वर्तमान में, भारत में स्वास्थ्य शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निजीकरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सरकार द्वारा इन क्षेत्रों को निजी हाथों में सौंपने की नीति ने कई समस्याएँ उत्पन्न की हैं। मैदानी क्षेत्रों में निजी स्कूल और अस्पताल अक्सर मुनाफे के केंद्र बन गए हैं, जहाँ गुणवत्तापूर्ण सेवा के बजाय आर्थिक शोषण को प्राथमिकता दी जाती है। कई निजी अस्पताल और स्कूल कथित तौर पर प्रभावशाली लोगों या उनके रिश्तेदारों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं, जो अपने व्यवसायिक हितों को बनाए रखने के लिए राजनीतिक समर्थन का सहारा लेते हैं।
हाल ही में, मेरे एक परिचित के अनुभव ने इस समस्या को और स्पष्ट किया। वे हमेशा से निजीकरण के समर्थक रहे, लेकिन जब वे बीमार पड़े, तो एक निजी अस्पताल ने उनसे भारी मात्रा में धन वसूला और अंत में उन्हें सरकारी संस्थान, लखनऊ के पीजीआई, में रेफर कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि निजी अस्पताल कई बार गंभीर मामलों में अपर्याप्त साबित होते हैं, और सरकारी चिकित्सा संस्थानों पर निर्भरता बनी रहती है।
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यदि सरकार सरकारी अस्पतालों और स्कूलों को मजबूत करने पर ध्यान नहीं देगी, तो भविष्य में आम जनता को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएँ प्राप्त करना और भी कठिन हो जाएगा। पिछले एक दशक में, कुछ मीडिया समूहों ने निजीकरण के पक्ष में माहौल बनाया है, जिसके कारण लोग सार्वजनिक सेवाओं के महत्व को उठाने से हिचकने लगे हैं।
निजीकरण की अंधी दौड़ में सामाजिक व्यवस्था को बाजार के हवाले करना खतरनाक हो सकता है। हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी सामानों के बहिष्कार की अपील की, जो स्वदेशी के विचार को दर्शाता है। लेकिन स्वदेशी का असली अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं, बल्कि देश की सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करना भी है। पिछले 11 वर्षों में निजीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने इस दिशा में कई सवाल खड़े किए हैं।
अब भी समय है कि सरकार पूँजीवाद के साथ-साथ सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता दे। भारत जैसे देश में समाजवादी ढांचा आवश्यक है, जो संविधान के तहत सरकार की जिम्मेदारी भी है। गांधी जी के स्वदेशी और सर्वोदय के सिद्धांतों को सही मायने में लागू करने की आवश्यकता है। केवल चुनावी नारों या प्रतीकों के सहारे नहीं, बल्कि वास्तविक नीतियों के माध्यम से देश की आंतरिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा। amitsrivastav.in पर मिलती है निस्पक्ष सुस्पष्ट हर तरह की जानकारी।

विचार अभिषेक कांत पांडेय
लेखक और शिक्षक

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