देवरिया। प्राकृतिक खेती को केवल विकल्प नहीं अनिवार्य रूप से देखा जाए। वर्तमान समय में जब रासायनिक खेती के दुष्परिणाम न केवल खेतों की उपजाऊ मिट्टी को खोखला बना रहे हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को भी गंभीर संकट की ओर धकेल रहे हैं, ऐसे में प्राकृतिक खेती को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता के रूप में देखा जाना चाहिए। यही संदेश लेकर कृषि विज्ञान केंद्र (भाकृअनुप – भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी) के मल्हना, देवरिया स्थित सभागार में एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
यह प्रशिक्षण ‘नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग’ के तहत पाँच दिवसीय सत्र के रूप में कृषि विभाग, देवरिया द्वारा कृषि सखियों के लिए संचालित किया गया, जिसमें प्राकृतिक खेती की बारीकियों को समझाने और उसे व्यवहार में उतारने की प्रेरणा दी गई। इस अवसर पर केंद्र के अध्यक्ष डॉ. मांधाता सिंह ने अपने वक्तव्य में प्राकृतिक खेती की आवश्यकता पर जोर देते हुए बताया कि जिस तरह से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग खेती की मूल आत्मा को नष्ट कर रहा है, वह अत्यंत चिंताजनक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल उत्पादन बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हुए, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए खेती करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। प्राकृतिक खेती न केवल जैव विविधता को पुनर्जीवित करती है, बल्कि किसान की आत्मनिर्भरता और लागत घटाकर लाभ में भी वृद्धि करती है।
प्राकृतिक खेती केवल विकल्प नहीं है अनिवार्य है

कार्यक्रम में शामिल केंद्र के उद्यान विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. रजनीश श्रीवास्तव ने गौ आधारित खेती की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती का आधार गाय है, और ‘बीजामृत’ इस पद्धति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। उन्होंने बताया कि बीजामृत के माध्यम से बुवाई से पहले बीजों का शोधन किया जाता है, जिससे बीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है। डॉ. श्रीवास्तव ने बीजामृत तैयार करने की विधि भी विस्तारपूर्वक बताई—जिसमें देसी गाय का गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी का प्रयोग किया जाता है।
इस प्रक्रिया से केवल बीज ही नहीं, बल्कि खेत की मिट्टी भी पुनर्जीवित होती है। यह विधि हजारों वर्षों पुरानी भारतीय परंपरा की देन है, जो आधुनिक समय में फिर से पुनर्जीवित हो रही है।
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सस्य विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. कमलेश मीना ने ‘जीवामृत’ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह प्राकृतिक खाद पौधों की वृद्धि, पोषण और मिट्टी में जैविक गतिविधियों को बढ़ाने में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि जीवामृत के प्रयोग से खेत की सूक्ष्म जैविक संरचना सशक्त होती है, जिससे भूमि की उर्वरता में सतत वृद्धि होती है। डॉ. मीना ने जीवामृत तैयार करने की तकनीकी जानकारी देते हुए यह स्पष्ट किया कि यह तरल खाद तैयार करने के लिए गोमूत्र, गोबर, गुड़, बेसन और पानी का उपयोग किया जाता है, जो आसानी से हर किसान के घर में उपलब्ध होता है। इस प्रकार प्राकृतिक खेती की यह विधियां आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का मार्ग खोलती हैं।
गृह विज्ञान विशेषज्ञ श्री जयकुमार ने इस अवसर पर कृषि और मानव स्वास्थ्य के अंतर्संबंध पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती के कारण उत्पन्न जहरीले अवशेष न केवल हमारे भोजन में प्रवेश कर जाते हैं, बल्कि वह धीरे-धीरे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती को अपनाने से न केवल हम शुद्ध और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि यह बच्चों से लेकर वृद्धों तक के स्वास्थ्य को दीर्घकालीन लाभ प्रदान करता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से गृह विज्ञान के क्षेत्र में प्राकृतिक खेती के साथ जुड़कर एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।
कार्यक्रम में पशु जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ डॉ. अंकुर शर्मा ने प्राकृतिक खेती में गौधन की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना पशुधन के खेती अधूरी है और विशेष रूप से गाय का गोबर व गोमूत्र प्राकृतिक खेती के दो ऐसे स्तंभ हैं, जो संपूर्ण खाद्य श्रृंखला को जैविक बना सकते हैं। डॉ. शर्मा ने बताया कि गोबर से न केवल खाद बनती है, बल्कि गोमूत्र का प्रयोग कीटनाशक के रूप में भी किया जा सकता है। इससे कीटों पर नियंत्रण होता है, लेकिन लाभकारी जीवों को नुकसान नहीं पहुंचता, जिससे खेत का पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। उन्होंने बताया कि एक स्वस्थ गौधन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि कृषि की रीढ़ की हड्डी है।
इस प्रेरणादायक प्रशिक्षण में राजमती देवी, किरण देवी, सीमा देवी, शीला देवी, रीता देवी, कंचन देवी, अनीता देवी सहित कुल ५४ कृषि सखियों ने भाग लिया। इन महिलाओं ने प्रशिक्षण में उत्साहपूर्वक भाग लेकर यह सिद्ध किया कि यदि सही मार्गदर्शन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया जाए, तो ग्रामीण महिलाएं भी कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और नवाचार की प्रतीक बन सकती हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने प्राकृतिक खेती के विभिन्न घटकों को न केवल सुना, बल्कि व्यवहारिक रूप से उन्हें बनाना भी सीखा, जिससे वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर इसका प्रचार-प्रसार कर सकें। यह प्रशिक्षण न केवल ज्ञानवर्धक था, बल्कि भारत के कृषि भविष्य को टिकाऊ और समृद्ध बनाने की दिशा में एक ठोस पहल भी सिद्ध हुआ।
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देवरिया कि खबर पढ़कर आपके वेबसाइट पर बहुत अच्छा लगा मै देवो कि नगरी देवरिया से आपके सभी लेखो को नियमित पढता रहता हूं।
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अच्छी जानकारी दी है आपने।