भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – “मोदी जी की माया, जनता की काया”

Amit Srivastav

नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में भ्रष्टाचार, दमन और जनाक्रोश से उपजे विद्रोहों की पृष्ठभूमि भारत मे भाजपा सरकार की योजना वध स्थिति का व्यंग्यात्मक विश्लेषण। यह 10 अध्यायों का महाकाव्य भाजपा सरकार की नीतियों, गोदी मीडिया के प्रचार, और जनता की अनसुनी परेशानियों को उजागर करता है। आधार-पैन लिंक, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, और शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाली से लेकर ‘मन की बात’ और ‘5 ट्रिलियन’ के सपनों तक, यह लेख सरकार के वादों और हकीकत के बीच के फासले को कटाक्ष के साथ पेश करता है।

क्या भारत में भी बंग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया जैसा विद्रोह संभव है? जानें भाजपा सरकार की उपलब्धियां, भाजपा सरकार की योजनाएं इस तीखे और हास्यपूर्ण महाकाव्य विश्लेषण के 10 अध्याय में। 56″सीने पर 56 हजार जनता की दर्द भरे शब्दों के साथ।

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मोदी जी की माया जनता की काया — अरे भाई साहब, क्या जमाना है! नेपाल में विद्रोह की आग लगी, बांग्लादेश में सरकार पलटी, इंडोनेशिया में लोग सड़कों पर चिल्ला रहे हैं – और हम भारतवासी? हम तो “विकास” के नाम पर आधार कार्ड अपडेट करवा रहे हैं, पैन लिंक करवा रहे हैं, और महंगाई के बोझ तले दबे जा रहे हैं।

व्यंग्य की बात तो देखिए, दुनिया भर की सरकारें गिर रही हैं भ्रष्टाचार, दमन और युवाओं के गुस्से से, और यहां भाजपा सरकार कह रही है, “सब कुछ अमृतकाल में है!” अमृतकाल? हां, जनता के लिए अमृत की तरह मीठा, लेकिन असल में जहर की तरह कड़वा। इस लेख के हर अध्याय में उदाहरण, कटाक्ष, व्यंग्यात्मक हंसी-मजाक उल्लेखित है – क्योंकि हंसना ही बचा है, वर्ना जन्म प्रमाणपत्र बनवाते-बनवाते जीवन निकल जाएगा। फिर बनेगा आपका भी आनलाईन मृत्यु प्रमाण पत्र।


यह महाकाव्य लंबा होगा क्योंकि हम गोदी मीडिया से शुरू करेंगे, जो सरकार का पालतू भोंपू है, फिर सरकार की योजनाओं पर, जो जनता की परेशानी का स्रोत हैं। नेपाल-बांग्लादेश की तुलना, भाजपा के वादे, मन की बात, विपक्ष पर हमले, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, शिक्षा-स्वास्थ्य – सब पर चटपटा व्यंग्य और हां, अंत में निष्कर्ष कि क्या भारत में भी वैसा ही होगा? चलिए, चाय की प्याली लीजिए, क्योंकि यह लंबा सफर है। लेकिन याद रखिए, यह हकीकत से भरा व्यंग्य है – सच्चाई से प्रेरित, लेकिन अगर कोई हमारे कलम से आहत हो तो मोदी जी से कहिएगा, वो “मन की बात” में सब सुलझा देंगे!

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

गोदी मीडिया – क्या शानदार नाम! जैसे कोई प्यारा सा पपी गोद में बैठा हो, और सरकार उसे दुलार रही हो, बिस्किट दे रही हो। लेकिन असल में यह मीडिया नहीं, बल्कि भाजपा का प्रचार विभाग है। याद कीजिए नेपाल का केस: वहां सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाया, युवाओं को डराने की कोशिश की, लेकिन युवा भड़क गए और 36 घंटों में सरकार उखड़ गई।

यहां भारत में? गोदी मीडिया पहले से ही काम पर लगा है। हर शाम टीवी पर एंकर्स चिल्लाते हैं, “मोदी जी ने चमत्कार किया!” लेकिन चमत्कार क्या? महंगाई कम हुई? हा हा, कम हुई तो गोदी मीडिया के ग्राफ में, जहां एक्सिस को उल्टा करके दिखाते हैं। असल में टमाटर 100 रुपये किलो, हरा सब्जी 80 से 100, लेकिन एंकर कहता है, “यह तो मौसमी है!” मौसमी? हां, हर मौसम में महंगाई।


गोदी मीडिया में एक एंकर है – नाम नहीं लूंगा, लेकिन वो जो चश्मा लगाकर चिल्लाता है – वो हर डिबेट में कहता है, “देश पहले!” लेकिन देश में बेरोजगारी पर चुप। अगर कोई विपक्षी बोलता है, “महंगाई बढ़ी है”, तो एंकर चिल्लाता है, “आप देशद्रोही हैं! नेहरू की गलती!” नेहरू? अरे, नेहरू तो 1964 में गए, लेकिन गोदी मीडिया के लिए हर समस्या नेहरू की देन दिखाई देती है।

मोदी जी की कोई गलती नहीं – सब “विरासत” है। और अगर कोई सच्ची खबर दिखाए, जैसे किसान आंदोलन, तो गोदी मीडिया कहता है, “यह तो खालिस्तानी हैं!” किसान जो अन्न उगाते हैं, वो खालिस्तानी, और जो विज्ञापन देते हैं, वो राष्ट्रभक्त।


अब सोशल मीडिया की बात। नेपाल में बैन से विद्रोह हुआ, यहां भारत में IT रूल्स से पहले से कंट्रोल। फेक न्यूज? हां, लेकिन सिर्फ विपक्ष की। भाजपा का आईटी सेल ट्रोल आर्मी चलाता है – #ModiHaiToMumkinHai ट्रेंड करता है, लेकिन #Unemployment को दबा देता है।


व्यंग्य: युवाओं को कहते हैं, “सोशल मीडिया पर सकारात्मक रहो”, लेकिन सकारात्मक मतलब मोदी जी की तारीफ। अगर कोई क्रिटिसाइज करे, तो ट्रोल आते हैं – “तुम पाकिस्तानी हो!” और गोदी मीडिया उसे न्यूज बनाता है, “देखिए, कैसे सोशल मीडिया पर देशद्रोह फैल रहा है!” लेकिन असल में सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा है – आधार लिंक न होने पर बैंक फ्रीज, पैन लिंक न होने पर रिफंड रुकना। गोदी मीडिया कहता है, “यह तो डिजिटल इंडिया है!” डिजिटल? हां, जहां जनता डिजिटल रूप से परेशान है।


उदाहरण: इलेक्टोरल बॉन्ड। सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक कहा, लेकिन गोदी मीडिया ने क्या किया? “यह तो ट्रांसपेरेंसी लाएगा!” ट्रांसपेरेंसी? हां, जहां डोनर्स के नाम छुपे थे, और हजारों करोड़ आए। लेकिन गोदी मीडिया ने विपक्ष पर फोकस किया, “कांग्रेस ने भी लिए!”


व्यंग्य है कि मीडिया जो जांचना चाहिए, वो प्रचार करता है। जनता नजरअंदाज हो रही है, लेकिन टीवी पर “प्राइम टाइम” में मोदी जी की रैलियां। और सर्वे? गोदी मीडिया के सर्वे में भाजपा हमेशा 400 पार। असल में जनता सोच रही है, “400 पार? हां, महंगाई 400 पार!”


कल्पना कीजिए एक गोदी एंकर का दिन। सुबह उठता है, मोदी जी की फोटो को प्रणाम करता है, फिर स्क्रिप्ट पढ़ता है – “आज महंगाई पर बात, लेकिन कहना कि वैश्विक है।” शाम को डिबेट: विपक्षी को बोलने नहीं देते, खुद चिल्लाते हैं। व्यंग्य है कि मीडिया “फ्री प्रेस” है, लेकिन फ्री मतलब सरकार से फ्री विज्ञापन। जनता देखती है और सोचती है, “क्या यह न्यूज है या इंफोमर्शियल?” लेकिन कोई चारा नहीं, क्योंकि असली पत्रकारों को “फेक न्यूज” कह कर जेल में डाल दिया जाता है।

नेपाल में युवाओं ने सोशल मीडिया से लड़ाई लड़ी, यहां गोदी मीडिया ने पहले से ही जनता की आवाज दबा दी है। लेकिन कितने दिन? गुस्सा तो बढ़ रहा है। आय, निवास, जाति, जन्म, मृत्यु, आधार, पैन आदी बनवाने और लिंक कराते कराते जनता डिजिटल इंडिया की चक्की में पीसी जा रही है। जिस दिन गुस्सा फुटा बंग्लादेश नेपाल जैसा भारत में भी होगा। तभी सत्ता का परिवर्तन भी होगा अब चुनाव से सत्ता परिवर्तन होना मुश्किल है। जनता भले ही वोट न दे सत्ता सत्ता पक्ष का ही बना रहेगा जिस प्रकार लालू यादव ने सत्ता पर कब्जा स्थापित किया था।

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

शुरू करते हैं आधार से। आधार – “आधार” मतलब नींव, लेकिन जनता की आर्थिक नींव को हिला दिया है। हर चीज से लिंक— बैंक अकाउंट, मोबाइल, पैन, राशन कार्ड, गैस सिलेंडर, यहां तक कि मौत के बाद भी।


व्यंग्य: अगर आधार अपडेट नहीं किया, तो बैंक अकाउंट फ्रीज, जैसे जनता कोई क्रिमिनल हो। और अपडेट कैसे? सर्विस सेंटर पर लाइन लगाओ, घूस दो, क्योंकि सिस्टम “डाउन” रहता है। सरकार कहती है, “डिजिटल क्रांति!” क्रांति? हां, जनता क्रांतिकारी बन रही है – क्रांति से पहले परेशान होकर।


उदाहरण: एक गरीब आदमी आधार लिंक करवाने जाता है, लेकिन फिंगरप्रिंट मैच नहीं करता, क्योंकि हाथ मजदूरी से खुरदुरे। फिर क्या? “आओ कल!” कल आओ, परसों आओ – जीवन बीत जाता है। मिस प्रिंट है जन्म और निवास आनलाईन बनवा कर लाओ मतलब एक से पांच दस हजार रुपये का खर्चा गोदी मीडिया कहता है, “आधार से भ्रष्टाचार रुका!” रुका? हां, लेकिन जनता का पैसा रुक गया और जेब खाली हो गया।

अब पैन कार्ड लिंक। अगर नहीं लिंका, तो TDS ज्यादा कटेगा, रिफंड नहीं मिलेगा। लिंक कराने जाओ तो दो चार हजार का खर्चा करो।


व्यंग्य है: सरकार कहती है, “काला धन रोकना है”, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड से सफेद में काला धन आया। जनता मिडिल क्लास टैक्स देती है, लेकिन अमीरों के लिए “टैक्स हेवन”। उदाहरण: एक सैलरीड आदमी पैन-आधार लिंक भूल गया, अब रिफंड के लिए फॉर्म भरना, फिर अपील – जैसे कोर्ट केस हो। और महंगाई ऊपर से।


जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र। जन्म हुआ, आनलाईन प्रमाणपत्र बनवाओ – लेकिन ऑनलाइन पोर्टल क्रैश। दस्तावेज अपलोड करो, लेकिन “एरर 404″। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आसा बहू और गांव का प्रधान आपके जन्म का प्रमाण देता है न कि स्कूली सर्टिफिकेट या माता-पिता, यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? समय मिले तो जन्म मरण प्रमाण पत्र का प्रोफार्मा देखिए।


व्यंग्य: सरकार “ई-गवर्नेंस” कहती है, लेकिन ई मतलब “एक्सक्यूज” – एक्सक्यूज फॉर डिले। मृत्यु प्रमाणपत्र? परिवार दुखी, लेकिन प्रमाणपत्र के बिना इंश्योरेंस क्लेम नहीं।
उदाहरण: कोविड में कितने लोग मरे? लेकिन प्रमाणपत्र न होने से आंकड़े कम दिखाए। गोदी मीडिया कहता है, “कोविड हैंडलिंग बेस्ट!” बेस्ट? हां, आंकड़ों को हैंडल करने में।

जानिए बेरोजगारी पर— आंकड़े: 45% युवा बेरोजगार। लेकिन सरकार “मेक इन इंडिया” कहती है।

  • व्यंग्य: मेक इन इंडिया? हां, पकौड़े मेक इन इंडिया। आईआईटी पास युवा रोडसाइड स्टॉल पर।
  • उदाहरण: SSC परीक्षा लीक, रेलवे भर्ती रद्द – युवा प्रदर्शन करते हैं, लेकिन पुलिस लाठीचार्ज। नेपाल में युवा भड़के, यहां भारत में “पेपर लीक” से भड़क रहे हैं। सरकार कहती है, “स्टार्टअप!” लेकिन स्टार्टअप के लिए कैपिटल कहां? अमीरों के पास।
  • महंगाई। पेट्रोल 100+, डीजल 90+। “ग्लोबल फैक्टर”, लेकिन जब दाम कम, “मोदी जी की कूटनीति”। गृहिणी बाजार जाती है, सब्जी महंगी, लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “GDP ग्रोथ!” ग्रोथ? हां, महंगाई की ग्रोथ।
  • भ्रष्टाचार। राफेल डील – कीमत बढ़ी, लेकिन “राष्ट्रीय सुरक्षा”। पीएम केयर्स फंड – डोनेशन आए, लेकिन खर्च कहां?
  • व्यंग्य: ट्रांसपेरेंसी? हां, फंड ट्रांसपेरेंट नहीं।
  • नोटबंदी: जनता लाइन में मरी, लेकिन काला धन बढ़ा।
  • उदाहरण: 2000 के नोट आए, फिर वापस – जैसे मजाक। नेपाल में भ्रष्टाचार से विद्रोह, यहां जनता त्रस्त लेकिन चुप।
भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

नेपाल में क्या हुआ, भाइयों और बहनों? सोशल मीडिया पर बैन लगा, सरकार ने सोचा, “युवाओं को डरा देंगे, सब कंट्रोल में रहेगा!” लेकिन नेपाल के युवा तो बाजीगर निकले। 36 घंटों में सड़कों पर उतरे, नारे लगाए, और सरकार को उखाड़ फेंका। अब इसे व्यंग्य कहें या विडंबना, कि जिस सोशल मीडिया को सरकार ने दबाने की कोशिश की, उसी ने सरकार को दबा दिया। और हम भारत में? अरे, हम तो पहले से ही “डिजिटल इंडिया” के नाम पर डिजिटल गुलामी में जी रहे हैं।

IT रूल्स, डेटा प्रोटेक्शन के नाम पर कंट्रोल, और गोदी मीडिया का भोंपू – सब मिलकर जनता की आवाज को दबा रहे हैं। लेकिन नेपाल की कहानी हमें कुछ सिखाती है, और यह अध्याय उसी की विस्तृत पड़ताल है, जिसमें हम देखेंगे कि पड़ोसियों की आग भारत की सीमाओं तक क्यों चिंता का सबब है, और कैसे भाजपा सरकार इसे अनदेखा कर रही है, क्योंकि उनकी नींद में खलल तो सिर्फ “चुनावी बॉन्ड” की रकम से पड़ता है।


4 नेपाल: सोशल मीडिया बैन और युवाओं का विद्रोह
नेपाल में विद्रोह की शुरुआत तब हुई जब सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की। वजह? “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “अफवाहों पर रोक”। अरे, यह तो वही पुराना बहाना है जो हर सरकार इस्तेमाल करती है।

लेकिन नेपाल के युवाओं ने कहा, “बस, बहुत हुआ!” टिकटॉक, ट्विटर, फेसबुक – ये उनके लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी आवाज उठाने का जरिया थे। सरकार ने सोचा, बैन कर देंगे, तो युवा चुप हो जाएंगे। लेकिन बैन ने उल्टा आग में घी डाल दिया। युवा सड़कों पर उतरे, नारे लगाए, और 36 घंटों में सरकार को अलविदा कह दिया। यह कोई साधारण विद्रोह नहीं था – यह भ्रष्टाचार, दमन, और बेरोजगारी के खिलाफ जनता का गुस्सा था, जो सोशल मीडिया बैन ने और भड़का दिया।


अब भारत की बात। यहां भी सोशल मीडिया पर कंट्रोल की कोशिशें कम नहीं। 2021 में नए IT रूल्स आए, जिसमें कहा गया कि सोशल मीडिया कंपनियों को सरकार के कहने पर कंटेंट हटाना होगा। अगर कोई सरकार के खिलाफ ट्वीट करता है, तो तुरंत “फेक न्यूज” का लेबल लगेगा। व्यंग्य है न? सरकार कहती है, “हम तो अभिव्यक्ति की आजादी के साथ हैं”, लेकिन आजादी सिर्फ तब तक, जब तक आप #ModiHaiToMumkinHai लिखते हैं। अगर #Unemployment या #Inflation ट्रेंड करे, तो तुरंत ट्रोल आर्मी एक्टिव।

उदाहरण लीजिए: 2020-21 का किसान आंदोलन। दिल्ली की सीमाओं पर इंटरनेट बंद कर दिया गया। क्यों? “राष्ट्रीय सुरक्षा”। लेकिन असल में सरकार को डर था कि किसानों की आवाज सोशल मीडिया पर वायरल न हो जाए। रिहाना ने एक ट्वीट किया, तो गोदी मीडिया ने हंगामा मचा दिया, “विदेशी साजिश!” लेकिन साजिश तो जनता की आवाज दबाने की थी।

नेपाल में युवा भड़के क्योंकि उनकी आवाज दबाई गई। भारत में? युवा डरे हुए हैं। क्यों? क्योंकि ED, CBI, और IT सेल का डर।


उदाहरण: एक स्टूडेंट ने ट्वीट किया कि बेरोजगारी बढ़ रही है। अगले दिन उसके पास “नोटिस”। व्यंग्य है कि सरकार “डिजिटल इंडिया” की बात करती है, लेकिन डिजिटल मतलब सिर्फ आधार लिंक और UPI। आवाज उठाने की आजादी? वो तो “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर कुचल दी जाती है। लेकिन नेपाल हमें सिखाता है कि जब गुस्सा भड़कता है, तो कोई बैन काम नहीं आता।


4 बांग्लादेश: छात्रों की ताकत और सरकार का पतन
अब बांग्लादेश की कहानी। वहां भी कुछ वैसा ही हुआ। छात्रों ने सड़कों पर उतरकर सरकार को हिला दिया। क्यों? क्योंकि भ्रष्टाचार, नौकरी की कमी, और सरकारी दमन से तंग आ चुके थे। वहां नौकरियों में कोटा सिस्टम के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। सरकार ने दबाने की कोशिश की, लेकिन छात्रों ने हार नहीं मानी। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए – पुलिस की लाठी, आंसू गैस, लेकिन छात्र डटे रहे। नतीजा? सरकार को जाना पड़ा। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़ भारत भाग कर आई यह तो आप सबको पता ही है।


व्यंग्य: बांग्लादेश में छात्रों ने सरकार गिरा दी, और भारत में? JNU और जामिया के छात्रों पर लाठीचार्ज। गोदी मीडिया ने क्या कहा? “टुकड़े-टुकड़े गैंग!” जैसे पढ़ाई करना और सवाल पूछना अपराध हो।


उदाहरण: 2019 में CAA-NRC के खिलाफ प्रदर्शन। दिल्ली की सड़कों पर छात्र और नागरिक उतरे। लेकिन सरकार ने क्या किया? पुलिस भेजी, इंटरनेट बंद किया, और गोदी मीडिया ने इसे “देशद्रोह” करार दिया।


व्यंग्य है कि बांग्लादेश में छात्रों ने जीत हासिल की, लेकिन भारत में छात्रों को “अर्बन नक्सल” कहा गया। और गोदी मीडिया? वो तो बस “मोदी जी की तारीफ” में व्यस्त। बांग्लादेश में जनता जीती, लेकिन भारत में जनता की आवाज को “विदेशी फंडिंग” का लेबल देकर दबाया जाता है।

इंडोनेशिया: भ्रष्टाचार और टैक्स का विरोध
इंडोनेशिया की कहानी भी कम नहीं। वहां जनता सड़कों पर है – भ्रष्टाचार और भारी टैक्स के खिलाफ। सरकार ने नए टैक्स लगाए, जिससे छोटे व्यापारी और मिडिल क्लास पर बोझ बढ़ा। लोग भड़क गए। प्रदर्शन, हड़ताल, और सोशल मीडिया पर गुस्सा। भारत में भी यही हो रहा है। GST को लीजिए। “वन नेशन, वन टैक्स” का नारा, लेकिन छोटे व्यापारियों की कमर टूटी।

उदाहरण: एक छोटा दुकानदार, जो कपड़े बेचता है, अब हर महीने GST फाइल करता है। गलती हुई, तो फाइन। और बड़े कॉरपोरेट्स? उनके लिए टैक्स छूट।

व्यंग्य: “मेक इन इंडिया” छोटे व्यापारियों को मारने के लिए।
इंडोनेशिया में जनता टैक्स के खिलाफ सड़कों पर, और भारत में? जनता चुप, क्योंकि गोदी मीडिया कहता है, “GST से अर्थव्यवस्था मजबूत!” मजबूत? हां, अमीरों की जेब। मिडिल क्लास की जेब में तो छेद। और भ्रष्टाचार? इंडोनेशिया में लोग सड़कों पर, लेकिन भारत में? राफेल डील, पीएम केयर्स फंड – सवाल पूछो, तो जवाब “राष्ट्रीय सुरक्षा”। भ्रष्टाचार पर सवाल पूछना ही देशद्रोह है।

भारत के लिए क्यों बुरी खबर?
नेपाल और बांग्लादेश की अशांति भारत के लिए चेतावनी है। क्यों? क्योंकि सीमाएं साझा हैं, और अशांति फैल सकती है। नेपाल में विद्रोह से भारत की सीमा पर तनाव। बांग्लादेश में अस्थिरता से माइग्रेशन का डर। लेकिन भाजपा सरकार क्या कर रही है? “चुनावी बॉन्ड” और “400 पार” के सपने देख रही है।

व्यंग्य: पड़ोसी जल रहे हैं, और हम “विकसित भारत” की बात कर रहे हैं। विश्व गुरु बनने का झूठा प्रचार। उदाहरण: नेपाल में अशांति से भारत-नेपाल बॉर्डर पर व्यापार प्रभावित। लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “मोदी जी की विदेश नीति से सब ठीक!” ठीक? हां, शायद गोदी मीडिया के स्टूडियो में।


नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया – तीनों देशों में एक बात कॉमन: भ्रष्टाचार, दमन, और जनता का गुस्सा। भारत में भी यही है। बेरोजगारी 45%, महंगाई आसमान पर, आधार-पैन लिंक का झंझट। जेब में पैसे नहीं खर्च करने के लिए मजबूर लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “सब चंगा है कठौती मे गंगा है आओ नहाओ भाजपा ज्वाईन करो पाक-साफ हो जाओगे!” जैसे चिटफंड बैकिंग वाले गंगा स्नान कर जनता की जमा पूंजी हडप पाक-साफ हो गये हैं।


व्यंग्य: जनता का गुस्सा बढ़ रहा है, लेकिन सरकार को लगता है कि गोदी मीडिया और ED से सब कंट्रोल हो जाएगा। लेकिन नेपाल ने दिखाया, जब गुस्सा भड़कता है, तो कोई कंट्रोल काम नहीं आता।

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

अब आते हैं भाजपा के वादों पर – वो गुब्बारे, जो 2014 और 2019 में हवा में उड़ाए गए, लेकिन जनता के हाथ में सिर्फ फटी डोर आई।

व्यंग्य का आलम देखिए: हर चुनाव में नए वादे, नए नारे, लेकिन नतीजा? जनता की जेब खाली, और सरकार की तिजोरी भरी। भारत को कंगाल दो ही मिलकर कर रहे हैं पहला नेता दूसरा अभिनेता। नेता जनता से चुनकर जाते हैं पांच साल के लिए लेकिन सबसे ज्यादा कमाई और पीढ़ी दर पीढ़ी पेंशन के हकदार।

यहां 60 साल सरकारी विभागों में सेवा देने वालों का बुढापे का सहारा छिनने वाली भाजपा सरकार ही है जो कहती है मंचों पर न खायेंगे न खाने देगें यह तो बिल्कुल ही उल्टा नारा है क्योंकि सबको दिख रहा है सिर्फ खायेंगे क्योकि हम नेता खाने के लिए बने हैं आम जन को बस खाने नही देगे, हकीकत यह है। यह अध्याय बताएगा कि कैसे भाजपा के वादे सिर्फ हवा में उड़ते हैं, और जनता को सिर्फ “मन की बात” सुनने को मिलती है।


2014: काला धन, अच्छे दिन, और सपनों का सौदागर
2014 में भाई नरेंद्र मोदी जी आए, और क्या कमाल का नारा था – “न खाऊंगा, न खाने दूंगा!” जनता ने तालियां बजाईं। काला धन वापस लाने का वादा – 100 दिन में हर अकाउंट में 15 लाख। व्यंग्य: 15 लाख तो नहीं आए, लेकिन 15 लाख दिए वाली बात पर तालियां जम कर बजाई गयी। नोटबंदी हुई, सरकार ने कहा, “काला धन खत्म!” लेकिन क्या हुआ? जनता लाइनों में मरी, ATM खाली, और काला धन? वो तो डिजिटल हो गया।


उदाहरण: 2016 में नोटबंदी। लोग बैंकों के बाहर लाइन में, आये दिन लगभग 50 से ज्यादा लोग मरे। लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “यह तो क्रांतिकारी कदम!” क्रांतिकारी? हां, जनता की जिंदगी को क्रांति में डाल दिया।


अच्छे दिन? हां, अमीरों के लिए। इलेक्टोरल बॉन्ड से हजारों करोड़ आए, लेकिन किसके? सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “असंवैधानिक”, लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “ट्रांसपेरेंसी!” व्यंग्य: ट्रांसपेरेंसी ऐसी कि डोनर्स के नाम छुपे। जनता सोचती है, “काला धन गया कहां?” जवाब: शायद स्विस बैंक से इलेक्टोरल बॉन्ड तक।


राम मंदिर: वादा पूरा, लेकिन रोजगार कहां?
राम मंदिर का वादा। 2019 में जोर-शोर से प्रचार। 2024 में मंदिर बना, उद्घाटन हुआ। गोदी मीडिया ने 24/7 कवरेज की, जैसे भारत अब विश्व गुरु बन गया।


लेकिन व्यंग्य: मंदिर बना, लेकिन मंदिर में चढ़ाने के लिए जनता की जेब में पैसा नहीं। बेरोजगारी 45%, युवा नौकरी मांगते हैं, लेकिन जवाब? “राम राज्य!” राम राज्य में हनुमान जी की तरह युवा उछल रहे हैं – नौकरी के लिए।


उदाहरण: UP में बेरोजगार युवा पुलिस भर्ती के लिए लाइन में, लेकिन पेपर लीक। सरकार ने कहा, “हम जांच करेंगे!” जांच? हां, जांच का रिजल्ट अगले चुनाव तक।


किसान कानून: वादा, वापसी, और मजाक
2020 में तीन किसान कानून आए। वादा था— “किसानों की आय दोगुनी!” लेकिन किसानों ने कहा, “यह तो कॉरपोरेट्स के लिए!” सड़कों पर उतरे, दिल्ली की सीमाएं बंद। 700 से ज्यादा किसान शहीद। गोदी मीडिया ने कहा, “यह खालिस्तानी हैं!” व्यंग्य: जो अन्न उगाते हैं, वो खालिस्तानी, और जो टैक्स चुराते हैं, वो राष्ट्रभक्त। आखिर में कानून वापस हुए, लेकिन नुकसान? किसानों का। वादा पूरा? नहीं, सिर्फ वोटों के लिए वापसी।


महिला आरक्षण: पास, लेकिन लागू कब?
महिला आरक्षण बिल – “नारी शक्ति” का नारा। 2023 में पास हुआ, लेकिन लागू कब? “जनगणना और परिसीमन के बाद”।

व्यंग्य: यानी अगले जन्म में लागू होगा।
उदाहरण: कैबिनेट में कितनी महिलाएं? गिनती कर लीजिए। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा, लेकिन बेटियां बेरोजगार। मणिपुर में हिंसा, महिलाओं पर अत्याचार, लेकिन सरकार? “सब चंगा है!”


अन्य वादे: हवा में उड़ते गुब्बारे
2 करोड़ नौकरियां हर साल: 10 साल में 20 करोड़ नौकरियों का वादा था। लेकिन CMIE के आंकड़े? बेरोजगारी 45%। व्यंग्य: नौकरियां आईं, लेकिन गोदी मीडिया के स्टूडियो में।

स्वच्छ भारत: गंगा साफ करने का वादा। लेकिन गंगा? अभी भी शहरों का कचरा गंगा में प्रवाहित। व्यंग्य: गंगा में स्नान से पाप धुलते हैं, लेकिन गंदगी नहीं। भाजपा मे ज्वाइन हो जाओ गंगा स्नान हो गया सब पाप खत्म हो जाता है।

स्मार्ट सिटी: 100 स्मार्ट सिटी का वादा। कितने बने? गिनती शून्य। व्यंग्य: स्मार्ट सिटी नहीं, स्मार्ट प्रचार।


जनता की हालत
वादे हवा में, लेकिन जनता की हालत? आधार-पैन लिंक, महंगाई, बेरोजगारी। सरकार कहती है, “विकसित भारत”, लेकिन जनता “विकास” के नाम पर टैक्स दे रही है।
उदाहरण: मिडिल क्लास की सैलरी का आधा टैक्स में, लेकिन रिटर्न? खराब सड़कें, टूटी नालियां। नेपाल में जनता भड़की, यहां जनता चुप। लेकिन कितने दिनों तक? यहां भी जनता पूछ रही है —मोदी जी आपके झूठे वादों का क्या हुआ?

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

“मन की बात” – वाह, क्या नाम है! जैसे कोई जादू का शो हो, जिसमें हर महीने नरेंद्र मोदी जी माइक पकड़ते हैं और देश को बताते हैं कि सब कुछ कितना शानदार चल रहा है। लेकिन यह “मन की बात” सिर्फ मोदी जी के मन की है, जनता के दिल की बात तो जैसे रेडियो सिग्नल में खो जाती है। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार – ये सब जनता के दिल की बातें हैं, लेकिन “मन की बात” में इनका जिक्र? अरे, वो तो “सकारात्मकता” के नाम पर दबा दिया जाता है।

इस अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे “मन की बात” एक ऐसा मंच बन गया है, जहां सरकार अपनी पीठ खुद थपथपाती है, और जनता बस तालियां बजाने को मजबूर है। नेपाल में जनता सड़कों पर उतरी, बांग्लादेश में सरकार गिर गई, लेकिन भारत में? गोदी मीडिया और “मन की बात” मिलकर जनता को सपनों की दुनिया में रखते हैं। चलिए, इस व्यंग्यात्मक यात्रा को और रसीला बनाते हैं।


“मन की बात” – एक रेडियो शो या प्रचार का मास्टरस्ट्रोक?
2014 में जब “मन की बात” शुरू हुई, तो जनता ने सोचा, “वाह, अब प्रधानमंत्री हमसे सीधे बात करेंगे!” लेकिन जल्दी ही समझ आ गया कि यह कोई बातचीत नहीं, बल्कि एकतरफा प्रवचन है। हर महीने रेडियो पर, टीवी पर, यूट्यूब पर – मोदी जी आते हैं, और बताते हैं कि भारत कैसे विश्व गुरु बन रहा है। योग दिवस, स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया – सब कुछ इतना चमकता-दमकता कि लगता है, भारत तो स्वर्ग बन गया।

लेकिन जनता जमीन पर है, जहां महंगाई आसमान छू रही है, नौकरियां गायब हैं, और आधार-पैन लिंक न होने पर बैंक अकाउंट फ्रीज हो रहा है। “मन की बात” में इनका जिक्र? जीरो।


उदाहरण लीजिए: 2020 में कोविड लॉकडाउन। जनता भूखी, प्रवासी मजदूर सड़कों पर पैदल चल रहे थे, लेकिन “मन की बात” में क्या? “आत्मनिर्भर भारत!” आत्मनिर्भर? हां, मजदूरों को अपने पैरों पर चलकर घर जाना पड़ा। गोदी मीडिया ने इसे “प्रेरणादायक” बताया, लेकिन असल में यह सरकार की नाकामी थी।

एक और उदाहरण— बेरोजगारी। CMIE के आंकड़े कहते हैं, 45% युवा बेरोजगार। लेकिन “मन की बात” में? “स्टार्टअप इंडिया!” जैसे हर युवा के पास स्टार्टअप के लिए लाखों रुपये पड़े हैं। व्यंग्य है कि सरकार कहती है, “पकौड़े बेचो, आत्मनिर्भर बनो!” लेकिन पकौड़े बेचने वाले को भी GST फाइल करना पड़ता है।


सकारात्मकता का ओवरडोज, लेकिन जनता की परेशानी का कोई जिक्र नहीं
“मन की बात” का फॉर्मेट देखिए। हर एपिसोड में कोई न कोई कहानी – कहीं कोई महिला किसान जो जैविक खेती कर रही है, कहीं कोई स्टार्टअप वाला जो “मेक इन इंडिया” का झंडा उठाए है। सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन व्यंग्य यह है कि ये कहानियां 1% लोगों की हैं। बाकी 99% जनता? वो तो आधार सेंटर की लाइन में खड़ी है—

और आनलाईन जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आशा बहू, आंगनबाड़ी कार्यकत्री, ग्राम प्रधान से अपने जन्म का प्रोफार्मा भरवाने, फिर दो गवाहों के साथ तहसील से ब्लॉक तक की परिक्रमा, दो चार हजार रुपये पाकेट में जगह जगह खर्च करने के लिए रखकर दो चार महीने करनी होती है, वहां जहाँ जनता महंगाई से जूझ रही है।

उदाहरण: एक बार “मन की बात” में मोदी जी ने कहा, “युवा डिजिटल इंडिया का भविष्य हैं!” लेकिन डिजिटल इंडिया का हकीकत? गांवों में इंटरनेट नहीं, और शहरों में युवा नौकरी के लिए ऑनलाइन फॉर्म भरते-भरते हार गए। SSC, रेलवे भर्ती – पेपर लीक, परीक्षाएं रद्द। लेकिन “मन की बात” में? “स्किल इंडिया!” स्किल? हां, जनता को लाइन में खड़े रहने की स्किल तो मिल गई।


और महंगाई? पेट्रोल 100 रुपये लीटर, सब्जियां 80-100 रुपये किलो। लेकिन “मन की बात” में? “हमारी अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन की ओर!”

व्यंग्य: 5 ट्रिलियन का सपना, लेकिन जनता की जेब में 5 रुपये का दर्द। एक गृहिणी बाजार जाती है, सोचती है, “आज क्या बनाऊं?” लेकिन गोदी मीडिया और “मन की बात” कहते हैं, “महंगाई वैश्विक है!” वैश्विक? तो फिर तेल के दाम कम होने पर “मोदी जी की कूटनीति” क्यों?

व्यंग्य: जब दाम बढ़ते हैं, तो “रूस-यूक्रेन युद्ध”, लेकिन जब कम होते हैं, तो “मोदी जी की जीत”। कच्चे तेल से आपको बता दें कि लगभग 18 रुपये लीटर पेट्रोल पड़ता है और बिकता है 100 रुपये लीटर, तेल कंपनियों को फायदा ही फायदा इसका श्रेय जाता है भाई नरेंद्र मोदी को। पिछली सरकारों में सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी देकर ग्राहक तक पहुँचाती थी अब फायदा लेकर ग्राहकों को दिया जाता है।


भ्रष्टाचार पर चुप्पी, लेकिन योग और स्वच्छता पर लेक्चर
भ्रष्टाचार की बात करें। राफेल डील, पीएम केयर्स फंड, इलेक्टोरल बॉन्ड – जनता सवाल पूछती है, लेकिन “मन की बात” में जवाब? “योग करें, तनाव कम होगा!”

व्यंग्य: तनाव तो जनता का भ्रष्टाचार से है, लेकिन मोदी जी कहते हैं, “सूर्य नमस्कार करो!” उदाहरण: पीएम केयर्स फंड। कोविड में हजारों करोड़ आए, लेकिन खर्च कहां? कोई हिसाब नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक कहा, लेकिन “मन की बात” में? “हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत बना रहे हैं!” मुक्त? हां, शायद विपक्ष के लिए, क्योंकि ED-CBI तो उनके पीछे ही पड़ते हैं।


स्वच्छ भारत का जिक्र बार-बार। गंगा साफ करने का वादा। लेकिन 2025 में भी गंगा में शहरों का कचरा। व्यंग्य: “मन की बात” में गंगा साफ हो रही है, लेकिन असल में गंगा में कचरा तैर रहा है। उदाहरण: वाराणसी में गंगा के किनारे कचरे के ढेर। लेकिन गोदी मीडिया और “मन की बात” में? “स्वच्छ भारत मिशन सक्सेस!” सक्सेस? हां, फोटोशूट में।


नेपाल और बांग्लादेश से तुलना
नेपाल में जनता भड़की क्योंकि उनकी आवाज दबाई गई। बांग्लादेश में छात्रों ने सरकार गिरा दी। लेकिन भारत में? “मन की बात” जनता को लोरी सुना रही है।

उदाहरण: कोविड में ऑक्सीजन की कमी से लोग मरे, लेकिन “मन की बात” में? “हमने कोविड को हराया!” हराया? हां, आंकड़ों को छुपाकर। नेपाल में सोशल मीडिया बैन से विद्रोह हुआ, लेकिन भारत में गोदी मीडिया और “मन की बात” मिलकर जनता को चुप करा रहे हैं। व्यंग्य: जनता का गुस्सा बढ़ रहा है, लेकिन “मन की बात” में सिर्फ “सकारात्मक कहानियां”।


जनता की “दिल की बात” कहां?
भाजपा सरकार की उपलब्धियां, जनता की परेशानियां – आधार-पैन लिंक, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र भाजपा सरकार की झमाझम जन हितैषी नहीं बल्कि जन मुआवन योजना जो जेब खाली कराने के लिए बनाई गई है हजारों झंझट, बेरोजगारी, महंगाई – इनका “मन की बात” में कोई जिक्र नहीं।

व्यंग्य: सरकार कहती है, “हम सुन रहे हैं”, लेकिन सुन क्या रहे हैं? सिर्फ तालियां। उदाहरण: एक युवा ट्वीट करता है, “नौकरी चाहिए!” जवाब? ट्रोल आर्मी से गालियां, और “मन की बात” में? “युवा शक्ति!” शक्ति? हां, लाठी खाने की शक्ति।


“मन की बात” एक मास्टरस्ट्रोक है – प्रचार का, जनता को भटकाने का। नेपाल में जनता सड़कों पर, लेकिन भारत में जनता रेडियो सुन रही है। लेकिन कितने दिन? गुस्सा तो पक रहा है। जिस दिन भारत में आम जनता का गुस्सा पक कर तैयार हुआ नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया सब फिका पड सकता है।

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

अब आते हैं भाजपा की सबसे पसंदीदा रणनीति पर – विपक्ष को कुचलना। यह कोई नई बात नहीं, लेकिन जिस तरह से भाजपा ने इसे कला बना दिया है, वो तारीफ के काबिल है – अगर व्यंग्य की नजर से देखें। विपक्ष को “परिवारवाद”, “भ्रष्टाचारी”, “देशद्रोही” कहना, और फिर ED, CBI, IT जैसे हथियारों से उन्हें निशाना बनाना – यह भाजपा का ट्रेडमार्क बन गया है।

नेपाल में सरकार गिर गई क्योंकि जनता भ्रष्टाचार से तंग थी, लेकिन भारत में? भ्रष्टाचार के आरोप सिर्फ विपक्ष पर। इस अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे भाजपा ने विपक्ष को “दुश्मन नंबर 1” बना दिया, और गोदी मीडिया ने इसमें ढोल बजाया। यह अध्याय होगा एक व्यंग्यात्मक रोलरकोस्टर।


परिवारवाद: विपक्ष का पसंदीदा टारगेट
भाजपा का सबसे बड़ा हथियार – “परिवारवाद”। कांग्रेस हो, सपा हो, DMK हो – सब पर एक ही इल्जाम: “ये परिवारवादी हैं!” लेकिन भाजपा में कोई परिवारवाद नहीं, क्योंकि सारा परिवार तो “संघ” है। उदाहरण: राहुल गांधी को “पप्पू” कहना, प्रियंका गांधी को “नेहरू की विरासत” कहकर तंज कसना। लेकिन भाजपा में? एक ही चेहरा – मोदी जी। बाकी सब “भक्त”।

व्यंग्य: परिवारवाद बुरा है, लेकिन भक्तवाद तो देश की प्रोग्रेस है।
उदाहरण: यूपी में अखिलेश यादव। हर रैली में भाजपा कहती है, “सपा मतलब परिवारवाद!” लेकिन जब यूपी में योगी जी की सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो? “यह तो विपक्ष की साजिश!” व्यंग्य: परिवारवाद बुरा, लेकिन भ्रष्टाचार? वो तो “राष्ट्रीय हित” में।


ED-CBI: विपक्ष के लिए “एक्सप्रेस डिलीवरी”
ED और CBI – ये दो ऐसे नाम हैं, जो विपक्षी नेताओं के लिए बुरा सपना बन गए हैं। कोई भी विपक्षी नेता अगर बोलता है, तो अगले दिन ED का नोटिस। व्यंग्य: ED का फुल फॉर्म? “इलेक्शन डिस्ट्रक्शन”।

उदाहरण: दिल्ली में अरविंद केजरीवाल। AAP ने सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया स्कूल बनाए, अस्पताल सुधारे, लेकिन ED ने क्या किया? शराब नीति केस में जेल। कोर्ट ने बेल दी, लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “भ्रष्टाचारी!”

व्यंग्य: भ्रष्टाचार का इल्जाम सिर्फ विपक्ष पर, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड में हजारों करोड़? वो तो “ट्रांसपेरेंसी”।

एक और उदाहरण: महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे। शिवसेना टूटी, लेकिन ED-CBI चुप। क्यों? क्योंकि टूटने वाले BJP के साथ गए। व्यंग्य: ED-CBI सिर्फ विपक्ष के लिए, BJP के लिए तो “क्लीन चिट एक्सप्रेस”।


गोदी मीडिया का रोल
विपक्ष पर हमले में गोदी मीडिया का रोल अहम है। हर शाम डिबेट में एंकर चिल्लाता है, “विपक्ष देश को बर्बाद कर रहा है!” लेकिन भ्रष्टाचार के असली सवाल? चुप। उदाहरण: राफेल डील। विपक्ष ने सवाल उठाए, लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा!” पीएम केयर्स फंड – कोई हिसाब नहीं, लेकिन विपक्षी नेताओं के पुराने केस खोले जा रहे हैं। व्यंग्य: भ्रष्टाचार मुक्त भारत, लेकिन सिर्फ विपक्ष के लिए।


नेपाल से तुलना
नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता भड़की। लेकिन भारत में? भ्रष्टाचार के आरोप सिर्फ विपक्ष पर। उदाहरण: ममता बनर्जी पर कोयला घोटाले का इल्जाम, लेकिन जब BJP के नेता पर सवाल, तो “सबूत दो!” व्यंग्य: सबूत चाहिए, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड के सबूत? वो तो “गोपनीय”।


जनता का क्या?
विपक्ष को कुचलने की रणनीति से जनता का क्या? जनता बेरोजगारी, महंगाई से त्रस्त। लेकिन गोदी मीडिया और BJP कहते हैं, “विपक्ष की वजह से!” नेहरू की देन है।

व्यंग्य: विपक्ष तो संसद में भी नहीं, फिर भी सारी गलती उनकी। जनता का गुस्सा बढ़ रहा है, लेकिन BJP का फोकस? “400 पार!”

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

भारत को “5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था” बनाने का सपना – वाह, क्या नारा है! जब भी नरेंद्र मोदी जी या उनके वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंच पर आते हैं, तो यह जादुई आंकड़ा हवा में तैरता है। “5 ट्रिलियन! विश्व गुरु! अमृतकाल!” लेकिन व्यंग्य देखिए: यह 5 ट्रिलियन का सपना ऊपर से चमकता है, नीचे जनता की जेब में 5 रुपये का दर्द है। पेट्रोल 100 रुपये लीटर, टमाटर 80 रुपये किलो, और नौकरी? वो तो सिर्फ गोदी मीडिया के सर्वे में।

इस अध्याय में हम विस्तार से देखेंगे कि कैसे भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियां जनता को परेशान कर रही हैं, जबकि गोदी मीडिया और “मन की बात” में सब कुछ “चकाचक” बताया जाता है। नेपाल में भ्रष्टाचार और दमन से जनता भड़की, बांग्लादेश में सरकार गिर गई, लेकिन भारत में? जनता टैक्स, महंगाई, और बेरोजगारी के बोझ तले दबी है, और सरकार कह रही है, “सब चंगा सी!” चलिए, इस व्यंग्यात्मक सफर पर, जहां हम अर्थव्यवस्था के “अच्छे दिन” को कटाक्ष के साथ खोलकर रख देंगे।


5 ट्रिलियन का सपना: हकीकत या हवा?
2019 में भाजपा ने कहा, “2024 तक भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेगा!” गोदी मीडिया ने ढोल बजाए, और जनता ने सोचा, “वाह, अब तो अच्छे दिन आएंगे!” लेकिन 2025 में हम कहां हैं? अर्थव्यवस्था 3.5 ट्रिलियन के आसपास, और वो भी डॉलर में। रुपये में?

व्यंग्य देखिए: रुपया 83-84 के पार, और हर बार जब डॉलर के खिलाफ रुपया गिरता है, गोदी मीडिया कहता है, “यह तो वैश्विक है!” लेकिन जब अर्थव्यवस्था की बात आती है, तो “मोदी जी की नीतियों की जीत!” यह दोहरा मापदंड नहीं, तो क्या है?


उदाहरण लीजिए: 2020 में कोविड आया, अर्थव्यवस्था माइनस 6% पर चली गई। सरकार ने क्या किया? “आत्मनिर्भर भारत” का नारा। लेकिन आत्मनिर्भर कैसे? छोटे व्यापारियों की दुकानें बंद, MSME सेक्टर डूबा, और बड़े कॉरपोरेट्स को टैक्स छूट।


व्यंग्य: आत्मनिर्भर का मतलब अमीरों को और अमीर करना। जनता? वो तो लॉकडाउन में सड़कों पर पैदल चल रही थी। अब जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने वाली डिजिटल इंडिया की चक्की मे पीसी जा रही है, जेब खाली कराने के लिए। गोदी मीडिया ने कहा, “यह तो प्रेरणादायक है!” प्रेरणादायक? हां, 1000 किलोमीटर पैदल चलना प्रेरणादायक है, लेकिन सरकार के लिए नहीं, जनता के लिए।


GST: “वन नेशन, वन टैक्स” या “वन नेशन, वन त्रासदी”?
GST को लीजिए। 2017 में जब इसे लॉन्च किया गया, तो मोदी जी ने कहा, “यह अर्थव्यवस्था का गेम-चेंजर है!” लेकिन गेम बदला किसका? छोटे व्यापारियों का।

उदाहरण: एक छोटा दुकानदार, जो कपड़े बेचता है, अब हर महीने GST फाइल करता है। गलती हुई, तो फाइन। और बड़े कॉरपोरेट्स? उनके लिए टैक्स छूट, लोन री-स्ट्रक्चरिंग।

व्यंग्य: GST का मतलब “गरीब सताओ टैक्स”। छोटे व्यापारी GST पोर्टल पर जूझ रहे हैं, लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “GST से अर्थव्यवस्था मजबूत!” मजबूत? हां, अमीरों की जेब मजबूत। मिडिल क्लास गरीबी के पायदान पर और गरीबों के लिए 5 किलो फ्री राशन की झमाझम योजना। भाजपा सरकार की उपलब्धियां सरकार जानती है गरीबों को बस इतना ही काफी है।


उदाहरण: रेस्तरां में खाना खाइए। 18% GST। कपड़े खरीदिए, 12% GST। और अगर कुछ बचता है, तो इनकम टैक्स। मिडिल क्लास की कमाई का आधा टैक्स में, लेकिन रिटर्न? खराब सड़कें, टूटी नालियां। व्यंग्य: सरकार कहती है, “टैक्स से विकास”, लेकिन विकास कहां? शायद अहमदाबाद में, जहां बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के ऑफिस हैं।


बेरोजगारी: 45% का आंकड़ा, लेकिन “मेक इन इंडिया” का नारा
बेरोजगारी की बात करें। CMIE के आंकड़े चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं: 45% युवा बेरोजगार। लेकिन सरकार क्या कहती है? “मेक इन इंडिया!”

व्यंग्य: मेक इन इंडिया? हां, पकौड़े मेक इन इंडिया। आईआईटी-आईआईएम पास युवा रोडसाइड स्टॉल पर। उदाहरण: SSC और रेलवे भर्ती के पेपर लीक। लाखों युवा फॉर्म भरते हैं, लेकिन परीक्षा रद्द। सरकार कहती है, “हम जांच करेंगे!” जांच? हां, अगले चुनाव तक। और गोदी मीडिया? “मोदी जी ने 6 करोड़ नौकरियां दीं!” कहां? शायद गोदी मीडिया के स्टूडियो में।


उदाहरण: यूपी में पुलिस भर्ती। लाखों युवा लाइन में, लेकिन पेपर लीक। नेपाल में युवा सड़कों पर उतरे, लेकिन भारत में? युवा डरे हुए हैं, क्योंकि ED का डर। व्यंग्य: “स्टार्टअप इंडिया” का नारा, लेकिन स्टार्टअप के लिए कैपिटल कहां? अमीरों के पास।


महंगाई: जनता की जेब में आग, लेकिन गोदी मीडिया में ठंडक
महंगाई का आलम देखिए। पेट्रोल 100 रुपये लीटर, डीजल 90+, टमाटर 80 रुपये किलो। गृहिणी बाजार जाती है, सोचती है, “आज क्या बनाऊं?” लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “महंगाई वैश्विक है!” वैश्विक? तो फिर जब तेल के दाम कम होते हैं, तो “मोदी जी की कूटनीति” क्यों? व्यंग्य: दाम बढ़े, तो “रूस-यूक्रेन युद्ध”, दाम कम हुए, तो “मोदी जी की जीत”।


उदाहरण: 2022 में खाद्य तेल की कीमतें दोगुनी। सरकार ने कहा, “वैश्विक संकट!” लेकिन जब जनता ने पूछा, “तो सब्सिडी क्यों नहीं?” जवाब? चुप्पी। गोदी मीडिया ने कहा, “GDP ग्रोथ!” ग्रोथ? हां, महंगाई की ग्रोथ।


भ्रष्टाचार: इलेक्टोरल बॉन्ड से “ट्रांसपेरेंसी”?
भ्रष्टाचार पर बात करें। इलेक्टोरल बॉन्ड – सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक कहा, लेकिन गोदी मीडिया ने इसे “ट्रांसपेरेंसी” बताया। व्यंग्य: ट्रांसपेरेंसी ऐसी कि डोनर्स के नाम छुपे। उदाहरण: हजारों करोड़ आए, लेकिन किसके? कोई हिसाब नहीं। पीएम केयर्स फंड – कोविड में करोड़ों आए, लेकिन खर्च कहां? “राष्ट्रीय सुरक्षा!” नेपाल में भ्रष्टाचार से जनता भड़की, लेकिन भारत में? जनता चुप, क्योंकि गोदी मीडिया कहता है, “मोदी जी भ्रष्टाचार मुक्त!” मुक्त? हां, विपक्ष के लिए।


जनता का दर्द
जनता की हालत? आधार-पैन लिंक का झंझट, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए लाइन, और टैक्स का बोझ। व्यंग्य: सरकार कहती है, “विकसित भारत”, लेकिन जनता “विकास” के नाम पर टैक्स दे रही है। उदाहरण— एक मिडिल क्लास कर्मचारी। सैलरी का आधा टैक्स में, लेकिन रिटर्न? खराब सड़कें, टूटी नालियां। नेपाल में जनता भड़की, भारत में जनता चुप। लेकिन कितने दिन?

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

पर्यावरण की बात करें तो भाजपा सरकार का रिकॉर्ड ऐसा है कि लगता है, “क्लाइमेट चेंज” नहीं, “वोट चेंज” की रणनीति है। गंगा साफ करने का वादा, कोयला माइनिंग को बढ़ावा, और “ग्रीन इंडिया” का नारा – सब कुछ एक साथ।

लेकिन व्यंग्य देखिए: गंगा अभी भी गंदी, जंगल कट रहे हैं, और प्रदूषण? वो तो दिल्ली की हवा में साफ दिखता है। नेपाल में जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर, लेकिन भारत में पर्यावरण के नाम पर सिर्फ फोटोशूट। इस अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे पर्यावरण के नाम पर प्रचार होता है, लेकिन हकीकत में जनता सांस लेने को तरस रही है।


गंगा साफ करने का वादा: सपना या मजाक?
2014 में मोदी जी ने कहा, “मां गंगा ने मुझे बुलाया है!” वाह, क्या डायलॉग! नमामि गंगे प्रोजेक्ट शुरू हुआ, करोड़ों रुपये खर्च। लेकिन 2025 में गंगा की हालत? अभी भी गंदी। उदाहरण: वाराणसी में गंगा के किनारे कचरे के ढेर। सीवेज सीधे गंगा में। लेकिन गोदी मीडिया और “मन की बात” में? “गंगा साफ हो रही है!” साफ? हां, फोटोशूट में। व्यंग्य: गंगा में स्नान से पाप धुलते हैं, लेकिन गंदगी नहीं।


उदाहरण: 2019 में नमामि गंगे के तहत 30,000 करोड़ खर्च। लेकिन CPCB की रिपोर्ट? गंगा के 70% हिस्से में पानी पीने लायक नहीं। सरकार ने कहा, “हम कोशिश कर रहे हैं!” कोशिश? हां, प्रचार की कोशिश।


कोयला माइनिंग: “ग्रीन इंडिया” का काला सच
पर्यावरण की बात करें, तो कोयला माइनिंग। सरकार कहती है, “ऊर्जा सुरक्षा!” लेकिन जंगल कट रहे हैं, आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। उदाहरण: छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य। हजारों पेड़ कटे, लेकिन गोदी मीडिया? चुप। व्यंग्य: “ग्रीन इंडिया” का मतलब कोयले का काला धुआं।


प्रदूषण: दिल्ली की हवा, जनता का दम
दिल्ली की हवा दुनिया में सबसे खराब। AQI 300-400। लेकिन सरकार? “हम क्लाइमेट चेंज से लड़ रहे हैं!” व्यंग्य: लड़ाई सिर्फ कॉन्फ्रेंस में। उदाहरण: 2023 में दिल्ली में स्मॉग। स्कूल बंद, लेकिन सरकार ने कहा, “पटाखे बंद करो!” पटाखे? हां, लेकिन फैक्ट्रियां और गाड़ियां? वो तो “विकास” हैं।


नेपाल से तुलना
नेपाल में जनता भ्रष्टाचार और दमन से भड़की। भारत में? पर्यावरण के नाम पर प्रचार। उदाहरण: गंगा साफ करने का वादा, लेकिन हकीकत में कचरा। जनता सांस लेने को तरस रही है, लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “भारत विश्व में क्लाइमेट लीडर!” लीडर? हां, प्रदूषण में।


जनता की हालत
पर्यावरण के नाम पर टैक्स। उदाहरण: स्वच्छ भारत सेस। लेकिन स्वच्छता कहां? नालियों में कचरा। व्यंग्य: “स्वच्छ भारत” का मतलब फोटोशूट, बड़े बड़े नेता लोग हाथों में झाड़ू ले फोटो खिंचवाने शोषण मीडिया और गोदी मीडिया से झमाझम खबरों को प्रकाशित कराते हैं, “यही है स्वच्छ भारत अभियान” धरातल पर जनता की सांसें घुट रही हैं।

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

शिक्षा और स्वास्थ्य – ये दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें हर सरकार “प्राथमिकता” बताती है, लेकिन हकीकत में ये जनता के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन जाते हैं। भाजपा सरकार ने “नई शिक्षा नीति” (NEP 2020) और “आयुष्मान भारत” जैसे बड़े-बड़े वादे किए। सुनने में तो लगता है कि भारत अब हार्वर्ड और एम्स का कॉम्बो बन जाएगा, लेकिन धरातल पर? स्कूल बंद, शिक्षक भर्ती नहीं, शिक्षक विहीन विद्यालय या शिक्षक गायब, और अस्पतालों में बेड की जगह फर्श।

सरकार कहती है, “हम विश्व गुरु बन रहे हैं!” लेकिन जनता स्कूल में बिना छत के पढ़ रही है और अस्पताल में ऑक्सीजन के लिए तरस रही है। नेपाल में जनता भ्रष्टाचार और दमन से सड़कों पर उतरी, बांग्लादेश में सरकार गिर गई, लेकिन भारत में? जनता आधार-पैन लिंक और टैक्स के बोझ तले दबी है, और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर सिर्फ नारे सुन रही है। इस अध्याय में हम बताएँगे कि कैसे सरकार के “विश्वस्तरीय” वादे जनता के लिए “विश्वस्तरीय” परेशानी बन गए हैं। चटपटा व्यंग्य और उदाहरणों के साथ, चलिए जनता के इस दर्द को खोलते हैं।


नई शिक्षा नीति – सपना या सिर्फ कागजी क्रांति?
नई शिक्षा नीति 2020 – वाह, क्या नाम है! जब इसे लॉन्च किया गया, तो गोदी मीडिया ने इसे “शिक्षा का क्रांतिकारी कदम” बताया। कहा गया कि अब बच्चे रट्टा मारने की जगह “क्रिएटिव” बनेंगे, स्कूल “वर्ल्ड क्लास” होंगे, और भारत शिक्षा का हब बनेगा। लेकिन 2025 में हकीकत क्या है? सरकारी स्कूलों में छत टपक रही है, शिक्षकों की कमी है, और डिजिटल शिक्षा? वो तो गांवों में इंटरनेट की कमी के कारण सिर्फ नारा बनकर रह गया।


व्यंग्य देखिए: सरकार कहती है, “डिजिटल शिक्षा!” लेकिन गांव में बच्चे मोबाइल सिग्नल के लिए पेड़ पर चढ़ते हैं।


उदाहरण: बिहार के एक सरकारी स्कूल में 2023 में बच्चों को बारिश में भीगते हुए पढ़ते देखा गया, क्योंकि छत नहीं थी। गोदी मीडिया ने क्या कहा? “NEP से शिक्षा में क्रांति!” क्रांति? हां, बच्चों को बारिश में पढ़ने की क्रांति। और शहरों में? प्राइवेट स्कूलों की फीस इतनी कि मिडिल क्लास की जेब खाली। NEP में “5+3+3+4” का फॉर्मूला सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन लागू कैसे? स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं ही नहीं। सरकार कहती है, “हम 21वीं सदी के लिए तैयार हैं!” लेकिन बच्चों के पास किताबें तक नहीं।


व्यंग्य: 21वीं सदी का भारत, जहां बच्चे 19वीं सदी की हालत में पढ़ रहे हैं। और गोदी मीडिया? वो तो बस “मोदी जी की दूरदर्शिता” की तारीफ में व्यस्त है। नेपाल में जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर थी, लेकिन भारत में? बच्चे स्कूल के बाहर बैठे हैं, क्योंकि सरकार को फोटोशूट से फुर्सत नहीं।


बेरोजगारी और शिक्षा – डिग्री बांटो, नौकरी भूल जाओ
NEP में कहा गया कि शिक्षा अब “रोजगारोन्मुखी” होगी। सुनने में तो अच्छा लगा, लेकिन हकीकत? 45% युवा बेरोजगार। आईआईटी-आईआईएम पास युवा चाय-पकौड़े बेच रहे हैं।

व्यंग्य: सरकार कहती है, “स्किल इंडिया!” लेकिन स्किल सिर्फ पकौड़े तलने की।


उदाहरण: 2024 में SSC और रेलवे भर्ती के पेपर लीक हुए। लाखों युवा फॉर्म भरते हैं, सालों इंतजार करते हैं, लेकिन नतीजा? “परीक्षा रद्द, अगले साल फिर कोशिश करें!” और गोदी मीडिया? “मोदी जी ने 6 करोड़ नौकरियां दीं!” कहां? शायद उनके स्टूडियो में। एक और उदाहरण: यूपी में शिक्षक भर्ती। 69,000 पदों के लिए लाखों आवेदन, लेकिन भर्ती अटकी। क्यों? “कानूनी पेचीदगियां”।


व्यंग्य: कानूनी पेचीदगियां सिर्फ भर्ती में, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड में कोई पेचीदगी नहीं। NEP में “वोकेशनल ट्रेनिंग” की बात, लेकिन ट्रेनिंग सेंटर कहां? सरकार कहती है, “युवा शक्ति!” लेकिन युवा शक्ति लाठी खाने में व्यस्त है। नेपाल में युवा सड़कों पर उतरे, लेकिन भारत में? युवा डरे हुए हैं, क्योंकि ED और पुलिस का डर। और शिक्षा का बजट? GDP का 6% देने का वादा था, लेकिन 2025 में भी 3% से कम।


व्यंग्य: शिक्षा में निवेश नहीं, लेकिन गोदी मीडिया के विज्ञापनों में करोड़ों। जनता की डिग्री बेकार, लेकिन सरकार का प्रचार चमकदार।


आयुष्मान भारत – स्वास्थ्य का सपना, लेकिन बेड का अकाल
अब स्वास्थ्य की बात। आयुष्मान भारत – 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज। सुनने में तो लगता है, भारत में अब कोई बीमार नहीं मरेगा। लेकिन हकीकत? कोविड में लोग ऑक्सीजन के लिए तरस गए, अस्पतालों में बेड नहीं, और दवाइयां? वो तो ब्लैक मार्केट में।

अस्पतालों से दवाइयां गायब बिकती है प्रधानमंत्री जन औषधालय पर धीरे-धीरे मार्केट से आम मेडिकल स्टोर को बन्द करने की कोशिश चलेगा प्रधानमंत्री का मेडिकल स्टोर जैसे 350 मे मिल रही रसोई गैस मे सब्सिडी दे गैस का कालाबाजारी बंद हुआ जहां 50 रुपये अधिक दामों पर आसानी से घर बैठे रसोई गैस उपलब्ध हो जाती थी अब हजार रुपये देकर लाना पड़ता है। जनता पूछ रही है क्या बंद हुआ न कालाबाजारी और मिल रहा है सस्ते दरो पर रसोई गैस?


व्यंग्य: आयुष्मान भारत का कार्ड तो मिला, लेकिन अस्पताल में बेड नहीं। उदाहरण— 2021 में दूसरी कोविड लहर। दिल्ली के अस्पतालों में लोग सड़कों पर मर रहे थे, लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “मोदी जी ने कोविड को हराया!” हराया? हां, आंकड़ों को छुपाकर। एक और उदाहरण— 2023 में एक गरीब परिवार आयुष्मान कार्ड लेकर अस्पताल गया, लेकिन अस्पताल ने कहा, “यहां कार्ड नहीं चलता!” क्यों? क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों को सरकार से पेमेंट समय पर नहीं मिलता।


व्यंग्य: आयुष्मान भारत का मतलब “आयुष्मान सिर्फ कागज पर”। और सरकारी अस्पताल? वहां डॉक्टर नहीं, मशीनें खराब, और मरीज फर्श पर। सरकार कहती है, “हमने स्वास्थ्य में क्रांति की!” क्रांति? हां, मरीजों को फर्श पर लेटने की क्रांति। नेपाल में जनता दमन के खिलाफ सड़कों पर थी, लेकिन भारत में? जनता अस्पताल के बाहर कतार में।


कोविड का कुप्रबंधन – तालियां और थालियां, लेकिन ऑक्सीजन नहीं
कोविड का जिक्र जरूरी है। जब दुनिया कोविड से जूझ रही थी, भारत में क्या हुआ? मोदी जी ने कहा, “थाली बजाओ, ताली बजाओ!” जनता ने बजाया, लेकिन ऑक्सीजन? वो तो गायब।


उदाहरण: दिल्ली में लोग अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए रो रहे थे। उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह जनपद गोरखपुर का भी हाल बेहाल था, सोशल मीडिया पर SOS कॉल्स, लेकिन सरकार? “हमने सब संभाल लिया!” संभाला? हां, गोदी मीडिया ने आंकड़े संभाल लिए। मृत्यु के आंकड़े छुपाए गए, लेकिन “मन की बात” में? “भारत ने कोविड को हराया!”


व्यंग्य: कोविड को हराया, लेकिन जनता हार गई। और आयुष्मान भारत? उसका कार्ड तो था, लेकिन ऑक्सीजन और बेड नहीं। एक और उदाहरण: गंगा में तैरती लाशें। गोदी मीडिया ने कहा, “यह तो पुरानी परंपरा!” परंपरा? हां, मरने की परंपरा। सरकार ने वैक्सीन का ढोल पीटा, लेकिन वैक्सीन सेंटरों पर लाइनें। “कोविन” ऐप तो बनाया, लेकिन कोविन का मतलब “कोई विन नहीं”। जनता की हालत खराब, लेकिन सरकार का प्रचार शानदार।


नेपाल और बांग्लादेश से तुलना 
नेपाल में जनता भ्रष्टाचार और दमन से तंग आकर सड़कों पर उतरी। बांग्लादेश में छात्रों ने सरकार गिरा दी। लेकिन भारत में? शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर सिर्फ नारे। धर्म पर टिकी भाजपा सरकार, स्कूलों में सुविधाएं नहीं, अस्पतालों में बेड नहीं। जनता की हालत खराब, लेकिन गोदी मीडिया कहता है, “मोदी जी ने क्रांति की!” क्रांति? हां, जनता को परेशान करने की क्रांति।


उदाहरण: NEP में डिजिटल शिक्षा की बात, लेकिन गांवों में इंटरनेट नहीं। आयुष्मान भारत में 5 लाख का इलाज, लेकिन अस्पताल में दवा नहीं। नेपाल में युवा भड़के, लेकिन भारत में? जनता चुप, क्योंकि गोदी मीडिया और ED का डर। लेकिन यह चुप्पी कब तक?

भाजपा सरकार की झमाझम योजना: 1 Wonderful व्यंग्यात्मक महाकाव्य – "मोदी जी की माया, जनता की काया"

अब आते हैं इस व्यंग्यात्मक महाकाव्य के अंतिम अध्याय पर। नेपाल में 36 घंटों में सरकार उखड़ गई। बांग्लादेश में छात्रों ने सड़कों पर उतरकर इतिहास रच दिया। इंडोनेशिया में भ्रष्टाचार और टैक्स के खिलाफ प्रदर्शन। लेकिन भारत में? जनता बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, और आधार-पैन लिंक के झंझट से त्रस्त है, लेकिन चुप है। क्यों? क्योंकि गोदी मीडिया और “मन की बात” ने जनता को सपनों की लोरी सुना रखी है।

लेकिन यह चुप्पी कितने दिन? क्या भारत में भी नेपाल जैसा विद्रोह होगा? या गोदी मीडिया और ED-CBI की जोड़ी सरकार को बचा लेगी? इस अंतिम अध्याय में हम देखेंगे कि जनता का गुस्सा कहां तक पहुंचा है, और क्यों भारत में अभी तक सड़कों पर आग नहीं लगी। थोड़ी सी लगाई अग्नि वीरों ने लगाई जिसे सरकारी तंत्र ने कंट्रोल कर लिया। व्यंग्य और हकीकत का मिश्रण, इस अंतिम अध्याय में।


जनता का गुस्सा – उबल रहा है, लेकिन अभी चुप
नेपाल में जनता ने सोशल मीडिया बैन के खिलाफ सड़कों पर उतरकर सरकार को उखाड़ फेंका। बांग्लादेश में छात्रों ने भ्रष्टाचार और नौकरी की कमी के खिलाफ विद्रोह किया। लेकिन भारत में? जनता का गुस्सा तो है, लेकिन अभी अंदर ही अंदर पक रहा है। बेरोजगारी 45%, पेट्रोल 100 रुपये लीटर, टमाटर 80 रुपये किलो। आधार-पैन लिंक न होने पर बैंक अकाउंट फ्रीज। जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए लाइनें। लेकिन जनता चुप क्यों? क्योंकि गोदी मीडिया कहता है, “सब चंगा सी!”


व्यंग्य: जनता का गुस्सा उबल रहा है, लेकिन गोदी मीडिया ने उसे “सकारात्मकता” की चाशनी में डुबो दिया।


उदाहरण: 2023 में किसान आंदोलन। दिल्ली की सीमाएं बंद, 700 से ज्यादा किसान शहीद। लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “यह खालिस्तानी हैं!” जनता ने देखा, समझा, लेकिन सड़कों पर नहीं उतरी। क्यों? क्योंकि ED, CBI, और पुलिस का डर। नेपाल में युवा भड़के, लेकिन भारत में? युवा ट्वीट करने से भी डरते हैं, क्योंकि ट्रोल आर्मी और IT सेल तैयार। लेकिन यह चुप्पी कब तक? हर उबलते हुए बर्तन का ढक्कन एक दिन उड़ता है।


गोदी मीडिया और प्रचार – जनता को चुप रखने का जादू 
गोदी मीडिया इस चुप्पी का सबसे बड़ा कारण है। हर शाम टीवी पर एंकर चिल्लाते हैं, “मोदी जी ने चमत्कार किया!” महंगाई? “वैश्विक!” बेरोजगारी? “पकौड़े बेचो!” भ्रष्टाचार? “विपक्ष की साजिश!”


व्यंग्य: गोदी मीडिया जनता की आवाज नहीं, सरकार का भोंपू है। उदाहरण— इलेक्टोरल बॉन्ड। सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक कहा, लेकिन गोदी मीडिया ने कहा, “यह तो ट्रांसपेरेंसी!” ट्रांसपेरेंसी? हां, डोनर्स के नाम छुपाने की ट्रांसपेरेंसी। और पीएम केयर्स फंड? हजारों करोड़ आए, लेकिन खर्च कहां? “राष्ट्रीय सुरक्षा!” जनता सवाल पूछती है, लेकिन गोदी मीडिया जवाब देता है, “मोदी जी विश्व नेता!” विश्व नेता? हां, गोदी मीडिया के स्टूडियो में। नेपाल में सोशल मीडिया ने सरकार को उखाड़ा, लेकिन भारत में? सोशल मीडिया पर IT रूल्स और ट्रोल आर्मी।


व्यंग्य: जनता की आवाज दबाने के लिए गोदी मीडिया और IT सेल का “डिजिटल इंडिया”। लेकिन जनता का गुस्सा ज्यादा समय तक दब नहीं सकता।


ED-CBI और डर का माहौल
भाजपा की दूसरी रणनीति – ED और CBI। विपक्षी नेता बोलता है, अगले दिन ED का नोटिस। उदाहरण— अरविंद केजरीवाल। शराब नीति केस में जेल, लेकिन कोर्ट ने बेल दी। गोदी मीडिया ने क्या कहा? “भ्रष्टाचारी!” लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड में हजारों करोड़? वो तो “राष्ट्रीय हित”।


व्यंग्य: ED-CBI विपक्ष के लिए “एक्सप्रेस डिलीवरी”, लेकिन BJP के लिए “क्लीन चिट एक्सप्रेस”। जनता देख रही है, समझ रही है, लेकिन डर है। उदाहरण— एक युवा ट्वीट करता है, “बेरोजगारी हटाओ!” अगले दिन ट्रोल आर्मी से गालियां। नेपाल में युवा सड़कों पर थे, लेकिन भारत में? डर का माहौल। लेकिन यह डर कब तक? नेपाल ने दिखाया, जब गुस्सा भड़कता है, तो कोई डर काम नहीं आता।


नेपाल, बांग्लादेश, और भारत – क्या अंतर? 
नेपाल में सोशल मीडिया बैन से विद्रोह हुआ। बांग्लादेश में छात्रों ने सरकार गिरा दी। लेकिन भारत में? जनता चुप। क्यों? क्योंकि गोदी मीडिया, ED-CBI, और “मन की बात” ने जनता को लोरी सुना रखी है। लेकिन अंतर क्या है? नेपाल और बांग्लादेश में जनता का गुस्सा सड़कों पर उतरा, लेकिन भारत में अभी अंदर ही अंदर पक रहा है।

उदाहरण— 2020 में CAA-NRC विरोध। लाखों लोग सड़कों पर, लेकिन पुलिस और गोदी मीडिया ने इसे “देशद्रोह” करार दिया। नेपाल में सरकार गई, लेकिन भारत में? सरकार मजबूत, क्योंकि गोदी मीडिया और IT सेल मजबूत।

व्यंग्य: यह मजबूती कागजी है। जनता का गुस्सा पक रहा है – बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार। और जब यह भड़केगा, तो गोदी मीडिया का भोंपू भी चुप हो जाएगा।


5: अमृतकाल या जहरकाल?
सरकार कहती है, “अमृतकाल!” लेकिन जनता के लिए यह जहरकाल है। आधार-पैन लिंक, टैक्स, महंगाई, बेरोजगारी – जनता त्रस्त है।

Pornography and India

व्यंग्य: अमृतकाल में जनता जहर पी रही है। उदाहरण— एक मिडिल क्लास परिवार। सैलरी का आधा टैक्स में, बाकी महंगाई में। बच्चे की फीस, मां का इलाज – सब मुश्किल। लेकिन गोदी मीडिया? “भारत विश्व गुरु!” विश्व गुरु? हां, गरीबी और बेरोजगारी में। नेपाल और बांग्लादेश से सीखो— जनता का गुस्सा जब भड़कता है, तो कोई नारा काम नहीं आता। भारत में भी वह दिन दूर नहीं, जब जनता सड़कों पर उतरेगी। गोदी मीडिया और ED बचा पाएंगे? शायद नहीं।

Political change in India

इस लेख में सहयोग amitsrivastav.in टीम से अभिषेक कांत पांडेय शिक्षक एवं लेखक।

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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