शाहजहांपुर/तिलहर। नगर पालिका तिलहर इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे गंभीर आरोपों के चलते विवादों के घेरे में आ गई है। फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर कुछ कमेंट्स तेजी से वायरल हो रहे हैं जिनमें नगर पालिका में करोड़ों के घोटालों, नियमों की अनदेखी और मनमानी टेंडर प्रक्रिया का दावा किया गया है।
इन आरोपों की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वाटर कूलर जैसी सामान्य वस्तु की कीमत ₹1 लाख से सीधी ₹3.27 लाख तक दर्शाई गई है। नगर को शुद्ध व ठंडा पानी उपलब्ध कराने की मंशा जनहित में दिखाई जरूर गई, लेकिन सोशल मीडिया पर उठे सवाल बता रहे हैं कि कहीं न कहीं इस पूरी प्रक्रिया में आर्थिक भ्रष्टाचार की गूंज है। यदि आरोप बेबुनियाद होते तो इतने बड़े स्तर पर इन्हें जनता का समर्थन और चर्चा न मिलती।

नगर पालिका तिलहर में भ्रष्टाचार की बाढ़
नगर पालिका की कार्यशैली पर यह पहला प्रश्न नहीं है। कुछ माह पूर्व भी पालिका के सभासदों ने बैठक का बहिष्कार करते हुए प्रशासन पर विभिन्न भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। यह असंतोष अब फिर से सतह पर उभरता दिखाई दे रहा है।
इतना ही नहीं, ‘बंधन योजना’ के अंतर्गत गुर्दा आश्रम के सौंदर्यीकरण में भी महंत दर्शन दास द्वारा यह आरोप लगाया गया है कि लाखों रुपये के बजट के बावजूद वहां पुरानी ईंटों का उपयोग किया गया, जिससे न केवल गुणवत्ता से समझौता हुआ बल्कि धार्मिक स्थल की गरिमा को भी ठेस पहुंची। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि योजनागत आर्थिक कदाचार का संकेत है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
दीनदयाल योजना के अंतर्गत भी बड़ा आरोप यह है कि एक ठेकेदार ने फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र के आधार पर ठेका प्राप्त किया, और आश्चर्यजनक रूप से पालिका प्रशासन ने इस फर्जी प्रमाणपत्र पर अपनी मोहर भी लगा दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल ठेकेदार ही नहीं, बल्कि पालिका के भीतर भी ऐसे अधिकारी मौजूद हैं जो नियमों को ताक पर रखकर अपने हित साध रहे हैं। लंबे समय से यह चर्चा रही है कि कई योग्य फर्मों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर कर चहेती संस्थाओं को मनमाने ढंग से काम सौंपा जाता है, जिससे न केवल गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि सरकारी खजाने को भी भारी नुकसान होता है।
सबसे बड़ा और सनसनीखेज आरोप नगर पालिका में हाल ही में हुए 27 टेंडरों को ‘मैनेज’ किए जाने को लेकर है। आरोप है कि इनमें से एक टेंडर तो ऐसा भी था जिसमें प्रतिभूति राशि ही जमा नहीं कराई गई, फिर भी ठेका पारित हो गया। विशेषकर बॉम्बे गिफ्ट हाउस से उमटकीज वाली गली में बने शौचालय व दुकानों के निर्माण में जिस संस्था को काम सौंपा गया, उसने नियमानुसार प्रतिभूति जमा नहीं की, लेकिन जब यह बात सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो कागज़ी खानापूरी कर दी गई। ऐसे मामलों से यह सिद्ध होता है कि नियमों का पालन केवल दिखावे के लिए किया जाता है, असल में अंदर ही अंदर सब कुछ पहले से तय होता है।
पालिका की उदासीनता का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि नगर में वर्षों से कई दुकानों की नीलामी नहीं कराई गई, जिससे नगर पालिका के राजस्व को सीधा नुकसान हो रहा है। जहां एक ओर पालिका विकास के लिए बजट की कमी का रोना रोती है, वहीं खुद के राजस्व स्रोतों को जानबूझकर नकारा जा रहा है। यह न तो नीति है, न ही योजना, बल्कि सीधे तौर पर जनता के धन के दुरुपयोग और प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है।
इन सब आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार कोई ठोस जांच होगी? या फिर हमेशा की तरह कुछ दिनों तक चर्चा के बाद इस पूरे प्रकरण को दबा दिया जाएगा? स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले भी जब-जब कोई भ्रष्टाचार उजागर हुआ, तो आरोप लगाने वालों को ही ‘मैनेज’ कर दिया गया। इसी कारण जनता में यह गहरी भावना बन चुकी है कि पालिका की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं, बल्कि ‘प्रबंधन’ ही नीति बन चुका है।

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अब आवश्यकता है कि शासन स्तर से इस पूरे मामले में स्वतंत्र जांच कराई जाए। आरोपों की गहराई और सामाजिक आक्रोश को देखते हुए यह महज़ सोशल मीडिया की सनक नहीं कही जा सकती। यदि जिम्मेदार अधिकारियों, ठेकेदारों और कर्मियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो जनता का विश्वास व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा। जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि “पालिका भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है”, और यदि अब भी जिम्मेदार नहीं चेते तो तिलहर का विकास केवल कागज़ों में सिमट कर रह जाएगा।
शाहजहांपुर से अरविंद गुप्ता कि रिपोर्ट
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