योगी सरकार की शिक्षा नीति के तहत सरकारी स्कूलों का मर्जर क्या सुधार है या गरीबों के भविष्य पर प्रहार? पढ़ें एक तीखा विश्लेषण, जिसमें RTE अधिनियम के उल्लंघन, शिक्षा के निजीकरण, और बच्चों के मौलिक अधिकारों पर हो रहे हमलों को बेनकाब किया गया है। सरकारी स्कूलों की बंदी और निजी स्कूलों के बढ़ते प्रभाव पर आधारित यह लेख शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई सामने लाता है।
योगी सरकार की स्कूल मर्जर नीति पर आधारित यह आलोचनात्मक लेख सरकारी स्कूलों की बदहाली का कारण, RTE अधिनियम के उल्लंघन, शिक्षा के निजीकरण का दुष्परिणाम, परिषदीय, सरकारी, आश्रम पद्धति विद्यालयों की उपेक्षा, और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा- परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों से वंचित होने जैसी गंभीर समस्याओं को उजागर करता है। यह लेख बच्चों के हितों और संविधानिक अधिकारों की रक्षा की माँग करता है। योगी सरकार से अपनी नाकामी छुपाते हुए अनिवार्य शिक्षा पर बुलडोज़र न चलाने की सलाह देता है।
उत्तर प्रदेश, वह राज्य जो कभी सांस्कृतिक और शैक्षिक वैभव का प्रतीक था, आज योगी आदित्यनाथ की सरकार के तथाकथित “शिक्षा सुधार” के नाम पर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां सरकारी परिषदीय स्कूलों का मर्जर और बंदी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ तोड़ने का पर्याय बन चुका है। यह कोई नीति नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश है, जिसका मकसद गरीब, दलित, और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करना और निजी स्कूलों के लिए रास्ता साफ करना स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
लेखक श्री चित्रगुप्त वंशज-अमित श्रीवास्तव का यह कर्म-धर्म लेखनी जनहित में योगी सरकार की गलत नीतियों पर तीखा कटाक्ष करता है, जिसमें सरकारी स्कूलों के मर्जर, शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम का उल्लंघन, योगी सरकार की नाकामी प्राथमिक विद्यालयों से लेकर आश्रम पद्धति विद्यालयों तक की बदहाली, और शिक्षा के निजीकरण की साजिश को बेनकाब करता है। साथ ही, यह बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार की नाकामियों पर करारा प्रहार करता है।
Table of Contents
शिक्षा नीति
सरकारी स्कूल: धरोहर या कबाड़?

सरकारी स्कूल भारत की आत्मा हैं। ये वो पवित्र मंदिर हैं, जहां गरीब का बच्चा, किसान का बेटा, और मजदूर की बेटी अपने सपनों को पंख लगाने का हौसला पाते हैं। लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार की नजर में ये स्कूल शायद कबाड़खाने से ज्यादा कुछ नहीं। सरकार का तर्क है कि जिन स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं, उन्हें पास के स्कूलों में मर्ज कर देना “संसाधनों का बेहतर उपयोग” है।
लेकिन क्या सरकार ने कभी यह सवाल उठाया कि इन स्कूलों में बच्चे क्यों नहीं आ रहे? सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या घटने पर कोई सर्वे हुआ? क्या यह सरकार की अपनी नाकामी का नतीजा नहीं कि पिछले चार सालों में उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों से 42 लाख बच्चे गायब हो चुके हैं? अकेले 2024-25 में 8 लाख बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया। यह आंकड़े केवल कागज के पन्ने नहीं, बल्कि लाखों बच्चों के बिखरे सपनों की दास्तान हैं।
योगी सरकार का “मर्जर मॉडल” ऐसा लगता है जैसे कोई जर्जर मकान को गिराकर उसकी जगह मॉल बनाना चाहता हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार का काम केवल स्कूलों को बंद करना है, या शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत यह सुनिश्चित करना कि हर गांव, हर कस्बे में बच्चों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले? अगर सरकार वाकई “रामराज्य” की बात करती है, तो क्या रामराज्य में बच्चों को स्कूल की बजाय सड़कों पर भटकना सिखाया जाता है?
शिक्षा का अधिकार
RTE एक्ट का उल्लंघन: संविधान पर बुलडोजर

शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 और संविधान का अनुच्छेद 21A हर 6 से 14 साल के बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। इसके तहत हर एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूल और तीन किलोमीटर के दायरे में उच्च प्राथमिक स्कूल होना अनिवार्य है। लेकिन योगी सरकार की मर्जर नीति इस कानून को ठेंगा दिखा रही है। स्कूलों को बंद करने से बच्चे, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियां, स्कूल तक पहुंचने में असमर्थ होंगे। जिससे “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” का नारा सिर्फ़ नारा ही रह जायेगा। लंबी दूरी, खराब सड़कें, और सामाजिक बाधाएं ड्रॉपआउट दर को आसमान छूने पर मजबूर करेंगी।
लखनऊ हाई कोर्ट ने सरकार से सवाल किया कि क्या मर्जर से पहले कोई सर्वे किया गया? जवाब में सरकार के पास केवल खामोशी थी। स्वामी प्रसाद मौर्य ने इसे “गरीबों के भविष्य पर हमला” करार दिया, और ठीक ही कहा। आज के दौर में जब लोग 1 किलोमीटर की पैदल यात्रा नही करना चाहते साथ ही आर्थिक तंगी से परेशान हैं, सरकार की नीतियों से मध्यम वर्गीय परिवार गरीबी के तरफ़ जा रहे हैं।
वैसी स्थिति में जब सरकार स्कूलों को बंद करके बच्चों को 4-6 किलोमीटर दूर पढ़ने के लिए मजबूर करती है, तो यह शिक्षा का अधिकार नहीं, बल्कि शिक्षा से वंचित करने का अधिकार बन जाता है? और अगर यह नीति RTE का उल्लंघन नहीं है, तो फिर क्या है? शायद योगी सरकार का बुलडोजर अब संविधान पर भी चलने को तैयार है!
योगी सरकार की नाकामी
आश्रम पद्धति विद्यालय: सपनों का कब्रिस्तान

योगी सरकार की नाकामी केवल प्राथमिक स्कूलों तक सीमित नहीं। आश्रम पद्धति विद्यालय, आवासीय लगभग सभी विद्यालय जो गरीब वर्ग के होनहार सामान्य जाति, अनुसूचित जाति, जनजाति, और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए बनाए गए —जिन परिवारों का वार्षिक आय लगभग ग्रामीण 46 शहरी से 54 हजार मानक रखे गए हैं, आज सपनों का कब्रिस्तान बन चुके हैं। इन स्कूलों में न शिक्षक हैं, न बुनियादी सुविधाएं। बिजली, पानी, शौचालय, और पुस्तकालय तो दूर, कई स्कूलों में छत तक टपक रही है।
एक शिक्षक को पांच कक्षाओं को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी जाती है, और ऊपर से उसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझा दिया जाता है—चुनाव ड्यूटी से लेकर गाय गिनती तक। एक तो विद्यालयों में शिक्षकों की कमी उपर से अनेकों गैर शैक्षणिक कार्य। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार जानबूझकर शिक्षा और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को चौपट कर रही है और अपनी नाकामी को छुपाकर कर्मियों को जिम्मेदार ठहरा निर्दोष शिक्षकों के सर ठीकरा फोड़ रही है।
आश्रम पद्धति विद्यालय, जो कभी गरीब होनहार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा से वंचित बच्चों के लिए आशा की किरण थे, आज योगी सरकार की उपेक्षा के शिकार हैं। सरकार ने इन स्कूलों को निजी हाथों में सौंपने की योजना बनाई, लेकिन क्या यह शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन नहीं? जब सरकार अपने ही स्कूलों को मजबूत करने के बजाय उन्हें बंद करने या निजीकरण की राह चुन रही है, तो यह साफ है कि उसकी प्राथमिकता शिक्षा नहीं, बल्कि निजी स्कूल मालिकों की जेब भरना है।
निजीकरण व्यवस्था नही – नव रियासती करण
निजीकरण का नंगा नाच: गरीबों की जेब पर डाका
उत्तर प्रदेश में निजी स्कूलों की बाढ़ आ गई है। जब योगी पहली बार उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बने तेवर देख लग रहा था अब सरकारी प्राइवेट स्कूल मनमानी तरीके से अभिभावकों के जेब पर डांका नही डाल सकेगें लेकिन महज़ एक साल मे योगी अपने तेवर को ही भूल गए इनके शासनकाल में स्कूल बिना मानकों के मान्यता पा रहे हैं, अनगिनत विद्यालय तो बिना मान्यता के ही चल रहे हैं और शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब काट रहे हैं।
एक निजी स्कूल की फीस 500 से 5000 रुपये या अधिक प्रति माह तक होती है, स्कूल ड्रेस किताब कांपी मे कमीशन खोरी अलग से, जिसका संज्ञान लेना भी अब मुनासिब नहीं समझा जा रहा है, जैसे प्राइवेट स्कूल संचालक सरकार को कोई जड़ी-बूटी सूंघा रखी है। शिक्षा के नाम पर उत्तर प्रदेश में प्राइवेट स्कूलों से खुलेआम लूट मचा है, जो पूरा कर पाना एक गरीब परिवार के लिए असंभव है। वैसी स्थिति में 50 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को बंद कर देना, कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे विद्यालयों के लिए सोने मे सुहागा, बल्ले बल्ले हो जाएगा।
सरकार की मेहरबानी से ये स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। क्यूंकि प्रयाप्त शिक्षकों की नियुक्ति सरकार करना ही नहीं चाहती। शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करना ही नहीं चाहती सिर्फ़ बेचना ही जेहन में है —रेल बेच दी, तेल बेच दी, बेच दिया हवाईअड्डा अब बारी है स्कूलों को पूरी तरह से बेचने की। यही स्थिति रही तो भारत में सरकारी नियंत्रण से कुछ ही सालों में सब कुछ बिक जायेगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा, “सरकार ने जिन बूथों पर चुनाव हारे, वहां स्कूल बंद किए जा रहे हैं।” क्या यह नीति शिक्षा सुधार के लिए है, या राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है?
आम आदमी पार्टी के नेता पवन तिवारी ने और तीखा कटाक्ष किया— “योगी सरकार 27,308 शराब की दुकानें खोल सकती है, लेकिन 27,000 स्कूल बंद करने की योजना बना रही है। जनता को तय करना है कि उसे दारू चाहिए या शिक्षा।” यह व्यंग्य सरकार की प्राथमिकताओं पर करारी चोट करता है। जब सरकार शराब की दुकानों को बढ़ावा दे रही है और स्कूलों को बंद कर रही है, तो क्या यह “रामराज्य” का सपना है, या गरीबों के सपनों पर बुलडोजर चलाने की साजिश? शायद योगी जी को लग रहा है कि बच्चे ब्लैकबोर्ड की जगह ब्लैक लेबल पर लिखना सीख लेंगे!
निजीकरण सरकार की मानसिकता,
शिक्षा विभाग की नाकामी: जवाबदेही कौन लेगा?
सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होने का कारण सरकार की अपनी नाकामी है। उत्तर प्रदेश में 5,695 स्कूलों में केवल एक शिक्षक है, और 6 लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है। कई स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय, और पुस्तकालय जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। क्या सरकार ने कभी इन स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती के लिए गंभीर प्रयास किए? क्या डिजिटल बोर्ड, लैब, या खेल के मैदान जैसी सुविधाएं दी गईं? जवाब है—नहीं। इसके बजाय, सरकार मर्जर और पेयरिंग जैसी नीतियों को लागू कर रही है, जो बच्चों के भविष्य को और अंधेरे में धकेल रही हैं।
शिक्षा विभाग के अधिकारी अपनी नाकामी छिपाने के लिए निजी स्कूलों को मान्यता देने में व्यस्त हैं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बिना मानकों के स्कूलों को लाइसेंस बांटे जा रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर हो रही हैं। क्या यह सरकार की नीति है कि गरीब का बच्चा स्कूल न जाए, बल्कि निजी स्कूलों की मोटी फीस के बोझ तले दब जाए?
सरकार की उपलब्धियां
शिक्षकों और अभिभावकों का गुस्सा: जनआंदोलन की आग

उत्तर प्रदेश के शिक्षक, अभिभावक, और छात्र संगठन इस नीति के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। उत्तर प्रदेश के सभी जिलों लखनऊ से लेकर जौनपुर, मिर्जापुर, देवरिया श्रावस्ती यहां तक, कि योगी के गृह जनपद गोरखपुर में भी शिक्षकों और अभिभावकों ने ज्ञापन सौंपे और प्रदर्शन किए।
उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ ने चेतावनी दी है कि अगर यह नीति वापस नहीं ली गई, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करेंगे। एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने लखनऊ में विधानसभा का घेराव करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। उनके नारे—“स्कूल बंद करना बंद करो” और “शिक्षा विरोधी सरकार मुर्दाबाद”—प्रदेश की जनता की भावनाओं को दर्शाते हैं।
यह आंदोलन केवल शिक्षकों का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है, जो अपने बच्चे के लिए बेहतर भविष्य चाहता है। यह आंदोलन हर उस बच्चे का है, जो स्कूल की चौखट पर अपने सपनों को साकार करना चाहता है। लेकिन क्या योगी सरकार इन आवाजों को सुनेगी, या यह जनआंदोलन को भी अपने बुलडोजर से कुचल देगी?
भारत की शिक्षा नीति मे
नई शिक्षा नीति: सुधार का ढोंग या निजीकरण का रास्ता?
योगी सरकार दावा करती है कि मर्जर नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए है। लेकिन NEP का लक्ष्य तो शिक्षा को सुलभ और समावेशी बनाना था, न कि स्कूलों को बंद करना। मायावती ने सटीक कहा कि यह नीति “गरीब-विरोधी” है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। क्या सरकार NEP का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही है? या फिर यह शिक्षा के निजीकरण का एक सुनियोजित कदम है, जिसमें सरकारी स्कूलों को खत्म कर निजी स्कूलों को बढ़ावा दिया जा रहा है?
शिक्षा से वंचित करने की सरकारी योजना
बच्चों का भविष्य: अंधेरे में एक कदम

स्कूलों के मर्जर से सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों, खासकर लड़कियों को होगा। लंबी दूरी तय करना, खासकर बारिश के मौसम में, उनके लिए असंभव होगा। इससे ड्रॉपआउट दर बढ़ेगी, और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर बोझ बढ़ेगा। मिड-डे मील जैसी योजनाएं भी प्रभावित होंगी, जिससे बच्चों का पोषण और स्कूल में उपस्थिति दोनों पर असर पड़ेगा।
क्या योगी सरकार को यह नहीं दिखता कि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें, परिवहन, और सुरक्षा की स्थिति ऐसी नहीं है कि बच्चे 02-04 किलोमीटर दूर स्कूल जा सकें? क्या सरकार का मकसद बच्चों को स्कूल से दूर करना है, ताकि वे मजदूरी करने को मजबूर हो जाएं? शायद सरकार को लगता है कि गरीब का बच्चा पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि खेतों में काम करने के लिए पैदा हुआ है!
उपलब्धियों का मार्ग
वैकल्पिक समाधान: सरकारी स्कूलों को बचाने की राह
सरकारी स्कूलों को बंद करना समाधान नहीं, बल्कि समस्या को और गहरा करना है। सरकार को चाहिए कि वह इन स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती करे, सभी तरह के शिक्षकों को समान वेतन दे, बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए, और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करे। निजी स्कूलों को बिना मानकों के मान्यता देना बंद करना होगा। ईसाइयों के कंधे पर शिक्षा के लिए स्कूलों के माध्यम से जो सनातनियों मे इसाई कल्चर का बढ़ावा दिया जा रहा है तत्काल प्रभाव से ईसाईयों के विद्यालयों को पहले बंद करावे।
अगर उत्तर प्रदेश योगी आदित्यनाथ वास्तव में हिंदूवादी सरकार चला रहे है तो इस मामले को गंभीरता से संज्ञान लेकर हिन्दूओं में ईसाई कल्चर शिक्षा दी जाने वाली विद्यालयों को तत्काल प्रभाव से बंद कराने का निर्देश देगी, जिससे अपने आप सरकारी विद्यालयों में बच्चों का बाढ़ आने लगेगा। शैक्षणिक सामग्री के साथ बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जा रहे हैं न कि सरकारी स्कूलों में, जब वही बच्चे अपनी शैक्षणिक सामग्री के साथ सरकारी स्कूलों में जाना शुरू कर देगें, वो बच्चे प्राइवेट स्कूलों से अधिक सरकारी स्कूलों उपयोगी शिक्षा ग्रहण करेगें।
क्यूंकि सबको पता है जितनी योग्यता के आधार पर सरकारी स्कूलों में अध्यापक नियुक्त हैं, उतनी योग्यता धारी प्राइवेट स्कूलों में कहीं देखने के लिए भी नहीं मिलते। सनातनी बच्चों को भागवत गीता रामायण का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, उन्हेंं सरकार की मेहरबानी से ईसाई धर्म का पाठ पढ़ाया जाता है। इसके लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। अगर सरकार वास्तव में शिक्षा को प्राथमिकता देना चाहती है, तो उसे मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट स्कूल जैसी योजनाओं को सभी स्कूलों तक विस्तार करना चाहिए।
सरकारी वेतन लेने वालों के बच्चे पढ़ेंगे सरकारी स्कूलों में यह आदेश अनिवार्य करना होगा, अपने आप शिक्षा मे गुणवत्ता आ जाएगी और प्राइवेट स्कूलों से अभिभावकों का ध्यान सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजना सुनिश्चित कर देगा। सरकार एक सर्वे कराकर देखे और सार्वजनिक करे जितने योग्य शिक्षक सरकारी विद्यालयों में हैं उसना योग्य शिक्षक कहीं प्राइवेट स्कूलों में नही रखा गया है।
सरकारी स्कूलों में बच्चों की कमी यह सरकार की नाकामी का जीता-जागता प्रमाण है। अल्प शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराकर स्कूलों को मर्ज करना समस्या का समाधान नही बल्कि आम जन के लिए समस्या पैदा करने जैसा है। सर्वे कराकर कारण का पता करे तब समाधान होगा, न कि मौजूदा स्कूलों को बंद करना समस्या का समाधान है।
जनता की जंग, शिक्षा की पुकार
योगी सरकार की स्कूल मर्जर नीति न केवल शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि यह गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के भविष्य पर कुठाराघात है। सरकारी स्कूल देश की धरोहर हैं, और इन्हें बंद करना शिक्षा व्यवस्था की हत्या करने जैसा है। यह समय है कि उत्तर प्रदेश की जनता एकजुट होकर इस नीति के खिलाफ आवाज उठाए। शिक्षक, अभिभावक, और छात्र संगठन पहले ही मोर्चा खोल चुके हैं। अब सरकार को तय करना है कि वह जनता की आवाज सुनेगी या अपने “बुलडोजर मॉडल” को अनिवार्य शिक्षा पर भी लागू करेगी।
अंत में, एक तीखा कटाक्ष— जब योगी सरकार शराब की दुकानों को रात-दिन खुलवाने में मशगूल है और स्कूलों को ताले लगाने में मस्त है, तो शायद उसे यह समझना होगा कि शिक्षा ही वह तलवार है, जो बच्चों को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती है। लेकिन अगर सरकार इस तलवार को ही तोड़ देगी, तो बच्चे न केवल पढ़ना भूल जाएंगे, बल्कि अपने हक के लिए लड़ना भी भूल जाएंगे। क्या यही है योगी जी का “सबका साथ, सबका विकास”? या फिर यह “सबका स्कूल बंद, निजी स्कूलों का विकास” है?

Disclaimer: This response is satirical and critical in nature, as per the request, and focuses on issues concerning children’s welfare. It draws upon available sources, arguments presented by Amit Srivastav, and additional research. For further information, please refer to credible sources such as amitsrivastav.in and relevant news reports on the subject.
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बिल्कुल सही लिखा है आपने योगी सरकार गरीबों को शिक्षा से दूर करना चाहती है बस 5 किलो राशन ही प्रयाप्त है उनके लिए।
बिल्कुल सही लिखा है आपने सरकार जनहितैषी नहीं है बनियों की सरकार है दो चार पूंजी पतियों के हाथ देश बेच राज करेगी।