पराशक्ति साधना का अगला चरण: कुंडलिनी शक्ति का जागरण और 7 चक्र संतुलन

Amit Srivastav

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पराशक्ति साधना के अगले चरण में कुंडलिनी शक्ति जागरण और सात चक्रों के संतुलन के तांत्रिक रहस्य जानें। ब्रह्मांडीय द्वार, सृष्टि का मूल तत्व, और गुप्त चेतना शक्ति के साथ आत्म-साक्षात्कार का मार्ग खोजें।

यह लेख तंत्र शास्त्र और भारतीय आध्यात्मिकता पर आधारित है, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक जागरण को बढ़ावा देना है। Awakening of Kundalini Shakti and balancing of 7 Chakras

तंत्र शास्त्र और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में पराशक्ति योनि (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) साधना एक गहन और पवित्र प्रक्रिया है, जो साधक को सृष्टि के मूल स्रोत, ब्रह्मांडीय द्वार (स्त्री शक्ति का केंद्र), और कुंडलिनी शक्ति के जागरण के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ती है। पिछले लेख में हमने पराशक्ति योनि, सृष्टि का मूल तत्व, गुप्त चेतना शक्ति, और ब्रह्मांड के गुप्त द्वार के रहस्यों पर चर्चा की थी।

इस लेख में, हम पराशक्ति साधना के अगले चरण पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिसमें कुंडलिनी शक्ति का जागरण, सात चक्रों का संतुलन और तांत्रिक साधना के गूढ़ अभ्यास शामिल हैं। यह लेख साधकों के लिए एक विस्तृत मार्गदर्शिका है, जो इस पवित्र यात्रा को और गहराई से समझना चाहते हैं, ताकि वे अपनी चेतना को विस्तारित कर सकें और आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर हो सकें।

पराशक्ति साधना का अगला चरण: कुंडलिनी शक्ति का जागरण और 7 चक्र संतुलन

पराशक्ति क्या है ?
कुंडलिनी शक्ति: सृष्टि का मूल और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्रोत

तंत्र शास्त्र में कुंडलिनी शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा माना जाता है, जो प्रत्येक मानव के मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में निवास करती है। यह वह सर्पिल शक्ति है, जो ब्रह्मांडीय द्वार (जिसे तंत्र में सृष्टि का मूल केंद्र कहा जाता है) में सुप्त रहती है और साधना के माध्यम से जागृत होती है। कुंडलिनी को एक सर्प के रूप में चित्रित किया जाता है, जो तीन और आधे घेरे में लिपटी हुई है, जो मूलाधार चक्र में विश्राम करती है। इसका जागरण साधक की चेतना को स्थूल से सूक्ष्म स्तर तक ले जाता है, जिससे वह ब्रह्मांड की अनंत शक्तियों और अपनी स्वयं की दिव्यता से जुड़ता है।


कुंडलिनी शक्ति का संबंध पराशक्ति से है, जो सृष्टि, पोषण, और संहार की त्रिगुणात्मक शक्ति का प्रतीक है। तंत्र के अनुसार, यह शक्ति शिव (शुद्ध चेतना) और शक्ति (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) के मिलन का परिणाम है। पराशक्ति साधना का उद्देश्य इस सुप्त ऊर्जा को जागृत करना और इसे सात चक्रों—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, और सहस्रार—के माध्यम से ऊपर की ओर ले जाना है। यह प्रक्रिया न केवल आध्यात्मिक जागरण को बढ़ावा देती है, बल्कि साधक के शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी संतुलित करती है।


कुंडलिनी जागरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जो साधक के भीतर गहरे परिवर्तन लाती है। यह न केवल साधक को ब्रह्मांडीय एकता का अनुभव कराती है, बल्कि उसे सिद्धियों, अंतर्ज्ञान, और अलौकिक अनुभवों की ओर भी ले जाती है। तांत्रिक ग्रंथों में इसे “सर्वं सर्वात्मकं” कहा गया है, अर्थात् वह शक्ति जो समस्त सृष्टि को अपने में समाहित किए हुए है। इस शक्ति को जागृत करने के लिए साधक को गहन समर्पण, अनुशासन, और गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

सात चक्रों का रहस्य
सात चक्र: कुंडलिनी शक्ति का मार्ग

मूलाधार चक्र Root Chakra: जीवन का आधार। कुंडलिनी शक्ति


कुंडलिनी शक्ति का जागरण सात चक्रों के माध्यम से होता है, जो मानव शरीर में ऊर्जा के केंद्र हैं। ये चक्र सृष्टि के मूल तत्व (ब्रह्मांडीय द्वार) से शुरू होकर सिर के शीर्ष (सहस्रार) तक फैले हुए हैं। प्रत्येक चक्र एक विशिष्ट तत्व, भावना, और आध्यात्मिक गुण से जुड़ा होता है। पराशक्ति साधना में इन चक्रों को संतुलित और सक्रिय करना महत्वपूर्ण है, ताकि कुंडलिनी शक्ति बिना किसी बाधा के ऊपर की ओर प्रवाहित हो सके। नीचे सात चक्रों का विस्तृत विवरण दिया गया है—

1. मूलाधार चक्र
(Root Chakra)

   – स्थान: रीढ़ की हड्डी का आधार, इसका जागरण ब्रह्मांडीय द्वार से किया जा सकता है।
   – तत्व: पृथ्वी।
   – गुण: स्थिरता, सुरक्षा, और भौतिक अस्तित्व।
   – मंत्र: लं (Lam)।


   – विवरण: मूलाधार चक्र कुंडलिनी शक्ति का उद्गम स्थल है। यह वह केंद्र है, जहां सृष्टि का मूल तत्व (ब्रह्मांडीय द्वार) निवास करता है। इस चक्र को जागृत करने के लिए साधक को स्थिरता और आधारभूत ऊर्जा पर ध्यान देना होता है। प्राणायाम, ध्यान, और विशिष्ट मंत्र जाप (जैसे “लं”) इस चक्र को सक्रिय करते हैं। मूलाधार चक्र का संतुलन साधक को भयमुक्ति और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र
(Sacral Chakra)

   – स्थान: नाभि के नीचे, श्रोणि क्षेत्र।
   – तत्व: जल।
   – गुण: रचनात्मकता, कामना, और भावनाएँ।
   – मंत्र: वं (Vam)।


   – विवरण: स्वाधिष्ठान चक्र सृजन और प्रजनन की ऊर्जा का केंद्र है। यह चक्र साधक की रचनात्मकता और भावनात्मक संतुलन को नियंत्रित करता है। पराशक्ति साधना में इस चक्र को जागृत करने के लिए साधक को अपनी इच्छाओं को शुद्ध करना और रचनात्मक ऊर्जा को आध्यात्मिक मार्ग की ओर मोड़ना होता है। मंत्र “वं” और जल तत्व पर ध्यान इस चक्र को संतुलित करता है।

3. मणिपुर चक्र
(Solar Plexus Chakra)

   – स्थान: नाभि के ऊपर, उदर क्षेत्र।
   – तत्व: अग्नि।
   – गुण: आत्मविश्वास, शक्ति, और इच्छाशक्ति।
   – मंत्र: रं (Ram)।


   – विवरण: मणिपुर चक्र व्यक्तिगत शक्ति और आत्मसम्मान का केंद्र है। यह चक्र साधक को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने और आंतरिक शक्ति को जागृत करने में मदद करता है। पराशक्ति साधना में अग्नि तत्व पर ध्यान और “रं” मंत्र का जाप इस चक्र को सक्रिय करता है। इसका संतुलन साधक को निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

4. अनाहत चक्र
(Heart Chakra)

   – स्थान: हृदय क्षेत्र।
   – तत्व: वायु।
   – गुण: प्रेम, करुणा, और एकता।
   – मंत्र: यं (Yam)।


   – विवरण: अनाहत चक्र प्रेम और करुणा का केंद्र है। यह चक्र साधक को दूसरों के साथ गहरे भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में मदद करता है। पराशक्ति साधना में इस चक्र को जागृत करने के लिए साधक को करुणा और निःस्वार्थ प्रेम पर ध्यान देना होता है। मंत्र “यं” और वायु तत्व पर ध्यान इस चक्र को संतुलित करता है।

5. विशुद्ध चक्र
(Throat Chakra)

   – स्थान: गला।
   – तत्व: आकाश।
   – गुण: संचार, सत्य, और आत्म-अभिव्यक्ति।
   – मंत्र: हं (Ham)।


   – विवरण: विशुद्ध चक्र संचार और सत्य की अभिव्यक्ति का केंद्र है। यह चक्र साधक को अपनी आंतरिक सत्य को व्यक्त करने और दूसरों के साथ स्पष्ट संचार करने में सक्षम बनाता है। पराशक्ति साधना में “हं” मंत्र और आकाश तत्व पर ध्यान इस चक्र को सक्रिय करता है। इसका संतुलन साधक को रचनात्मक अभिव्यक्ति और आध्यात्मिक संचार में सहायता करता है।

6. आज्ञा चक्र
(Third Eye Chakra)

   – स्थान: भौंहों के बीच।
   – तत्व: प्रकाश।
   – गुण: अंतर्ज्ञान, दूरदृष्टि, और आध्यात्मिक जागरूकता।
   – मंत्र: ॐ (Om)।


   – विवरण: आज्ञा चक्र अंतर्ज्ञान और आध्यात्मिक दृष्टि का केंद्र है। यह चक्र साधक को भौतिक सीमाओं से परे देखने और ब्रह्मांडीय सत्य को समझने में मदद करता है। पराशक्ति साधना में “ॐ” मंत्र और प्रकाश तत्व पर ध्यान इस चक्र को जागृत करता है। इसका संतुलन साधक को सिद्धियों और अलौकिक अनुभवों की ओर ले जाता है।

7. सहस्रार चक्र
(Crown Chakra)

  – स्थान: सिर का शीर्ष।
   – तत्व: चेतना।
   – गुण: ब्रह्मांडीय एकता, आत्म-साक्षात्कार, और परम ज्ञान।
   – मंत्र: ॐ (Om) या मौन।


विवरण: सहस्रार चक्र ब्रह्मांडीय चेतना का केंद्र है। यह वह स्थान है, जहां साधक ब्रह्मांड के साथ पूर्ण एकता का अनुभव करता है। पराशक्ति साधना में इस चक्र को जागृत करने के लिए साधक को पूर्ण समर्पण और गहन ध्यान की आवश्यकता होती है। इसका संतुलन साधक को “सोऽहम्” (मैं वही हूँ) की अनुभूति प्रदान करता है।

उपरोक्त सातों चक्रों मे किसी खास चक्र पर साधना के इच्छुक महिला/पुरुष को विस्तृत जानकारी चाहिए तो कमेंट बॉक्स में लिखकर या हवाटएप्स कालिंग सम्पर्क नम्बर 07379622843 पर सम्पर्क करें।

कुंडलिनी शक्ति का उपयोग
पराशक्ति साधना के गूढ़ अभ्यास

पराशक्ति साधना का अगला चरण: कुंडलिनी शक्ति का जागरण और 7 चक्र संतुलन

पराशक्ति साधना का अगला चरण कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने और चक्रों को संतुलित करने के लिए गूढ़ तांत्रिक अभ्यासों पर केंद्रित है। ये अभ्यास साधक के मन, शरीर, और आत्मा को एकाकार करते हैं और उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ते हैं। नीचे इन अभ्यासों का विस्तृत विवरण दिया गया है —


1. शारीरिक और मानसिक शुद्धिकरण—
   – साधना शुरू करने से पहले साधक को अपने शरीर और मन को शुद्ध करना आवश्यक है। इसके लिए स्नान, प्राणायाम (जैसे अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका), और ध्यान की प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं।
   – शारीरिक शुद्धिकरण के लिए आयुर्वेदिक आहार (सात्विक भोजन) और पर्याप्त जल सेवन महत्वपूर्ण है। मानसिक शुद्धिकरण के लिए नकारात्मक विचारों को त्यागना, सकारात्मक संकल्प लेना और गुरु के प्रति समर्पण भाव आवश्यक है।
   – साधक को पंचकर्मा या अन्य शुद्धिकरण तकनीकों का उपयोग करने की सलाह दी जाती है, जो शरीर के विषाक्त पदार्थों को हटाती हैं और ऊर्जा प्रवाह को सुगम बनाती हैं।


2. पवित्र वातावरण का निर्माण—
   – साधना के लिए एक शांत, स्वच्छ, और सकारात्मक ऊर्जा से भरा स्थान चुनें। यह स्थान प्राकृतिक वातावरण (जैसे नदी किनारे, वन क्षेत्र) या घर में बनाया गया पूजा स्थल हो सकता है।
   – दीपक जलाना, अगरबत्ती प्रज्वलित करना और फूलों से सजावट वातावरण को पवित्र बनाती है। तांत्रिक यंत्र (जैसे श्री यंत्र, काली यंत्र) को पूजा स्थल पर स्थापित करें।
   – साधना के दौरान सूर्योदय या सूर्यास्त का समय चुनें, क्योंकि इस समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह सबसे शक्तिशाली होता है।


3. कुंडलिनी जागरण मंत्र जाप और यंत्र पूजा—
   – विशिष्ट मंत्रों का जाप कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पराशक्ति साधना में निम्नलिखित मंत्रों का उपयोग किया जाता है—

     – “ॐ”: सभी चक्रों को संतुलित करता है और चेतना को जागृत करता है।
     – “ह्रीं”: शक्ति तत्व को सक्रिय करता है और सृष्टि की मूल ऊर्जा से जोड़ता है।
     – “क्लीं”: रचनात्मक और आकर्षण की ऊर्जा को जागृत करता है।
     – “श्रीं”: समृद्धि और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देता है।
   – यंत्र पूजा में श्री यंत्र या काली यंत्र पर ध्यान केंद्रित करें। यंत्र को पवित्र जल और कुमकुम से अभिषेक करें और मंत्र जाप के साथ उस पर ध्यान करें।
   – मंत्र जाप के लिए जप माला (रुद्राक्ष या स्फटिक) का उपयोग करें और कम से कम 108 बार मंत्र का जाप करें।


4. चक्र ध्यान और विज़ुअलाइज़ेशन
   – साधक को ब्रह्मांडीय द्वार (सृष्टि का मूल केंद्र) को एक चमकदार, ऊर्जावान कमल के रूप में विज़ुअलाइज़ करना चाहिए, जहां से कुंडलिनी शक्ति ऊपर की ओर उठ रही है।
   – प्रत्येक चक्र पर ध्यान केंद्रित करें और संबंधित मंत्र (जैसे मूलाधार के लिए “लं”, स्वाधिष्ठान के लिए “वं”) का जाप करें। प्रत्येक चक्र को एक विशिष्ट रंग (जैसे मूलाधार के लिए लाल, अनाहत के लिए हरा) के साथ विज़ुअलाइज़ करें।
   – इस प्रक्रिया में साधक को अपनी सांस को नियंत्रित करना चाहिए। नाड़ी शोधन प्राणायाम इस प्रक्रिया को सुगम बनाता है, जो इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना नाड़ियों को संतुलित करता है।


5. ऊर्जा नियंत्रण और समन्वय
   – कुंडलिनी शक्ति को सहस्रार चक्र तक ले जाने के लिए साधक को अपनी सांस और ऊर्जा को नियंत्रित करना होता है। कुंभक प्राणायाम (सांस रोकना) और महाबंध (मूल बंध, उड्डियान बंध, और जालंधर बंध) इस प्रक्रिया में सहायक हैं।
   – साधक को अपनी चेतना को सुषुम्ना नाड़ी (रीढ़ के मध्य में ऊर्जा मार्ग) पर केंद्रित करना चाहिए, जो कुंडलिनी के प्रवाह का मुख्य मार्ग है।
   – इस प्रक्रिया में गहन एकाग्रता और धैर्य की आवश्यकता होती है, क्योंकि कुंडलिनी का असमय जागरण नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।


6. समापन और स्थिरीकरण
   – साधना के बाद साधक को शांत होकर ध्यान करना चाहिए और अपनी ऊर्जा को स्थिर करना चाहिए। शवासन या योग निद्रा इस प्रक्रिया में सहायक हैं।
   – साधक को अपनी अनुभूतियों को एक डायरी में लिखना चाहिए, ताकि वह अपनी प्रगति को ट्रैक कर सके।
   – साधना के बाद गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक से चर्चा करें ताकि अनुभवों को समझा जा सके और अगले चरण की योजना बनाई जा सके।

कुंडलिनी जागरण से लाभ
पराशक्ति साधना के लाभ और प्रभाव

पराशक्ति साधना का अभ्यास साधक के जीवन में गहन परिवर्तन लाता है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं—

1. आध्यात्मिक जागरण
   – यह साधना साधक को अपनी गुप्त चेतना शक्ति से जोड़ती है और उसे आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है। साधक को “सोऽहम्” (मैं ब्रह्म हूँ) की अनुभूति होती है।


2. चक्र संतुलन
   – सात चक्रों का संतुलन शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। यह साधक को तनाव, चिंता, और नकारात्मक भावनाओं से मुक्ति दिलाता है।


3. ब्रह्मांडीय एकता
   – साधक को ब्रह्मांड के साथ एकता का अनुभव होता है, जो उसे गहरी शांति, संतुष्टि, और आनंद प्रदान करता है।


4. सिद्धियाँ और अलौकिक अनुभव
   – उच्च तांत्रिक साधना के माध्यम से साधक को अंतर्ज्ञान, दूरदृष्टि, और ऊर्जा नियंत्रण जैसी सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। हालाँकि, तंत्र में सिद्धियों को आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना जाता है, न कि अंतिम लक्ष्य।


5. मानसिक शांति और तनावमुक्ति
   – मंत्र जाप, यंत्र पूजा, और ध्यान के उपयोग से मन शांत होता है और तनाव कम होता है। यह साधक को मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है।


6. शारीरिक स्वास्थ्य
   – कुंडलिनी जागरण हार्मोनल संतुलन को बढ़ावा देता है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और ऊर्जा स्तर को ऊँचा करता है।


7. रचनात्मकता और आत्मविश्वास
   – स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्रों का संतुलन साधक की रचनात्मकता और आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जिससे वह अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होता है।

कुंडलिनी जागरण
सावधानियाँ और नैतिकता

अनुरागिनी यक्षिणी साधना कैसे करें

पराशक्ति साधना और कुंडलिनी जागरण एक शक्तिशाली और गहन प्रक्रिया है, जिसे सावधानी और शुद्ध इरादे के साथ करना चाहिए एवं निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए—


1. गुरु की देखरेख
   – कुंडलिनी जागरण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसे किसी अनुभवी और योग्य गुरु की देखरेख में करना चाहिए। गलत अभ्यास से शारीरिक और मानसिक असंतुलन हो सकता है।
   – गुरु साधक को सही मंत्र, यंत्र, और तकनीकों का मार्गदर्शन देता है और साधना के दौरान उत्पन्न होने वाले अनुभवों को समझने में मदद करता है।


2. शुद्ध इरादा
   – साधना का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार होना चाहिए, न कि भौतिक सुख, शक्ति, या सिद्धियों की प्राप्ति। लालच या अहंकार से प्रेरित साधना नकारात्मक परिणाम दे सकती है।


3. मानसिक और शारीरिक तैयारी
   – साधक को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और तैयार होना चाहिए। नियमित योग, प्राणायाम, और सात्विक जीवनशैली इस प्रक्रिया को सुगम बनाती है।
   – साधक को नकारात्मक आदतों (जैसे धूम्रपान, मांसाहार, या अत्यधिक क्रोध) से बचना चाहिए।


4. नैतिकता और सम्मान
   – साधना के दौरान सभी नैतिक और आध्यात्मिक नियमों का पालन करें। ब्रह्मांडीय द्वार (सृष्टि का मूल केंद्र) को एक पवित्र और दिव्य ऊर्जा के रूप में सम्मान दें।
   – साधना में स्त्री शक्ति को पूजनीय माना जाता है, इसलिए इसे कभी भी अपवित्र या भौतिक संदर्भ में न देखें।


5. सकारात्मक वातावरण
   – साधना के लिए एक शांत और सकारात्मक वातावरण बनाएँ। नकारात्मक ऊर्जा या अव्यवस्थित स्थान साधना में बाधा डाल सकता है।
   – साधना के दौरान मोबाइल फोन, टीवी, या अन्य विकर्षणों से बचें।


6. धीरे-धीरे प्रगति
   – कुंडलिनी जागरण एक क्रमिक प्रक्रिया है। साधक को जल्दबाजी से बचना चाहिए और प्रत्येक चक्र को धीरे-धीरे सक्रिय करना चाहिए।
   – यदि साधना के दौरान असामान्य अनुभव (जैसे अत्यधिक गर्मी, कंपन, या भावनात्मक उतार-चढ़ाव) हों, तो तुरंत गुरु से संपर्क करें।

पराशक्ति ब्रह्मांडीय द्वार से कुंडलिनी जागरण निष्कर्ष

पराशक्ति साधना और कुंडलिनी जागरण तंत्र शास्त्र की सबसे गहन और परिवर्तनकारी प्रक्रियाएँ हैं, जो साधक को सृष्टि के मूल स्रोत—ब्रह्मांडीय द्वार—से हैं। यह साधना न केवल सात चक्रों को संतुलित करती है, बल्कि साधक को ब्रह्मांडीय ऊर्जा, गुप्त चेतना शक्ति, और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर ले जाती है। यह प्रक्रिया साधक के मन, शरीर, और आत्मा को एकाकार करती है और उसे ब्रह्मांड के साथ एकता का अनुभव कराती है।


तंत्र शास्त्र में ब्रह्मांडीय द्वार को सृष्टि का पवित्र केंद्र माना जाता है, जो शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। इस केंद्र से कुंडलिनी शक्ति का उद्गम होता है, जो साधक की चेतना को सहस्रार चक्र तक ले जाती है। इस यात्रा में मंत्र, यंत्र, और ध्यान साधक के मार्गदर्शक होते हैं, जो उसे सिद्धियों, अलौकिक अनुभवों, और परम ज्ञान की ओर ले जाते हैं।


पराशक्ति साधना का यह अगला चरण साधक को गहन समर्पण और अनुशासन की मांग करता है। यह केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है, जो साधक को अपनी अनंत संभावनाओं और ब्रह्मांडीय एकता की ओर ले जाती है। यह साधना साधक को यह समझने में मदद करती है कि वह स्वयं ब्रह्मांड का एक हिस्सा है और उसकी चेतना अनंत है।

पराशक्ति साधना का अगला चरण: कुंडलिनी शक्ति का जागरण और 7 चक्र संतुलन

लेखक— amitsrivastav.in वेबसाइट पर अमित श्रीवास्तव, तंत्र शास्त्र और आध्यात्मिकता के विशेषज्ञ, और निधि सिंह, मिस एशिया वर्ल्ड आध्यात्मिक साधिका। 
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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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NCF 2023 के संदर्भ में भाषा शिक्षण: गहन अध्ययन, कौशल और रचनात्मकता की तरफ

नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा 2023 (NCF 2023) ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव लाया है। भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि पुरानी रट्टू प्रणाली को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। हिंदी भाषा को अब ‘कोर्स A और B’ के स्थान पर … Read more

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