भारत में शिक्षा व्यवस्था की खट्टी-मीठी सफर 1947 से 2025 तक की कहानी – जहां वादे थे पांच सितारा, लेकिन हकीकत में बासी परोसा गया। नीतियों, आंकड़ों और व्यंग्य के मसालेदार मिश्रण के साथ पढ़िए एक ईमानदार विश्लेषण।
मुख्य पृष्ठ लेखन परिचय—
भारत की आज़ादी के बाद से शिक्षा व्यवस्था का इतिहास एक ऐसी पटकथा की तरह रहा है, जिसमें हर सरकार ने अपने-अपने किरदार निभाए, संवाद बोले, नारे उछाले, लेकिन मंच की ज़मीन अक्सर खोखली ही रही। शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की रीढ़ कहा गया, लेकिन हकीकत में यह रीढ़ हमेशा किसी न किसी गठिया रोग से पीड़ित रही। कभी वादों की बारिश हुई, कभी योजनाओं की बाढ़, पर स्कूलों की छतें टपकती रहीं, किताबें गायब रहीं और शिक्षकों की कमी, जो थे भी अक्सर कुछ अनुपस्थित।
1947 से लेकर 2025 तक भारत की शिक्षा प्रणाली ने कई रंग देखे—नेहरू का आदर्शवाद, इंदिरा गांधी का समाजवाद, राजीव गांधी का टेक्नोलॉजी प्रेम और मोदी सरकार की मार्केट-फ्रेंडली रणनीतियाँ—लेकिन इनमें से कोई भी ऐसा नहीं रहा जो गांव के हर बच्चे तक किताब और ज्ञान की रोशनी पहुँचा पाया हो।
यह लेख भारत की शिक्षा प्रणाली की उसी 78 वर्षीय यात्रा को व्यंग्य, तथ्य और सच्चाई की चाशनी में डुबोकर प्रस्तुत करता है, जिसमें सरकारी घोषणाओं के खोखलेपन, प्राथमिक विद्यालयों की बदहाली, निजीकरण की आंधी, और बच्चों के सपनों के टूटने की कहानी छुपी है। यह सिर्फ आंकड़ों और नीतियों की बात नहीं करता, बल्कि उन कहानियों को भी उजागर करता है, जहां खिचड़ी में नमक नहीं था, स्कूल में ब्लैकबोर्ड था लेकिन चॉक नहीं, और शिक्षकों से ज्यादा राजनीति ने शिक्षा को दिशा दी।
यह एक ऐसा दस्तावेज़ है जो न केवल गुदगुदाता है, बल्कि सोचने पर मजबूर भी करता है—क्या हमारे बच्चों को वाकई भविष्य देने की कोशिश हो रही है, या हम उन्हें सिर्फ नारे परोसकर भूल रहे हैं?
भारत की आजादी के बाद से शिक्षा का सफर एक ऐसी रोलर-कोस्टर सवारी रहा है, जिसमें चढ़ने का उत्साह तो बहुत था, लेकिन नीचे उतरते वक्त कई बार पेट में गुदगुदी और कभी-कभी डर का अहसास भी हुआ। 1947 से 2025 तक की इस यात्रा में सरकारों ने शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े सपने दिखाए, नारे गढ़े, और नीतियां बनाईं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर ऐसी रही जैसे कोई चमचमाता रेस्तरां मेन्यू तो पांच सितारा दिखाए, पर खाना परोसे बासी।
इस लेख में हम भारत की शिक्षा व्यवस्था के इतिहास को एक व्यंग्यात्मक, हास्यास्पद, और खट्टी-मीठी चाशनी में डुबोकर पेश कर रहे हैं, अंत तक पढ़ें समझें विचार करें जिसमें तारीफ, आलोचना, और ठहाकों का मिश्रण है। सटीक आंकड़ों और तथ्यों के साथ, तो कमर कस लीजिए, क्योंकि यह चित्रगुप्त वंश अमित श्रीवास्तव कि कर्म-धर्म लेखनी, शिक्षा और राजनीति का मसालेदार मिश्रण होने वाला है!
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1947-1960: आजादी का जोश और शिक्षा का सपना
1947 में जब सत्ता का हस्तांतरण कहने को भारत आजाद हुआ, तो माहौल ऐसा था जैसे कोई नया-नवेला दूल्हा शादी के बाद दुनिया जीतने का सपना देख रहा हो। शिक्षा को लेकर नेताओं के मन में एक रोमांटिक उत्साह था। जवाहरलाल नेहरू, जो देश के पहले प्रधानमंत्री थे, और उनके शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने शिक्षा को प्रगति का आधार माना।
मौलाना साहब का नाम आजाद था, लेकिन उनकी योजनाएं इतनी आजाद नहीं थीं, क्योंकि देश की साक्षरता दर उस समय मात्र 12% थी—यानी 100 में से 88 लोग न तो अखबार पढ़ सकते थे, न ही अपने नेताओं के भाषण समझ सकते थे। फिर भी, 1947 में ही केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की स्थापना हुई, जो एक बड़ा कदम था। लेकिन यह कदम ऐसा था जैसे कोई बिना जूतों के मैराथन दौड़ने निकल पड़े—इरादा तो नेक था, लेकिन संसाधन गायब थे।
1948 में राधाकृष्णन आयोग गठित हुआ, जिसने विश्वविद्यालयी शिक्षा पर जोर दिया और सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता दी जाए। लेकिन यह स्वायत्तता वैसी थी जैसे किसी को कह दो, “उड़ो, पर पंख नहीं देंगे!” विश्वविद्यालयों को फंडिंग और नीतियों के लिए दिल्ली की ओर ताकना पड़ता था। फिर 1950 में खड़गपुर में पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खुला, जो एक शानदार कदम था।
IITs ने भारत को इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वैश्विक पहचान दी, लेकिन यह पहचान कुछ चुनिंदा बच्चों तक सीमित रही। बाकी देश के लिए प्राथमिक शिक्षा का हाल ऐसा था जैसे कोई कहे, “हम तो चांद पर बंगला बनाएंगे, लेकिन गांव में कच्चा मकान भी नहीं है।”
संविधान के अनुच्छेद 45 में वादा किया गया कि 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी। लेकिन यह वादा ऐसा था जैसे कोई कहे, “मैं तुम्हें मंगल ग्रह पर छुट्टियां मनाने ले जाऊंगा!”—सपना तो अच्छा था, लेकिन स्कूल कहां थे? शिक्षक कहां थे? 1950 के दशक में प्राथमिक स्कूलों की संख्या बढ़ी, और साक्षरता दर धीरे-धीरे 18% तक पहुंची।
लेकिन यह प्रगति ऐसी थी जैसे कोई साइकिल पर चांद की सैर करने निकल पड़े। स्कूलों में छत टपकती थी, किताबें गायब थीं, और शिक्षक अक्सर खेतों में काम करने या चाय की दुकान पर गप्पें मारने में व्यस्त रहते थे।
1960 का दशक: कोठारी आयोग और शिक्षा का “महायज्ञ”
1960 का दशक वह समय था जब सरकार को लगा कि अब कुछ ठोस करना होगा। 1964 में कोठारी आयोग गठित हुआ, जिसे शिक्षा का “महायज्ञ” जलाने का जिम्मा सौंपा गया। इस आयोग ने 1966 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें कहा गया कि शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करना चाहिए। यह सुझाव इतना क्रांतिकारी था कि सरकार ने ताली तो बजाई, लेकिन जेब में हाथ डालने की हिम्मत नहीं की। 2025 में भी हम उस 6% के लक्ष्य से कोसों दूर हैं—2020-21 में यह आंकड़ा मात्र 4.4% था। यह ऐसा था जैसे कोई हर साल कहे, “इस बार मैं जिम जाऊंगा!” और फिर सोफे पर पड़ा रहे।
कोठारी आयोग ने 10+2+3 की शिक्षा प्रणाली की सिफारिश की, जो आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन इस रीढ़ में शुरू से ही ऑस्टियोपोरोसिस की शिकायत थी। स्कूलों में शिक्षक कम थे, और जो थे, वे अक्सर गायब रहते थे। फिर भी, इस दौर में केंद्रीय विद्यालय (1963) की स्थापना हुई, जो मध्यम वर्ग के लिए वरदान साबित हुए। लेकिन इन स्कूलों की संख्या इतनी कम थी कि वे समुद्र में टिमटिमाते दीपक जैसे थे—रोशनी तो थी, पर सारा अंधेरा दूर नहीं कर सकती थी।
1960 के दशक में राजनीति भी शिक्षा को प्रभावित कर रही थी। नेहरू की समाजवादी नीतियों ने सरकारी स्कूलों पर जोर दिया, लेकिन नौकरशाही और भ्रष्टाचार ने इन योजनाओं को खोखला कर दिया। यह ऐसा था जैसे कोई शानदार रेसिपी बनाए, लेकिन रसोइया सामग्री चुराकर घर ले जाए। फिर भी, इस दौर में साक्षरता दर 28% तक पहुंची, जो एक छोटी जीत थी, लेकिन जीत इतनी छोटी थी कि उसे सेलिब्रेट करने का मन भी नहीं करता था।

1970 का दशक: इंदिरा का दौर और शिक्षा का सियासी रंग
1970 का दशक इंदिरा गांधी के नेतृत्व में बीता, और शिक्षा में भी उनका सियासी रंग दिखा। इस दौर में शिक्षा को समाजवादी ढांचे में ढालने की कोशिश हुई। 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के तहत शिक्षा को समवर्ती सूची में डाला गया, यानी केंद्र और राज्य दोनों इसके लिए जिम्मेदार हुए। लेकिन यह जिम्मेदारी ऐसी थी जैसे दो लोग एक ही रस्सी खींचें और दोनों उल्टी दिशा में चल पड़ें। केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे पर दोष मढ़ते रहे, और प्राथमिक शिक्षा का हाल वैसा ही रहा—टपकती छतें, खाली कक्षाएं।
इस दौर में प्राथमिक शिक्षा के लिए कुछ योजनाएं शुरू हुईं, लेकिन वे इतनी धीमी थीं कि लगता था सरकार ने सोचा, “जल्दी क्या है? बच्चे तो बड़े होंगे ही!” 1970 के दशक में साक्षरता दर 34% तक पहुंची, लेकिन ग्रामीण भारत में स्कूलों की हालत ऐसी थी कि बच्चे स्कूल जाने के बजाय खेतों में काम करना पसंद करते थे। इंदिरा गांधी ने शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने की बात की, लेकिन उनकी नीतियां अक्सर सियासी नारों तक सीमित रहीं। यह ऐसा था जैसे कोई बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए, लेकिन दुकान में सामान ही न हो।

1980 का दशक: नई शिक्षा नीति और “सर्व शिक्षा” का नारा
1980 का दशक वह समय था जब भारत में टेलीविजन आया, और सरकार को लगा कि शिक्षा को भी “टेलीकास्ट” करना चाहिए। 1986 में राजीव गांधी की अगुवाई में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) आई, जिसने फिर से 6% जीडीपी खर्च का वादा दोहराया। लेकिन यह वादा ऐसा था जैसे कोई हर साल वही पुरानी कसम खाए, लेकिन उसे तोड़ने की पूरी तैयारी रखे।
इस नीति ने ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड जैसी योजनाएं शुरू कीं, जिसका मकसद था कि हर प्राथमिक स्कूल में कम से कम एक ब्लैकबोर्ड, एक शिक्षक, और कुछ किताबें तो हों। लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि कई स्कूलों में ब्लैकबोर्ड तो आया, पर चॉक नहीं, और शिक्षक तो दूर, स्कूल की इमारत ही गायब थी।
1985 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) की स्थापना हुई, जो दूरस्थ शिक्षा के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। लेकिन IGNOU के कोर्सेज को देखकर लगता था कि सरकार ने सोचा, “पढ़ाई तो करो, लेकिन हमें ज्यादा मेहनत न करनी पड़े!” सामग्री पुरानी थी, और डिग्रियां अक्सर नौकरियों में गंभीरता से नहीं ली जाती थीं। इस दौर में जवाहर नवोदय विद्यालय (1986) भी शुरू हुए, जो ग्रामीण बच्चों के लिए एक उम्मीद की किरण थे।
लेकिन इनकी संख्या इतनी कम थी कि यह योजना ऐसी लगती थी जैसे सरकार ने कहा, “हम कुछ बच्चों को तो चमकाएंगे, बाकी को अपने हाल पर छोड़ दो!” देश के हर जिलों में एक एक जवाहर नवोदय विद्यालय की स्थापना हुई और पूरी व्यवस्था केन्द्र सरकार ने अपने जिम्मे रखा, जो जिले का सबसे बेहतरीन विद्यालयों में उभरकर सामने आया।
1990 का दशक: उदारीकरण और शिक्षा का बाजारीकरण
1990 का दशक वह समय था जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खोला, और शिक्षा भी इस लहर में बह निकली। प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों का जाल बिछने लगा। सरकार ने सोचा, “जब प्राइवेट कंपनियां साबुन और टूथपेस्ट बेच सकती हैं, तो शिक्षा क्यों नहीं?” नतीजा यह हुआ कि शिक्षा एक बिजनेस बन गई। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की बाढ़ आ गई, लेकिन इनमें से कई “डिग्री बेचने की दुकानें” थीं, जहां पैसा दो और डिग्री लो।
1994 में जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP) शुरू हुआ, जिसने प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश की। इस कार्यक्रम की बदौलत साक्षरता दर 1991 में 52% से बढ़कर 2001 में 65% हो गई। लेकिन यह सफलता ऐसी थी जैसे कोई कहे, “मैंने मैराथन में आधा रास्ता तय कर लिया!”—बाकी आधा रास्ता अभी भी बाकी था। इस दौर में राजनीति ने भी शिक्षा को प्रभावित किया। विभिन्न दलों की सरकारें अपने-अपने राज्यों में अपनी उपलब्धियां गिनवाती थीं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्कूलों की हालत वैसी ही थी—खस्ताहाल।

2000 का दशक: सर्व शिक्षा अभियान और “सब पढ़ें, सब बढ़ें”
2000 का दशक शिक्षा के लिए एक सुनहरा दौर था, कम से कम कागजों पर तो यही लगता था। 2002 में 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया। सर्व शिक्षा अभियान (SSA, 2001) शुरू हुआ, जिसका नारा था “सब पढ़ें, सब बढ़ें।” यह योजना इतनी महत्वाकांक्षी थी कि लगता था सरकार ने सोचा, “अब तो हर बच्चा IIT में जाएगा!” लेकिन हकीकत में, स्कूलों में दाखिले तो बढ़े, पर पढ़ाई की गुणवत्ता वैसी ही रही। मिड-डे मील योजना (1995 में शुरू, 2000 में विस्तार) इस दौर का एक और सितारा थी।
यह योजना बच्चों को स्कूल लाने में सफल रही, क्योंकि मां-बाप को लगा कि कम से कम बच्चे को खाना तो मिलेगा। लेकिन कई बार खाना ऐसा होता था कि बच्चे पढ़ाई छोड़कर खाने की क्वालिटी पर डिबेट करने लगते थे। फिर भी, इस योजना ने ड्रॉपआउट दर को कम किया। 2009 में राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट लागू हुआ, जिसने 6-14 साल के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को कानूनी हक बना दिया। लेकिन इस कानून का हाल ऐसा था जैसे कोई शादी का कार्ड छपवाए, पर मेहमानों को खाना न दे। स्कूलों में शिक्षक, बुनियादी ढांचा, और संसाधनों की कमी ने इस कानून को खोखला बना दिया।
2010 का दशक: डिजिटल सपने और जमीनी हकीकत
2010 का दशक वह समय था जब भारत डिजिटल क्रांति की लहर पर सवार था। सरकार ने सोचा, “अगर सबके पास स्मार्टफोन है, तो स्मार्ट क्लासरूम क्यों नहीं?” दीक्षा जैसे ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू हुए, और डिजिटल इंडिया का नारा शिक्षा तक पहुंच गया। लेकिन यह डिजिटल सपना ग्रामीण भारत में एक मजाक बनकर रह गया, जहां न तो इंटरनेट था, न बिजली, और न ही स्मार्टफोन।
2014 में जब भाजपा सरकार सत्ता में आई, तो शिक्षा के क्षेत्र में नए जोश की उम्मीद जगी। लेकिन प्राथमिक शिक्षा को लेकर उनकी नीतियां ऐसी थीं जैसे कोई पुरानी रेसिपी को नया नाम देकर परोसे। सर्व शिक्षा अभियान को और जोर-शोर से लागू करने की बात हुई, लेकिन बजट में प्राथमिक शिक्षा के लिए फंडिंग हमेशा कम रही। 2014-15 में शिक्षा पर जीडीपी का केवल 3.9% खर्च हुआ, जो कोठारी आयोग के 6% के लक्ष्य से कोसों दूर था।
मिड-डे मील योजना को और विस्तार दिया गया, लेकिन खाने की क्वालिटी पर सवाल उठते रहे। 2017 में राजस्थान के एक स्कूल में खाने में छिपकली मिलने की खबर ने सुर्खियां बटोरीं। यह ऐसा था जैसे सरकार ने कहा, “खाना तो मिलेगा, लेकिन स्वाद की गारंटी नहीं!” डिजिटल इंडिया के तहत दीक्षा जैसे प्लेटफॉर्म शुरू हुए, लेकिन ग्रामीण स्कूलों में बिजली और इंटरनेट की कमी ने इन्हें बेकार बना दिया। 2016 में एक सरकारी सर्वे ने बताया कि 20% प्राथमिक स्कूलों में बिजली नहीं थी। यह डिजिटल सपना ऐसा था जैसे बिना सड़क के गांव में फरारी दौड़ाने की बात हो।
2020 और उसके बाद: NEP 2020 और नया जोश
2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) आई, जिसे सरकार ने “शिक्षा का महाकुंभ” करार दिया। NEP ने 5+3+3+4 की नई संरचना दी, जिसमें शुरुआती शिक्षा पर जोर था। जादुई पिटारा और निपुण भारत जैसी योजनाएं शुरू हुईं, जिनका मकसद था कि बच्चे कक्षा 3 तक बुनियादी साक्षरता और गणन कौशल हासिल कर लें। लेकिन 2025 तक, NEP के पांच साल बाद, जमीनी स्तर पर बदलाव न के बराबर है।
NEP का सबसे बड़ा वादा था कि शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च होगा। लेकिन 2023-24 में यह आंकड़ा अभी भी 4.5% के आसपास अटका हुआ है। यह ऐसा था जैसे कोई हर साल वही न्यू ईयर रिजॉल्यूशन दोहराए, लेकिन जिम का सामान धूल खाता रहे। कोविड-19 महामारी ने प्राथमिक शिक्षा को और गहरे गड्ढे में धकेल दिया। ऑनलाइन शिक्षा को समाधान बताया गया, लेकिन ग्रामीण भारत में 70% से ज्यादा बच्चों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं था। 2021 की एक स्टडी में पता चला कि 80% ग्रामीण बच्चे ऑनलाइन क्लास से वंचित रहे।

भाजपा सरकार (2014-2025): चमकदार नारे, खाली डिब्बा
2014 से 2025 तक, भाजपा सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कई चमकदार नारे दिए—डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, और NEP 2020। लेकिन प्राथमिक शिक्षा को लेकर उनकी नीतियां ऐसी थीं जैसे कोई चमकदार उपहार का डिब्बा दे, जो खोलने पर खाली निकले। शिक्षकों की कमी, स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, और बजट की कंजूसी ने प्राथमिक शिक्षा को खस्ताहाल रखा। ASER 2023 की रिपोर्ट बताती है कि कक्षा 5 के 50% बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते। यह ऐसा है जैसे सरकार ने बच्चों को स्कूल तो भेज दिया, लेकिन पढ़ाना-लिखाना भूल गई।
इस दौरान सरकार की मेहरबानी और नाकामी से इसाई मिशनरियों ने शिक्षा का कमान संभाला और देखते देखते शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन गया। आज बेरोजगारी की आलम में गांव-गांव बेरोजगार युवा – युवतियों द्वारा अपने घर दरवाजे पर शिक्षा का अलख जलाने का काम तेजी से बढ़ रहा है मतलब सरकार का बोझ कम करने स्कूल खोल शिक्षा देने का। सरकार शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक इस लिए नही लगा रही है कि शिक्षा पर सरकार का खर्च बच रहा है और सरकार आने वाले समय में शिक्षा से अपने को किनारे करना चाह रही है।
जब सरकार शिक्षा से अपने को किनारे कर लेगी फिर वह दौर आयेगा जब चाहते हुए भी बच्चों को पढ़ा पाना मध्यम व गरीब वर्ग के लिए नामुमकिन हो जायेगा और जो साक्षरता दर बढ़ रहा है नीचे जाने लगेगा और फिर निरक्षरों की संख्या वहीं पहुंच जायेगी जहां से चढ़कर पिछली सरकारों की वजह से यहां तक पहुंच चुका है। 2014 से पहले सरकार स्कूल खोलने का काम करती थीं 2014 के बाद सरकार सरकारी स्कूल बंद करने की रास्ता तलाश रही है जैसे अभी पिछले दो सालों से स्कूलों का मर्जर पर जोर दिया जा रहा है।
अगर सरकार जनहितैषी होती तो शिक्षा का निजीकरण होने से बचाती और सरकारी स्कूलों पर समुचित व्यवस्था देकर केजरीवाल सरकार में चमकी दिल्ली राज्य की सरकारी स्कूलों के तर्ज पर सरकारी स्कूलों को बचाने का प्रयास करती लेकिन हमें नही लगता सब निजीकरण करने की राह देख रही भाजपा सरकार शिक्षा को अपने हवाले रख सकेगी। अगर भाजपा सरकार सरकारी शिक्षा को अपने जिम्मे रखना चाहती तो समुचित व्यवस्था के तहत विषयवार अध्यापकों की भर्ती करती समुचित अध्यापक हर विद्यालयों पर उपलब्ध कराती और शिक्षा के लिए आवश्यक सामग्री में कोताही नहीं करती।
जब सरकारी स्कूलों में कोई व्यवस्था ही नहीं है तभी तो बच्चों का पलायन स्पर्धा के युग में प्राइवेट स्कूलों की ओर हो रहा है। जहां अयोग्य अध्यापक हैं किंतु दिखावे का व्यवस्था से परिपूर्ण है। आज अगर सरकारी स्कूलों को व्यवस्था से परिपूर्ण कर दिया जाए तो कल ही प्राइवेट स्कूलों की ओर पलायन रुक जायेगा और बच्चों की वापसी हो जायेगी। आवासीय विद्यालयों की स्थिति जैसे आश्रम पद्धति, कस्तूरबा गांधी, जवाहर नवोदय आदि विद्यालयों को भाजपा सरकार और भी ख़राब करने पर तूली हुई है जहां प्रतिस्पर्धा से जिले के टाप बच्चों का नामांकन होता है, वहां व्यवस्था में कटौती और अध्यापकों की कमी शिक्षा को ध्वस्त कर दिया है।
जिस कारण बच्चे वहां से भी निकल रहे हैं जो शिक्षा लेने के उद्देश्य से नामांकित हैं और उनके परिवार कि आर्थिक स्थिति मजबूत है वे बच्चे आवासीय विद्यालय छोड़ रहे हैं। सरकार अपनी नाकामी का ठीकरा जो प्राइमरी स्कूलों पर फोड़ मर्ज करने को आतूल दिखाई दी है, कल को जिले के उन आवासीय विद्यालयों में बच्चों की कमी दिखा मर्ज या बंद करने का आदेश देगी। मतलब साफ है कि सरकार सरकारी शिक्षा पर बुलडोज़र चलाने की फिराक में लगी हुई है।
सरकार को डबल फायदा जो होगा विद्यालयों को बंद करने से —एक तो शिक्षा पर होने वाला खर्च बचेगा, दूसरा सरकार को बिना खर्च हर गांव शहर में भरपूर जमीन मिल जायेगी। जिसमें कोई अन्य कार्य सरकार को फायदा देने वाला होगा। जैसे सरकारी अस्पतालों से फ्री की दवाईयों को हटाकर प्रधानमंत्री जन औषधालय खोल सरकार दवा बेचना शुरू कर दी गांव-गांव में खाली होने पर स्कूलों की जमीन पर एक दिन अपने आबकारी विभाग में दो हजार महिने की मानदेय नियुक्ति कर शराब ही बेचना शुरू कर देगी जैसे रसोई गैस से बिचौलियों को हटाया खुद बिचौलियों से अधिक कमाने लगी।
वैसे ही शराब मे हो रही धांधली को बंद कर दिया जायेगा सस्ते दामों पर गांव-गांव शराब आसानी से होम डिलीवरी मिल सकेगी और शराब से बिचौलियों को हटा दो चार गुना दामों पर शराब बिकेगी तो देश का विकास होगा। सरकार से स्कूल नहीं चल पा रहा है तो क्या हुआ, जन औषधालय की तरह स्वास्थ्य वर्धक सस्ती दर पर शराब की दुकानें तो चलेगी ही।
भारत में शिक्षा का उद्देश्यपूर्ण निष्कर्ष
भारत में शिक्षा का इतिहास एक रंग-बिरंगी, हास्यास्पद, और खट्टी-मीठी कहानी है। 1947 से 2025 तक, सरकारों ने सपने तो बहुत दिखाए, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर सपनों से कोसों दूर रही। भाजपा सरकार के दौर में भी यही कहानी दोहराई गई—नारे चमकदार, लेकिन नतीजे फीके। अगर भारत को सचमुच शिक्षा का सुपरपावर बनना है, तो जरूरत है न सिर्फ नीतियों की, बल्कि उनकी ईमानदारी लागू करने की। और हां, अगली बार जब कोई नई नीति आए, तो शायद हमें पहले पूछना चाहिए, “साहब, इस बार खिचड़ी में नमक तो डालेंगे न?”
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