उत्तर प्रदेश की सियासत में जातिवाद का खेल बेनकाब! मुलायम, मायावती से संन्यासी बाबा तक, कैसे राजनीतिक ‘जाति वीआईपी’ मलाई खाते हैं, और मेहनती जनता को धोखा मिलता है। अमित श्रीवास्तव कि कर्म-धर्म लेखनी से यह व्यंग्यात्मक संपादकीय सत्ता के पीछे की सच्चाई को उजागर करता है।
लोकतंत्र के इस तमाशे में आपका स्वागत है, जहां वोट तो सबका, मगर सत्ता का स्वाद सिर्फ ‘जाति स्पेशल’ को! उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में मुलायम सिंह के ‘यादव राज’, मायावती का ‘जाटव जलवा’, और योगी के ‘ठाकुर ठाठ’ ने एक ही कहानी सुनाई— सत्ता की मलाई चट करने वाले वही, जो ‘राजनीतिक भाई-भतीजा क्लब’ के मेंबर हैं।
यह व्यंग्यात्मक संपादकीय उस जादू-टोने का पर्दाफाश करेगा, जहां मेहनती लोग मेरिट में आगे, मगर सत्ता की लाइन में पीछे, और आम जनता? वो तो बस वोट की लॉटरी में ‘बेटर लक नेक्स्ट टाइम’ सुनती रहती है। तैयार रहिए, यह लेख का सफर सियासत के ‘जाति सर्कस’ की सैर कराएगा, जहां हंसी भी आएगी और सच्चाई के कड़वे घूंट भी….!

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जातिवाद का खेल बेनकाब: लोकतंत्र का सियासी सफर
भाइयों और बहनों, लोकतंत्र के इस महान मंच पर जहां हर वोटर को ‘समानता’ का मंत्र पढ़ाया जाता है, वहां असलियत में तो जाति का जुगाड़ ही राज करता है। कल्पना कीजिए, एक ऐसा तमाशा जहां सत्ता का कुर्सी पर चढ़ना आसान है जितना किसी यादव को दूध की मलाई चखना, लेकिन उतरना मुश्किल जितना ठाकुर को अपनी तलवार छोड़ना। यह लेख निष्पक्ष पत्रकार अमित श्रीवास्तव की कलम से लिखित है, लेकिन व्यंग्य की मिर्ची इतनी तेज कि आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे – न हंसी से, तो सच्चाई से।
हम बात करेंगे उन राजनीतिक जातिवादियों की, जो सत्ता के इंद्रजाल में आम जनता को उलझाए रखते हैं, जबकि अपने जाति के ‘मेहनती’ समाज में ऊपर उठ चुके भाइयों को तो मलाई ही नहीं, पूरा क्रीम फैक्टरी सौंप देते हैं और गरीब भाईयों को मिलता है जाति आरक्षण के नाम पर ठेंगा। मुलायम-अखिलेश से लेकर मायावती, और अब ‘बाबा जी’ तक – हर दौर में बस यही कहानी— ‘जाति पहले, जनता बाद में’।
लेकिन सावधान, यह कोई विद्रोह का आह्वान नहीं, बस एक कटाक्षपूर्ण आईना जो आपको दिखाएगा कि कैसे आपके वोट की कीमत सिर्फ एक चाय की दुकान जितनी है, जबकि सत्ता की चाबी जाति के ताले से खुलती है। तो चलिए, इस सफर पर निकलें, जहां हर पैराग्राफ एक बम फोड़ेगा, और अंत में आप सोचने के लिए मजबूर हो जायेगें – क्या यह लोकतंत्र है, या जाति का सर्कस?
सबसे पहले, आइए उस दौर से शुरू करें जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘यादव राज’ का सूरज चमका। मुलायम सिंह यादव – अरे, नाम ही तो काफी है! एक साफ-सुथरा किसान पुत्र, जो समाजवादी पार्टी के बैनर तले सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते चाचा-भतीजे का पूरा साम्राज्य बसा लिया। 1993 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, और देखिए न, सत्ता का पहला फायदा किसे मिला? उनके अपने यादव भाइयों को।
गांव-गांव में यादव युवाओं को पुलिस की नौकरियां, सिंचाई विभाग के ठेके, और सरकारी योजनाओं का ऐसा लॉलीपॉप कि लगे जैसे पूरे राज्य का दूध सिर्फ एक बस्ती के लिए ही बह रहा हो। निष्पक्ष नजर डालें तो आंकड़े झूठ नहीं बोलते: मुलायम के शासनकाल में यादव समुदाय का प्रतिनिधित्व नौकरशाही में 20% से ऊपर चढ़ गया, जबकि राज्य की आबादी में उनका हिस्सा महज 8-10%।
लेकिन व्यंग्य यह है कि ये फायदे ‘मेहनती’ यादवों को नहीं, बल्कि उन ‘राजनीतिक भाई-भतीजावादियों’ को मिले जो मेरिट की बजाय ‘मुलायम कनेक्शन’ पर उड़ान भरते थे। एक यादव इंजीनियर, जो आईआईटी से निकला और मेहनत से परीक्षा टॉप किया, उसे इंतजार करना पड़ा सालों तक, जबकि चाचा का भतीजा, जो ‘सॉफ्टवेयर’ की बजाय ‘सॉफ्ट पोस्टिंग’ जानता था, सीधा एसडीएम बन गया। और बाकी जातियां?
ब्राह्मण को मंदिर की घंटी बजाने दो, दलित को चप्पल सिलने दो – सबको यही संदेश— ‘तुम्हारी बारी कभी नहीं आएगी, क्योंकि सत्ता का सूत्र ‘यादव फर्स्ट’ है।’ अखिलेश यादव का दौर तो और मजेदार – 2012 में युवा मुख्यमंत्री बने, और साइकिल पर घूमते हुए विकास का ऐसा ड्रामा रचा कि लगे जैसे यूपी को सिंगापुर बना देंगे। लेकिन साइकिल के पहिए तो यादव गांवों की सड़कों पर ही चले।
लैपटॉप वितरण योजना में कितने लैपटॉप दलित बच्चों तक पहुंचे? शायद उतने ही जितने साइकिलें ठाकुरों को – जीरो! इसके बजाय, अखिलेश के करीबी यादव उद्योगपतियों को जमीनें, सब्सिडी, और टेंडर – सब मुफ्त में। व्यंग्य की हद यह कि समाजवादी पार्टी का ‘समाजवाद’ सिर्फ यादव समाज तक सीमित था, बाकी सब ‘विपक्षी’।
आम जनता? वो तो वोट देकर खुश, जैसे कोई भिखारी लॉटरी जीतने का सपना देखता है। लेकिन सच्चाई यह कि इन सत्ता कालों में गरीबी रेखा नीचे उतरने की बजाय ऊपर चढ़ गई, क्योंकि फायदा तो ऊपरी मलाई ही ले गई। तो बताइए, क्या यह लोकतंत्र है, या जाति का ‘मिल्कमेड’?
अब घूमते हैं उस ओर जहां ‘बहुजन समाज’ का नारा गूंजा, लेकिन फायदा सिर्फ ‘बहुजन’ के एक कोने तक। मायावती – बीएसपी की बेटी, जो दलितों की मसीहा बनकर सत्ता की चौखट पर दस्तक दी। 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, और उसके बाद तो सत्ता का ऐसा चक्र चला कि चार बार कुर्सी पर विराजमान हो गईं। लेकिन निष्पक्ष विश्लेषण करें तो उनके शासन का असली लाभ किसे मिला?
जाटव दलितों को – जो मायावती की अपनी उप-जाति है। राज्य में जाटव समुदाय का वर्चस्व नौकरशाही, पुलिस, और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में इतना बढ़ा कि लगे जैसे पूरा यूपी ‘जाटव प्रदेश’ हो गया। आंकड़े देखिए: मायावती के दौर में दलितों में से सिर्फ जाटवों का प्रतिनिधित्व 60% से ज्यादा, जबकि अन्य दलित उप-जातियां जैसे पासी, वाल्मीकि को तो भूल ही जाइए। व्यंग्य यह कि ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ का मंत्र तो ठीक था, लेकिन ‘बहुजन’ में सिर्फ जाटव शामिल थे, बाकी सब ‘अन्यजन’।
एक मेहनती पासी युवा, जो यूपीपीएससी की परीक्षा में टॉप किया, उसे प्रमोशन के लिए सालों इंतजार, जबकि मायावती का करीबी जाटव चपरासी से आईएएस बन गया – कैसे? अरे, ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर! और तो और, मायावती के राज में बुद्धा पार्क, अम्बेडकर विलेज – ये सब जाटव बहुल इलाकों में ही बने, जबकि अन्य दलित गांवों में तो बिजली-पानी का नामो-निशान नहीं। राजनीतिक भाई-भतीजावाद की यह कला इतनी बारीक कि मायावती के रिश्तेदारों को तो करोड़ों के टेंडर मिले, लेकिन आम दलित किसान को बीज के लिए कर्जा भी नहीं।
बाकी जातियां? यादवों को तो ‘सामंत’ कहकर कोसा, लेकिन खुद के ‘सामंत’ जाटव ठेकेदारों को तो स्वर्णिम अवसर दिए। आम जनता का क्या? वो तो ‘मायावी’ सपनों में खोई रही, जबकि सत्ता का असली मायाजाल सिर्फ एक जाति के इर्द-गिर्द घूमता रहा। सोचिए, अगर लोकतंत्र में समानता होनी थी, तो क्यों हर सत्ता एक जाति का ‘प्राइवेट लिमिटेड’ बन जाती है? यह धोखा तो सिर्फ मेरिट वालों के साथ नहीं, पूरे समाज के साथ है – जहां मेहनत की बजाय ‘जाति कार्ड’ चलता है।
और अब आते हैं वर्तमान के ‘बाबा जी’ पर – योगी आदित्यनाथ, जिनकी सरकार 2017 से यूपी पर राज कर रही है। ठाकुर बाबा, जो गोरखपुर से सांसद बने, फिर मुख्यमंत्री – और सत्ता का पहला फायदा? अंदाजा लगाइए। ठाकुर समुदाय को। पुलिस विभाग में ठाकुरों का दबदबा इतना कि लगे जैसे यूपी पुलिस ‘ठाकुर ब्रिगेड’ है। निष्पक्ष आंकड़ों से: योगी राज में ऊपरी जातियों, खासकर ठाकुरों का सरकारी नौकरियों में हिस्सा 15% से कूदकर 25% हो गया, जबकि ब्राह्मणों और अन्य पिछड़ों को तो ‘बुलडोजर’ की धमकी तक मिली।
व्यंग्य की हद यह कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा तो ठीक, लेकिन ‘सबका’ में ठाकुर पहले, बाकी लाइन में। एक मेहनती ब्राह्मण आईएएस, जो योगी के नीतियों का समर्थन करता था, उसे प्रमोशन के लिए इंतजार, जबकि बाबा जी का करीबी ठाकुर गुंडा तो एसएसपी बन गया। और दलित-यादव? उन्हें तो ‘माफिया’ बोलकर साफ किया, लेकिन अपने ठाकुर ‘माफिया’ उद्योगपतियों को तो जमीनें और सब्सिडी की बौछार।
राजनीतिक जातिवाद का यह नया रूप इतना चालाक कि बाबा जी योगी तो ‘सन्यासी’ बनकर जनता को भ्रमित करते हैं, लेकिन पीछे से ठाकुर भाइयों को ‘राजयोग’ सुलभ करा देते हैं। आम जनता? वो तो ‘जय श्री राम’ चिल्लाती रही, जबकि सत्ता का असली रामराज ठाकुर राज था। सोचिए, अगर हर सरकार अपनी जाति को प्राथमिकता देगी, तो लोकतंत्र क्या बचेगा? सिर्फ एक ‘जाति लॉटरी’, जहां जीतने वाले पहले से तय हैं।
यह तो सिर्फ टिप ऑफ द आइसबर्ग है। राजनीति में जातिवाद का यह खेल सदियों पुराना है, लेकिन आधुनिक भारत में यह ‘भाई-भतीजावाद’ के रूप में विकसित हो गया। कल्पना कीजिए, एक ऐसा सिस्टम जहां वोट तो सब देते हैं, लेकिन कुर्सी पर चढ़ने वाले सिर्फ वही जो ‘जाति वीआईपी’ पास रखते हैं। मुलायम के दौर में यादव किसानों को तो मुफ्त बिजली, लेकिन ब्राह्मण किसानों को? ‘पेड़ काटो, लकड़ी बेचो’।
मायावती के समय जाटव महिलाओं को आरक्षण का लाभ, लेकिन पासी महिलाओं को? ‘घूंघट में रहो, चुप रहो’। और योगी राज में ठाकुर युवाओं को स्पोर्ट्स कोटा, लेकिन यादव युवाओं को? ‘जेल का कोटा’। व्यंग्य यह कि ये सब ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर हो रहा है। एक मेहनती अन्य पिछड़ा वर्ग का लड़का, जो इंजीनियरिंग में टॉप किया, उसे नौकरी के लिए भटकना पड़ता है, जबकि राजनीतिक नेता का बेटा, जो ‘पढ़ाई’ की बजाय ‘पार्टी वर्क’ करता था, सीधा मंत्रिमंडल में।
यह धोखा कैसे होता है? सरल: सत्ता में आने पर पहले अपने जाति के ‘लॉयलिस्ट’ को पोस्टिंग, फिर उनके जरिए टेंडर, फिर उन टेंडरों से कलेक्शन, और अंत में अगले चुनाव के लिए फंडा। आम जनता को? बस भाषण और वादे। निष्पक्ष कहें तो यह सिस्टम पूरे देश में फैला है – बिहार में लालू के राज में यादव, नीतीश के दौर में कुर्मी; महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पाटीदार। हर जगह यही: जाति का ‘प्राइवेट क्लब’, जहां एंट्री फ्री लेकिन एग्जिट इम्पॉसिबल। और मेरिट वाले? वे तो ‘ट्रेजिक हीरोज’ – मेहनत करें, लेकिन फायदा न लें, क्योंकि ‘जाति लॉयल्टी’ से बड़ा कोई धर्म नहीं।

लेकिन रुकिए, यह व्यंग्य सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि एक आईना है। सोचिए, अगर आम जनता जाग जाए, तो क्या होगा? वोट तो देते हो निष्पक्ष, लेकिन नेता जाति के चश्मे से देखते हैं। मुलायम-अखिलेश ने तो ‘साइकिल’ पर विकास का सपना दिखाया, लेकिन पहिए तो यादव गांवों में ही घूमे। मायावती ने ‘हाथी’ पर बहुजन का बोझ लादा, लेकिन हाथी तो जाटव जंगल में ही चरता रहा। बाबा जी ने ‘बुलडोजर’ से माफिया साफ किया, लेकिन ठाकुर माफिया को तो ‘क्लीन चिट’।
यह चक्र कैसे टूटेगा? शायद तब जब हम वोट देते समय जाति न देखें, मेरिट देखें। लेकिन व्यंग्य की बात तो यह कि नेता खुद कहते हैं ‘जाति न देखो’, लेकिन सत्ता मिलते ही ‘जाति फर्स्ट’। एक किस्सा सुनिए: एक बार मुलायम जी से पूछा गया कि क्यों सिर्फ यादवों को फायदा? जवाब: ‘वे मेरे भाई हैं’। अरे भाई, तो बाकी राज्य के लोग क्या, सौतेले? इसी तरह मायावती जी बोलीं, ‘जाटव मेरी मां की जाति’। तो बाकी दलित क्या, पड़ोसी? और योगी जी तो कहते ही नहीं, बस एक्शन में ठाकुरों का ‘राम-राज’ चला देते हैं।
आम जनता का धोखा यही है – वोट दो, चुप रहो, और फायदा देखो दूरबीन से। लेकिन सच्चाई यह कि सत्ता का 90% हिस्सा जाति के 10% लोगों तक सीमित रहता है। आंकड़े झूठ नहीं बोलते: यूपी में 80 विधानसभा सीटें आरक्षित, लेकिन उनमें भी सत्ता का लाभ सिर्फ एक-दो उप-जातियों को। बाकी? ‘वेटिंग लिस्ट’ पर।
अब गहराई में उतरें। राजनीतिक जातिवाद का यह जाल इतना जटिल कि मेहनती लोगों को धोखा देने के लिए ‘पॉलिसी’ तक बना ली जाती हैं। जैसे, मुलायम के समय ‘ओबीसी आरक्षण’ का दुरुपयोग – नाम ओबीसी, लेकिन लाभ यादव। एक यादव किसान को लोन माफ, लेकिन जाट किसान को? ‘ब्याज चुकाओ’। व्यंग्य यह कि आरक्षण तो समानता के लिए था, लेकिन हो गया ‘जाति का प्राइवेट आरक्षण’।
मायावती के दौर में ‘दलित उद्यमिता योजना’ – करोड़ों खर्च, लेकिन लाभ जाटव ठेकेदारों को। एक वाल्मीकि उद्यमी को तो फंड ही न मिला, क्योंकि ‘कनेक्शन’ नहीं। और योगी राज में ‘मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना’ – नाम युवा, लेकिन लाभ ठाकुर युवाओं को। एक यादव लड़के ने अप्लाई किया, रिजेक्ट – वजह? ‘पुलिस वेरिफिकेशन’ में ‘माफिया कनेक्शन’। हाहा, व्यंग्य तो यही है!
ये नेता जनता को बेवकूफ बनाते हैं भाषणों से ‘हम सबके लिए’, लेकिन एक्शन में ‘हमारी जाति के लिए’। और दूसरे जाति वर्ग के साथ धोखा? सबसे बड़ा। एक ब्राह्मण डॉक्टर, जो सरकारी अस्पताल में मेहनत करता है, उसे प्रमोशन नहीं क्योंकि ‘ठाकुर सुपरिंटेंडेंट’ आना है। एक दलित टीचर को ट्रांसफर पूर्वांचल में, क्योंकि ‘जाटव इंस्पेक्टर’ का इलाका। यह सिस्टम मेरिट को कुचलता है, क्योंकि मेरिट तो ‘जाति-न्यूट्रल’ होती है, लेकिन सत्ता ‘जाति-लोडेड’। निष्पक्ष कहें तो यह पूरे लोकतंत्र का कैंसर है – जहां वोटर ‘डेमोक्रेटिक’, लेकिन नेता ‘डेमागॉगिक’।

चलिए, थोड़ा इतिहास घुमाते हैं। स्वतंत्र भारत में जाति राजनीति की जड़ें गहरी हैं। जयप्रकाश नारायण ने ‘टोटल रेवोल्यूशन’ कहा, लेकिन रेवोल्यूशन तो जाति का ही हुआ। इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’, लेकिन गरीबी तो ऊपरी जातियों की नहीं हटी। राजीव गांधी ने ‘कंप्यूटर क्रांति’, लेकिन कंप्यूटर तो कांग्रेस के ‘फैमिली’ को मिले। लेकिन उत्तर प्रदेश तो इसका एपिसेंटर। यहां हर चुनाव जाति का ‘काउंटर’ – यादव vs दलित vs ठाकुर।
व्यंग्य यह कि जनता सोचती है ‘विकास वोट’, लेकिन नेता जानते हैं ‘जाति वोट’। एक सर्वे देखिए— 70% वोटर जाति के आधार पर चुनते हैं। तो नेता क्यों न फायदा उठाएं? मुलायम ने तो ‘मुस्लिम-यादव’ फॉर्मूला बनाया, लेकिन मुस्लिम को? बस वोट, फायदा यादव को। मायावती ने ‘दलित-ब्राह्मण’, लेकिन ब्राह्मण को? सपना, फायदा जाटव को।
योगी ने ‘हिंदुत्व’, लेकिन हिंदुत्व में ठाकुर टॉप। आम जनता का जीवन? गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई – ये तो स्थायी। लेकिन सत्ता का सर्कस चलता रहे। सोचिए, अगर ये नेता अपनी जाति छोड़ दें, तो क्या? शायद सत्ता खो दें। लेकिन व्यंग्य की बात: वे तो कहते हैं ‘जाति भूल जाओ’, खुद तो ‘जाति याद रखो’।
अब बात करते हैं आर्थिक धोखे की। सत्ता में जाति फायदा सिर्फ नौकरियां नहीं, बल्कि पूंजी भी। मुलायम के समय यादव उद्योगपतियों को तो एसईजेड, लेकिन अन्य को? ‘टैक्स चुकाओ’। एक यादव चीनी मिल मालिक बना, क्योंकि ‘पॉलिटिकल सपोर्ट’। मायावती के राज में जाटव रियल एस्टेट टाइकून उभरे, क्योंकि ‘लैंड अलॉटमेंट’ आसान।
योगी के दौर में ठाकुर बिल्डर्स को ‘बुलडोजर-फ्री’ जोन। व्यंग्य यह कि ‘इकोनॉमिक रिफॉर्म्स’ तो सबके लिए, लेकिन ‘रिफॉर्म्स का रिफॉर्म’ जाति के लिए। एक मेहनती अन्य जाति का बिजनेसमैन लोन के लिए भटकता है, जबकि नेता का रिश्तेदार ‘जीरो कॉलेटरल’ पर करोड़ों। यह धोखा दूसरे वर्ग के साथ कैसे? सरल: बाजार में कॉम्पिटिशन बराबर हो, लेकिन ‘पॉलिटिकल एडवांटेज’ से एक जाति आगे। नतीजा? असमानता बढ़ती गई। निष्पक्ष आंकड़ों से: यूपी में टॉप 1% अमीरों में 40% एक-दो जातियों से। बाकी? संघर्ष। आम जनता बेवकूफ बनी रही, क्योंकि मीडिया तो ‘सकारात्मक’ कवरेज देता है।
सांस्कृतिक धोखा भी कम नहीं। सत्ता में जाति संस्कृति को प्रमोट करती है। मुलायम ने ‘यादव फेस्टिवल’, मायावती ने ‘जाटव महोत्सव’, योगी ने ‘ठाकुर मेला’। लेकिन बाकी? ‘फॉरगॉटन’। एक कवि, जो ब्राह्मण है, को अवॉर्ड नहीं क्योंकि ‘जाति बैलेंस’। व्यंग्य: संस्कृति तो ‘यूनिवर्सल’, लेकिन सत्ता में ‘जाति-स्पेसिफिक’। यह मेहनती कलाकारों को कुचलता है।
शिक्षा में भी यही। आरक्षण तो अच्छा, लेकिन दुरुपयोग। मुलायम के समय यादव कॉलेजों में ‘क्वोटा किंग’, मायावती के जाटव। योगी के ठाकुर। एक मेरिट वाला दलित (पासी) एडमिशन मिस, क्योंकि ‘कनेक्शन’ वाला जाटव आ गया। धोखा यही।
स्वास्थ्य में— अस्पतालों में पोस्टिंग जाति पर। ठाकुर डॉक्टर को ‘प्राइम पोस्ट’, बाकी को ‘रिमोट’। व्यंग्य: ‘हेल्थ फॉर ऑल’, लेकिन ‘हेल्थ फॉर कनेक्टेड’।
कानून में— पुलिस जाति लॉयल। मुलायम के यादव एसपी, मायावती के जाटव, योगी के ठाकुर। केस सॉल्व? अगर आरोपी ‘अपनी जाति’ तो ‘क्लोज’।
अंत में, संदेश साफ— राजनीतिक जातिवाद धोखा है। मेहनती लोगों को छला जाता है, दूसरे वर्ग को दबाया जाता है। निष्पक्ष कहें— बदलाव जनता से ही सम्भव है। लेकिन तब तक, हंसते रहिए – क्योंकि रोने का समय तो सत्ता वालों का है। जय हिंद, जय लोकतंत्र – अगर बचा हो तो!


लेखक चित्रगुप्त परिवार से अमित श्रीवास्तव – व्यंग्य की भरमार में।

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