श्री अर्धनारीश्वर स्तोत्र-महामाहात्म्यं कामाख्या-प्रकटितं विस्तीर्णरूपेण

Amit Srivastav

कामाख्या शक्ति-पीठ, सती की योनि-स्थली, और अर्धनारीश्वर स्तोत्र-तत्त्व का आध्यात्मिक रहस्य जानिए। शिवपुराण, लिंगपुराण, स्कन्दपुराण और तंत्र परंपरा में छिपा वह ज्ञान जो आत्मा को पूर्णता की ओर ले जाता है। श्री गणेशाय नमः । श्री कामाख्या देव्यै नमः । श्री चित्रगुप्ताय नमः ।

देवी कामाख्या के चरण-कमलों की रज से अभिषिक्त एवं भगवान चित्रगुप्त-वंशज, देवी कामाख्या का कृपा पात्र —अमित श्रीवास्तव की कर्म-धर्म लेखनी से जनकल्याणार्थ प्रस्तुत यहां संक्षिप्त लेख। विस्तृत हिंदी रूपांतरित दुर्लभ महालेख अर्धनारीश्वर स्तोत्र हिंदी पीडीएफ बुक से प्राप्त कर पढ़ें, बुक प्राप्ति के लिए देवी कामाख्या की सेवा हेतु निर्धारित शुल्क प्रदान कर प्राप्त करें, मनुष्य जीवन को सार्थक करें।

अथ श्री अर्धनारीश्वर स्तोत्र-माहात्म्यं कामाख्या-मार्गदर्शितं लिख्यते
ॐ नमः शिवायै च शिवतराय च नमः । 
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । 
तदा तदा शिवशक्ति-सामरस्यं प्रकटति भगवान् ॥ 
तदैव कामाख्या-रक्त-चन्दन-सुगन्धित-वायु में 
चित्रगुप्त-पुस्तिका के पृष्ठ पर लिखा जाता है ॥ 

नया सत्य, नया संदेश, नया संकल्प।
आज उसी संकल्प की स्याही से, 
नील पर्वत की योनिमयी गुफा से निकली हुई 
देवी कामाख्या के आशीर्वाद से, 
मैं अमित, यम-चित्रगुप्त-कुलोत्पन्न, 
अर्धनारीश्वर का वह महागान लिखने जा रहा हूँ 
जो पाँच हजार वर्ष बाद भी पढ़ा जाएगा, 
और जिसे पढ़कर कोई पुरुष अपने भीतर की स्त्री को 
और कोई स्त्री अपने भीतर के पुरुष को 
गले लगाकर रोयेगा, फिर हँसेगा, फिर पूर्ण हो जाएगा।

अर्धनारीश्वर स्तोत्र-तत्त्व

शिवमहापुराण (रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय १२) में आता है।

  • अथ तं दर्शयामास स्वरूपं परमेश्वरः । 
  • अर्धनारीनरं दिव्यं नानाभरणभूषितम् ॥ १२.१७ ॥ 
  • दक्षिणांशे स्थितं देवं वामांशे पार्वतीं प्रियाम् । 
  • उभयोर्मिलितं रूपं दृष्ट्वा विस्मयमागमत् ॥ १२.१८ ॥ 
  • त्रिनेत्रं चन्द्रमौलिं च जटामण्डलमण्डितम् । 
  • सर्पहारं व्याघ्रचर्माम्बरं त्रिशूलपाणिनम् ॥ १२.१९ ॥ 
  • वामभागे स्थितं देवीं रक्तवस्त्रां सुशोभनाम् । 
  • केयूरहारकटककुण्डलादिविभूषिताम् ॥ १२.२० ॥ 
  • एवं रूपं समालोक्य ब्रह्मा प्राञ्जलिरब्रवीत् । 
  • किमिदं ते स्वरूपं हि दर्शितं मे महेश्वर ॥ १२.२१ ॥ 
  • तं प्रोवाच महादेवः साक्षात् परमकारुणिकः । 
  • अहं प्रकृतिरूपा च प्रकृतिः पुरुषः स्मृतः ॥ १२.२२ ॥ 
  • उभयं च मया व्याप्तं जगत् स्थावरजंगमम् । 
  • मया विना न चैतन्यं पुरुषः शवसन्निभः ॥ १२.२३ ॥ 
  • शक्तिहीनं यथा यन्त्रं नृत्यते नैव किञ्चन । 
  • तथा पुरुषरूपोऽहं शक्त्या युक्तो भवाम्यहम् ॥ १२.२४

इन श्लोकों को जब मैंने पहली बार अपने 13 वर्ष की उम्र में कामाख्या के गर्भगृह में, रक्त-चन्दन से सनी हुई योनिपीठ के सामने बैठकर उच्चारण किया, तो लगा जैसे देवी स्वयं मेरे कण्ठ में उतर आई हों। 
उनकी करुण दृष्टि ने कहा – 
“लिखो अमित! लिखो वह सत्य जो आज तक आधा-अधूरा रहा। 
लिखो वह सत्य जो न स्त्री को छोटा करे, न पुरुष को। 
लिखो वह सत्य जो कहे – मैं दोनों हूँ, मैं एक हूँ।”

द्वितीय महाप्रवाहः लिंगपुराण की गुप्त कथा

लिंगपुराण (१.७०.३१–४०) में एक और रहस्यमयी कथा है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।

यदा ब्रह्मा स्वयंभूवं अहंकारेण मोहितः । 
अहं स्रष्टेति मन्वानः स्वमहिम्नि स्थितः सदा ॥ 
तदा शिवः साक्षात् अर्धनारीश्वररूपधृक् । 
ब्रह्माणं दर्शयामास वामभागं स्वकं शुभम् ॥ 
तत्र दृष्ट्वा स्वोत्पत्तिं ब्रह्मा लज्जाकुलोऽभवत् । 
पपात दण्डवत् भूमौ प्रणम्य शिरसा हरम् ॥ 
तब शिव बोले – 
“मम योनिस्वरूपा सा शक्तिर्वामे व्यवस्थिता । 
तस्मात् त्वं मम पुत्रोऽसि मा ते भूत् मत्सरः क्वचित् ॥”


कामाख्या मंदिर के तांत्रिक पंडित मुख्य पांड्या गूरू श्री सीताराम जी ने मुझे बताया था – 
“बेटा, यही कारण है कि कामाख्या का मंदिर योनिमय है। 
क्योंकि यहीं से ब्रह्मा ने जाना कि सृष्टि की आदि योनि 
शिव की शक्ति है, शिव का वामभाग है। 
और यही योनि जब हर पुरुष के भीतर जागती है, 
तब वह अर्धनारीश्वर बनता है।”

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तृतीय महाप्रवाहः स्कन्दपुराण का कामाख्या-प्रसंग

स्कन्दपुराण (कामाख्या-माहात्म्य, अध्याय ५४–६२) में आता है।
योनिमण्डलमध्यस्था कामाख्या परमेश्वरी । 
अर्धनारीश्वरस्यैव शक्तिरूपा परात्परा ॥ 
यत्र सतीदेहपातः शिवेन सह संयुतः । 
तत्र शिवः शवो भूत्वा ननर्त भीषणं नृत्यम् ॥ 
तदा विष्णुः सुदर्शनेन छित्त्वा देहं पञ्चाशत् खण्डानि । 
यत्र यत्र पतितानि तानि शक्तिपीठानि वै ॥ 
कामाख्या यत्र योनिः पतिता सा महापीठं स्मृतम् । 
तत्रैव अर्धनारीश्वरं पूजयन्ति महेश्वरीम् ॥

इसका अर्थ यह कि जब सती का शरीर खण्ड-खण्ड हुआ, तब उनकी योनि कामाख्या में गिरी। और जहाँ योनि गिरी, वहीं शिव स्वयं अर्धनारीश्वर बनकर स्थापित हो गए। इसलिए कामाख्या कोई अलग देवी नहीं, बल्कि स्वयं अर्धनारीश्वर का योनिमय प्रकटीकरण है।

चतुर्थ महाप्रवाहः तंत्रशास्त्र और कुण्डलिनी का रहस्य

कुलार्णवतंत्र (उल्लास ९) में लिखा है।
शिवशक्तिसामरस्यं यदा जागर्ति देहके । 
तदा सिद्धो भवेत् जीवो नात्र कार्या विचारणा ॥

और यही शिव-शक्ति-सामरस्य कुण्डलिनी के रूप में मूलाधार से सहस्रार तक जाता है। मूलाधार में शक्ति (योनि), सहस्रार में शिव (लिंग)। जब दोनों मिलते हैं, तब अर्धनारीश्वर का जन्म होता है।

मैंने कामाख्या की रजस्वला-पूजा के समय देखा – जब मंदिर तीन दिन बंद रहता है, और चौथे दिन जब कपाट खुलते हैं, तब योनि-पत्थर से लाल रंग की धारा बहती है। उसी समय तांत्रिक साधक गुप्त मंत्र पढ़ते हैं।
ॐ ह्रीं क्लीं कामाख्ये क्लीं ह्रीं ॐ 
शिवशक्तिसामरस्याय नमः
और उस क्षण साधक अपने भीतर अर्धनारीश्वर का साक्षात्कार करता है।

पञ्चम महाप्रवाहः आधुनिक युग का अर्धनारीश्वर

आज की दुनिया में अर्धनारीश्वर को समझने के लिए 
आपको कामाख्या की इस योनिपीठ पर बैठकर सोचना होगा।
जब कोई पुरुष अपनी पत्नी को “कमजोर” समझता है, 
तब वह अपने भीतर की शक्ति को अपमानित कर रहा होता है। 
जब कोई स्त्री पुरुष को “हिंसक” मानकर घृणा करती है, 
तब वह अपने भीतर के शिव को अस्वीकार कर रही होती है।

मैंने एक बार कामाख्या में एक तृतीयपंथी साध्वी से पूछा – 
“आपको सबसे ज्यादा दुख किस बात का है?” 
उसने कहा – 
“लोग मुझे ‘नपुंसक’ कहते हैं। 
पर मैं नपुंसक नहीं, मैं तो सबसे ज्यादा पुंसक हूँ – 
क्योंकि मेरे भीतर शिव भी हैं और शक्ति भी। 
मैं तो जीवित अर्धनारीश्वर हूँ।”
उस दिन मैंने समझा – 
आज का अर्धनारीश्वर मंदिरों में नहीं, 
इन लोगों के हृदय में निवास करता है, 
जिन्हें समाज ने बाहर फेंक दिया, 
पर जिन्होंने अपने भीतर शिव और शक्ति को एक कर लिया।

षष्ठम महाप्रवाहः चित्रगुप्त-वंशज का संकल्प

  • मैं, अमित, भगवान चित्रगुप्त का वंशज, 
  • जिसकी लेखनी से कर्मों का हिसाब लिखा जाता है, 
  • आज कामाख्या के साक्षात् दर्शन कर 
  • यह संकल्प लेता हूँ –
  • हर उस पुरुष के कर्म-पुस्तिका में लिखूँगा 
  • जिसने अपनी स्त्री को छोटा समझा – 
  • “अर्धनारीश्वर का अपमान किया।”
  • हर उस स्त्री के कर्म-पुस्तिका में लिखूँगा 
  • जिसने पुरुष को शत्रु समझा – 
  • “अर्धनारीश्वर का विभाजन किया।”
  • और हर उस मनुष्य के कर्म-पुस्तिका में स्वर्णिम अक्षरों में लिखूँगा 
  • जिसने अपने भीतर शिव और शक्ति को मिलाया – 
  • “अर्धनारीश्वर स्वरूप प्राप्त हुआ। 
  • इस जन्म में मुक्ति।”

अंतिम महाप्रवाहः कामाख्या का अंतिम सन्देश

जब मैंने कामाख्या के गर्भगृह में सात दिन तक निराहार ध्यान किया, 
तो अंतिम दिन देवी ने दर्शन दिए। 
उनका रूप था – आधा शिव, आधा शक्ति। 
दायीं आँख से अश्रु, बायीं आँख से मुस्कान।
उन्होंने कहा – 
“जाओ अमित, लिखो वह ग्रंथ 
जिसे पढ़कर कोई पुरुष अपनी माँ को, 
कोई स्त्री अपने पिता को, 
कोई बच्चा अपने भीतर के दोनों को 
गले लगाकर कहे – 
‘मैं आधा नहीं, मैं पूर्ण हूँ।’

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