जानें 4 दिवसीय अंबुबाची मेला – कब, कहाँ लगता है: आस्था से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

Amit Srivastav

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अंबुबाची मेला हर वर्ष आषाढ़ मास (अक्सर जून के मध्य या अंत में) में मनाया जाता है। यह मेला मुख्यतः कामाख्या देवी के रजस्वला (मासिक धर्म) के समय आयोजित होता है, और इसे “धरती माता के ऋतु धर्म” का प्रतीक माना जाता है।
अंबुबाची मेला की मास और तिथि:
हिंदू पंचांग अनुसार- यह मेला आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि से आरंभ होता है और अमावस्या या प्रतिपदा तक चलता है।

अंबुबाची मेला कब है 2026 समयावधि:
मेला 4 दिन तक चलता है—

1. पहला दिन: मंदिर के पट बंद होते हैं – देवी रजस्वला होती हैं
2. दूसरा और तीसरा दिन: कोई पूजा नहीं होती, मंदिर बंद रहता है
3. चौथा दिन: मंदिर के पट पुनः खुलता है – देवी की शुद्धि और स्नान के बाद भक्तों को दर्शन होता है

अंबुबाची मेला: 2026 में तिथियाँ

मंदिर के कपाट बंद (प्रवृत्ति): 22 जून 2026 (सोमवार)। इस दिन से देवी के एकांतवास के लिए मंदिर के द्वार बंद हो जाएंगे।

मंदिर के कपाट फिर से खुलेंगे (निवृत्ति): 26 जून 2026 (शुक्रवार)। इस दिन सुबह से भक्तों के लिए दर्शन और अनुष्ठान फिर से शुरू हो जाएंगे। 

धार्मिक मान्यता—
इस समय देवी शक्ति विश्राम करती हैं, इसलिए इन 3 दिनों में किसी भी शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि असम में नहीं किए जाते। जगत-जननी धरती माता स्वयं ही रजस्वला होती हैं और उन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है। यह रहा 2026 अंबुबाची मेला कामाख्या का न्यू अपडेट, नीचे पढ़िए जानिए पूर्व की दी गई जानकारी को। 

वर्ष 2024 में 16 जून से 20 जून तक चलने वाला विश्व का एकमात्र देवी के पीरियड्स पर आधारित अंबुआची मेला भब्य रुप से शुरू हो रहा है। अंबुआची मेला भारत देश के असम राज्य गुवाहाटी के सटे कामरुप जिले में निलांचल पर्वत पर 51 शक्तिपीठों में प्रथम कामाख्या योनी रूपा सर्वशक्तिशाली शक्तिपीठ पर लगता है। यहां से जानिए महत्वपूर्ण जानकारी भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज के वंशज अमित श्रीवास्तव की कलम से।
जानें 4 दिवसीय अंबुबाची मेला - कब, कहाँ लगता है: आस्था से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

मां कामाख्या अंबुबाची पर्व विशेष सती के 51 शक्तिपीठों में सर्वशक्तिशाली शक्तिपीठ देवी कामाख्या योनी रुप में विराजमान हैं। यहां देवी सामान्य स्त्रियों के जैसे ही रजस्वला होती हैं। रजस्वला के दौरान मंदिर का कपाट बंद हो जाता है। सृष्टि विस्तार में स्त्री योनी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए यहां योनी रूपा महाशक्तिपीठ कामाख्या देवी की अनोखी पूजा अर्चना का विशेष महत्व है। हमारा भारत वर्ष विभिन्न मान्यताओं का देश है। यहां कई तरह के रीति-रिवाज कल्चर प्रचलित है।

यहां तक कि देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के नियम व तरीकों को भी अलग अलग जगहों पर अलग अलग तौर तरीकों से मनाते देखा जा सकता है। सृष्टि का केन्द्र विन्दु मुक्ति धाम माना जाने वाला सती के 51 शक्तिपीठों में प्रथम – कामाख्या शक्तिपीठ पर सती का योनी भाग स्थापित है। यहां प्रत्येक वर्ष की भांति वार्षिक उत्सव के तौर पर चार दिवसीय अंबुबाची मेला आयोजित किया जा रहा है। यह मेला प्राचीन काल से आयोजित होता रहा है। कोविड-19 के दौरान बिते दो वर्ष आयोजन फीका चला था।

कोविड काल के बाद पहले जैसा ही भब्य आयोजन किया जा रहा है। इस अंबुबाची मेला में रोज दिन लाखों श्रद्धालु आते रहते हैं। और भब्य उत्सव का आंनद लेते हुए माता की भक्ति में लीन हो अपनी मनोकामना पूर्ण कि याचना करते हैं। यहां जो भी मन्नतें मांगी जाती है निश्चित रूप से पूरी हो जाती है।

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यहां देवी के पीरियड्स की होली है भव्य पूजा – वैज्ञानिक भी हैं हैरान 

 
हिन्दू धर्म मान्यताओं के अनुसार पीरियड्स के दौरान स्त्रियों को पूजा करना वर्जित किया गया है। यहां तक कि घरेलू कार्य से भी स्त्रियों को वर्जित किया जाता है। रजस्वला स्त्री के ताप को स्यम् भगवान भी सहन नहीं कर सकते हैं। इस वजह से रजस्वला स्त्री का प्रवेश मंदिर में वर्जित है। स्त्री अगर अपने पीरियड्स के दौरान तुलसी के पौधे में जल अर्पित कर दे तो तुलसी का पौधा भी मुर्झा जाता है। किसी फसल में भ्रमण कर दे तो फसल तक नष्ट हो जाती है। रजस्वला स्त्री किसी तरह की पूजा-पाठ में सम्मलित नही होती हैं, न ही रसोई घर में जाने दिया जाता है। मान्यता है सती जब दूसरे जन्म में पार्वती रानी मैना की बेटी पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया तब युवा अवस्था प्राप्त कर रजस्वला हुईं थी। धर्म ग्रंथों में वर्णित है उस समय माता पार्वती को 28 दिनों तक पीरियड्स रहा था जो आज 28 दिनों का मासिक चक्र के रूप में माना जाता है। वर्तमान में रजस्वला के दौरान स्त्री को अपवित्र माना जाता है। लेकिन यहां माता के पीरियड्स का ही विषेश पूजा किया जाता है। सती का योनी यहां एक शिला के रूप में स्थापित है, देवी यहां सामान्य स्त्रियों की भाती प्रत्येक माह रजस्वला होती है। इस दौरान गर्भ गृह मंदिर का कपाट बंद हो जाता है और देवी गर्भ गृह में चली जाती है। देवी के रजस्वला होने की जानकारी ज्योतिष गणित के अनुसार यहां सबको मालूम रहती है। उससे पहले ही सफेद वस्त्र से देवी की योनी शिला, गर्भ गृह को ढक दिया जाता है।जानें 4 दिवसीय अंबुबाची मेला - कब, कहाँ लगता है: आस्था से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

AMBUBACHI MELA 2024

16 जून 2024 रविवार से 20 जून बृहस्पतिवार तक निर्धारित समय से चार दिन देवी वार्षिक रजस्वला में रहेंगी। इस दौरान अंबुबाची मेला लगेगा। 21 जून को सूर्योदय के बाद गर्भ गृह, मंदिर का कपाट खुलेगा। महिला पुजारियों द्वारा माता को स्नान कराया जायेगा। फिर मंदिर के पुजारी विधि-विधान से पूजन करेंगें। उसके बाद वीआईपी लोगों को दर्शन कराया जायेगा। तत्पश्चात लाईन में लगे सामान्य भक्तों को दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा। 16 जून… निर्धारित समय से पहले देवी का विधि पूर्वक पूजन होगा और निर्धारित समय पर सभी भक्त व पुजारी मंदिर गर्भ गृह से बाहर निकल आयेगें। गर्भ गृह का कपाट बंद होगा। देवी के पीरियड्स से ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिनों तक रक्त के समान लाल बहता है। चार दिन बाद धीरे-धीरे अपने आप पुनः पानी का रंग साफ हो जाता है। इस रहस्य को लेकर वैज्ञानिकों ने यहां बहुत ही जांच-पड़ताल की लेकिन वैज्ञानिक असफल हो माता का चमत्कार मान वापस हुए थे।
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अनोखी परंपरा- अनोखा प्रसाद

असम राज्य के कुछ हिस्सों में कुवांरी लडकियों के प्रथम मासिक धर्म का उत्सव मनाया जाता जाता है। जिस लड़की को पहला मासिक चक्र आता है, उसे एक कमरे में बंद कर दिया जाता है, न वो लड़की तीन दिनों तक किसी पुरुष को देखती न कोई पुरुष उस लड़की को देखता है। तीन दिन बाद चक्र से बाहर आने पर सार्वजनिक भोज का आयोजन किया जाता है। मासिक चक्र में आई लड़की उस दौरान एक तरह से काल कोठरी मतलब बंद कमरे में रहती है। देवी कामाख्या के रजस्वला के साथ ही अगर किसी लड़की का पहला मासिक चक्र शुरू होता है तो उस लड़की को बहुत शुभ माना जाता है। 
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योनि पुजा का रहस्य

देवी कामाख्या के रजस्वला के दौरान, समय पूर्व योनी शिला गर्भ गृह में योनि भाग सहित आस-पास सफेद वस्त्र बिछाया जाता है। चार दिन बाद पांचवें दिन गर्भ गृह का कपाट खुलने का भक्त जनों को इंतजार रहता है। यहां वही वस्त्र देवी के मासिक धर्म से भींग कर लाल हो जाता है। इसी वस्त्र को भक्तों को थोड़ा थोड़ा फाड़कर प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इसे ही अंबुबाची वस्त्र कहते हैं। इस प्रसाद का बहुत ही महत्व है। श्रधा पूर्वक आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होती है। देवी की कृपा पात्र ही अमुल्य प्रसाद को प्राप्त करते हैं। इस अंबुबाची वस्त्र को धारण करने से भूत-प्रेतों का छाया शरीर में प्रवेश नहीं कर सकता, अगर पहले से ही प्रेतात्मा है तो तुरंत शरीर छोड़ किनारे हो जाता है। ऐसा बताया जाता है कि इस स्थान पर आने वाले भक्त जन तांत्रिक या भूत-प्रेत से उत्पन्न बाधाओं से दूर हो जाते हैं। जबकि यह कामरूप कामाख्या तिरथ स्थान पूरी तरह से तांत्रिक क्षेत्र में आता है। विश्व भर से योगी, तांत्रिक, जादूगर, जादूगरनी तमाम तरह की सिद्धियां प्राप्त करने वाले यहीं आते हैं। हम यह भी बता दें कि पवित्र मन से यहां सहज ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती है। देवी के रजस्वला होने पर सभी तरह के तांत्रिक यहां तक कि त्रिया राज जादूई नगरी कि जादूगरनीयां भी अपनी सिद्धि के लिए आती हैं। त्रिया राज जादूई नगरी कि जादूगरनीयां भी अपनी अपनी रुचि के अनुसार रुप बदल अपनी सिद्धियों को मजबूत करती हैं। देश विदेश से आये जो बहुत बड़ा तांत्रिक होता है वो इनके असली रूप को पहचान जाता है और इनके शरण में आ शिष्य बनने की प्रार्थना कर शिष्य बन अपने गुरू से तमाम तांत्रिक सिद्धी प्राप्त कर लेता है। सामान्य जगहों पर वैसे ही सिद्ध तांत्रिकों को त्रिया राज का सिख कहा जाता है।
जानें 4 दिवसीय अंबुबाची मेला - कब, कहाँ लगता है: आस्था से जुड़ी संपूर्ण जानकारीअंबुबाची मेला 

योनी पीठ अंबुआची मेला का रास्ता भारत वर्ष के असम राज्य में प्रमुख स्थान गुवाहटी जहां सभी देशों जगहों से आवागमन का हवाई, रेल, रोड मार्ग उपलब्ध है। हवाई अड्डे से 20 किलोमीटर, गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर रोड मार्ग पर कामाख्या शक्तिपीठ निल गीरी, निलांचल पर्वत पर स्थित है। जो बहुत ही प्राचीन काल से प्रसिद्ध स्थान है। इस स्थान से जुड़ी दास्तान सभी युगों में देखने को मिलता है। यह स्थान श्रृष्टि का केन्द्र विन्दु मुक्ति धाम के रूप में धर्म ग्रंथों में वर्णित है।

इस शक्तिपीठ पर योनी रूपा देवी का आशिर्वाद लेने आना चाहिए। किंतु देवी के कृपा से ही यहां तक कोई भी पहुंच दर्शन प्राप्त करता है। इस कलयुग में शक्तिपीठों में स्थापित देवीयां ही सदैव सत्य हैं। अपनी आस्था के अनुसार परोक्ष या अपरोक्ष दर्शन मिलता है। दैवीय शक्तियों का थोड़ा भी सम्मान और एहसास है तो प्रेम से बोलो और कमेंट में लिखो जय माँ कामाख्या देवी। 

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भक्त जन को एक सलाह –

 
हमारे द्वारा दी गई उपरोक्त जानकारी धार्मिक आस्थाओं सहित कामाख्या योनी पीठ से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। ब्लाग लेखक संपूर्ण रूप से हर शब्दों के पुष्टि की जिम्मेदारी नहीं लेगा। यहां पहली बार आये अनभिज्ञ व्यक्ति तांत्रिक सिद्धियों के लिए योग्य गुरु का सहयोग ले। यह सम्पूर्ण क्षेत्र तांत्रिक क्षेत्र है, देवी की पूजा अर्चना में ध्यान लगायें, किसी को किसी भी तरह का उपहास न करें, यहां मेले में सभी का सम्मान करें। हो सकता है बहुत कुरुप या बहुत सुन्दर दिख रहा व्यक्ति स्त्री पुरुष या जानवर बड़ी जादूगरनी हो या तंत्र विद्या का सिद्धी प्राप्त किया हो। प्राचीन समय में कामरुप के लोग अपनी इच्छानुसार अपना रुप बदल लिया करते थे। 
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7 thoughts on “जानें 4 दिवसीय अंबुबाची मेला – कब, कहाँ लगता है: आस्था से जुड़ी संपूर्ण जानकारी”

  1. योनी रूपा कामाख्या देवी सदैव हम सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखना 🚩 जय भवानी 🚩

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  2. 24 जून को देवी योनी रूपा कामाख्या होगी मासिक धर्म से निवृत्त 25 जून सूर्योदय बाद खुलेगा गर्भ गृह का कपाट। देवी स्नान के बाद होगी विधि-विधान से निवृती पूजा फिर श्रद्धालु करेंगे दर्शन मिलेगा अजीबोगरीब अंबुआची वस्त्र प्रसाद। सभी पर बनी रहे देवी कामाख्या की कृपा🙏प्रेम से बोलिए जय माता दी 🚩

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  3. आज सुबह सूर्योदय बाद देवी स्नान निवृती पूजा अर्चना के बाद पंडों ने किया दर्शन फिर वीआईपी लोगों ने किया दर्शन कल 26 को लाइन में खड़े श्रद्धालु करेंगे दर्शन पायेंगे प्रसाद में अंबुआची वस्त्र दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जय बोलिए कामाख्या देवी शक्तिपीठ की🙏🙏🚩🚩

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