देवरिया का मेडिकल कॉलेज में दलालों का महाकुंभ? स्वास्थ्य ‘क्रांति’ का काला अध्याय

Amit Srivastav

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देवरिया का मेडिकल कॉलेज में दलालों के राज और स्वास्थ्य सेवाओं की अव्यवस्था का खुलासा। कभी भरोसेमंद जिला अस्पताल अब लूट-खसोट का अड्डा बन गया है। जनता इलाज नहीं, ठोकरें खा रही है। पढ़िए स्थानीय पत्रकार दिलीप कुमार के साथ अमित श्रीवास्तव की जमीनी पोलिटिक्स रिपोर्ट।

देवरिया का मेडिकल कॉलेज में दलालों का महाकुंभ? स्वास्थ्य 'क्रांति' का काला अध्याय

देवरिया जिले की धूल भरी सड़कों पर, जहां कभी ट्रैक्टरों की आवाजें और खेतों की हरियाली जीवन का संगीत बजाती थीं, आज एक अलग ही दृश्य है। एक बुजुर्ग किसान, अपनी बीमार पत्नी को गोद में उठाए, देवरिया का मेडिकल कॉलेज की ओर बढ़ रहा है। उसकी आंखों में उम्मीद कम, थकान ज्यादा है। क्यों? क्योंकि सरकार की ‘महान स्वास्थ्य क्रांति’ ने यहां का पुराना जिला अस्पताल ‘अपग्रेड’ कर एक ऐसे ‘महल’ में बदल दिया है, जहां आम आदमी का प्रवेश ही एक चुनौती है।

एक समय था जब देवरिया जिला अस्पताल इस इलाके का जीवन रक्षक था – एक द्वितीयक स्तर का स्वास्थ्य केंद्र, जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और बड़े तृतीयक अस्पतालों के बीच सेतु का काम करता। यहां चिकित्सा अधिकारी, सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, नर्सें, पैरामेडिकल स्टाफ – सब मिलकर 24 घंटे सेवा देते। मरीज आता, तुरंत जांच होती, दवा मिलती, और अगर जरूरत पड़ती तो बेड पर भर्ती।

लैब टेस्ट, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड जैसी नैदानिक सेवाएं एक ही छत के नीचे। गरीब जनता के लिए यह अस्पताल नहीं, एक विश्वास था। लेकिन अब? अब मेडिकल कॉलेज का बोर्ड लगा है, और जनता दर-दर ठोकरें खा रही है। सरकार की यह ‘व्यवस्था’ क्या है? विकास का नाम लेकर लूट का सिलसिला?

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कल्पना कीजिए एक साधारण दिन— सुबह 6 बजे एक मजदूर का बच्चा बुखार से तप रहा है। पिता उसे लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचता है। पहले तो पार्किंग की जंग – जहां दलाल पहले से काबिज हैं, ‘स्पेशल एंट्री’ के लिए पैसे मांगते। फिर रजिस्ट्रेशन काउंटर: दो-दो घंटे की लाइन, जहां सूरज की तपिश में लोग पसीना बहाते हैं। पर्ची मिली, तो डॉक्टर के पास जाने की बारी – वहां भी कतार, जैसे कोई मुफ्त की लॉटरी बंट रही हो। डॉक्टर मिला, तो जांच के लिए लैब— एक और इंतजार। दवा? अंदर की फार्मेसी में स्टॉक नहीं, बाहर की दुकानों से मंगवाओ।

और बाहर? अस्पताल के ठीक सामने दवा दुकानें सजी हैं, जहां डॉक्टरों का ‘कमीशन’ पहले से तय है। हाल ही में एक महिला को कुत्ता काटा – साधारण वैक्सीन की जरूरत। लेकिन डॉक्टर ने चार हजार की दवाएं लिखीं, ‘डर’ दिखाकर। मरीज सोचता है— “यह इलाज है या लूट?” जनता का सवाल साफ है “कहां गया हमारा पुराना जिला अस्पताल? जहां तुरंत इलाज मिलता, कोई दलाल नहीं, कोई कमीशन नहीं। इससे तो अच्छा वही था!” लेकिन जवाब कौन देगा? ऊपर के अधिकारी, जो ‘प्रोजेक्ट्स’ की फाइलों में दबे हैं, या वे डॉक्टर जो ‘व्यवस्था’ का हिस्सा बन चुके हैं?

देवरिया का मेडिकल कॉलेज में दलालों का महाकुंभ? स्वास्थ्य ‘क्रांति’ का काला अध्याय

देवरिया का मेडिकल कॉलेज में दलालों का महाकुंभ? स्वास्थ्य 'क्रांति' का काला अध्याय


यह सिर्फ देवरिया की कहानी नहीं, पूरे देश में सरकार की ‘स्वास्थ्य नीतियों’ का नमूना है। चुनावी मंचों से वादे किए जाते हैं “हर जिले में मेडिकल कॉलेज! स्वास्थ्य सेवाओं का स्वर्णिम युग!” लेकिन हकीकत? जिला अस्पतालों को ‘मेडिकल कॉलेज’ का नाम देकर, उन्हें एक ब्यूरोक्रेटिक जंगल में बदल दिया जाता है। जहां पहले 50-100 बेड होते थे, अब ‘कॉलेज’ के नाम पर छात्रों की ट्रेनिंग प्राथमिकता है, मरीजों की देखभाल गौण। ओपीडी में डॉक्टर कम, इंटर्न ज्यादा – जो अनुभवहीन हैं।

इमरजेंसी वार्ड? नाम का है, असल में इंतजार का वार्ड। गरीबों के लिए ‘आयुष्मान भारत’ जैसी स्कीमें हैं, लेकिन पेपरवर्क इतना कि इलाज से पहले ही मरीज थक जाता या मर जाता है। और दलाल? वे तो ‘व्यवस्था’ का अभिन्न अंग बन गए। अस्पताल के गेट से लेकर बेड तक, हर जगह उनका राज। कमीशन का खेल ऊपर तक जाता है – डॉक्टर, अधिकारी, यहां तक कि राजनीतिक संरक्षण। एक रिपोर्ट (जो गोदी मीडिया कभी नहीं दिखाएगी) कहती है कि ऐसे ‘अपग्रेड’ के बाद मरीजों की संख्या बढ़ी, लेकिन संतुष्टि घटी। क्यों? क्योंकि ‘विकास’ के नाम पर बजट तो आवंटित होता है, लेकिन जमीन पर पहुंचता कहां है? ठेकेदारों की जेब में? या चुनावी फंड में?


सरकार की यह ‘पालिटिकल मास्टरस्ट्रोक’ देखकर हंसी आती है। एक तरफ ‘डिजिटल इंडिया’ – ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की बातें। लेकिन देवरिया में? इंटरनेट कनेक्शन कमजोर, स्मार्टफोन हर किसी के पास नहीं। नतीजा— लाइनें लंबी, मरीज परेशान। दूसरी तरफ, ‘गोदी मीडिया’ की भूमिका – वे तो व्यस्त हैं ‘राष्ट्रीय गौरव’ की खबरें दिखाने में। देवरिया की जनता की पुकार? वह तो ‘विपक्षी प्रोपगैंडा’ है। अगर कोई लोकल रिपोर्टर आवाज उठाए, तो ‘फेक न्यूज’ का लेबल।

मीडिया के ‘गोद’ में बैठी सरकार को असली मुद्दे क्यों दिखें? वे तो ‘मेडिकल कॉलेज’ की इमारतों की फोटो से वोट बटोर रही है। लेकिन जनता अब जाग रही है। वे कह रही हैं— “हमें अपना जिला अस्पताल लौटाओ! मोदी जी वो बूरा दिन ही अच्छा था जब आसानी से इलाज मिलता फ्री की दवाईयां उपलब्ध थीं मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने के लिए हफ्तों महिने का न तो चक्कर लगाना पड़ता न मेडिकल मे तमाम जांच के नाम पर रुपये लगते।

जनता कह रही है — काश मोदी जी वो बुरा दिन ही लौटा देते, आपके अच्छे दिनों से जनता त्रस्त हो रही है। जहां सुविधा थी, पहुंच थी, विश्वास था।” यह मांग सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं, लोकतंत्र की है। अगर सरकार नहीं सुनती, तो अगली ‘क्रांति’ मतपेटी से आएगी। मतदाताओं के मत मे भी फेरबदल होता रहा तो बंग्लादेश, नेपाल जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है यह जनता के रूख देखकर संभावना व्यक्त की जा रही है न की विद्रोह का आह्वान। समस्याओं के बीच जब सफर किया जाता है तो जनमानस का भी दुख-दर्द दिखाई देता है यह लेख जनता की आवाज में प्रस्तुत है।


देवरिया के लोग सो नहीं रहे – वे संघर्ष कर रहे हैं। दलालों का यह महाकुंभ बंद होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि जिला अस्पताल को पुनर्जीवित करे, दलाली पर लगाम लगाए, और खुद भी तमाम नियम बना जनता से धन उगाही बंद करे। पढ़ाई करने वाले बच्चों के मेडिकल फिटनेस में इतना न तामझाम था ना फुजूल के खर्च। आजकल बच्चों को भी मेडिकल फिटनेस बनवाने के लिए हफ्तों महिनों का चक्कर कटवाने के साथ साथ जांच के नाम पर दलालों के अलावा सरकार भी धन उगाही करने मे कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

जिन बच्चों को स्कूल कालेज में पढ़ाई करनी चाहिए वे अपने अभिभावकों के साथ ब्लाक तहसील से लेकर जिला अस्पताल तक कागजातों को तैयार कराने के लिए चक्कर काटते दिखाई दे रहे हैं। जन्म प्रमाण, आय, जाति, निवास, माइग्रेशन से लेकर मेडिकल फिटनेस तक का सफर बच्चों को शिक्षा से वंचित कर रहा है। फ्री की दवाईयां गायब जन औषधालय सरकार खोल जनता के जेब पर डांका डालने का काम किया है। असली स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करे।

‘विकास’ का मतलब इमारतें नहीं, लोगों की जिंदगी बचाना है। वरना, यह ‘क्रांति’ का काला अध्याय इतिहास में दर्ज होगा – जहां गरीबों की ठोकरें सरकार की ‘उपलब्धियों’ का आईना बनेंगी। समय है, बदलाव का। देवरिया की आवाज दबाई नहीं जा सकती – वह गूंजेगी, और बदलाव लाएगी।

देवरिया का मेडिकल कॉलेज में दलालों का महाकुंभ? स्वास्थ्य 'क्रांति' का काला अध्याय

amitsrivastav.in पर देवरिया से आंखों देखी पत्रकार दिलीप कुमार के साथ लेखक संपादक गूगल ब्लॉगर अमित श्रीवास्तव की रिपोर्ट।

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HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav

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