वसंत पंचमी सरस्वती पूजा कब है, निर्धारित दिन-समय, विधि-विधान और ऐतिहासिक महत्व

Amit Srivastav

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वसंत पंचमी सरस्वती पूजा कब है, निर्धारित दिन-समय, विधि-विधान और ऐतिहासिक महत्व

2026 वसंत पंचमी – सनातन धर्म में वसंतोत्सव एक ऐसा पर्व है, जो खिलें प्रकृति के उपवन के साथ कला, संगीत, नृत्य, ज्ञान और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की पूजा अनुष्ठान से शुरू हो सनातन धर्म में पूराने वर्ष से नव वर्ष की तरफ़ ले जाती है। वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती कि पूजा-अर्चना – लेखनी, कलाकृति, संगीत, नृत्य प्रेमी पूरे देश विदेश में धूमधाम से करते हैं। समर्पण और भक्ति भाव से मां सरस्वती की पूजा अनुष्ठान करने वालों का जीवन अंधकारमय नही रहता। मनुष्य जीवन में बुद्धि-विवेक का बहुत बड़ा महत्व है।

उचित शिक्षा मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों तक को बुद्धिमान बनाती है और मां सरस्वती इसकि अधिष्ठात्री देवी हैं। वो एक अलग बात है – खग जाने खगही के भाषा, पशु-पक्षी तो अपनी भाषा जानते ही हैं, मनुष्यों के बीच रहते हुए मनुष्यों कि भी भाषा जानने और समझने लगते हैं। जैसे एक सभ्य परिवार का व्यक्ति असभ्य समाज में जाकर असभ्य भाषाओं को जान लेता है, या असभ्य समाज का कोई सभ्य समाज में आकर सभ्य हो जाता है। इस संसार में मनुष्य को ज्ञानी माना गया है, किन्तु कुछ मामलों में मनुष्य से अधिक ज्ञानी पशु-पक्षी भी देखने को मिल जाते हैं।

उन्हें पूर्वानुमान का ज्ञान भी हो जाता है और अपनी भाषा में हमें बताने का प्रयास भी करते हैं। मनुष्य तन पाकर देवी देवताओं की उपासना अराधना न कर पाना पशुवत जीवन जीने के समान है। देवी सरस्वती की पूजा अर्चना विद्यार्थियों को नियमित रूप से करनी चाहिए। छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा की शुरुआत बसंत पंचमी के दिन कराना शुभ माना जाता है। छोटे बच्चों को विधि-विधान से तैयार कर, मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष बैठाकर, सम्भव हो तो भोजपत्र पर केसर मिश्रित स्याही से मयूर पंख या शाही कांटा जिसे आप सब किरीच की कलम नाम से जानते हैं, से मां सरस्वती का ध्यान कराते लेखनी कि शुरुआत करानी चाहिए।

वसंत पंचमी सरस्वती पूजा कब है, निर्धारित दिन-समय, विधि-विधान और ऐतिहासिक महत्व

वसंत – पंचमी – का – महत्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल माघ मास के, शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंतोत्सव में, ज्ञान और बुद्धि कि देवी मां सरस्वती की सार्वजनिक रूप से उत्सव के रूप में पूजा की जाती है। अग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अक्सर फरवरी महीने में बसंत पंचमी पडती है। इस समय पृथ्वी से कुहासे की चादर हट चुकी रहती है। मौसम खुशनुमा हो जाता है। चारों तरफ़ खेतों में हरियाली दिखाई देती है, सरसों के पीले-पीले फुल खेतों में लहराते हैं, तो वहीं गेहूं की फसलों में दाने बनना शुरू हो जाता है। बसंत पंचमी को नये फसल से नेवान हो जाता है।

पहले समय में बसंत पंचमी तक कुछ गेहूं की फसल तैयार हो जाती थी, जिसको उस दिन पकवान में उपयोग किया जाता था। चहूं ओर प्रकृति खुशियों में सराबोर दिखाई पड़ती है। बसंत पंचमी से रंग-गुलाल एक दूसरे को लगा खुशियां मनाने का समय होता है। बसंत पंचमी के बाद शिवरात्रि साल का अंतिम मास फागुन के अमावस्या तिथि को होली मिलन का त्योहार आता है। होली हिन्दू पंचांग के अनुसार सनातन वर्ष के अन्तिम दिन होता है। वर्ष की विदाई और नये वर्ष में प्रवेश फागुन मास की अमावस्या तिथि को होली उत्सव से होती है। अगले सूर्योदय चैत मास की प्रथमा तिथि सनातन वर्ष का पहला दिन होता है।

वसंत – पंचमी – 2025- कब है – तारीख – और- समय

अग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वसंत पंचमी, जिसे सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है, इस वर्ष 2 फरवरी 2025 (रविवार) से पंचमी मुहूर्त हो रहा है। पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पंचमी तिथि 2 फरवरी को सुबह 9:14 बजे से शुरू होकर 3 फरवरी को सुबह 6:52 बजे तक रहेगी। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7:09 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक है, यानी कुल 5 घंटे 26 मिनट का समय उपलब्ध है।


हालांकि, कुछ पंचांगों के अनुसार, पंचमी तिथि 2 फरवरी को दोपहर 12:45 बजे से 3 फरवरी को सुबह 11:48 बजे तक है, जिसके अनुसार 3 फरवरी को सरस्वती पूजा करना शास्त्र सम्मत माना गया है।


अतः, विभिन्न पंचांगों के मतभेद के कारण, कुछ स्थानों पर 2 फरवरी को, जबकि अन्य स्थानों पर 3 फरवरी को सरस्वती पूजा मनाई जाएगी। आप अपने क्षेत्र की परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार पूजा का दिन चुन सकते हैं। इस अवधि में सार्वजनिक रूप से रखी गई मुर्ति व विद्या के मंदिरों विद्यालयों में देवी सरस्वती की पूजा अनुष्ठान किया जायेगा।

पूजा-पाठ – का – विधि-विधान

बसंत पंचमी सरस्वती पूजा धार्मिक एवं वैज्ञानिक रूप से बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। वैज्ञानिक मान्यता अनुसार बसंत पंचमी से ठंड कम होना शुरू हो जाता है। धार्मिक मान्यता है इस दिन से बसंत ऋतु कि शुरुआत होती है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा में पीले या सफेद रंग का वस्त्र धारण करना शुभ होता है। बसंत पंचमी को सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पीले या सफेद वस्त्र धारण करें और देवी सरस्वती पूजा का संकल्प लें। माँ सरस्वती का चित्र या मुर्ति पूजा स्थल पर स्थापित करें। माँ सरस्वती को गंगा जल से स्नान कराएं या अर्पित करें।

फिर पीले वस्त्र धारण करायें। गेंदे के फूल का माला पहनाकर पूजा सामग्री में पीले रंग की मिठाई, पीला गेंदा, कनैर, सूर्यमुखी आदि फूल, सफेद चंदन, पीले रंग की रोड़ी, पीला गुलाल, अक्षत, दीप, धूप, गंध, दूब, अब्रक, केशर मिश्रित स्याही, कलम, भोज पत्र या सफेद कागज, मधू, गुड़, घी, दूध, दही, आदि अर्पित कर अपनी पठन-पाठन सामग्री पर कुछ चढ़ावा चढ़ाये, सरस्वती वंदना एवं मंत्र से पूजा-अर्चना करें।

पूजा में सरस्वती कवच का पाठ उत्तम फलदायी होता है। हवन कुंड बनाकर हवन सामग्री से हवन करें। हवन में सभी लोग भाग लें और “ओम श्री सरस्वत्यै नमः स्वाहा” मंत्र से हवन करें। फिर खड़े होकर मां सरस्वती की आरती करें। प्रणाम कर प्रसाद ग्रहण करें।

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वसंत – पंचमी – का – ऐतिहासिक – महत्व

वसंत पंचमी का दिन सनातन धर्मियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है लेकिन इतिहास के पन्नों से हमारे ऐतिहासिक इतिहास को दूर किया गया है। अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान का शौर्य व बलिदान का दिन बसंत पंचमी है। इसी दिन पृथ्वीराज चौहान अपने शब्द भेदी बाण से सुल्तान गोरी को एक ही बाण से मृत्युदंड दे दिए थे। ऐसे बीर सपूत पृथ्वीराज चौहान के मूल गाथा को इतिहास के पन्नों में प्रचेता के वंशजों से उत्पन्न या दोगलो ने नहीं रखा। वसंत पंचमी के दिन पृथ्वीराज चौहान को शौर्य एवं बलिदान दिवस के रूप में याद करना चाहिए।

पृथ्वीराज चौहान विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित कर अपनी उदारता दिखाते जीवन दान दे छोड़ दिये। 17 वीं बार जब पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी से पराजित हुए, तब मुहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना अपने साथ अफगानिस्तान अपने भाई सुल्तान गयासुद्दीन गौरी के सामने पेश किया। पृथ्वीराज चौहान कि महा गाथा को जानने के लिये अगले लेख में। Click on the link ब्लाग पोस्ट पढ़ने के लिए ब्लू लाइन पर क्लिक किजिये।

  • चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
  • ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।
HomeOctober 27, 2022Amit Srivastav
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