तुलसी कौन थी? पूर्व जन्म मे तुलसी एक लड़की थी, जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में वृंदा का जन्म हुआ था। बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थीं, बड़े ही प्रेम से भगवान विष्णु की भक्ति, सेवा, पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में शिव के क्रोध से उत्पन्न दैत्यराज दानव राज जलंधर से हो गया।
जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। जब शिव क्रोध से उत्पन्न पसीना समुद्र में गीरा तो जलंधर की उत्पत्ति हुई जो शिव स्वरूप उनके समान बलवान था। जलंधर का विवाह वृंदा से हो गया। वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। देवासुर संग्राम तब बराबर ही चल रहा था। दैत्य माता दिति अपनी बहन अदिति के पुत्रों देवताओं से स्वर्ग लोक छिन अपने दैत्य पुत्रों को दिलाना चाहती थी। देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगा तो वृंदा ने कहा।
स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं आप जब तक युद्ध में रहेगे मैं पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी, और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चला गया, और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, वृंदा की व्रत के प्रभाव से सभी देवी-देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवी देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि वृंदा मेरी परम भक्त है मै उसके साथ छल नहीं कर सकता।
फिर देवता बोले दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान विष्णु ने जलंधर का ही रूप ले वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए, जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में जगत-जननी पार्वती व विघ्नहर्ता गणेश जी की सहायता से शिव जी ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया, जलंधर का सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े हैं ये कौन है?
वृंदा ने पूँछा – आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान विष्णु अपने मूल स्वरूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके, वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान विष्णु तुंरत पत्थर के हो गये। सभी देवताओं मे हाहाकार मच गया। लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्रार्थना करने लगी तब वृंदा जी ने भगवान विष्णु को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी।

भगवान विष्णु के वरदान स्वरूप वृंदा जी की राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा आज से इनका नाम तुलसी है, पृथ्वी लोक में निरोग जीवन प्रदान करने में मनुष्यों का सहयोग करेंगी और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और मैं बिना तुलसी जी का भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे।
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तुलसी विवाह कब है 2024 :
तुलसी जी का विष्णु स्वरूप शालिग्राम पत्थर के साथ वर्ष 2024 में 13 नवम्बर तुलसी जी का विवाह है। शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है देव-उठावनी एकादशी के दिन, इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। 12 नवम्बर 2024 को सायं 04:04 मिनट से द्वादश तिथि प्रारंभ हो रही है। देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु अपनी योग निद्रा से जाग जाते हैं और विवाह मुहूर्त शुरू हो जाता है। तुलसी विवाह के बाद सामान्य विवाह का मुहूर्त होता है।
तुलसी का पौधा किसी को देना चाहिए या नहीं:
तुलसी का पौधा वैसे व्यक्ति को उपहार स्वरूप दिया जाना चाहिए जो पवित्र मन में तुलसी जी की सेवा कर सके दान स्वरूप दिए गए तुलसी के पौधे को लेने वाला व्यक्ति सेवा करे तो तुलसी पौधे को उपहार में देने वाले को पुण्य प्राप्त होती है।
तुलसी के गुण:
तुलसी का पत्ता तना जड़ सम्पूर्ण रुप से अमृत के समान है, आयुर्वेद में तुलसी का बहुत बड़ा महत्व है। तुलसी का पौधा भगवान विष्णु जी ने पृथ्वी लोक पर निरोग जीवन प्रदान करने की उद्देश्य से दिया है। बहुत सारी गंभीर बीमारियों का इलाज़ है तुलसी। तुलसी में गुण ही गुण है।
तुलसी का पत्ता कब न तोड़े, कब तोड़ना चाहिए :
तुलसी का पत्ता संध्या समय व रविवार मंगलवार के दिन और कार्तिक मास में कभी भी नहीं तोड़ना चाहिए न ही पौधे को उखाड़ना निकालना चाहिए। रविवार मंगलवार का दिन छोड़कर और संध्या होने से पहले दिन के समय में पत्ता तोड़ लेना चाहिए। पौधा निकालने में भी दिन और संध्या समय का ध्यान रखना चाहिए। पत्ता जब भी तोड़े तुलसी जी को प्रणाम कर अपनी निदान समस्या को प्रकट कर के ही तोड़ना चाहिए।
इस वृंदा बनी तुलसी अलौकिक ऐतिहासिक शिक्षा को अधिक से अधिक लोगों में अवश्य शेयर करे और अपनों को सुनाए आप को पुण्य अवश्य मिलेगा। शुभ मंगलकामनाओ के साथ भगवान चित्रगुप्त वंशज अमित श्रीवास्तव।

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