाए गए अध्याय 2: कामसूत्र का असली … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

माँ की ममता — wonderful महाग्रंथ श्रृंखला खंड 1,2,3

क्या हम सचमुच अपनी माँ को समझ पाए हैं? “माँ की ममता” महाग्रंथ-श्रृंखला — केवल एक पुस्तक नहीं, समाज के आत्ममंथन का दस्तावेज़ है जहाँ माँ पर बहुत लिखा गया है। कविताएँ लिखी गईं, गीत लिखे गए, कहानियाँ लिखी गईं, आँसू बहाए गए, श्रद्धा व्यक्त की गई और माँ को धरती पर ईश्वर का रूप … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

सुखी दांपत्य जीवन: प्रेम, सम्मान और संवाद की संपूर्ण यात्रा

क्या केवल विवाह कर लेना ही सुखी दांपत्य जीवन की गारंटी है?यदि ऐसा होता, तो दुनिया में इतने अधिक वैवाहिक तनाव, बढ़ती दूरियाँ, लगातार होने वाले विवाद, भावनात्मक अकेलापन और टूटते रिश्ते दिखाई नहीं देते। वास्तविकता यह है कि विवाह जीवन की सबसे सुंदर यात्राओं में से एक है, लेकिन यह सबसे चुनौतीपूर्ण यात्राओं में … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

क्या वास्तव में होती हैं अप्सराएँ? mrigakshi apsara का रहस्य, शास्त्रीय परंपरा, तांत्रिक विमर्श और 1 आध्यात्मिक दृष्टि

क्या अप्सराएँ केवल पौराणिक कथा हैं या भारतीय शास्त्रों का गहन प्रतीक? Mrigakshi Apsara मृगाक्षी अप्सरा, वैदिक संदर्भ, शक्ति परंपरा और शोधपरक तंत्र-मंत्र साधना विधि-विधान के साथ विश्लेषण पढ़ें। पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा अप्सरा साधना महाग्रंथ श्रृंखला 64 में प्रथम शिर्षक मृगाक्षी अप्सरा साधना महाग्रंथ mrigakshi apsara mantra सम्पूर्ण विधि-विधान सहित amozan पर eBook एवं … Read more
न्यायपालिका; आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक - ज्ञानेंद्र मिश्र

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग | काल भैरव मंत्र, पूजा विधि और उपाय

बटुक भैरव कार्य सिद्धि एवं शत्रुनाशक प्रयोग काल भैरव की पूजा विधि, मंत्र और उपाय भगवान बटुक भैरव की पूजा विधि, शक्तिशाली कार्य सिद्धि मंत्र, अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र, कवच पाठ और शत्रु नाशक प्रभावी उपाय जानिए। कालभैरवाष्टमी पर विशेष प्रयोग से असंभव कार्य सिद्ध होंगे और शत्रु परेशान करना छोड़ देंगे। भैरव कृपा प्राप्त … Read more

Leave a Comment